पौराणिक कहानियाँ - गीताप्रेस 1669 Pauranik Kahaniyan - Hindi book by - Gitapress
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गीता प्रेस, गोरखपुर >> पौराणिक कहानियाँ

पौराणिक कहानियाँ

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5995
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है पौराणिक कहानियाँ......

Pauranik Kahaniyan a hindi book by Gitapress - पौराणिक कहानियाँ - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नम्र निवेदन

भारतीय संस्कृति में वेदों के बाद पुराणों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वेदों के विषय गूढ़ होने के कारण जन-सामान्य के लिये कठिन हैं, किन्तु भक्तिरस से ओतप्रोत पुराणों की मंगलमयी एवं ज्ञानप्रदायिनी कथाओं के श्रवण-मनन और पठन-पाठन के द्वारा साधारण मनुष्य भी भक्तितत्त्व का अनुपम रहस्य जानकर सहज ही अपना आत्मकल्याण कर सकता है। पुराणों की पवित्र कहानियों के स्वाध्याय से अध्यात्म की दिशा में अग्रसर होनेवाले साधकों को तत्त्वबोध की प्राप्ति होती है तथा भगवान् के पुनीत चरणों में सहज अनुराग होता है। पौराणिक कहानियों के द्वारा धर्म-अधर्म का ज्ञान होता है, सदाचार में प्रवृत्ति होती है तथा भगवान् में भक्ति बढ़ती है। इन कथारूप उपदेशों को सुनते-सुनते मानव मन निर्मल होता है, जीवन सुधरता है तथा इहलोक और परलोक-दोनों में सुख और शान्ति मिलती है।

प्रस्तुत पुस्तक ‘कल्याण’ (वर्ष 63, सन् 1989 ई.) में प्रकाशित ‘पुराण-कथांक’ से चयनित कहानियों का अनुपम संग्रह है। इसमें शिवभक्त नन्दभद्र, नारायण-मन्त्र की महिमा, कीर्तन का फल, सत्यकी महिमा, दानका स्वरूप, चोरी आदि 36 उपयोगी एवं सन्मार्ग की प्रेरक कहानियाँ संकलित हैं। पुराणों से संकलित सुहृत् सम्मत उपदेशपरक कहानियों का स्वाध्याय सबके लिये कल्याणकारी है। इनके अध्ययन और मनन से प्रेरणा लेकर हम सबको सन्मार्ग और भगवद्भक्ति पथपर आगे बढ़ना चाहिये।


प्रकाशक


शिवभक्त नन्दभद्र



प्राचीन काल की बात है, बहूदक नामक तीर्थ में नन्दभद्र नामके एक वैश्य रहते थे। वे वर्णाश्रम-धर्म का पालन करनेवाले सदाचारी पुरुष थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम कनका था। वह भी पतिव्रत-धर्म का पालन करनेवाली साध्वी स्त्री थी। उसमें अन्य अनेक सद्गुण भी विद्यमान थे, जिससे उनकी गृहस्थी बड़े आनन्द एवं धर्मपूर्वक व्यतीत हो रही थी।

वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार नन्दभद्र वाणिज्य को ही अपना श्रेष्ठ धर्म मानते थे और उसे ही अपनाये हुए थे। नन्दभद्र के हृदय में परोपकार तो मानो साक्षात् मूर्तिमान होकर विराजमान था। वे भगवान् की पूजा की भावना से अपना समस्त व्यवसाय करते और दूसरों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए थोड़ा लाभ लेकर वस्तुओं की बिक्री करते थे। ग्राहकों के साथ किसी प्रकार का भेद-भाव न रखते हुए वस्तुओं के क्रय-विक्रय में वे पूर्णरूप से समता का बर्ताव करते थे उनके यहाँ ग्राहकों को अच्छा माल दिखाकर कभी भी घटिया माल नहीं दिया जाता था। वे घृणित-वर्जित वस्तु-मदिरा आदि का व्यापार कभी नहीं करते थे।

सौम्य-स्वभाववाले नन्दभद्र का रहन-सहन भी बहुत सीधा-सादा था। वे लकड़ी एवं घास–फूससे निर्मित एक छोटे-से मकान में निवास करते थे। उनका खान-पान बहुत साधारण-कम खर्चीला था।

जिसे भगवान् से प्रेम हो जाता है, उसे संसार के कार्य फीके से लगने लगते हैं। यही दशा नन्दभद्रकी थी। वे चन्द्रमौलि भगवान शंकर के अनन्य-भक्त थे। बहूदकमें एक बहुत सुन्दर शिवलिंग स्थापित था, जो कपिलेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध था। नन्दभद्र तीनों समय बड़े प्रेम से कपिलेश्वर शिवलिंग की पूजा किया करते थे। वे सभी के हित-साधन में सदैव संलग्न रहते एवं मन, वाणी और क्रिया द्वारा परोपकार-धर्म का पालन करते थे। किसी के साथ न उनका द्वेष था न राग। वे न किसी से अनुरोध करते थे न विरोध। वे निन्दाजस्तुति में सदा ही सम तथा जो कुछ मिल जाता, उसी में संतुष्ट रहते थे।

नन्दभद्र का जीवन संन्यासियों–जैसा ही था, वे गृहस्थाश्रम को संन्यासाश्रम से कम न मानते थे। वे कहा करते थे कि जो विषयों को बाहर से त्यागकर मन के द्वारा उसे ग्रहण करता रहता वह इहलोक और परलोक-दोनों ओर से भ्रष्ट होकर फटे हुए बादल की भाँति नष्ट हो जाता है। संन्यास का सारभूत तत्त्व है विषयों का त्याग, सभी को उसका पालन करना चाहिये। गृहस्थ में रहकर यथाशक्ति देवता पितर, अतिथि, ब्राह्मण, पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि समस्त भूतों के लिये सदा अन्न देना चाहिये। इनसे बचा हुआ अन्न ही स्वयं भोजन करना चाहिये।

नन्दभद्र का सदाचार-सुखमय जीवन सभी के लिये स्पृहणीय था। सज्जन लोग सदैव संतों के जीवन से लाभ उठाते हैं, उन्हें देख-देखकर प्रसन्न होते तथा उनका अनुसरण कर अपने जीवन को सदाचार मय बनाते हैं। दूसरी ओर दुष्टजन किसी संतको देखकर जलते हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति नन्दभद्रके पड़ोस में रहता था, उसका नाम था सत्यव्रत। नाम तो उसका सत्यव्रत था, परंतु था वह बड़ा ही नास्तिक एवं दुराचारी। धर्मपरायण नन्दभद्र को सुखी देखकर वह जला करता था। बारम्बार नन्दभद्र पर मिथ्या दोषारोपण करना और सदा उनके दोष ही ढूँढ़ते रहना मानो उसका स्वभाव ही बन गया था। उसके जीवन की सबसे बड़ी चाह यही थी कि किसी प्रकार कोई नन्दभद्र का दोष दिख जाय तो उसे धर्म से गिरा दूँ।

प्रारब्ध के भोग से कौन छूट पाता है ? देवता या मनुष्य कोई भी क्यों न हो, प्रारब्ध का विधान तो सभी को स्वीकार करना पड़ता है। अचानक नन्दभद्र का इकलौता पुत्र चल बसा। महामति नन्दभद्र ने विधिका विधान मानकर शोक नहीं किया। थोड़े ही दिनों के पश्चात् सहसा उनकी पतिव्रता पत्नी कनका भी चल बसी।
लम्बे अवसर की प्रतीक्षा के पश्चात् नन्दभद्र पर विपत्ति आयी देखकर उनके पड़ोसी सत्यव्रत को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सोचा कि अब मैं नन्दभद्र को धर्मभ्रष्ट कर ही दूँगा। वह दौड़कर उनके पास पहुँचा और बनावटी दुःख प्रकट करते हुए बोला—‘हा नन्दभद्र ! बहुत बुरा हुआ। तुम्हारे—जैसे धर्मात्मा को भी कैसा दुःख उठाना पड़ रहा है। इससे यही समझ में आता है कि यह धर्म-कर्म ढकोसला है, मेरे मन में तो कई बार तुम्हें चेतावनी देने की बात आयी थी कि दिन में तीन बार पूजा करना, स्तुति प्रार्थना करना—सब व्यर्थ है, परंतु संकोचवश मैं चुप रहा। आज कहे बिना नहीं रहा गया, अतः कह रहा हूँ।’

उसने पुनः कहा—‘भैया नन्दभद्र ! धर्म के नामपर क्यों इतना कष्ट उठाते हो ? मिथ्यावाद अच्छा नहीं होता। जबसे तुम इस पत्थर-पूजन में लगे हो, तबसे तुम्हें कोई अच्छा फल मिला हो, ऐसा मैंने नहीं देखा। तुम्हारा इकलौता पुत्र और साध्वी पत्नी दोनों संसार से चल बस। यदि भगवान् होते तो क्या तुम्हें ऐसा फल देते ? भैया ! भगवान् तो स्वार्थी लोगों की कल्पना मात्र हैं। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ आदि सब स्वभाव से ही विचरण करते हैं, स्वभाव से ही समस्त जीव-जन्तु, पेड़-पौधे एवं मनुष्य पैदा होते हैं। मनुष्ययोनि ही सबसे दुःखद योनि है, अन्य सभी योनियाँ सुखद हैं, क्योंकि उनमें सभी स्वच्छन्द विचरण किया करते हैं। पुण्य और पाप सब कुछ कल्पना है। नन्दभद्र ! मैं तुम्हें सही सलाह देता हूँ कि मिथ्या धर्मका परित्याग करके आनन्द पूर्वक खाओ, पीओ और भोगो; क्योंकि यही सत्य है।’

सत्यव्रत की मूर्खतापूर्ण बातें नन्दभद्र पर कोई प्रभाव न डाल सकीं। उनके विचार तो पर्वत की भाँति अचल एवं समुद्र की भाँति गम्भीर थे। वे तनिक भी विचलित न हुए और हँसते हुए बोले—‘सत्यव्रत जी ! आप अपने-आपको ही धोखा दे रहे हैं। क्या पापियों पर दुःख नहीं आते ? क्या उनके पुत्र, स्त्री आदि की मृत्यु नहीं होती ? जब किसी सज्जन पुरुष पर दुःख आता है, तब सभी लोग सहानुभूति प्रकट करते हैं, परंतु विपत्तिकाल में दुराचारी के प्रति सहानुभूति प्रकट करने वाला कोई नहीं होता। अतः धर्मपालन करनेवाला ही श्रेष्ठ है।’

सत्यव्रत तो अपने हठपर था, उसे ये बातें कैसे अच्छी लगतीं नन्दभद्र ने पुनः कहा—‘महाशय ! अन्धा व्यक्ति सूर्य के स्वरूप को नहीं जानता, परंतु उसके न जानने से क्या सूर्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है ? जिस प्रकार राजा के बिना प्रजा नहीं रह सकती, उसी प्रकार ईश्वर के बिना संसार का संचालन नहीं हो सकता, यह आप सत्य समझ लें। जिस शिवलिंग को आप पत्थर कहते हैं, स्वयं भगवान् श्रीराम ने समुद्रतटपर उसकी स्थापना की थी।’


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