पुनर्जन्मवाद - स्वामी अभेदानन्द Punarjanamvad - Hindi book by - Swami Abhedanand
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पुनर्जन्मवाद

स्वामी अभेदानन्द

प्रकाशक : श्रीरामकृष्ण वेदान्त मठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5900
आईएसबीएन :81-88446-29-7

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प्रस्तुत है पुस्तक पुनर्जन्मवाद...

Punarjanmvad

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रकाशक का वक्तव्य

यह पुस्तक पुनर्जन्मवाद स्वामी अभेदानन्दजी महाराज की अत्यधिक प्रसिद्ध एवं प्रचलित अंग्रेजी पुस्तक ‘Reincarnation’ का हिन्दी अनुवाद है। अनुवादक हैं स्वामी संशुद्धानन्द जी, जिन्होंने सुन्दर, सरल भाषा में विषय एवं भाव कायम रखते हुए अनुवाद किया है। हम आशा करते हैं कि विदग्ध हिन्दीभाषी पाठक वेदान्त दर्शन पर आधारित इस पुस्तक को जीवन निर्माण का पथ मानेंगे तथा इसे समादृत करेंगे। भारतीय हिन्दू दर्शन के किसी भी अन्य दर्शन में जीवात्मा के पूर्ण विकास की प्रक्रिया को इतने वैज्ञानिक एवं युक्तिपूर्ण ढंग से अभी तक वर्णित नहीं किया गया है। स्वामी अभेदानन्द जी महाराज ने अन्य दर्शनों से तथा विचारकों से तुलनात्मक रूप से पुनर्जन्मवाद की श्रेष्ठता सिद्ध की है जिसके द्वारा मानव जीवन के वैचित्र्यों, विषमताओं एवं भिन्नताओं का संतोषजनक रूप से विश्लेषण किया जा सकता है। हिन्दी के प्रेमी पाठक इस पुस्तक के अध्ययन से अवश्य ही प्रेरणा प्राप्त कर उन्नत मार्ग की ओर अग्रसर होने का सुअवसर पायेंगे।

रामकृष्ण वेदान्त मठ

भूमिका

(एक)

इस पुस्तक में पुनर्जन्मवाद, लोकान्तर गमन, पुनरुज्जीवन, विकास एवं आनुवंशिकता पर विश्लेषणात्मक व्याख्यान संग्रहित हैं। महान रहस्यवादी दार्शनिक संत स्वामी अभेदानन्दजी ने विभिन्न आलोचनात्मक समस्याओं को उठाया है तथा उनका संतोषजनक, विवेकपूर्ण एवं वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत किया है। उनका विश्लेषण करने का ढंग अत्यधिक आकर्षक एवं तर्कसंगत तथा भाषा प्रांजल है। उनमें अन्तर्निहित एवं गुम्फित विचार बहुत ही गंभीर और अन्तर्मन को छूने वाले हैं। उन्होंने अपने समस्त व्याख्यानों में वेदान्त के अद्वैत दृष्टिकोण एवं महान भारतीय तत्वबोध को अपनाया है। वे कहते हैं कि जगत के प्रत्यक्ष पदार्थ कारण एवं कार्य के शाश्वत नियम से बंधे हुए हैं। कार्य दृश्यमान एवं बोधगम्य है जब कि कारण अदृश्यमान एवं अबोधगम्य है। प्रत्येक स्थल एक सूक्ष्म कारण का फल है। इस विराट बहुआयामी जगत के पीछे कुछ है और इसकी सृष्टि शून्य से नहीं हुई है। स्वामी जी ने सांख्य, मीमांसा एवं वेदान्त के ‘सत्कार्यवाद’ को स्वीकार किया है। वे मिलन भूमि या आधार को, जो जगत की जाग्रत छायाओं का कारण है, स्वीकार करते हैं तथा कहते हैं कि वह अधिष्ठान ब्रह्म है जो पूर्ण ज्ञान एवं पूर्णानन्द है।

स्वामी अभेदानन्द कहते हैं कि सूक्ष्म एवं सुप्त संस्कार या छाप ही मानव के चरित्र एवं भाग्य के निर्माता एवं नियामक हैं। मन का अवचेतन स्तर इन शक्तिशाली संस्कारों की संग्रहशाला है, मानव इन संस्कारों के हाथ में एक यंत्र है किन्तु वह इन संस्कारों पर प्रतिसंस्कारों द्वारा नियंत्रण कर सकता है जिस प्रकार आदतों या स्वभाव को प्रति स्वभाव द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। मानव अपने भविष्य का निर्माण अपने वर्तमान के कार्यों के फलस्वरूप करता है और इस प्रक्रिया में जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। हिन्दू पुनर्जन्मवाद में विश्वास करते हैं। वे जानते हैं कि आत्मा मृत्युरहित एवं अविनाशी है; यह अपनी मुक्ति के उपाय का अवलम्बन करने हेतु एवं पूर्वजन्मार्जित फलों का इस संसार में भोग करने के लिये वस्त्र के समान नया शरीर धारण करती है। जीवात्मा क्रमिक विकास के विभिन्न स्तरों से विचरते हुए अन्त में उच्चतम लक्ष्य पर पहुंच कर पूर्णता प्राप्त करती है।

स्वामीजी के ये व्याख्यान उनके प्रकांड ज्ञान एवं अध्ययन की गहराई से प्रदीप्त हैं। विशेष रूप से देहान्तरवाद पर उनका अंतिम व्याख्यान अद्वितीय एवं विशेष रूप से ज्ञानोज्ज्वल है। इस व्याख्यान में स्वामीजी ने दृढ़ता से अपने मौलिक विचारों को तर्कसंगत तथ्यों की कठोर भावभूमि पर प्रस्तुत किया है। वे आधुनिक विज्ञान एवं उसकी सत्य-संधान की पद्धतियों को स्वीकार करते हैं किन्तु उसके रूढ़ एवं मौलिकवादी सिद्धांतों एवं नियमों को पूर्णत: अस्वीकार करते हैं तथा आधुनिक वैज्ञानिकों, नास्तिवादियों एवं प्रत्यक्षवादियों के उस सिद्धान्त से सहमत नहीं जो आनुवंशिकता को मानते हैं तथा इसके द्वारा सारी बातों की व्याख्या करते हैं। वे क्रिश्चियन, यहूदी, मुसलिम एवं पारसियों के देहान्तर के विचित्र दृष्टिकोण का खण्डन करते हैं। देहान्तर को वे एवं अनेक विद्वान जीवात्मा का अन्य शरीर में स्थानान्तरण मानते हैं। पाइथागोरस, प्लेटो तथा उसके अनुयायियों में भी यह विश्वास पाया जाता है। प्लेटो ने पौराणिक भाषा में अपने ग्रन्थ फोयड्रस (Phoedrus) में दिखाया है कि मानव जीवात्माएं किस प्रकार मृतक शरीर से निष्क्रमण कर नये अनुभव प्राप्त करने के लिये नया शरीर ग्रहण कर लेती हैं। पुन: प्लेटोनिक देहान्तरवाद का विचार मृत्यु के पश्चात् बारंबार जीवन को स्वीकार करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार जीवात्माएं अपने सत्कर्मों एवं दुष्कर्मों के स्वाभाविक परिणामों से प्रभावित नहीं हैं। प्लेटो स्वयं विश्वास करते थे कि जीवात्माएं प्राय: निम्न पशु शरीरों का चयन करती हैं।

किन्तु हिन्दू पुनर्जन्मवाद का सिद्धान्त इससे भिन्न है। बौद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी हिन्दू सिद्धान्त से भिन्न है, क्योंकि बौद्धगण भी जीवात्मा-सत्ता की निरंतरता में विश्वास नहीं करते, जबकि हिन्दू विश्वास करते हैं कि जीवात्मा अविनश्वर है तथा शरीर नश्वर है। स्वामी अभेदानन्द हिन्दू अथवा वेदान्तिक पुनर्जन्मवाद तथा प्लेटो के देहान्तवाद में अंतर दिखाते हैं। वे कहते हैं कि हिन्दू अथवा वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार आत्मा अथवा जीवन का बीजाणु निम्न स्तरों से होते हुए अंत में उच्चतर मानव स्तर पर पहुंचता है तथा इस उच्चतर स्तर पर पहुँच कर वह पुन: निम्नवर्ती पशु शरीरों में नहीं जाता। प्लेटो का सिद्धान्त इसके विपरीत है क्योंकि यह शिक्षा देता है मानव-जीवात्मा अन्य पशु शरीरों में भी स्थानान्तरण करती है। यह सत्य है, स्वामी अभेदानन्द कहते हैं कि यद्यपि ‘‘पुराणों में ऐसे दृष्टान्त हैं जिनसे लगता है कि मानव-जीवात्मा पशु स्वभाव के निम्न स्तर पर उतर आती है, किन्तु इसका अर्थ आत्मा का आवश्यक रूप से पशु शरीर धारण करना नहीं है, बल्कि यह संभव है कि मनुष्य शरीर में ही वे पशुवत जीवन व्यतीत करेंगे, जैसा कि हम मनुष्यों में भी बिल्ली स्वभाव, कुत्ता स्वभाव अथवा सर्प स्वभाव का व्यक्ति पाते हैं और वे प्राय: इन पशुओं से भी अधिक निर्दयी होते हैं। शरीर के स्तर पर वे मानव शरीर ही धारण किये रहते हैं और पशु स्वभाव में अपने कर्म का फल भोगते रहते हैं।’’ स्वामी विवेकानन्द अवश्य ही प्राचीन पौराणिक मतों का पोषण करते थे, किन्तु स्वामी अभेदानन्द ने बहुत विवेकसम्मत, वैज्ञानिक तथा अत्यधिक वास्तविक तात्पर्य तथा दृष्टिकोण ग्रहण किया है।

यहीं पर स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी अभेदानन्द के दृष्टिकोणों में अंतर स्पष्ट है। मिस्टर टायलर, प्रोफेसर सेथ प्रिंगले-पेटसन, डाक्टर राधाकृष्णन एवं अन्यान्य ने भी अभेदानन्द के दृष्टकोण को अपनाया है। डाक्टर राधाकृष्णन अपनी पुस्तक Idealist View of Life (1937-पृ.292) में स्वामी जी के समान ही कहते हैं ‘‘किसी मनुष्य के बर्बर स्तर पर उतर जाना सम्भव है किन्तु तब भी वह मनुष्य ही है।....सम्भावना यही है कि मानव का पशुजीवन में जन्म एक रूपक ही हो जो पशु प्रवृत्तियों के साथ मानव जन्म लेने को दिखाता है।’’ स्वामी अभेदानन्द एक दृढ़ एवं संतुलित तर्क अपने इस विचार की पुष्टि में देते हैं कि हम ‘‘पहले ही क्रम विकास की प्रक्रिया में निम्न पशु शरीरों में होकर आये हैं। अब जब हम उनका अतिक्रमण कर चुके हैं, तो पुन: उनमें वापस क्यों जायेंगे ?’’ जो भी हो स्वामी अभेदानन्द के मत में जीवात्मा का पुनर्जन्म पार्थिव जीवन का अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करने की प्रक्रिया है; यह उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है; यह मानव के ध्येय परम चेतना की प्राप्ति हेतु, निरन्तर अग्रसर होते जाना है।


(दो)


स्वामी अभेदानन्दजी ने पश्चिम के विद्वान श्रोताओं के समक्ष पुनर्जन्म पर अनेक बार व्याख्यान दिये। ब्रह्मवादिन पत्रिका (VOL.III, अप्रैल 1898 अंक 14 पृ. 567) में उल्लिखित है : ‘‘कुछ सर्वोत्तम व्याख्यान और उदाहरण के लिए ‘पुनर्जन्म’ तीन बार दिये गये तथा चौथी बार के लिये अनुरोध किया गया।’’ स्वामी जी का पुनर्जन्म पर प्रथम व्याख्यान 13 फरवरी, 1898 ई. को न्यूयार्क में दिया गया था : जैसा कि हम उनकी Leaves from MY Diary में पाते हैं। 13 फरवरी को तीन बजे पुनर्जन्म विषय पर (अनुरोध करने पर पुन: दिया गया)।’’ उसी विषय पर द्वितीय व्याख्यान 13 मार्च, 1898 शनिवार को 3 बजे दिया गया। व्याख्यान का विषय था विकासवाद एवं पुनर्जन्म। स्वामी जी अपनी विचार Leaves from MY Diary में इस तरह वर्णन करते हैं ‘‘13 मार्च, रविवार को 3 बजे अपराह्न में मैंने लगभग 200 श्रोताओं के सामने विकासवाद एवं पुनर्जन्म पर व्याख्यान दिया (जो बाद में प्रकाशित हुआ)। सभागार में उपस्थित सभी व्यक्तियों के द्वारा व्याख्यान की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।’’



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