भारतीय व्याख्यान - स्वामी विवेकानन्द Bhartiya Vyakhyan - Hindi book by - Swami Vivekanand
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भारतीय व्याख्यान

स्वामी विवेकानन्द

प्रकाशक : रामकृष्ण मठ प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :418
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5937
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पुस्तक भारतीय व्याख्यान....

Bhartiya Vyakhyan A Hindi Book by Swami Vivekanand - भारतीय व्याख्यान - स्वामी विवेकानन्द

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वक्तव्य

प्रथम संस्करण

पाश्चात्य देशों के भ्रमण से लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने सन 1897 में कोलम्बो से लेकर अल्मोड़ा तक यात्रा की थी, उसमें उन्हें स्थान-स्थान पर मान-पत्र प्रदान किये गए थे। स्वामीजी ने उन मान-पत्रों के उत्तर-स्वरूप जो अभिभाषण दिये थे, उनका संग्रह अंग्रेजी में ‘इण्डियन लेक्चर्स’ (Indian Lectures) नामक ग्रंथ में प्रकाशित है।
‘भारत में विवेकानन्द’’* उसी पुस्तक का हिन्दी रुपान्तर है। इन भावयुक्त स्फूर्तिप्रद भाषणों में वेदान्त का सच्चा स्वरूप उद्घाटित है। इन्हें पढ़ने पर विदित हो जाता है कि स्वदेश तथा भारतीय संस्कृति के प्रति स्वामीजी की कितनी अपार श्रद्धा थी। उनके राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी वैध और ठोस विचारों के प्रचार की आज की परिस्थिति में कितनी आवश्यकता है, क्या इसे भी बतलाना होगा ? स्वाधीन भारत अपने महापुरुषों के सदुपयोगों से लाभान्वित हो; यही इस पुस्तक प्रकाशन का उद्देश्य है।

यह हिन्दी अनुवाद हिन्दी साहित्य के सुविख्यात लेखक तथा कवि पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी, ‘निराला’ ने किया है। इस महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए हम उनके प्रति परम कृतज्ञ हैं।
हम पं. शुकदेव प्रसादजी तिवारी (श्रीविनय मोहन शर्मा), एम.ए., एल-एल.बी., प्राध्यापक, नागपुर महाविद्यालय, के अत्यंत आभारी हैं, जिन्होंने इस पुस्तक के कार्य में हमें बहुमूल्य सूचनाएँ दी हैं।
हमें विश्वास है कि इस पुस्तक के अध्ययन से पाठकों का अनेक दिशाओं में लाभ होगा।

प्रकाशक

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*सप्तम संस्करण से इस पुस्तक का नाम ‘भारत में विवेकानन्द’ से ‘भारतीय व्याख्यान’ हुआ है।


भारतीय व्याख्यान

प्राची में प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान

(कोलम्बो का व्याख्यान)

पाश्चात्य देशों में अपने स्मरणीय प्रचारकार्य के बाद स्वामी विवेकानन्द 15 जनवरी 1897 को तीसरे प्रहर जहाज से कोलम्बो में उतरे और वहाँ के हिन्दू समाज ने उनका बड़ा शानदार स्वागत किया। निम्नलिखित मानपत्र उनकी सेवा में प्रस्तुत किया गया :

सेवा में,
श्रीमत् स्वामी विवेकानन्दजी
पूज्य स्वामीजी,
कोलम्बो नगर के हिन्दू निवासियों की एक सार्वजनिक सभा द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के अनुसार आज हम लोग इस द्वीप में आपका हृदय से स्वागत करते हैं। हम इसको अपना सौभाग्य समझते हैं कि पाश्चचात्य देशों में आपके महान् धर्मप्रचारकार्य के बाद स्वदेश वापस आने पर हमको आपका सर्वप्रथम स्वागत करने का अवसर मिला।

ईश्वर की कृपा से इस महान् धर्मप्रचारकार्य को जो सफलता प्राप्त हुई है उसे देखकर हम सब बड़े कृत्यकृत्य तथा प्रफुल्लित हुए हैं। आपने यूरोपियन तथा अमेरिकन राष्ट्रों के सम्मुख यह घोषित कर दिया है कि हिन्दू आदर्श का सार्वभौम धर्म वही है, जिसमें सब प्रकार के सम्प्रदायों का सुन्दर सामंजस्य हो, जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार आध्यात्मिक आहार प्राप्त हो सके तथा जो प्रेम से प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर के समीप ला सके। आपने उस महान् सत्य का प्रचार किया है तथा उसका मार्ग सिखाया है जिसकी शिक्षा आदि काल से हमारे यहाँ के महापुरुष उत्तराधिकार क्रम से देते आये हैं। इन्हीं के पवित्र चरणों के पड़ने से भारतवर्ष की भूमि सदैव पवित्र हुई है तथा इन्हीं के कल्याणप्रद चरित्र एवं प्रेरणा ये यह देश अनेकानेक परिवर्तनों के बीच गुजरता हुआ भी सदैव संसार का प्रदीप बन रहा है।

श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव जैसे सद्गुरु की अनुप्रेरणा तथा आपकी त्यागमय लगन द्वारा पाश्चात्य राष्ट्रों को भारतवर्ष की एक आध्यात्मिक प्रतिभा के जीवन्त सम्पर्क का अमूल्य वरदान मिला है। और साथ ही पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध से अनेक भारतवासियों को मुक्त कर, आपने उन्हें अपने देश की महान् सांस्कृतिक परम्परा का दायित्व बोध कराया है।

आपने अपने महान् कर्म तथा उदाहरण द्वारा मानवजाति का जो उपकार किया है उसका बदला चुकाना सम्भव नहीं है और आपने हमारी इस मातृभूमि को एक नया तेज प्रदान किया है। हमारी यही प्रार्थना है कि ईश्वर के अनुग्रह से आपकी तथा आपके कार्य की उत्तरोत्तर उन्नति होती रहे।


कोलम्बो-निवासी हिन्दुओं की ओर से
हम हैं आपके विनम्र
पी.कुमारस्वामी, स्वागताध्यक्ष
तथा मेम्बर, लेजिस्लेटिव कौंसिल, सीलोन
तथा ए. कुलवीरसिंहम्, मंत्री
कोलम्बो, जनवरी 1897


स्वामीजी ने संक्षेप में उत्तर दिया और उनका जो स्नेहपूर्ण स्वागत किया गया था उसकी सरहाना की। उन्होंने उक्त अवसर का लाभ उठाकर यह व्यक्त किया कि भावप्रदर्शन किसी महान् राजनीतिज्ञ या महान् सैनिक या धनकुबेर के सम्मान में न होकर, एक भिक्षुक संन्यासी के प्रति हुआ है जो धर्म के प्रति हिन्दुओं की मनोवृत्ति का परिचायक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर राष्ट्र को जीवित रहना है तो धर्म को राष्ट्रीय जीवन का मेरुदण्ड बनाए रखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मेरा जो स्वागत हुआ है उसे मैं किसी व्यक्ति का स्वागत नहीं मानता, वरन् मेरा साग्रह निवेदन है कि यह एक मूलतत्त्व की मान्यता है।
16 तारीख की शाम को स्वामीजी ने ‘फ्लोरल हॉल’ में निम्नलिखित सार्वजनिक व्याख्यान दिया :


स्वामीजी का भाषण



जो थोड़ा-बहुत कार्य मेरे द्वारा हुआ है, वह मेरी किसी अन्तर्निहित शक्ति द्वारा नहीं हुआ, वरन् पाश्चात्य देशो में पर्यटन करते समय, अपनी इस परम पवित्र और प्रिय मातृभूमि से जो उत्साह, जो सुभेच्छा तथा जो आशीर्वाद मुझे मिले हैं उन्हीं की शक्ति द्वारा सम्भव हो सका है।

हाँ, यह ठीक है कि कुछ काम तो अवश्य हुआ है, पर पाश्चात्य देशों में भ्रमण करने से विशेष लाभ मेरा ही हुआ है। इसका कारण यह है कि पहले मैं जिन बातों को शायद भावनात्मक प्रकृति से सत्य मान लेता था, अब उन्हीं को मैं प्रमाणसिद्ध विश्वास तथा प्रत्यक्ष और शक्तिसम्पन्न सत्य के रूप में देख रहा हूँ। पहले मैं भी अन्य हिन्दुओं की तरह विश्वास करता था कि भारत पुण्यभूमि है कर्मभूमि है, जैसा कि माननीय सभापति महोदय ने अभी अभी तुमसे कहा भी है। पर आज मैं इस सभा के सामने खड़ा होकर दृढ़ विश्वास से कहता हूँ कि यह सत्य ही है। यदि पृथ्वी पर ऐसा कोई देश है, जिसे हम धन्य पुण्यभूमि कह सकते हैं, यदि ऐसा कोई स्थान है जहाँ पृथ्वी के सब जीवों को अपना कर्मफल भोगने के लिए आना पड़ता है, यदि ऐसा कोई स्थान है जहाँ भगवान् की ओर उन्मुख होने के प्रयत्न में संलग्न रहनेवाले जीवमात्र को अन्ततः आना होगा, यदि ऐसा कोई देश है जहाँ मानवजाति की क्षमा, धृति, दया, शुद्धता आदि सद्वृत्तियों का सर्वाधिक विकास हुआ है और यदि ऐसा कोई देश है जहाँ आध्यात्मिकता तथा आत्मान्वेषण का सर्वाधिक विकास हुआ है, तो वह भूमि भारत ही है।

अत्यन्त प्राचीन काल से ही यहाँ पर भिन्न भिन्न धर्मों के संस्थापकों ने अवतार लेकर सारे संसार को सत्य की आध्यात्मकि सनातन और पवित्र धारा से बारम्बार प्लावित किया है। यहीं से उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों ओर दार्शनिक ज्ञान की प्रबल धाराएँ प्रवाहित हुई हैं, और यहीं से वह धारा बहेगी, जो आजकल की पार्थिव सभ्यता को आध्यात्मिक जीवन प्रदान करेगी। विदेशों के लाखों स्त्री-पुरुष के हृदय में भौतिकता की जो अग्नि धधक रही है, उसे बुझाने के लिए जिस जीवनदायी सलिल की आवश्यकता है, वह यहीं विद्यमान है। मित्रो, विश्वास रखो, यही होने जा रहा है।

मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। तुम लोग जो संसार की विभिन्न जातियों के इतिहास के विद्यार्थी हो, इस सत्य से अच्छी तरह परिचित हो। संसार हमारे देश का अत्यन्त ऋणी है। यदि भिन्न भिन्न देशों की पारस्परिक तुलना की जाए तो मालूम होगा कि सारा संसार सहिष्णु एवं निरीह भारत का जितना ऋणी है, उतना और किसी देश का नहीं। ‘निरीह हिन्दू’—ये शब्द कभी कभी तिरस्कार के रूप में प्रयुक्त होते हैं, पर यदि किसी तिरस्कार में अद्भुत सत्य का कुछ अंश निहित रहता है तो वह इन्हीं शब्दों में है—‘निरीह हिन्दू’ ये सदा जगत्पिता की प्रिय सन्तान रहे हैं। यह ठीक है कि संसार के अन्यान्य स्थानों में सभ्यता का विकास हुआ है प्राचीन और वर्तमान में कितनी ही शक्तिशाली तथा महान् जातियों ने उच्च भावों को जन्म दिया है, पुराने समय में और आजकल भी बहुत से अनोखे तत्त्व एक जाति से दूसरी जाति में पहुँचे हैं, और यह भी ठीक है कि किसी राष्ट्र की गतिशील जीवनतरंगों ने महान् शक्तिशाली सत्य के बीजों को चारों ओर बिखेरा है।

परन्तु भाइयों ! तुम निर्घोष तथा रणसज्जा से सज्जित सेनासमूह की सहायता से। बिना रक्तप्रवाह से सिक्त हुए, बिना लाखों स्त्री-पुरुषों के खून की नदी में स्नान किये, कोई भी नया भाव आगे नहीं बढ़ा। प्रत्येक ओजस्वी भाव के प्रचार के साथ ही साथ असंख्य लोगों का हाहाकर, अनाथों और असहायों का करुणक्रन्दन और विधवाओं का अजस्र अश्रुपात होते देखा गया है।

प्रधानतः इसी उपाय द्वारा अन्यान्य देशों ने संसार को शिक्षा दी है, परन्तु इस उपाय का अवलम्बन किये बिना ही भारत हजारों वर्षों से शान्ति पूर्वक जीवित रहा है। जब यूनान का अस्तित्व नहीं था, रोम भविष्य के अन्धकारगर्भ में छिपा हुआ था, जब आधुनिक यूरोपियनों के पुरखे घने जंगलों के अन्दर छिपे रहते थे और अपने शरीर को नीले रंग से रँगा करते थे, तब भी भारत क्रियाशील था।

उससे भी पहले, जिस समय का इतिहास में कोई लेखा नहीं है, जिस सुदूर धुँधले अतीत की ओर झाँकने का साहस परम्परा को भी नहीं होता, उस काल से लेकर अब तक न जाने कितने ही भाव एक के बाद एक भारत से प्रसृत हुए हैं पर उनका प्रत्येक शब्द आगे शान्ति तथा पीछे आशीर्वाद के साथ कहा गया है। संसार के सभी देशों में केवल एक हमारे ही देश ने लड़ाई-झगड़ा करके किसी अन्य देश को पराजित नहीं किया है—इसका शुभ आशीर्वाद हमारे साथ है और इसी से हम अब तक जीवित हैं।

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