कठघरे में औरत - हरपाल सिंह Kathghare Mein Aurat - Hindi book by - Harpal Singh
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कठघरे में औरत

हरपाल सिंह

प्रकाशक : कैटरपिल्लर पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6024
आईएसबीएन :9788190483674

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सामाजिक यथार्थ का चित्रण करती कहानियाँ

Kathghare Mein Aurat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हरपाल सिंह ‘अरुष’ जिस प्रकार कविता केन्द्र में मानव को रखा है, उसी प्रकार उनकी हर कहानी में भी केन्द्रीयता मानव के ही हिस्से में आती है। इन्होंने जादुई यथार्थ का जादू सामाजिक यथार्थ को उकेरकर तोड़ा है। यही कारण है कि इनकी कहानियां मानव द्वारा यातना के प्रतिरोध में किये जा रहे संघर्ष का चित्रण करती हैं। यही कारण है कि इनकी कहानियों में खरखरापन विद्यमान है।

‘अरुष’ घटना की बहुफलकीय प्रकृति को भाषा की इकहरी अभिव्यक्ति में उद्घाटित करने की कला में अग्रणी माने जाते हैं। इनकी कहानियों का आस्वाद पाठक को हिस्सेदार बनाने का ऐसा उपक्रम आता है कि वह अपने आप को कहानीकार के साथ खड़ा हुआ महसूस करता है। एक बात जो ‘अरुष’ को अन्य कहानीकारों से अलग प्रकार का सिद्ध करती है, वह कि ये पौराणिक और ऐतिहासिक घटना पर ऐसी कहानी कहते हैं, जो संबंधित घटना का विमर्शात्मक रसायनशास्त्र प्रस्तुत कर देती है।

इस संकलन में सम्मिलित कहानियों में जहाँ ऊपर बतलाए गए सामाजिक यथार्थ का चित्रण हैं, वहीं दलित साहित्य का उदेश्य पूरा करने वाली कहानियां भी हैं।


कटघरे में औरत


एक शर्मदार, इज्जतदार और समाज में सुस्थापित पति ने अपनी पत्नी के विरुद्ध प्रताड़ना अवशोषण और अनुकुंठन करने के आरोप स्थापित करते हुए न्यायालय में एकवाद आखिर दायर कर ही दिया।

इस वाद से संबन्धित कुछ बातें जान लेना इसलिए भी आवश्यक जान पड़ती हैं कि जहाँ कहीं पाठक का मन अस्पष्टता का अनुभव करें, इस बातों का सहारा लेकर अपने मन को साफ कर ले और बिना किसी लिप्तता के तथा बिना पक्षपात किये सारी कार्रवाई को पढ़ता रहे। सारे विकल्प खुले रखने का उद्देश्य किसी कूटनीति चाल का हिस्सा नहीं है, यह तो सभी को विश्वास करना चाहिए।

जज जिसके यहाँ वाद दायर किया गया, वह अनुभव के आधार पर सरकार द्वारा, नामित जज है। यह पूछने की या बताने की गुँजाइश इसमें नहीं है कि जज महोदय को राजनीति का अनुभव रहा है या वकालत का। क्योकि इस जानकारी को प्राप्त करने का अधिकार पाठक को नहीं दिया जा सकता। यह बात इसलिये नहीं कही जा रही है कि अकेला जज ही वाद की सुनवाई करेगा। वैसे जज भी हों तो भी सुनना-सुनाना उसके दायित्व में कभी सम्मिलित नहीं किया गया। ज्यों-त्यों करके एक निर्णय ही है, जिसपर पर उनको मोहर दस्तखत करके चमकाना होता है। दोनों पक्षों के वकील होते हैं जो जज महोदय को सारी बातें अविस्तार समझाने की गारंटी अपने ऊपर ले लेते हैं। अंतर यह है कि वो वकील लोग केवल गारंटी ही लेते हैं दायित्व नहीं। दोनों पक्षों की ओर से एक-एक वकील कम से कम खड़ा होता ही है।

यह मुकद्दमा ऐसे विचित्र पेच लेकर उपस्थित हुआ था कि इसमें विशेष प्रकार के न्यायाधीश की आवश्यकता रह गयी थी। अतः इस विद्वान न्यायाधीश महोदय ने अध्ययन काल में कानून की पढ़ाई की ऐसी-तैसी करने के लिये ही छात्र राजनीति में पांव देकर अपने आप को चमका लिया था। अनुभव काल में अध्ययन किये गये ज्ञान का अतिक्रमण करके काफी कमा लिया था। देखने में टिंच, चलने-फिरने में मुस्तैद और हाव-भाव में निरीह भोले व्यक्तित्व के धनी इस महोदय के विराजमान हो जाने पर न्यायालय कक्ष गौरान्वित होने का अभिमान कर सकता था।

कहीं परिचय में ही पूरी कहानी का स्क्रिप्ट-टाइप समाप्त न हो जाए अतः वकीलों और वाद दायर करने वाले निरीह पति और फेमिनिज्म से ओत-प्रोत पत्नी साहिबा का परिचय देना मैं उपयुक्त नहीं समझता। वैसे यदि एडवांश में ही सारा परिचय देने की छूट मिल जाये तो आनंद का रहस्य कम होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
मुकदमें की सुनवाई इस प्रकार हुई-

पहला दिन-
जज ने पति से पूछा-हाँ, तो क्या कहना है तुम्हें ?
-सरकार ! बहुत कुछ कहना है। कोई एक परेशानी हो तो कहूँ।
-एक-एक करके सुनाओ।
-इसको (पत्नी की ओर संकेत करके) जब मैं अपने स्कूटर पर पीछे बैठाकर ले जाना चाहता हूँ तो इसने अपना हाथ जब भी रखा मेरे कंधे पर ही रखा। जबकि अन्य सभी महिलाएं खासतौर से विवाहित महिलाएं भी अपना दायां हाथ आगे बैठ पति या प्रेमी, जैसी भी स्थिति हो, की बैल्ट के सहारे मोड़कर रखती हैं। जज ने पत्नी की ओर संकेत करके पूछा, तुम्हें क्या कहना है ?

-मुझे भी बहुत कुछ कहना है सरकार !
-फिर कहती क्यों नहीं ?
-जब इनका ध्यान विचलित होता है मैं इनके कन्धे पर थोड़ा-सा प्रेशर डाल देती हूँ। जिसके कारण ध्यान सड़क पर केंद्रित हो जाता है। इन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि पीछे भी कोई बैठा है। ऐक्सीडेंट हो जाय तो ?
इतना सुनते ही पति महोदय ने दूसरा आरोप जड़ दिया- यह जब भी अकेली होती है। रसोई में हो या बाथरूम में। असफल प्रेम के दर्द भरे गीत गाती रहती है। इतनी दर्दीली आवाज में कि मेरा मन पसीज जाता है। मेरी आंखे डबडबा जाती है तो इतनी चमकदार मुस्कराहट के साथ मेरी ओर देखती है, उस प्यार के सामने जो असफल होकर तड़प रहा है मेरा जीवित प्यार जैसे कुछ है ही नहीं। गजब तो तब करती है जब उसी गीत की धुन गुनगुनाती हुई खाना परसती हुई मुझे चिढाती है।
पति के वकील ने, जो नवयुवक था, छोटी-छोटी आँखों और चिपके-चिपके चेहरे वाला, अपना चोगा, तो अब तक बायें कंधे पर ही लटक रहा था दायें कंधे तक खींच कर संतुलित करते हुए कहा- मी लार्ड ! क्या हालत है ? ये आजकल की पत्नियां !
जज ने उसको बीच में टोकते हुए कहा- कहने दो।

पति ने फिर कहना आरम्भ कर दिया। वह एक -एक बात स्पष्ट करने के तरीके से कहने का प्रयास कर रहा था। वह पक्ष को सत्य और यथार्थ जैसा आकार-प्रकार देने के लिए शब्दों को आत्मविश्वास के जल में धोकर निखार देना चाहता था-शुरू-शुरु में यह दिल की बात किया करती थी। विवाह के पहले इसकी दृष्टि में मनुष्य के शरीर में कोई भी अंग दिल से पवित्र और महान नहीं था। परंतु यह धीरे-धीरे दिमाग से काम लेने लगी। अब आप ही बताये सरकार ! आप तो न्यायकारी हैं, जो क्षेत्र मेरे लिये रिजर्व होकर रहना था इसने उसमें भी एन्क्रोचमेंट करना आरम्भ कर दिया। आरंभ क्या, अब तो ऐसा चक्कर चला दिया; मुझे लगता है, इसके भीतर या तो दिल कभी रहा ही नहीं, यदि रहा भी होगा तो वह अब इसके पास कतई नहीं है लगता है इसके पास जितना है, दिमाग ही दिमाग है। आप ही बताएं दाम्पत्य में सरलता लाने के लिये अकेला दिमाग पर्याप्त है क्या ? मुझे तो लगता है अकेला दिल अलबत्ता पर्याप्त होता है।

पति अपनी बात कह रहा था। सामने सुनते हुए जज के चेहरे पर पत्थर जैसा सन्नाटा जड़ा हुआ था। पति के वकील के चेहरे के पिचके हुए गालों के गड्ढे गर्व से उफना रहे थे। पत्नी का वकील अपने गोल चेहरे को लटकाए किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था। पति महोदय की दशा यह थी कि बोलने का तनाव उनके चेहरे पर लिपटा हुआ था। तर्क जैसी चपलता उनके चेहरे पर दूर-दूर तक कही दिखाई नहीं दो रही थी। पत्नी अबोध बनी सब सुनती जा रही थी।

पति ने कहना कंटीन्यु रखा- इसने अपने कमरे में चित्रकार जतिन बोस की ‘एस्टेटिक वूमैन’ नामक कलाकृति कुछ इस प्रकार टाग रखी है कि उससे लगता है यह लोक मर्यादा से इतनी दूर निकल गयी है जैसे अब कभी लौटकर नहीं आ सकती।
न्यायाधीश महोदय ऊंघते –ऊंघते रह गये। झुरझुरी सी लेकर वे उठ खड़े हुए। ‘वह चित्र अगले सप्ताह इसी दिन प्रातः दस बजे अदालत में प्रस्तुत किया जाए’, कहा और अपने कक्ष में विश्राम के लिये प्रविष्ट हो गये। शायद अधिक थक गये हों।

अगली तिथि को
न्यायाधीश महोदय की उपस्थिति में उस चित्र का पेकिंग खोला गया। न्यायाधीश भी मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत मिल जाते हैं। शुष्क कानून और नीरस संविधान की शल्य-क्रिया करते-करते इतने नीरस तो हो नहीं जाते कि आकर्षण नाम की अनुभूति से अनभिज्ञ ही बने रहें। उन्होंने भी सुन रखा है, जहां सौंदर्य दिखे वहीं उसकी प्रशंसा तो काम कर ही दें। अतः उनके मुंह से निकल ही पड़ा-क्या चित्र है ! अद्वितीय ! क्या इस पर ही झगड़ा है ?
इस पर पति का वकील सामाने आया-मी लार्ड ! चित्र पर नहीं। इसकी अभिव्यक्ति पर।
न्यायधीश ने पूछा- चित्र में अभिव्यक्ति कैसे व्यंजित होती है ?
-सर ! रेखओं, रंगों और ब्रुश के आघातों से।

-सर ! रेखाओं की गोलाई, मोटाई, दूरी और सुडौलता आदि, रंगों की रंगत और तीव्रता के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक सम्मिलित से। आघातों को तो सर ! सभी जानते हैं, सबल हो सकते हैं, माध्यम भी और न्यून अर्थात कोमल भी।

पत्नी का वकील जो अबकी बार सजग सा दीख रहा था बोल पड़ा – मी लार्ड मेरे लरनेड साथी एडवोकेट अदालत को गुमराह कर रहे हैं। चित्र के विषय में किसी चित्रकार से रिपोर्ट मंगाया जाना जरूरी है। सर ! कोर्ट इज ऑनली फार जस्टिस !
न्यायाधीश ने अपना सिर हामी में तीन बार उर्ध्वाधर हिलाया। पति –पत्नी तब ही देख पाये कि जज का सिर ठीक कपाल के ऊपर एक गोल चकत्ते में गंजा हो चुका है। पति की ओर अपनी पैसिंल की मूठ और अपनी ओर नोक करके जज ने फिर आज्ञा के स्वर में पूछा और कहना है ?
- हाँ सर अभी तो बहुत कुछ कहना है
- कहो ! अदालत का समय नष्ट क्यों कर रहे हो ?
- सरकार मैं तो अपने दर्द को बयान करने को पूरा समय चाहता हूँ। जिससे आप जैसे न्यायाकारी के होते हुए अदालत मुझे न्याय दिलवा सके।

- अनुनय-विनय नहीं, परेशानी कहो।
- सरकार यह किसी भी प्रकार के सम्बन्ध को सेलिब्रेट नहीं करती। इनवर्ड या आउटवर्ड। किसी को भी ऐसे नहीं कि संबंधों में थोड़ा बहुत जोश हो सके। इनवर्ड्स के बारे में,..... क्या कहूँ।

- कहते-कहते वह सकुचा गया। क्योंकि वह आंतरिक संबंधों की उन गहराइयों को खोलना चाहता था। जिनके लिये कुछ ऐसे शब्दों को बोलना पड़ सकता था। जिनको अदालत में बोलने पर धृष्टता मानी जा सकती थी। अतः अपने आप पर नियंत्रण करने के प्रयास में उसके चेहरे पर पसीने का छलक आना स्वाभाविक हो गया था। उसने इस पसीने को पोछने के लिये जेब में हाथ डाला तो रुमाल अनुपस्थित मिला, वह अपने दाहिने हाथ की हथेली से जब पसीना पोंछने लगा तो पत्नी ने अपने पर्स में से रुमाल इतनी फुर्ती से निकाला कि सभी को आश्चर्य हुआ। जब पत्नी ने उसके सामने अपना रुमाल किया तो उसने, ऐसी दिखावटी सहानुभूति के चिथड़े को अपने पास ही रखों, कहकर न्यायमूर्ति की ओर मुंह कर अपनी बात उच्चारनी आरंभ कर दी- अदालत में बहुत सी बातों को मेरा मतलब है शब्दों को उच्चारित करने की मनाही है। फिर भी एकदम प्राइवेट सम्बन्धों को जिनमें हम दोनों को मिल–जुलकर करेजियसली एंज्वाय करना चाहिए ऐसे क्षणों में भी आप मेरी पीड़ा समझ रहे है न ? न्यायपालक महोदय ! मैं क्या कहना चाह रहा हूँ ? ऐसे क्षणों को मधुर कैसे बनाया जा सकता है, यह या तो जानती ही नहीं या अपने आपकों ज्यादा शालीन दिखाने के चक्कर में सारी चीनी को रेत में तब्दील कर देती है। मेरे कहने का मतलब है हाँ; याद आया, रोमांस गोइंग डीप अप टू सोल, जैसी किसी स्थिति को यह जानती ही नहीं। यदि यह इतना जानते तो आत्म-मिलन का आत्म-संघर्ष में रूपान्तरण हो ही नहीं सकता।
- इतना समझाने- कहने और बताने में पति महोदय के माथे पर पसीने के लोट बहने लगे। अपने कीमती कोट की बहौलियों से पोछतें हुए वह अपनी बात पूरी कर सका। पत्नी से नहीं रुका गया- आप देख ही रहे हैं, इनकों पसीना पोंछने की संस्कृति की गंध तक नहीं छू सकी है, कह ही गयी।


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