मृत्युंजयी ऊधम सिंह - जियालाल आर्य Mrityunjayi Udham Singh - Hindi book by - Jiyalal Aarya
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उपन्यास >> मृत्युंजयी ऊधम सिंह

मृत्युंजयी ऊधम सिंह

जियालाल आर्य

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6088
आईएसबीएन :97-81267-1487-2

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प्रस्तुत है पुस्तक मृत्युंजयी ऊधम सिंह ....

Mrityunjayi Udham Singh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘मेरे जीवन का लक्ष्य है-क्रान्ति। क्रान्ति जो हमारे देश को स्वतंत्रता दिला सके। मैं अपने देशवासियों को इस उपन्यास के माध्यम से यह सन्देश देना चाहता हूँ कि हे देशवासियों मैं तो शायद नहीं रहूंगा परन्तु आप लोग अपने देश की स्वाधीनता के लिए अन्तिम श्वास तक संघर्ष करना। अँग्रेजी शासन को समाप्त करना और ऐसी स्थिति उत्पन्न करना कि भविष्य़ में कोई भी विदेशी शक्ति हमारे देश को कभी भी गुलाम न बना सके।’’

‘‘जज साहब इस प्रश्न से लगता है कि मेरी बातों ने आपकी आत्मा को कहीं स्पर्श किया है। नाम में क्या रखा है। ये सब मेरे ही नाम हैं जो समय और परिस्थिति वश आए और चले गए। मेरा अन्तिम नाम है राम मुहम्मद सिंह आज़ाद। यहाँ पर ‘राम’ शब्द का प्रयोग हिन्द के लिए, ‘मुहम्मद का मुसलमान के लिए, ‘‘सिंह का सिख और ‘आज़ाद’ अपने देश के लिए।’’
मृत्युंजयी ऊधम सिंह, अपने ढंग के अनूठे रचनाकार जियालाल आर्य का उपन्यास है, जिसे शहीद ऊधम सिंह का ज़िन्दगी नामा कहा जा सकता है।
ऊधम सिंह के बचपन से लेकर उनकी शहादत तक की कहानी यहाँ क़िस्सागोई शैली में बयान की गई है।

शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के संगरूर जनपद के सुनाम गाँव में हुआ था। उनकी जिन्दगी काफी जद्दोजहद-भरी रही। बचपन में ही अन्नाय, अनीत और शोषण के प्रति उनके मन में तीव्र प्रतिकार-भाव था, जो आगे चलकर उन्हें देशभक्त क्रान्तिकारी बनाने में सहायक हुआ। सर्वधर्म-समभाव की वह ज़िन्दा मिसाल थे। उन्होंने अपना नाम ‘राम मुहम्मद सिंह आज़ाद’ रख लिया था। यही कारण रहा है कि वह हर भारतीय के अपने थे-चाहे वो हिन्दू हो, मुसलमान हो, या सिख। उन्हें 31 जुलाई, 1940 को फाँसी दे दी गई थी उनकी शहादत के बाद हिन्दुओं ने अस्थि विसर्जन हरिद्वार में किया तो मुसलमानों ने फतेहगढ़ मस्जिद और सिखों ने करंत साहब में अपने-अपने रीति-अनुसार उनकी अन्तयेष्टि सम्पन्न की थी।

भाषा इतनी सहज कि बस्स पढ़ते चले जाएँ उपन्यास वर्क़-दर-वर्क़। इतिहास को पठनीय कैसे बनाया जाए-यह उपन्यास इसका जीवन्त साक्ष्य है।

आमुख


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशाँ होगा।।


इन पंक्तियों को हम अपने आप वर्षों से सुनते आ रहे हैं, पर एक प्रश्न बार-बार उठता है चिन्तन में कि क्या ऐसा हो रहा है ? सर्वेक्षण से लगता है कि कुछेक शहीद, जिनका नाम लेने से राजनीतिक दलों को किसी रूप में लाभ मिलता है, उनकी जयंती और पुण्यतिथी मनाई जाती है। कुछ ऐसे भी शहीद हैं जो बड़े घरानों से संबंधित है, उनको भी स्मरण किया जाता है, परन्तु ऐसे अनगिनत शहीद हैं जिन्होंने मन-वचन-कर्म से ही नहीं अपितु अपने तन-मन-धन से स्वाधीनता पाने के लिए सब कुछ आहूत कर दिया परन्तु उनका न तो कोई स्मारक बना, न उनके नाम पर प्रेरणार्थ कोई एवार्ड घोषित हुआ और न ही सार्वजनिक रूप में उनका स्मरण किया जाता है। ऐसे ही एक शहीद हुए ऊधम सिंह, जिनकी श्रद्धांजलि-स्वरूप यह औपन्यासिक कृति आपके सक्षम प्रस्तुत है।

सरदार ऊधम सिंह का नाम कब और कैसे ज्ञात हुआ, स्मरण नहीं है परन्तु उनके चरित्र ने मुझे लिखने को प्रेरित किया, जिससे आगे की पीढ़ी भी उनके वलिदान से प्रेरणा ग्रहण करती रहे। यह उपन्यास 2005 में लिखा गया था, परन्तु मेरी इच्छा थी कि जब तक उन स्थलों का स्वयं दर्शन न कर लूँ, जिनसे शहीद ऊधम सिंह का किसी न किसी रूप में सम्बन्ध रहा है, तब तक तथ्यों को ईमानदारी से लिखा गया मानने में कठिनाई होगी। मैं ऐसे अवसर की खोज में रहा। वह अवसर मिला सितम्बर 2006 में।

5 सितम्बर, 2006 को पंजाब मेल से राजपुरा के लिए प्रस्थान किया- अमेठी से। साथ में मेरी पत्नी कल्पना आर्या भी थी। सहयात्री होने से यात्रा का आनन्द सुखदायी होता है। गाड़ी से ही स्वमित्र सरदार सुरजीत सिंह को अपनी यात्रा के बारे में अवगत कराया। वे रोपड़ में थे। उन्होंने सलाह दिया कि मैं राजपुरा न जाकर अम्बाला में ही उतर जाऊँ। वे वहीं पर मुझे मिल जाएँगे। मैंने ऐसा ही किया। और 6 सितम्बर को सुबह उनसे साक्षात्कार हुआ। साथ में सारथी स्वरूप थे उनके कर्म शील पुत्र राजू। अम्बाला स्थिति लोक काल विभाग के निरीक्षण भवन के करीब दस बजे हम लोगों ने कार से पटियाला के लिए प्रस्थान किया। आशा थी कि पटियाला के गुरुद्वारा में शहीद ऊधम सिंह के बारे में पर्याप्त साहित्य मिल जाएगा।
पटियाला गुरुद्वारा की सभ्यता, स्वच्छता एवं कर्मशीलता मन-प्राण को आन्दोलित करनेवाली थी। सरोवर में चंचल मीनों का जलनृत्य मनोहारी था। गुरुद्वारे की सजी दुकानों पर ऊधम सिंह से सम्बन्धित साहित्य का अन्वेषण करता रहा। हिन्दी या अंग्रेजी में एक भी पुस्तक उपलब्ध नहीं थी। गुरुमुखी में एक पुस्तक मिली। सुरजीत सिंह ने कहा वह पुस्तक पढ़कर महत्त्वपूर्ण उपयोगी बातों से अवगत कराएँगे।

पटियाला में ही सुनाम गाँव पर पहुँचने के मार्ग का पता लगाया गया। सुनाम गाँव ऊधम सिंह का जन्म-स्थल है जो संगरूर जनपद का एक प्रसिद्ध गाँव हो गया है। हम लोग सुनाम के लिए प्रस्थान किए। रास्ते में धान के हरित खेत सड़क के दोनों ओर झूमते हुए लोग। इन खेतों में ही पंजाब की समृद्धि भरी है। करीब दो घण्टे की यात्रोपरान्त पूछते-पाछते उस पवित्र मकान पर पहुँच गए, जहां 26 दिसम्बर, 1899 में शेर सिंह उर्फ ऊधम सिंह का जन्म हुआ था।

श्री एस.एस. गिल, मानुमेन्द क्लक्र से साक्षात्कार हुआ। उन्होंने बताया कि शहीद ऊधम सिंह का एहलौकिक पदार्पण इसी कक्ष में हुआ। यह कक्ष या मकान सुनाम के रायपुरिया मुहल्ला में अवस्थित है। करीब पांच साल पूर्व इस स्थल को पुरातत्व विभाग पंजाब एन्सियन्ट एवं हिस्टोरिकल मॉनुमेन्ट और आरकियोलॉजकल साइट्स एवं रिमेन्ड ऐक्ट 1964 के अन्तर्गत अधिगृहीत किया था। इसमें एक कक्ष तथा पीछे की ओर छोटा-सा खुला स्थान था जिसमें एक किचेन एवं स्नानागार बनाया गया है। इस कक्ष में दुर्लभ चित्र और अभिलेख रखे गए हैं; यथा-ऊधम सिंह के चित्र जो लन्दन और यहाँ से प्राप्त हुए। इनमें से एक चित्र 1937 का है जिसे गुरु नानक जयन्ती के प्रकाशोत्सव पर शेफर्ड बुश ने लन्दन में लिया था। ऊधम सिंह के चचेरे भाई चंचल सिंह, जो अन्धे थे और चचेरी बहन आशा कौर के चित्र भी दिवाल पर शोभायमान दिखे। अन्य चित्रों में मानजज पर सायरिल एटकिसन, जिन्होंने ऊधम सिंह को फाँसी की सजा सुनाई थी, लेफ्टिनेन्ट गवर्नर ओ डायर और राज्य सचिव जेटलैण्ड के हैं। शहीद ऊधम सिंह के द्वारा लिखे गए पत्रों और उनसे सम्बन्धित अन्य अभिलेखों को सहेज कर रखा गया है जिसका उपयोग शोधकार्य के लिए किया जा सकता है। एक पत्र जिसे ऊधम सिंह ने पेन्टनविला प्रिजन (Pentonville Prison) से लिखा था, यहां उद्धृत हैं-


Pentonville Prison
07 .06 .1940

Dear Sir,
Would you please be good enough to forward on to me the Sikh Prayer Book (Gutka).
It would be greatly appreciated.
Yours faithfully
Mohammad Singh Azad.

सन्दर्भित गुटका को काराप्रशासन ने जब्त कर लिया था।
शहीद ऊधम सिंह के पिता श्री टहल सिंह और माताश्री नरायण कौर थीं। उनके परिवार का एक वंशवृक्ष कार्यालय में रखा गया है, जिसे नीचे दिया जा रहा है। इससे उनकी जाति धर्म पेशा एवं पैतृक आवास आदि के बारे में बहुत सी भ्रान्तियाँ स्पष्ट हो सकेंगी।

यह तो सर्वमान्य है कि शहीद ऊधम सिंह का जन्म स्थान या जद्दीधाम जिला संगरूर के ग्राम सुनाम मोहल्ला रायपुरिया है। उनके पूर्वज यहीं के थे या कहीं से आकर बस गए थे, इस पर मतैक्य नहीं है। डॉ. माता प्रसाद पूर्व राज्यपाल अरुणाचल ने लिखा है, ‘‘ऊधम सिंह के माता-पिता श्रीमती नायायणी देवी और चूहड़ राम चमार-जाटव उत्तर प्रदेश के एटा जनपद के पटियाली गाँव के निवासी थे। सन् 1857 ईं. के बाद अपना जीवन-निर्वाह करने के लिए वे सुनाम जिला संगरूर, पटियाला, पंजाब चले आए थे। एक समय पंजाब के बड़े सिख सरदारों के फार्म, फैक्ट्री और ईंट के भट्ठों पर आसानी से मजदूरी का काम मिल जाता था। सरदार धन्ना सिंह ओवरसियर ने चूहड़ राम को अन्य श्रमिकों के साथ सुनाम से तीन मील दक्षिण नीलोबाल नहर पर काम में लगा लिया।’’ (भारत में परिवर्तन के प्रेरणास्रोत- डॉ. माता प्रसाद पृ. 213)

उपयुक्त बातों का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। शहीद ऊधम सिंह के जन्म गृह की दीवारें ‘नानक शाही’ ईटों से निर्मित थीं, जिनके अवशेष आज भी दृष्टव्य हैं। इससे लगता है कि ऊधम सिंह का परिवार यहाँ पर कई सदियों से रह रहा था। ऊधम सिंह के परिवार में मौजूद उनकी चचेरी बहन आशा कौर के पुत्र श्री बचन सिंह से सुनाम में साक्षात्कार हुआ। वे कृषि कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके मामा ऊधम सिंह का परिवार सुनाम में कब से निवासित हैं। चूहड़ सिंह उर्फ टहल किसी को भी नहीं है। कई पुश्त से यहीं पर रह रहे हैं। चूहड़ सिंह उर्फ टहल सिंह के पिता बसाऊ भी इसी ग्राम के निवासी थे। चूहड़ सिंह ने गुरुद्वारा में अमृत चखा और सिख धर्म अपनाकर टहल सिंह हो गए। वे रेलवे में गेटकीपर थे। इन बातों से स्पष्ट है कि वे एटा के नहीं बल्कि संगरूर जनपद के ग्राम सुनाम के मूल निवासी थे। उन दिनों यह जनपद पटियाला का अंग था।

डॉ. माता प्रसाद ने सरदार धन्ना सिंह और सरदार चंचल सिंह का उल्लेख किया, जिन्होंने टहल सिंह दम्पति को सिख धर्म में दीक्षित कराया। इसका कोई प्रमाण नहीं है। ऊपर दिए गये वंशवृक्ष से स्पष्ट होगा कि चौथी पीढ़ी के रामदयाल सिख धर्म में दीक्षित होकर सरदार धन्ना सिंह हो गए थे। काकू उर्फ चंचल सिंह सरदार टहल सिंह के सहोदर और ऊधम सिंह के चाचा थे।

ऊधम सिंह के पूर्वजों की जाति और पेशा के बारे में जो भी जानकारी उपलब्ध है, उनके अनुसार वे ‘कमोऊँ जाति’ के थे, जिनका पेशा था, लकड़ी और लोहेका काम करना यथा बुनकरों का ताना-बाना, धान कूटने की ओखली कृषि कार्य के औजार, हल और जुआठ और लोहें के फाल आदि बनाना। इसके अतिरिक्त अधिकांश लोग कमाने या मजदूरी करते थे। संगरूर जनपद में ‘कमोऊं’ की अधिसंख्यता के कारण ‘कमोडिया देश’ भी कहा जाता था। सरदार चंदा सिंह ने भी ऊधम सिंह को अनाथाश्रम में उनके पैतृक पेशा लकड़ी का काम करना सिखाते थे। इसका उल्लेख कहीं से भी नहीं मिल पाया कि ऊधम सिंह के परिवारजन कभी चमड़े का काम करते रहे होंगे।

शहीद ऊधम सिंह जाति और धर्म, पेशा से ऊपर थे। वे भारत माता के सपूत थे। सपूत रहेंगे। प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ नाम रखकर ऊधम सिंह जाति और धर्म से काफी अलग और ऊँचे जा खड़े हुए।

सुनाम में ‘सीतासर धाम’ आज भी है। इसी धाम में ऊधम सिंह की माताश्री नारायणी देवी उर्फ नारायणी कौर पुत्रप्राप्ति के लिए श्रद्वावनत् होती थी। ‘सीतासर धाम’ के सामने ‘शहीद ऊधम सिंह स्मृति कक्ष’ का निर्माण प्रगति पर है। पंजाब सरकार ने प्रेरणापुरुष शहीद ऊधम सिंह को जन-जन तक पहुँचाने का कोई विशेष उल्लेखनीय काम नहीं किया है, यद्यपि निजी क्षेत्र में उनके नाम पर कालेज, मेडिकल कालेज अभियंत्रण कालेज आदि कार्यरत हैं।

शहीद ऊधमसिंह शहादत के करीब तीन साल बाद ज्ञानी जैल सिंह ने पहल की। शहीद ऊधमसिंह के अस्थि अवशेषों को लंदन से भारत लाने की मुहिम-सी छेड़ दी। परिणाम अच्छा रहा। ज्ञानी जैल सिंह ने 19 जुलाई 1974 को ऊधम सिंह के अस्थि अवशेष भारत लाने का यशस्वी काम किया। इन अवशेषों को दिल्ली के सुनाम, अमृतसर आदि स्थानों पर लोक दर्शनार्थ रखा गया और अन्ततः हरिद्वार, अनंत साहिब और फतेहगढ़ में उनकी इच्छानुसार रखा गया। हरिद्वार में गंगा के पवित्र जल क साथ ऊधमसिंह के अवशेष खेत-खलिहानों में, भारतवासियों को मन में और भारत माता के क्षिति हृदय में सम्मानित हुए।
ज्ञानी जैल सिंह ने सम्मान स्वरूप आशाकौर को 1000 रू. पेंशन स्वीकृत की। ऊधम सिंह के परिवार में उस समय वही जीवित थीं, यह बात आशाकौर के सुपुत्र श्री बच्चन सिंह ने बताई थी।

सुश्री मायावती ने देश को सम्मानित करने वाले और स्वाधीनता आन्दोलन की आग को अपनी शहादत से लहकाने वाले सपूतों के स्मरणार्थ उत्तर प्रदेश के जनपदों का नामकरण किया। शहीद ऊधमसिंह के नाम पर हरिद्वार को शहीद ऊधम सिंह नगर नाम दिया।

सुनाम से फतेहगढ़ आया। यहाँ पर गुरु गोविन्द सिंह के दो कनिष्ठ पुत्रों, जारावर सिंह और फतेह सिंह को दीवार में जीवित चुना दिया गया था। उन्हीं के नाम पर फतेहगढ़ और फतेहगढ़ गुरुद्वारा को स्थापित किया गया। इसी गुरुद्वारा के पूरब में मोहम्मद उर्फ ऊधम सिंह के अवशेष सुरक्षित हैं।


7 सितम्बर, 2006 को सरदार सुरजीतसिंह और सरदार इन्दर सिंह के साथ रोपड़ से अमृतसर के लिए हम लोगों ने प्रस्थान किया। मेरी भार्या कल्पना आर्या के साथ निरन्तर बना रहा। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में माथा टेका और अमृतसर-वाघा सीमा के बीच अवस्थित पुतलीबाई अनाथालय होते हुए वाघा बार्डर पर सायंकाल रिट्रीटोत्सव का साक्षात्कार किया। भारत और पाकिस्तान के भाईचारा का अनूठा आकर्षण दृश्य हर भारतीय को देखना चाहिए।

8 सितम्बर, 2006 की सुबह स्मर्णीय रही। स्वर्ण मंदिर के नैसर्गिक वातावरण में आध्यात्मिक मन जागृत हो गया। पड़ोस में स्थित जलियाँवाला बाग का परिभ्रमण एवं अध्ययन किया। यहाँ आते ही जलियाँवाला नरसंहार का स्मरण हो जाता है। शहीद ऊधमसिंह जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के प्रत्यक्षदर्शी थे और यहीं पर उन्होंने डायर को गोली मारने की भीष्म प्रतिज्ञा की थी।






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