कहानी एक नेता जी की - श्रवण कुमार गोस्वामी Kahani Ek Netaji Ki - Hindi book by - Shravan Kumar Goswami
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कहानी एक नेता जी की

श्रवण कुमार गोस्वामी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :191
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 616
आईएसबीएन :81-7028-605-0

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प्रस्तुत है आज के युग के नेता का, जन्म से नेता बनने तक का अत्यन्त रोचक मनोवैज्ञानिक चित्रण....

Kahani Ek Netaji Ki - A hindi Book by - Shravan Kumar Goswami कहानी एक नेता जी की - श्रवण कुमार गोस्वामी

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

जाने-माने साहित्यकार श्रवणकुमार गोस्वामी का नवीनतम उपन्यास है-? ‘कहानी एक नेताजी की’।
यह युग नेताओं का युग है। नित नये नेता पैदा हो रहे हैं। धरती से अनायास फूटने वाले, कुकुरमुत्तों की तरह।

यह उपन्यास एक ऐसे ही नेता का अत्यन्त रोचक मनोवैज्ञानिक चित्रण हैं, उसके बचपन से लेकर क्रमशः नेताजी बनकर उभरने तक। आज के समाज का, आज की राजनीति का दर्पण है यह उपन्यास। इस उपन्यास का कथानक अपने ढंग का है, शैली नई और घटनाओं के चित्रण में मौलिकता।

कहानी एक नेताजी की

जंगल जहाँ खत्म होता है, वहीं पर एक गाँव है। उस गाँव में एक विधवा रहती थी। उसका नाम भगजोगनी था। उसका एक बेटा था। वह दस साल का था। वह गाँव के लोगों की बकरियाँ, गायें तथा भैंसें चराने का काम किया करता था। ढोरों को चराने से थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी। भगजोगनी गाँव में कुटौना-पिसौना का काम कर लिया करती थी। इस तरह दोनों माँ-बेटे का गुजारा हो रहा था।

भगजोगनी की बड़ी इच्छा थी कि उसका बेटा पढ़-लिख ले। उसने सुना था कि पढ़-लिख लेने से आदमी बड़ा बन जाता है। उसे सरकार नौकरी दे देती है। तब उसकी आमदनी बढ़ जाती है। पढ़े-लिखे आदमी के पास धन की कोई कमी नहीं रहती है। इसलिए वह अपने बेटे को पढ़ाना-लिखाना चाहती थी। लेकिन उसका बेटा पाठशाला का नाम सुनते ही रोने लग जाता था। उसे तो ढोर चराना ही पसंद था।

भगजोगनी के बेटे का नाम बलदेव था। मगर गाँव के लोग उसे बल्ली कह कर पुकारा करते थे। भगजोगनी भी अपने बेटे को इसी नाम से पुकारा करती थी। बल्ली सुबह के समय गाँव के ढोरों को एक जगह जमा करता और उन्हें चराने के लिए जंगल की तरफ चला जाता था। सूरज डूबने के पहले वह ढोरों को लेकर गाँव लौट आता था। उसे पशुओं को चराने में बड़ा सुख मिलता था। उसने हर पशु का कोई न कोई नाम तय कर दिया था। वह सबको नाम से ही पुकारा करता। जब पशु जंगल में चरने लग जाते, तब बल्ली जंगल में घुस कर तरह-तरह के फल तोड़ कर खाने लग जाता।

बल्ली को भूख बहुत लगती थी। इसलिए वह इसकी भी चिन्ता नहीं करता था कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए। उसे जो कुछ भी मिलता वह खा लेता। वह अपने पास बराबर एक गुलेल रखता था। गुलेल की सहायता से वह पेड़ में काफी ऊँचाई तक लटक रहे जंगली फलों को भी आसानी से तोड़ लिया करता था। वह अपनी गुलेल से कभी-कभी खरगोश तथा पक्षियों का भी शिकार कर लिया करता था।

बल्ली की माँ अपने बेटे की भूख से बहुत परेशान रहा करती थी। कभी-कभी तो उसे भूखा ही रह जाना पड़ता था। वह माँ थी न, इसलिए उसकी यही कोशिश रहती थी कि उसके बेटे का पेट खाली न रहे। मगर बल्ली का पेट इतना बड़ा था कि उसमें कुछ भी डाल दो, उसका कुछ पता ही नहीं चलता था। पहले तो भगजोगनी यही सोचती थी कि उसका बेटा दिन भर ढोर को चराता है, इसलिए उसे इतनी भूख लगती है।

लेकिन उसे जल्द ही यह भी पता लग गया कि उसका बेटा जंगल में भी खाता ही रहता है। इसलिए भगजोगनी ने यह जानकर संतोष तो कर लिया कि उसका बेटा असल में पेटू है।
हर रोज की तरह उस दिन भी बल्ली अपने ढोरों को चरा रहा था। वह अपने काम में मशगूल था। इसलिए उसे यह मालूम भी नहीं हो सका कि उसके सामने कोई खड़ा है, जो उसे बड़े ध्यान से देख रहा है। अचानक बल्ली की नजर उस व्यक्ति पर पड़ गई। उसने आगे बढ़कर उसके चरणों पर अपना माथा रखते हुए कहा—‘‘परनाम साधु बाबा।’’

‘‘यशस्वी बनो !’’ साधु बाबा ने बल्ली के माथे पर अपना दाहिना हाथ रख दिया। इससे बल्ली को यह तो पता चल गया कि साधु बाबा ने उसे आशीर्वाद दिया है, पर वह ‘यशस्वी बनो’ का अर्थ नहीं समझ सका।
‘‘बेटे, ये सारे पशु क्या तुम्हारे ही हैं ?’’ साधु बाबा ने पूछा।
‘‘नहीं बाबा, सब पशु गाँव के लोगन का है। हम तो इनको खाली चराने का काम करते हैं।’’ बल्ली ने जवाब दिया।
‘‘बेटा, तुम इन पशुओं को बड़े प्रेम से चराते हो। इसलिए मुझे लगा कि ये सारे पशु तुम्हारे ही हैं। ये पशु तुम्हारा कहा भी खूब मानते हैं।’’ साधु बाबा ने कहा।

‘‘हाँ बाबा।’’
‘‘बेटा, मैं तुम्हारे पशु चराने के ढंग से बहुत प्रभावित हुआ हूँ। अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारा घर कहाँ है ?’’
‘‘यह जंगल जहाँ खत्म होता है, वहीं पर एगो गाँव है। उसी गाँव में हमारी एगो झोंपड़ी है। उसी झोंपड़ी में हम रहते हैं।’’
‘‘घर में और कौन है ?’’
‘‘घर में माई है।’’
‘‘तुम्हारे पिता ?’’
‘‘वह नहीं हैं।’’

‘‘यह सुन कर मुझे बहुत दुःख हुआ। मगर, चिन्ता की कोई बात नहीं है। तुम्हारे पिता नहीं हैं तो क्या हुआ ? सबका सच्चा पिता तो वह ऊपरवाला है और तुम्हारे ऊपर उसकी असीम कृपा है।’’ साधु बाबा ने बल्ली को आश्वासन देते हुए कहा।
साधु बाबा की बात सुनकर बल्ली उनकी तरफ टुकुर-टुकुर देखने लग गया। साधु बाबा ने क्या कहा, यह बात उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आ सकी।
‘‘बेटा, तुम्हारे पास खेती-बाड़ी तो जरूर होगी ?’’ साधु बाबा ने पूछा।
‘‘बाबा, हम लोग बहुत गरीब हैं। हमारे पास खाली एगो झोंपड़ी है और माई है और कुछ भी नहीं है।’’ बल्ली ने बताया।
‘‘फिर तुम दोनों का गुजारा कैसे होता है ?’’

‘‘हम ढोर चराते हैं। इससे खाने-पीने के लिए कुछ मिल जाता है। माई गाँव में कुटौना-पिसौना का काम थोड़ा कर लेती है। बस इसी से गुजारा हो जाता है।
साधु बाबा ने अपनी दोनों आँखें उठा कर आसमान की ओर देखा। फिर वह अपनी आँखों को मूँदकर बुदबुदाने लग गए—‘‘भगवन्, तेरी लीला अपरम्पार है। अब मैं तुझसे क्या कहूँ ? तू तो स्वयं अन्तर्यामी है। तू सर्वशक्तिमान भी है। परन्तु इस बालक को देखकर मेरा मन भर आया है। अब तू ही बता कि मुझे क्या करना चाहिए ? क्या इस बालक के सामने मैं तुम्हारी इच्छा प्रकट कर दूँ ?’’

साधु बाबा कुछ क्षणों तक आसमान की ओर अपनी बन्द आँखों से ताकते रहे, फिर उन्होंने अपना माथा झुका लिया।
साधु बाबा ने इशारे से बल्ली को अपने पास बुलाया। बल्ली साधु के समीप तपाक से पहुँच गया। बल्ली के माथे पर अपना दाहिना हाथ रखते हुए साधु बाबा ने पूछा—‘‘बेटा, क्या तुम मुझे अपनी माँ से नहीं मिलवाओगे ?’’
‘‘काहे नहीं,’’—बल्ली ने तुरन्त उत्तर दिया—‘‘जब सूरज भगवान डूबने लगेंगे तब हम गाँव की तरफ चल देंगे। आपका दरसन पाके माई को बहुत नीक लगेगा। उसका तो जनमे सफल हो जाएगा।’’

बल्ली ने देखा कि साधु बाबा ने फिर आसमान की ओर देखना शुरू कर दिया है। अरे ! यह क्या हो रहा है ! अभी-अभी तो चारों तरफ सूरज की तीखी किरणें फैली हुई थीं और अब यह सूरज पच्छिम की तरफ एकाएक डूबने कैसे लगा है ! धीरे-धीरे चारों ओर गोधूलि की ललाई भी छाने लगी है ! आसमान में पंछियों का झुंड अपने-अपने घोंसलों की ओर जाने लगा है।

बल्ली को ऐसा लगा कि यह साधु बाबा या तो कोई मायावी जीव है या फिर भगवान है।
अब बल्ली को डर लगने लग गया। उसका शरीर भी कँपकँपाने लग गया।
बल्ली की यह दशा देखकर साधु बाबा ने कहा—‘‘बेटा, अब सूरज डूबने ही वाला है। चलो, गाँव लौट चलें।’’
बल्ली मंत्रबिद्ध-सा अपने ढोरों के नाम ले-ले कर पुकारने लग गया। देखते ही देखते सारे पशु बल्ली के आस-पास आकर खड़े हो गए।

प्रायः सभी जानवरों के गले में घण्टियाँ बँधी हुई थीं। पशुओं ने गाँव की ओर प्रस्थान किया। उनके चलने से घण्टियों की जो सम्मिलित ध्वनि निकलने लगी, उससे पूरा वातावरण ही संगीतमय हो उठा।
बल्ली ने अपनी कमर में एक गमछी लपेट रखी थी। गमछी में एक बाँसुरी खुँसी हुई थी। साधु बाबा बाँसुरी की तरफ रह-रहकर देख रहे थे। बल्ली ने यह ताड़ लिया।

‘‘बेटा, क्या तुम बाँसुरी भी बजाते हो ?’’ साधु बाबा ने बड़े प्यार से पूछा।
‘‘हाँ बाबा।’’ बल्ली ने बताया।
‘‘तो तुम इसे बजाते क्यों नहीं ?’’ साधु बाबा ने प्रेरित किया।
बल्ली उत्साहित हो उठा। उसने कमर में खुँसी बाँसुरी निकाल ली। बाँसुरी को अधरों की ध्वनि में मिश्रित होकर एक अकल्पनीय संगीतमय परिवेश का निर्माण करने लगी।

बल्ली तन्मय होकर बाँसुरी बजाता जा रहा था और पशु कदम-ताल करते हुए गाँव की ओर बढ़े जा रहे थे।
साधु बाबा को लगा कि वह ब्रजभूमि में पहुँच गए हैं और उनकी आँखों के सामने कन्हैया गोचरण कर रहे हैं।

दो


‘‘माई, माई, देखो तो कौन आया है !’’ झोंपड़ी के सामने पहुँचते ही बल्ली जोर-जोर से चिल्लाने लग गया।
भगजोगनी झोंपड़ी के भीतर से निकली। सामने एक साधु बाबा को देखकर वह ठगी-सी रह गई। दिव्य रूप। इसके पहले उसने इस प्रकार के किसी साधु को कभी नहीं देखा था। साधु को देखते ही उसके हृदय में श्रद्धा उमड़ पड़ी। वह साधु बाबा का स्वागत कैसे करे, वह मन ही मन सोचने लग गई। एकाएक वह झोंपड़ी के भीतर चली गई। वह भीतर से एक खाली थाली और लोटे में पानी लेकर बाहर आ गई।

भगजोगनी ने थाली साधु बाबा के पैरों के पास जमीन पर रख दी। उसने अनुरोध के स्वर में कहा—‘‘बाबा, इस थाली पर अपना दोनों गोड़ रोप दीजिए।’’
साधु बाबा ने वैसा ही किया। भगजोगनी साधु बाबा के पैर धोने लग गई। पैरों में लगी धूल-मिट्टी धुल-धुल कर थाली में गिरने लग गई। देखते ही देखते थाली मटमैले पानी से भर गई। साधु बाबा ने पैर थाली से निकाल लिए। भगजोगनी ने थाली का मटमैला पानी झोंपड़ी के सामने बहा दिया। उसने पुनः साधु बाबा से अनुरोध किया—‘‘बाबा, थाली में अपना दोनों गोड़ रोप दीजिए।’’
साधु बाबा ने वैसा ही किया।

भगजोगनी ने साधु बाबा के दोनों पैरों को फिर से धोया।
इस बार थाली का पानी ज्यादा गंदा नहीं था। भगजोगनी के इशारा करने पर साधु बाबा ने अपने दोनों पैर थाली से हटा लिए।
भगजोगनी ने अपने आँचल से साधु बाबा के दोनों पैरों को अच्छी तरह पोंछा और अपने माथे को तीन बार साधु बाबा के पैरों पर रखा। इसके बाद उसने साधु बाबा की तरफ एक मचिया बढ़ाते हुए कहा—‘‘बिराजिए बाबा।’’
साधु बाबा मचिया पर बैठ गए।

भगजोगनी ने अपने बेटे बल्ली को अपने पास बुलाया। बल्ली अपनी माँ के पास आ गया। भगजोगनी ने थाली में पड़े साधु बाबा के पैरों के धोवन का थोड़ा-सा भाग बल्ली के हाथ में देते हुए कहा—‘‘बेटा, यह असली चरनामृत है। पी जाओ।’’
बल्ली ने बिना किसी हिचक के चुल्लू में चरनामृत लेकर पी लिया। इसके बाद भगजोगनी ने थाली में बचे धोवन को स्वयं पी लिया।
साधु बाबा यह सब बड़े ध्यान से देख रहे थे।
अब भगजोगनी ने साधु बाबा के सामने एक कटोरी में गुड़ की कुछ भेलियाँ बढ़ा दीं। एक लोटे में पानी भी लाकर रख दिया।

साधु बाबा ने भगजोगनी के द्वारा दी गई गुड़ की भेलियाँ इतने चाव से खाईं मानो वे मोतीचूर के लड्डू रहे हों। लोटे का पूरा पानी वह एक ही साँस में इस तरह गटक गए जैसे कि वह अमृत पी रहे हों।
अब साधु बाबा के चेहरे पर पसरी थकान मिट चली थी और उस पर एक नई आभा उभरने लग गई थी।
‘‘बेटी, तू बड़ी भाग्यवती है।’’ साधु बाबा ने बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहा। लेकिन साधु बाबा की बात सुनते ही भगजोगनी रोने लग गई। उसने रोते हुए ही कहा—‘‘बाबा, हमरा तो करमे फूट गया है। हमरा आदमी भी मर गया है। एगो इ बेटा है तो उसका मन पढ़ने-लिखने में जरको नइ लगता है।

यह सुनते ही बल्ली अपनी माँ के पास से हट गया। वह समझ गया कि अब उसकी खूब शिकायत की जाएगी, इसलिए वह चुपचाप वहाँ से सरक गया।
‘‘बाबा, आप कैसे कहते हैं कि हम भागवंती हैं। हमरा तो सब कुछ लुट गया है।’’ भगजोगनी ने अपना दुखड़ा संक्षेप में सुना दिया।
‘‘बेटी, तेरे पास एक लाल तो है न। यह तुम्हारे सभी कष्टों को दूर कर डालेगा।’’ साधु बाबा ने बताया।
‘‘बाबा, इ बेटवे तो हमरे सब दुःख का कारन है। इ जंगल में चरवाही करता है चरवाही करने से इसको पेट भर भातो नई मिलता है। आप नइ जानते हैं कि बल्ली केतना खाता है। भगवान इसको पेट नइ भड़साल दिहिन हैं। इसका पेट कभी नइ भरता है। हम अपना भात भी इसी को दे देते हैं, तइयो इसका पेट खालिए रहता है।’’
साधु बाबा भगजोगनी की बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे।

‘‘बाबा, इ बल्ली जब लड़का था, तब इ एगो साँप पकड़ के कच्चे खा गया था। लइकाई में इ माटी और काँच भी खूब खाता था। कच्चा माँस तो इ आज भी कचर-कचर खा जाता है। एक बार लइकाई में इ अपना गुहो खा गया था। हमरा बेटा अइसा भुक्खड़ है कि हम का बोलें ! इ दिन भर जंगल में न जाने का-का खाता रहता है, तइयो इसका पेट खालिए रहता है।’’
साधु बाबा अभी भी भगजोगनी की बातों को बड़े ध्यान से सुनते जा रहे थे।
‘‘बाबा, भगवान हमको एगो बेटा भी दिहिन हैं, तो उसका अइसा हाल है। हमको बरोबर डर लगते रहता है कि कोई दिन इ भुक्खड़ कोई अइसा चीज मत खा ले कि इसका पराने निकल जाए। इसके चलते न तो हमको दिन में चैन मिलता है और न रात को। बाबा, आप कइसे कहते हैं कि हम बड़ा भागवंती हैं ?’’

‘‘बेटी, साधु महात्मा का वचन कभी झूठ नहीं होता है।, मैंने कह दिया कि तू भाग्यवती है, तो तू भाग्यवती है।’’ साधु बाबा ने मुसकुराते हुए जोर देकर कहा।
‘‘बाबा, हम कहाँ बोलते हैं कि आपका कहनाम झूठ है ! मगर, जे सच है, जौन हमरे साथ रोज-रोज बीतता है, हम उसी का बखान कर रहे हैं।’’
‘‘बेटी, तुझे यही चिन्ता है न कि तेरा बेटा बहुत बड़ा पेटू है। यह इसकी भी परवाह नहीं करता कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए। वह भक्ष्य और अभक्ष्य दोनों की चिंता नहीं करता। इसलिए तुझे यह डर लगा रहता है कि इसे किसी दिन कुछ हो जाएगा।’’

‘‘हाँ बाबा, इसीलिए हम इसको किसिम-किसिम का चूरन बनाके खिलाते रहते हैं। हम हाट से बल्ली के वास्ते बरोबर पत्थल हजम चूरन खरीद के लाते हैं।
यह सुनते ही बाबा को हँसी आ गई।
‘‘बाबा, आप हँस काहे रहे हैं ?’’ भगजोगनी को साधु बाबा का इस तरह हँसना कुछ अच्छा नहीं लगा।
‘‘बेटी, मैं इसलिए हँस रहा हूँ कि तू अपने बेटे को तरह-तरह के चूरन खिलाती रहती है।’’ साधु बाबा ने सहजता के साथ कह दिया।

‘‘तो क्या करें बाबा ? बेटा का जान हमको पियारा है। इ वास्ते उसका जान बचाने का उपाय तो करना ही पड़ेगा न।’’
‘‘जरूर। उसकी जान बचाने का उपाय तो करना ही चाहिए। मगर तेरा बेटा तो भक्ष्य-अभक्ष्य, खाद्य-अखाद्य, तरल-ठोस, फल-फूल, जीव-जन्तु आदि सब कुछ खा लेता है, इसलिए पत्थर हजम चूर्ण देने से कोई लाभ नहीं होगा।’’
‘‘तब हम अपना बेटा को का दें, बाबा ?’’
‘‘बेटी, बल्ली को सर्वभक्षक पाचक देना चाहिए।’’
‘‘बाबा, इ कइसा पाचक होता है और कहाँ से मिल सकता है ?’’

‘‘बेटी, वह पाचक किसी दूकान में नहीं मिलता है।’’
‘‘जब उ पाचक दोकान में मिलबे नइ करता है, तो हम बल्ली को उ पाचक कहाँ से दे सकते हैं ?’’
‘‘बेटी, वह पाचक मैं तुझे दूँगा।’
‘‘बाबा, आप हमको उ पाचक देंगे !’’
‘‘हाँ। मगर इसके लिए मुझे एक बार जंगल जाना होगा। इस पाचक को बनाने में एक सौ जड़ी-बूटियों का प्रयोग करना पड़ता है।’’
‘‘बाबा, आप इ पाचक का नाम बताए थे ?’’

‘‘सर्वभक्षक पाचक।’’
‘‘सरब...इसके आगे आप का बोले थे बाबा ?’’
‘‘सर्व...भक्षक...पाचक।’’
‘‘बड़ा कठिन नाम है।’’
‘‘बेटी, तू चाहे तो इसे सरबभकोसक पाचक भी बोल सकती है।’’
‘‘मतलब, इ पाचक से आदमी सब कुछ भकोस के पचा सकता है। एही बात है न बाबा ?’’
‘‘हाँ, बेटी। इसे खाने से सब कुछ पच जाता है—लोहा, लक्कड़, पत्थर, तरल, ठोस, कुछ भी।’’
‘‘बाबा, अइसा पाचक बनाना आप कहाँ से सीखे हैं ?’’
‘‘बेटी, जब मैं हिमालय में तपस्या कर रहा था, तब एक महात्मा ने प्रसन्न होकर मुझे यह पाचक बनाने की विधि बतलाई थी।’’

‘‘बाबा, एगो बात हम बोलें ?’’
‘‘हाँ, बोलो बेटी।’’
‘‘एही गाँव में एगो बनिया रहता था। आजकल उ बम्बे में रहता है। सुनते हैं कि उसके पास महल जैसा कोठी है। चार-पाँच गो मोटर गाड़ी हैं। नौकर-चाकर से कोठी भरा रहता है। हियाँ उसको खाने की भी नइ जुरता था। मगर अब बम्बे में उ राजा जैसा रहता है।’’
‘‘अच्छा ! क्या करता है वह ?’’
‘‘बाबा, उ बनिया बम्बे में पाचक बनाने का एगो कारखाना खोल दिहिस है। सुनने में आता है कि उसका पाचक गोट्टे दुनिया में बिकता है।’’

‘‘तो ?’’ साधु बाबा ने जरा नाराजगी से भगजोगनी की तरफ देखा।
‘‘बाबा, एगो बात हम बोलें आपको ?’’
‘‘हाँ, बोलो बेटी।’’
‘‘बाबा, आप भी एगो पाचक बनाने का कारखाना खोल लीजिए न ? आपका पाचक तो खूब बिकेगा—सरब भकोसक पाचक कारखाना...’’
साधु बाबा भगजोगनी की यह बात सुन कर मंद-मंद मुसकाने लग गए।

तीन


अब रात हो चली थी।
भगजोगनी ने साधु बाबा का स्वागत तो गुड़ की भेली खिलाकर कर दिया था। अब रात के भोजन का कैसे प्रबन्ध हो, भगजोगनी इस चिन्ता में पड़ गई। घर में कुछ भी नहीं था। वह क्या करे ? उसने सोचा पड़ोसियों के यहाँ जाकर वह साधु बाबा के नाम पर कुछ सत्तू और आटा का प्रबन्ध कर लेगी। अगर दोनों चीजें मिल गईं तो वह साधु बाबा के लिए लिट्टी बना देगी। घर में सात-आठ आलू और दो प्याज पहले से पड़े हैं। उनसे वह चोखा बना लेगी। इससे ज्यादा तो वह और कुछ कर भी नहीं पाएगी। यह सोच कर वह झोंपड़ी से निकल पड़ी। निकलने से पहले उसने साधु बाबा से कहा—‘‘बाबा, हम अभी तुरत आ रहे हैं।’’

भगजोगनी अपनी झोंपड़ी के बाहर निकली ही थी कि उसने देखा कि बल्ली तीन-चार लड़कों के साथ बतियाता हुआ चला आ रहा है। उन लड़कों में बल्ली का लंगोटिया यार बजरंगी भी था। बजरंगी से बल्ली की खूब पटती थी।
लड़कों के पीछे गुल़ब्बो काकी भी चली आ रही थी। उसके हाथ में एक भारी थैला लटक रहा था।
भगजोगनी बल्ली, उसके साथियों तथा गुलब्बो काकी को देखकर रुक गई।
बल्ली के सभी साथी साधु बाबा के पास आकर बारी-बारी से पाँलगी करने लग गए और उनसे आशीर्वाद पाने लग गए।
साधु बाबा ने सभी लड़कों को अपने पास ही बिठा लिया।

गुलब्बो काकी ने आते ही अपने हाथ का थैला भगजोगनी को थमा दिया।
‘‘इ का है काकी ?’’ भगजोगनी ने पूछा।
‘‘अभी बताते हैं।’’ यह बोलकर गुलब्बो काकी साधु बाबा के पास पहुँच गई। वह साधु बाबा के चरणों को छूने के लिए जमीन पर बिछ गई।

साधु बाबा तनिक असमंजस में पड़ गए। वह क्या आशीर्वाद दें ? वह सोचने लगे कि यदि मैं कहता हूँ कि सौभाग्यशाली बनी रहो और कहीं यह विधवा हुई तो ? सो उन्होंने इतना ही कहा—‘‘सदा खुश रहो और सबके बीच खुशी बाँटते रहो।’’
गुलब्बो यह आशीर्वाद पाकर गद्गद हो उठी।

भगजोगनी ने साधु बाबा को बताया कि गुलब्बो काकी इस गाँव की मीराबाई है। वह बहुत बढ़िया भजन गाती है। वह भजन गाकर ही अपना समय बिताती है। गुलब्बो काकी के घर में राधाकृष्ण का एक मन्दिर भी है।
‘‘हाँ बाबा, इसीलिए हम आपसे विनती करने आए हैं कि आप हमारे घर चलिए। वहाँ आपको कोई कष्ट नहीं होगा। वहाँ आपको भगत भी मिलेंगे और भगवान भी।’’ गुलब्बो काकी ने दोनों हाथ जोड़कर साधु बाबा से प्रार्थना की।
‘‘बेटी, यह भी भगवान के बन्दे का ही घर है। यहाँ भी कोई कष्ट नहीं है। बल्ली की माँ तो पक्की भक्तिन है। मेरे लिए तुम दोनों ही बराबर हो।’’ साधु बाबा ने बड़े प्रेम से गुलब्बो को समझाया।

गुलब्बो को यह अच्छा नहीं लगा कि साधु बाबा ने उसकी बराबरी एक गड़ेरिन से कर दी। गुलब्बो कहाँ क्षत्रिय परिवार की है। यह ठीक है कि वह विधवा है और अकेली है, लेकिन उसके पास अभी भी जमीन जायदाद और खेती-बाड़ी की कोई कमी नहीं है। इस भगजोगनी के पास तो टूटी हुई झोंपड़ी के सिवा कुछ भी नहीं है।

एक बेटा है तो वह दिन-भर जंगल में चरवाही ही करता है। भगजोगनी गाँव में घूम-घूम कर घर-घर कूटने-पीसने का काम करती है। तब जाकर माँ और बेटे को खाना नसीब होता है। भगजोगनी ने अपने घर में साधु बाबा को तो बुला लिया, मगर वह साधु बाबा को खिलाएगी कहाँ से ? इसीलिए तो गुलब्बो थैला भर सामान लेकर आई है। उसने भगजोगनी को भीतर बुला कर समझा दिया—‘‘थैली में जो है, वह खाली साधु बाबा के लिए है।’’ इस वाक्य में यह चेतावनी भी शामिल थी कि इन चीजों से बने सामान पर कहीं बल्ली अपना हाथ न साफ कर बैठे।

‘‘हाँ काकी, इससे खाली साधु बाबा के वास्ते भोजन बनेगा।’’ भगजोगनी ने काकी को आश्वासन दिया।
‘‘किसी चीज की और दरकार हो तो बल्ली को भेज मँगवा लेना। कोई संकोच मत करना। साधु महात्मा को कोई कमी नहीं होनी चाहिए। अगर साधु बाबा को कोई तपलीख हो गया तो इससे गोट्टे गाँव का नाम बदनाम हो जाएगा।’’ गुलब्बो यह बोलकर झोंपड़ी के पिछवाड़े से ही निकल गई।

भगजोगनी की एक बहुत बड़ी चिन्ता दूर हो गई। गुलब्बो काकी आटा, सत्तू, चावल, दाल, एक शीशी में घी, दूसरी शीशी में तेल, आलू, प्याज, मिर्च, अदरख, टमाटर और खटाई दे गई थी। इतने सामानों से साधु बाबा के लिए तीन शाम का भोजन आराम से बनाया जा सकता है।

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