कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक - प्रताप सहगल Koi Aur Rasta Tatha Anya Laghu Natak - Hindi book by - Pratap Sahgal
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कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक

प्रताप सहगल

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :164
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6018
आईएसबीएन :978-81-88121-88

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प्रस्तुत है लघु नाटक....

Koi Aur Rasta Tatha Anya Laghu Natak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है। एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
‘अंक-दृष्टा’ जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो ‘अंतराल के बाद’ में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधों के बदले की गाथा है। ‘दफ्तर में एक दिन’ एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं ऊबाऊ माहौल को उकेरता है तो ‘कोई और रास्ता’ संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है। ‘फैसला’ में नारी–सम्मान का प्रश्न है तो ‘लड़ाई’ जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है। ‘वापसी’ अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढ़ी का बयान है तो ‘लम्हों ने खता की थी’ एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है। इसी तरह से ‘मेरी-तेरी सबकी गंगा’ में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है।

यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिज़ाज अलग समस्या अलग है। मामूली लोगों के जीवन के विरोध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लघु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी।

नेपथ्य


1994 में ‘नौ लघु नाटक’ नाम से लघु नाटकों का मेरा पहला संग्रह प्रकाशित हुआ था। तब से 2007 तक उस संग्रह का छह बार पुनर्मुद्रण हो चुका है। पहले संस्करण की भूमिका में मैंने लिखा था कि स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों एवं अन्य कई स्थानों पर बनी नाट्य मंडलियों द्वारा लघु नाटकों या एकांकी नाटकों की माँग बराबर बनी रहती है, लेकिन यह अनुमान मुझे नहीं था कि लघु नाटकों की माँग इतनी अधिक होती है।

हर वर्ष अनेक स्थानों पर इन नाटकों के मंचन के लिए अनुमति माँगने या फिर सूचना मिलने से यह पता चलता है कि लघु नाटकों का महत्त्व क्या है ?

जहाँ भी समय या साधनों का अभाव है, वहाँ लघु नाटकों की माँग और भी बढ़ जाती है। इस तरह से लघु नाटक कम साधनों में भी मंचित होते रहते हैं तथा बच्चों, किशोरों एवं युवकों/युवतियों को रंग-संस्कार भी देते हैं। इन नाटकों के अंत से लगेगा कि ये नाटक समस्या उठाकर किसी समाधान की ओर संकेत करते हैं। यह कतई जरूरी नहीं कि समस्या का समाधान मात्र वही हो, लेकिन एक संकेत तो वहाँ होता ही है।

यहाँ यह प्रश्न भी उठाया जा सकता है कि साहित्य आखिर समाधान प्रस्तुत क्यों करे ? उसका काम तो समस्या उठाना है, उसे कई आयामों से देखने की कोशिश करना है, समस्या से जुड़े लोगों के अंतरलोक में झाँकना और उसका समाजशास्त्रीय या मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पेश करना है। यही ठीक है, लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि अभी भी हमारे समाज में करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जो लेखकों, विचारकों की ओर इस आशा-भरी दृष्टि से देखते हैं कि संभवतः वे कोई रास्ता पेश कर सकें। इस तरह से यह सोद्देश्य लेखन बन जाता है। सोद्देश्य लेखन कहाँ नहीं। विचारधारात्मक स्तर पर, दार्शनिक या मनोवैज्ञानिक स्तर या फिर मात्र आनंद के स्तर पर, किसी भी दृष्टि से देखो तो लेखन प्रत्यक्षतः या परोक्षतः किसी उद्देश्य से तो जुड़ता ही है। लोग हमारी बात समझें, जिन इलाकों को हम शब्दों के माघ्यम से खोलते हैं, वे भी उन इलाकों में प्रवेश करें या फिर लिखकर हम अपने ही व्यक्तित्व में बदलाव को देखें—यह सब भी तो उद्देश्य ही हैं। इसलिए उद्देश्य से बचने की ज़रूरत भी नहीं है, अगर कोई उद्देश्य ही नहीं है, तो फिर लिखना क्या ? अर्थहीनता के बोध से बचने के लिए लिखना भी एक उद्देश्य है। हाँ, उद्देश्य और प्रवचन में फर्क करना ज़रूरी है, प्रवचन देना साहित्य का काम नहीं है।

आशा है, मेरे पिछले नौ लघु नाटकों की इस तरह से ये नौ लघु नाटक भी पाठकों एवं रंगकर्मियों को आकर्षित करेंगे।, इसी आशा के साथ-

प्रताप सहगल

अंक-दृष्टा


पात्र


कुलपति
सचिव
सदस्य एक
सदस्य दो
सदस्य तीन
सदस्य चार
जस्टिस सुंदरम्
चेंगलवरायन
कृष्णास्वामी
रामानुजन
हार्डी

(सभागार। कुल सात लोग एक-एक करके आते हैं, कुछ आसन खाली हैं। कुलपति आकर अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते हैं और हर तरफ नज़र घुमाकर देखते हैं। उनके साथ उनका सचिव भी है जो पीछे ही एक कुर्सी पर बैठ जाता है।)
कुलपति : हूँ....कोरम तो पूरा है।
सचिव : यस सर (एक फाइल कुल पति के सामने रख देता है।)
कुलपति : हूँ....। माननीय सदस्यों ! आज सिंडीकेट की यह असाधारण बैठक एक असाधारण मसले पर विचार करने के लिए बुलाई गई है जैसा कि एजेंडे से आपको कुछ अनुमान हुआ ही होगा।
सदस्य एक : कुलपति महोदय ! विस्तार से बताइए
कुलपति : हूँ...रामानुजन के नाम और काम को थोड़ा बहुत हम सभी जानते हैं, गणित अध्ययन बोर्ड के सामने भी यह काम पेश हुआ तो बोर्ड ने सिफारिश की है कि रामानुजन को अनुसंधान के लिए छात्रवृत्ति दी जाए ताकि वे विलायत में जाकर अपने शोध पूरे कर सकें।
सदस्य एक : इसमें असाधारण बात क्या है ?
कुलपति : असाधारण बात है।
(सभी सदस्य उत्सुकता पूर्वक कुलपति की ओर देखते हैं।)
बात यह है कि उम्मीदवार की शिक्षा नियमों के अनुसार नहीं है।
सदस्य दो : तब नियमानुसार उन्हें छात्रवृत्ति नहीं दी जा सकती।
सदस्य तीन : मामला इतना सरल होता तो इस बैठक की ज़रूरत ही नहीं थी, श्रीनिवास रामानुजन के पर्चे मैंने पढ़े हैं उनका और काम भी देखा है। मेरे विचार में तो यह छात्रवृत्ति देकर हम अपने पर ही उपकार करेंगे।

सदस्य दो : ऐसाऽऽऽ तो फिर नियमों का मतलब ?
सदस्य तीन : नियमों में हमें नहीं उलझना चाहिये। प्रो. अय्यर, प्रो. ग्रिफिथ और प्रो. हार्डी तक ने उनके काम की प्रशंसा की है।
सदस्य एक : कुलपति महोदय ! पर हम नियमों से हटकर तो कुछ नहीं कर सकते।
सदस्य तीन : क्यों नहीं...?
सदस्य एक : (बात काटते हुए) इसलिए कि हम पर सीधा पक्षपात का आरोप लगेगा।
सदस्य तीन : लेकिन कुलपित महोदय ! हम गणित बोर्ड की सिफारिश पर ही कार्रवाई कर रहे हैं। इसमें पक्षपात कैसा।
कुलपति : मेरी राय में भी नियमों के चक्कर में रामानुजन के टेलेंट को बढ़ने से रोकना नहीं चाहिए।
सदस्य एक : प्रतिभा को कौन बाँध सकता है, वो तो यहाँ भी अपना काम कर सकती है।
सदस्य चार : हाँ, फिर कल किसी और की सिफारिश होगी, परसों किसी और की, तब हम किया करेंगे।
कुलपति : तब भी विचार करेंगे।
सदस्य चार : मेरी राय में आने वाले खतरे को नजरअंदाज करना ठीक नहीं।’
सदस्य तीन : गणित के क्षेत्र में रामानुजन की योग्यता आज....
सदस्य दो : नहीं, नहीं मैं उनकी योग्यता पर संदेह नहीं कर रहा।
सदस्य एक : योग्यता का प्रश्न तो है ही नहीं....प्रश्न तो यह है कि छात्रवृत्ति प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार एम.ए. पास होना चाहिए..वही नहीं है।

कुलपति : ठीक है, नियम तो यही कहता है, पर....
सदस्य एक : बस, जब नियम यही कहता है तो बात खत्म। (थोड़ी देर सन्नाटा)
सदस्य तीन : (अचकचाते हुए) सिंडीकेट के सदस्यों का ध्यान मैं कुछ और बातों की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ
सदस्य एक : जब बात खत्म तो कैसी बात...
सदस्य तीन : अध्यक्ष महोदय ! अनुमति दें...
कुलपति: हाँ, कहिए।


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