ऋतुसंहार - मूलचन्द्र पाठक Ritusanhar - Hindi book by - Moolchandra Pathak
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ऋतुसंहार

मूलचन्द्र पाठक

प्रकाशक : विद्या विहार प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6036
आईएसबीएन :81-88140-89-9

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प्रस्तुत है पुस्तक ऋतुसंहार ...

Ritusanahar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘ऋतुसंहार’ संभवतः महाकवि कालिदास की काव्य-प्रतिभा का प्रथम प्रसाद है, जिससे पाठक वर्ग प्रायः वंचित ही रहा है। ‘ऋतुसंहार’ का शाब्दिक अर्थ है- ऋतुओं का संघात या समूह। इस काव्य में कवि ने छह ऋतुओं का छह सर्गों में सांगोपांग वर्णन किया है। कवि ने ऋतु-चक्र का वर्णन ग्रीष्म से आरंभ कर प्रावृट् (वर्षा), शरद्, हेमंत व शिशिर ऋतुओं का क्रमशः दिग्दर्शन कराते हुए प्रकृति के सर्वव्यापी सौंदर्य माधुर्य एवं वैभव से सम्पन्न वसंत ऋतु के साथ इस कृति का समापन किया है।  

प्रत्येक ऋतु के संदर्भ में कवि ने न केवल संबंधित कालखंड के प्राकृतिक वैशिष्ट्य, विविध दृश्यों व छवियों का चित्रण किया गया है बल्कि हर ऋतु में प्रकृति-जगत् में होनेवाले परिवर्तनों व प्रतिक्रियाओं के युवक-युवतियों व प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रणय-जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का भी रोमानी शैली में निरूपण व आकलन किया है। प्रकृति के प्रांगण में विहार करनेवाले विभिन्न पशु-पक्षियों तथा नानाविध वृक्षों, लताओं व फूलों को भी कवि भूला नहीं है। व भारत के प्राकृतिक वैभव तथा जीव जन्तुओं के वैविध्य के साथ-साथ उनके स्वभाव व प्रवृत्तियों से भी पूर्णतः परिचित है। प्रस्तुत काव्य को पढ़ने से भारत की विभिन्न ऋतुओं का सौंदर्य अपने संपूर्ण रूप में हमारी आँखों के समक्ष साक्षात् उपस्थित हो जाता है।

आशा है, मुक्त शैली में रचित यह काव्यानुवाद सुधी पाठकों को पंसद आएगा।

भूमिका

संस्कृत के रससिद्ध मूर्धन्य महाकवि कालिदास की सात कृतियाँ परंपरा से प्रसिद्ध रही हैं, जिसमें से दो  महाकाव्य, तीन नाटक एवं दो खंडकाव्य हैं। खंडकाव्यों में ‘मेघदूत’ को विश्ववव्यापी ख्याति मिली है, किंतु दुर्भाग्य से ‘ऋतुसंहार’ काव्य-प्रेमियों के बीच उतना लोकप्रिय एवं सुपरिचित नहीं रहा। विख्यात टीकाकार कालिदास के ‘मेघदूत’, ‘कुमारसंभव’ व  ‘रघुवंश’ पर तो टीकाएँ लिखी हैं। किंतु ‘ऋतुसंहार’ उनकी टीका से  वंचित रहा। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने जहाँ कालिदास की अन्य कृतियों के अंशों को अपने ग्रन्थों में उदधृत करना आवश्यक माना, वहाँ ‘ऋतुसंहार’ को उन्होंने इस महत्त्व का अधिकारी नहीं समझा। मल्लिनाथ व काव्यशास्त्र के आचार्यों की इस उपेक्षापूर्ण दृष्टि से कुछ विद्वानों ने तो यह निष्कर्ष निकाल लिया कि ‘ऋतुसंहार’ संभवतः कालिदास  की कृति ही नहीं है; किन्तु अधिकांश विद्वान् इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं करते तथा इस काव्य को निश्चित रूप से कालिदास की ही रचना मानने के पक्ष में है।

‘ऋतुसंहार’ का शाब्दिक अर्थ है ऋतुओं का संघात या समूह। इस काव्य में कवि ने भारतवर्ष में प्रतिवर्ष आनेवाली छह ऋतुओं का छह सर्गों में वर्णन किया है। इस प्रकार विषयवस्तु की दृष्टि से यह एक प्रकृति काव्य है। कवि ने भारत के वार्षिक ऋतुचक्र का वर्णन ग्रीष्म से आरंभ किया है और फिर प्रावृट् (वर्षा), शरत्, हेमंत व शिशिर ऋतुओं का क्रमशः दिग्दर्शन कराते हुए प्रकृति के सर्वव्यापी सौंदर्य, माधुर्य व वैभव से संपन्न वसंत ऋतु के साथ इस कृति का समापन किया है।

प्रत्येक ऋतु के संदर्भ से संपन्न वसंत ऋतु के साथ इस कृति का समापन किया है।
प्रत्येक ऋतु के संदर्भ में कवि ने न केवल संबंधित कालखंड के प्राकृतिक वैशिट्य, विविध दृश्यों छवियों का ही चित्रण किया है, बल्कि हर ऋतु में प्रकृति-जगत् में घटित होने वाले परिवर्तनों व प्रक्रियाओं के युवक-युवतियों व प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रणय-जीवन पर पड़नेवाले प्रभावों का भी रोमानी शैली में निरूपण व आकलन किया है। इस प्रकार यह एक ओर काव्य है तो दूसरी ओर प्रकृति की विशिष्ट पृष्ठभूमि में अपने आतंरिक व बाह्य सौंदर्य को उद्घाटित करनेवाले  मानवीय प्रणय की विविध भंगिमाओं व संवेदनों का साक्षात्कार करानेवाला काव्य भी है। यही विशेषता इसे कालिदास की कृति सिद्ध करनेवाला सबसे प्रबल प्रमाण कही जा सकती है, चाहे मल्लिनाथ ने इसपर अपनी टीका न रची हो और संस्कृत के अलंकारशास्त्रीय आचार्यों ने भी इसमें पद्यों को भी  विविध काव्य-तत्त्वों के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया हो।  
वस्तुतः ‘ऋतुसंहार’ कालिदास के कवि जीवन की, उनके उभरते यौवन काल की प्रारंभिक रचना है, जिसमें प्रकृति, प्रेम व सौंदर्य संबंधी उनकी उदीयमान दृष्टि व मनोभावों का उन्मीलन हुआ है। यह  संभवतः उनके सारस्वत जीवन की आद्य अभिव्यक्ति है, जिसमें उनकी काव्य-भावना, रस-संवेदना एवं अभिव्यक्ति-कला विकास के प्राथमिक सोपानों पर अपने पाँव जमाती दृष्टिगत हैं।

शायद उनकी काव्य-साधना की इस अनतिप्रौढ व अभ्यास परायणता अवस्था को देखकर ही मल्लिनाथ ने इस कृति पर टीका लिखना जरूरी नहीं समझा और प्रौढ़ व चमत्कारमय पद्यों की तलाश में होनेवाले काव्यशास्त्रीय आचार्यो ने भी सरल, बोधगम्य व चमत्कार-प्रदर्शन की प्रवृत्ति से प्रायः विमुख इस काव्य के पद्यों को अपने ग्रंथों में उदाहरण के लिए नहीं अपनाया पंडित्य व चमत्कृति से पूर्ण काव्यों को विशेष महत्व देने वाले संस्कृत काव्य-रसिकों ने भी शायद इसीलिये इस काव्य की ओर यथोचित ध्यान नहीं दिया। किन्तु हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि कालिदास की भावी रस-स्निग्ध, भाव-प्रणव व प्रौढ़ काव्यशैली के आरंभिक बीज इस ‘ऋतुसंहार’ में भलीभांति देखे जा सकते हे  और प्रकृति एवं मानव को चैतन्य की एक धारा में एकसूत्रित करनेवाली उनकी काव्य- संवेदना के स्पंदनो को भी इस कृति के कलेवर में सुस्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। कालिदास की कोमलता –कांत पदावली, बोधगम्य सरल शैली उनकी रोमानी (कालिदासो विलासः) तथा प्रकृति व मानव को एक ही धरातल पर समकक्ष रूप में स्थापित कर उनकी अद्वैत सत्ता की पहचान करानेवाली उनकी मूलभूत काव्य-चेतना का भी इस कृति में स्पष्टतः अवलोकन किया जा सकता है। अतः इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि ‘ऋतुसंहार’ कालिदास की ही कृति है; यद्यपि उनकी काव्य कला अभी अपनी यौवन की दहलीज पर खड़ी दिखाई देती है।

लौकिक संस्कृत काव्य की परंपरा में प्रकृति-वर्णन की प्रवृत्ति आदिकाव्य रामायण के काल से ही चली आ रही है। रामायण के अनेक स्थलों में वाल्मीकि ने विभिन्न ऋतुओं के मनोहारी दृश्यों व सौंदर्य का कथा के विकास की स्थितियों व पात्रों के मनोभावों के  साथ जोड़कर अत्यंत प्रभावी चित्रण किया है। कालिदास अपने काव्य-आदर्श के लिये किसी सीमा तक वाल्मीकि के ऋणी रहे हैं, अतः उनकी कृतियों में भी प्रकृति-सौंदर्य के विभिन्न स्वरूपों, उपादानों, छवियों तथा मानव प्रकृति के आंतरिक संबंधों की भावमयी कल्पनाओं को स्थान-स्थान पर देखा जा सकता है। ‘मेघदूत’ में वर्षा का, ‘कुमारसंभव’ में वसंत का तथा ‘रघुवंश’ में शरत् ग्रीष्म आदि विभिन्न ऋतुओं का कवि ने अपने काव्य-पात्रों की मनःस्थितियों के संदर्भ में अतीव कलात्मकता व भावमय निरूपण किया है। संस्कृत के अन्यान्य कवियों ने भी अपने काव्यों व नाटकों की कथाओं व पात्रों को प्रकृति के साथ जोड़कर या प्रायः उसी के परिवेश में प्रस्तुत किया है। यह अवश्य है कि बाद के कवियों ने प्रायः कल्पनारंजित व आलंकारिक प्रयोग अधिक किया है; उनकी कृतियों में प्रकृति का वैसा सूक्ष्म निरीक्षण, साक्षात् परिचय तथा उसके आतंरिक सौंदर्य में रमने की क्षमता दृष्टिगत नहीं होती, जैसी कि कालिदास के काव्य-नाटकों में पद-पद पर देखने को मिलती है।

‘ऋतुसंहाहार संभवतः कालीदास की काव्य प्रतिभा का प्रथम प्रसाद है, जिससे पाठक-वर्ग प्रायः वंचित ही  रहा है; यहाँ तक कि संस्कृत काव्य के सामान्य अध्येताओं ने भी उसकी ओर कम ही ध्यान दिया है। फिर जो संस्कृति से अनभिज्ञ हैं, उन काव्य पाठकों को तो ‘ऋतुसंहार’ से अपरिचय के लिए कोई दोष ही नहीं दिया जा सकता।

प्रस्तुत कृति में कालिदास की इसी प्रारंभिक किंतु संभावनापूर्ण काव्य-प्रतिभा के प्रथमोन्मेष का टटका सौंदर्य अपनी विभिन्न भंगिमाओं में व्यक्त हुआ है। प्रत्येक ऋतु के मानव –जीवन पर, पड़नेवाले प्रभावों को कालिदास ने बड़े रोमांटिक ढंग से इस कृति में हमारे सामने रखा है। अनेक पद्य तो प्रिया या प्रेयसी को संबोधित करके रचे गए हैं। प्रत्येक सर्ग के अंतिम पद्य में कवि ने संबोधित ऋतु के अपने समस्त  वैभव व सौंदर्यपूर्ण उपादानों के साथ सभी के लिए मंगलकारी होने का अभ्यर्थना की है। प्रकृति के प्रांगण में विहार व निवास करनेवाले विभिन्न पशुओं, पक्षियों तथा भारत में फूलनेवाले नानाविध वृक्षों, लताओं व फूलों को भी कवि भूला नहीं है। वह भारत के प्राकृतिक वैभव तथा जीव-जन्तुओं के वैविध्य के साथ-साथ उनके स्वभाव व प्रवृत्तियों से भी अच्छी तरह से परिचित है। यही कारण है कि इस काव्य को पढ़ने से भारत की विभिन्न ऋतुओं का सौंदर्य अपने संपूर्ण रूप में हमारी आँखों के आगे साक्षात् उपस्थित हो जाता है। यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रकृति-जगत् का यह वैभव अपने प्रतिवेशी मानव से  निरपेक्ष नहीं है। कवि ने हर जगह उसे युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं की मिलन-कामना और प्रयणोत्कंठा के संदर्भ में ही प्रस्तुत किया है। यहाँ यह भी कहना उचित होगा कि कवि ने प्रायः सामंती उच्च वर्ग के सीमित दायरे में ही प्रणय-जीवन की विभिन्न अनुभूतियों व प्रवृत्तियों के चित्र उकेरे हैं। इससे स्पष्ट है कि कवि स्वयं इसी वर्ग से संबन्ध रखता था या कम-से-कम इसी वर्ग के जीवन से अधिक निकटता से परिचित था।

ऋतुसंहार’ का यह हिन्दी अनुवाद छंदो के बंधंन से रहित मुक्त शैली में किया गया है। आजकल हिंदी कविता प्रायः इसी शैली में लिखी जा रही है, अतः पाठकों को यह अनुवाद-पद्धति अधिक रास आएगी, यही सोचकर इस शैली को अपनाया गया है। पूर्व में भर्तृहरि के तीनों शतकों का अनुवाद भी इसी शैली में किया गया था, जो लोगों को पसंद आया।


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