सरल राजयोग - स्वामी विवेकानन्द Saral Rajyog - Hindi book by - Swami Vivekanand
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सरल राजयोग

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :30
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5935
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक सरल राजयोग...

Saral Rajayog

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वक्तव्य

(प्रथम संस्करण)

अमेरिका में श्रीमती सारा सी. बुल के निवास-स्थान पर जब श्री स्वामी विवेकानन्दजी अपने कुछ शिष्यों सहित ठहरे हुए थे उस समय उन्होंने योग साधन पर कुछ छोटे भाषण दिए थे जिन्हें श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था। उसके बाद सन् 1913 में हमारे अमेरिका निवासी मित्रों ने इन भाषणों को अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के निमित्त एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। प्रस्तुत पुस्तक उसी अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद है। इसमें स्वामीजी ने संक्षेप रूप में राजयोग का सार दिया है। हमारे जीवन-गठन एवं चरित्र-निर्माण के लिए यह पुस्तक बड़ी ही सुन्दर एवं उपयोगी है।

यह अनुवाद श्री पृथ्वीनाथ शास्त्री, प्रयाग, ने करके दिया है। उनका यह अनुवाद भाषा तथा भाव दोनों की ही दृष्टि से सच्चा रहा है। उनके इस बहुमूल्य कार्य के लिए हम उनके परम कृतज्ञ हैं।
डॉ. पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम.एस-सी., प्रोफेसर, कॉलेज ऑफ साइन्स, नागपुर को भी हम हार्दिक धन्यवाद देते हैं जिन्होंने इस पुस्तक के प्रूफ-संशोधन में हमें बड़ी सहायता दी है।
हमें विश्वास है कि स्वामीजी की इस पुस्तक से हिन्दी जनता का विशेष हित होगा।

प्रकाशक

सरल राजयोग

प्रस्तावना


संसार के अन्य विज्ञानों की भांति राजयोग भी एक विज्ञान है। यह विज्ञान मन का विश्लेषण तथा अतीन्द्रिय जगत् के तथ्यों का संकलन करता है और इस प्रकार आध्यात्मिक जगत् का निर्माण करता है। संसार के सभी महान् उपदेष्टाओं ने कहा है, ‘‘हमने सत्य देखा और जाना है।’’ ईसा, पॉल और पीटर सभी ने जिन सत्यों की शिक्षा दी, उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने का दावा किया है।
यह प्रत्यक्ष अनुभव योग द्वारा प्राप्त होता है।
हमारे अस्तित्व की सीमा केवल चेतना अथवा स्मृति नहीं हो सकती। एक अतिचेतन भूमिका भी है। इस अवस्था में और सुषुप्ति में संवेदनाएँ नहीं प्राप्त होतीं। किन्तु इन दोनों के बीच ज्ञान और अज्ञान जैसा आकाश-पाताल का भेद है। यह आलोच्य योगशास्त्र ठीक विज्ञान के ही समान तर्कसंगत है।
मन की एकाग्रता ही समस्त ज्ञान का उद्गम है।

योग हमें जड़-तत्त्व को अपना दास बनाने की शिक्षा देता है, और उसको हमारा दास होना ही चाहिए। योग का अर्थ जोड़ना है अर्थात् जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना, मिलाना।
मन चेतना में और उसके नीचे के स्तर में कार्य करता है। हम लोग जिसे चेतना कहते हैं, वह हमारे स्वरूप की अनन्त शृंखला की एक कड़ी मात्र है।
हमारा यह ‘अहम्’ किंचित् मात्र चेतना और विपुल अचेतना को घेरे रहता है, जब कि उसके परे, और उसकी प्राय: अज्ञात, अतिचेतन की भूमिका है।

श्रद्धाभाव के योगाभ्यास करने पर मन का एक के बाद एक स्तर खुलता जाता है और प्रत्येक स्तर पर नये तथ्यों को प्रकाशित करता है। हम अपने सम्मुख नये जगतों की सृष्टि होती सी देखते हैं, नयी शक्तियाँ हमारे हाथों में आ जाती हैं, किन्तु हमें मार्ग में ही नहीं रुक जाना चाहिए, और जब हमारे सामने हीरों की खान पड़ी हो, तो काँच के मणियों से हमें चौंधिया नहीं जाना चाहिए।
केवल ईश्वर ही हमारा लक्ष्य है। उसकी प्राप्ति न हो पाना ही हमारी मृत्यु है।
सफलताकांक्षी साधक के लिए तीन बातों की आवश्यकता है।

पहली है ऐहिक और पारलौकिक इन्द्रियभोग-वासना का त्याग और केवल भगवान् और सत्य को लक्ष्य बनाना। हम यहाँ सत्य की उपलब्धि के लिए हैं, भोग के लिए नहीं। भोग पशुओं के लिए छोड़ दो, जिनको हमारी अपेक्षा उसमें कहीं अधिक आनन्द मिलता है। मनुष्य एक विचारशील प्राणी है, और मृत्यु पर विजय तथा प्रकाश को प्राप्त कर लेने तक उसे संघर्ष करते ही रहना चाहिए। उसे फिजूल की बातचीत में अपनी शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। समाज की पूजा एवं लोकप्रिय जनमत की पूजा मूर्ति-पूजा ही है। आत्मा का लिंग, देश, स्थान या काल नहीं होता।

दूसरी है सत्य और भगवत्प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा। जल में डूबता मनुष्य जैसे वायु के लिए व्याकुल होता है, वैसे ही व्याकुल हो जाओ। केवल ईश्वर को ही चाहो, और कुछ भी स्वीकार न करो। जो आभास मात्र है, उससे धोखा न खाओ। सब से विमुख होकर केवल ईश्वर की खोज करो।
तीसरी बात में छह अभ्यास है :

(1)    मन को बहिर्मुख न होने देना।
(2)    इन्द्रिय-निग्रह।
(3)    मन को अन्तर्मुख बनाना।
(4)    प्रतिकाररहित सहिष्णुता या पूर्ण तितिक्षा।
(5)    मन को एक भाव में स्थिर रखना। ध्येय को सम्मुख रखो, और उसका चिन्तन करो। उसे कभी अलग न करो। समय का हिसाब मत करो।
(6)    अपने स्वरूप का सतत चिन्तन करो।

अन्धविश्वास का परित्याग कर दो। ‘मैं तुच्छ हूँ’ इस तरह अपने को सोचते हुए सम्मोहित न करो। जब तक तुम ईश्वर के साथ एकात्मता की अनुभूति (वास्तविक अनुभूति) न कर लो, तब तक रात-दिन अपने आपको बताते रहो कि तुम यथार्थत: क्या हो।
इन साधनाओं के बिना कोई भी फल प्राप्त नहीं हो सकता।
हम उस सर्वातीत सत्ता या ब्रह्म की धारणा कर सकते हैं, पर उसे भाषा के द्वारा व्यक्ति करना असम्भव है। जैसे ही हम उसे अभिव्यक्त करने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही हम उसे सीमित बना डालते हैं और वह ब्रह्म नहीं रह जाता।
हमें इन्द्रिय-जगत् की सीमाओं के परे जाना है और बुद्धि से भी अतीत होना है। और ऐसा करने की शक्ति हममें है भी।
(एक सप्ताह तक प्राणायाम के प्रथम पाठ का अभ्यास करने के पश्चात् शिष्य को चाहिए कि वह गुरु को अपना अनुभव बताए।)


प्रथम पाठ



इस पाठ का उद्देश्य व्यक्तित्व का विकास है। प्रत्येक के लिए अपने व्यक्तित्व का विकास आवश्यक है। हम सभी एक केन्द्र में जा मिलेंगे। ‘कल्पना-शक्ति प्रेरणा का द्वार और समस्त विचार का आधार है।’ सभी पैगम्बर, कवि और अन्वेषक महती कल्पनाशक्ति से सम्पन्न थे। प्रकृति के रहस्यों की व्याख्या हमारे भीतर ही है; पत्थर बाहर गिरता है, लेकिन गुरुत्वाकर्षण हमारे भीतर है, बाहर नहीं। जो अति आहार करते हैं, जो उपवाल करते हैं, जो अत्यधिक सोते हैं, जो अत्यल्प और अतिशय आसक्ति योगाभ्यास के महान् शत्रु हैं। योगी के लिए तीन बातों की बड़ी आवश्यकता है:
प्रथम-शारीरिक और मानसिक पवित्रता। प्रत्येक प्रकार की मलिनता तथा मन को पतन की ओर ढकेलनेवाली सभी बातों का परित्याग आवश्यक है।

द्वितीय-धैर्य। प्रारम्भ में आश्चर्य जनक दर्शन आदि होंगे, पर बाद में वे सब अन्तर्हित हो जाएँगे। यह सब से कठिन समय है। पर दृढ़ रहो, यदि धैर्य रखोगे, तो अन्त में सिद्धि सुनिश्चित है।
तृतीय-अध्यवसाय या लगन। सुख-दु:ख, स्वास्थ्य-अस्वास्थ्य सभी दशाओं में साधना में एक दिन का भी नागा न करो।

 


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