गोबिन्द गाथा - भगवतीशरण मिश्र Gobind Gatha - Hindi book by - Bhagwati Sharan Mishra
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गोबिन्द गाथा

भगवतीशरण मिश्र

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :328
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 619
आईएसबीएन :81-7028-166-0

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सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह के आदर्शपूर्ण जीवन और उनकी वीरता, धीरता तथा संघर्ष की लोमहर्षक अमरगाथा का उपन्यास...

Govind Gatha - A hindi Book by - Bhagwati Sharan Mishra गोविन्द गाथा - भगवतीशरण मिश्र

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह के आदर्शपूर्ण जीवन और उनकी वीरता, धीरता तथा संघर्ष की लोमहर्षक अमरगाथा उपन्यास के रूप में। गुरु के बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रात्मक विवरण जिसमें औपन्यासिकता और इतिहास की प्रामाणिकता दोनों का मनोहर संगम मिलता है-सम्मोहक और प्रवाहपूर्ण शैली में।
यह उपन्यास लेखक की पूर्व-कृति ‘का के लागू पाँव’, की दूसरी तथा अंतिम कड़ी है। यूँ दोनों उपन्यास अपने में स्वतंत्र हैं। जहाँ ‘का के लागू पाँव’ में उनकी नौ वर्ष तक का आयु की कथा थी, वहीं इसमें उससे आगे की गाथा है, निर्वाण तक की। उपन्यास प्रारम्भ से लेकर अंत तक पाठक के मन को अपनी मोहनी में बाँधे रखता है। भगवतीशरण मिश्र की नवीनतम औपन्यासिक कृति।

आमुख

गुरु गोबिन्द सिंह की जीवन-गाथा को औपन्यासिक रूप देने का आरम्भ मेरी पुस्तक ‘का के लागूं पांव’ से हुआ था। इस पुस्तक के माध्यम से वह महान गाथा पूर्णता तक पहुंची है।
वस्तुतः गुरु के वास्तविक जीवन-चरित्र की संज्ञा इसी कृति को दी जा सकती है। इसका कारण है। ‘का के लागूं पांव’ में गुरु के बाल्यकाल की कथा सन्निहित है। नौ वर्ष तक के जीवन की। गुरु-गद्दी पर आसीन होने से लेकर प्राणों के अवसान तक के विवरण को इस औपन्यासिक किंतु यथार्थ-परक पुस्तक ‘गोबिन्द-गाथा’ में प्रस्तुत किया गया है।
किंतु ‘का के लागूं पांव’ नींव है। नींव के बिना अट्टालिका नहीं निर्मित होती। नींव जितनी गहरी और सशक्त होगी, अट्टालिका उतनी ही ऊंची-गगनचुम्बी। अट्टालिका को जानने के लिए नींव से परिचय भी आवश्यक है। यह है ‘का के लागूं पांव’ की प्रासंगिकता। यद्यपि जैसा कहा गया, वह गुरु के नौ वर्ष तक के जीवन को ही रूपायित करती है।

‘का के लागूं पांव’ यद्यपि गुरु गोबिन्द सिंह के साहस और शौर्यपूर्ण जीवन की पूर्व पीठिका के रूप में प्रस्तुत हुआ है और पिता गुरु तेगबहादुर की गाथा को उसमें बुनकर उसे पिता और पुत्र दोनों की सम्मिल्त कहानी बताया गया है। पुत्र पर पिता के प्रभावों का दिग्दर्शन आवश्यक था, उनके प्रताप से परिचय अनिवार्य, इसलिए उस पुस्तक में पुत्र की आरंभिक कथा के साथ पिता की प्रायः संपूर्ण जीवन-गाथा को डालना पड़ा। उस पुस्तक की भूमिका में मैंने ठीक ही अंकित किया था—

‘‘यह गाथा है पिता के बलिदान की, शहादत की, साहस और शौर्य की, उसके अंत की; तो यह कहानी है पुत्र के आरम्भ की, उसमें निहित संभावनाओं की, इन संभावनाओं के इजहार की। एक महापुरुष के निर्माण और उसके लिए आवश्यक आत्मविश्वास, अपार सहन-शक्ति और अलौकिक अदान-अवदान की। उसके लिए प्राप्त पिता के स्नेह-प्रेम की, शिक्षण-प्रसिक्षण की। पित्रृ पक्ष की’’

एक तरह से ‘का के लागूं पांव’ जहां पितृ-पक्ष की कहानी है, वहीं ‘गोबिन्द-गाथा’ पुत्र-पक्ष की।
‘का के लागूं पांव’ में मैंने उद्घोषित किया था, ‘‘यह आरम्भ है एक ऐसे अंत का जो अनंत काल तक इतिहास-पृष्ठों को अमर करता रहेगा।’’ ठीक ही इस कहानी, इस शौर्य-गाथा को मैंने गुरु गोबिन्द सिंह के इस अंत तक पहुंचाया है जो गुरु को अमरत्व प्रदान करने में पूर्णतया सक्षम हुआ है। इसी असामयिक अंत के समय गुरु ने गुरु-परंपरा को तिलांजलि दे, गुरु-ग्रंथ-साहब को ही गुरु-पद प्रदान किया था। और समय साक्षी है कि उनका निर्णय कितना उचित और दूर-दृष्टि-संपन्न था। आज भी सिख-पंथ अगर अपनी पूरी प्राणवत्ता के साथ जीवित हैं तो गुरु के इसी निर्णय के कारण। इतिहास-पृष्ठों में वस्तुतः गुरु और उनका पंथ अमरत्व को प्राप्त कर गए। पंथ के अनुयायी विश्वव्यापी हो गए और जीवनी-शक्ति में जैसे निरंतर संजावनी का संचार होता गया।

यह संजीवनी गुरु गोबिन्द सिंह के सतत् संघर्षों, असामान्य संगठन-शक्ति, अपार अलौकिकता, अगाध-विद्वता और अप्रतिम शौर्य-वीर्य की ही उपज है, इससे कोई भी सिख-इतिहास का अध्येता इंकार नहीं कर सकता। गुरु की इन सारी और उनसे अधिक विशेषताओं को इस पुस्तक में प्रभावकारी रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है।
पाटिलपुत्र तक तो ठीक (‘का के लागूं पांव’ यहीं तक की कहानी है) पर आनन्दपुर से आरम्भ हुआ गुरु का जीवन आदि से अंत तक संघर्ष-शील ही रहा। आश्चर्य है कि इतने संघर्षों से जूझते हुए गुरु अल्पावधि में ही कैसे इतना कुछ कर गए जो सामान्य व्यक्ति के लिए कई जीवनों में भी संपादित करना संभव नहीं होता। पहाड़ी राजा और मुगल निरंतर उनके पीछे हाथ धोकर पड़े रहे पर गुरु को जो करना था, वह कर गुजरे।

खालसा-पंथ की स्थापना गुरु के जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है। यह कहानी मौलिक उद्भावना और असामान्य कल्पना तथा विलक्षण संगठन-शक्ति का ही प्रतिफल है।
मैंने कहा गुरु का व्यक्तित्व बहुआयामी था। अधिकांश उन्हें एक पंथ-नेता और अद्भुत योद्धा के रूप में ही जानते हैं; उनके एक अतिविशिष्ट आयाम—उनकी साहित्यिकता, उनकी काव्य-कला, उनकी लेखन-शक्ति, उनकी विद्वता से बहुत कम लोगों का ही परिचय हुआ है।
मैं आभारी हूँ राजपाल एण्ड सन्ज़ के स्वत्वाधिकारी श्रीविश्वनाथजी का जिन्होंने उनके इस प्रायः उपेक्षित पक्ष की ओर मेरा ध्यान खींचा और मुझे इस कृति में उनके साथ न्याय करने को कहा। मैंने अपनी ओर से गुरु-व्यक्तित्व के इस आयाम को पूर्णतया उभारने का प्रयत्न किया है। विश्वनाथजी और सुधी पाठक ही बतलाएंगे कि मैं इस प्रश्न में कहां तक सफल हुआ हूँ।

गुरु का पथ यद्यपि उन्हें अमरत्व की मंजिल तक ले गया पर रहा वह सदा कंटकाकीर्ण ही। कभी-कभी ये कंटक अत्यंत क्रूरता से उनके चरणों को रक्त-रंजित और क्षत-विक्षत कर गए हैं। इन सबसे परिचय इस पुस्तक में होगा; अगर भूमिका में ही सारी बातें लिख दी जाएं तो पुस्तक-परायण का प्रयोजन ?
यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यद्यपि यह पुस्तक औपन्यासिक शैली में लिखी गई है पर ऐतिहासिक उपन्यास की मर्यादा को अक्षुण्ण रखने की दृष्टि से इसके संयोजन में भी एक काल्पनिक पात्र या घटना को नहीं लिया गया है। सब कुछ यथार्थाधारित है। शैली, शिल्प अथवा प्रस्तुतीकरण की विद्या लेखकीय है।

अपने शिल्प-विधान और विशिष्ट शैली को लेकर मैं नये रूप में कुछ कहने के बदले ‘का के लागूं पांव’ की भूमिका से ही निम्न पंक्तियों को उद्धृत करना चाहूंगा :....‘‘समीक्षक पाठक मुझे माफ करेंगे, गंगा और सतलज की धारा प्रतिक्षण नवीन होती रहती है तो औपन्यासिक शिल्प को भी अपने पुराने केंचुल से निकालना मेरी विवशता है। सपाट बयानी का मैं कायल नहीं। अगर अधिकांश अध्यायों का आरंभ, उनमें अंतर्निहित कथा का सार चिंतन-धाराओं के माध्यम से प्रस्तुत कर जाता हूँ तो इसके लिए अपने ‘अनर्गल’ दर्शन को आप पर थोपने का अधिकारी नहीं हूं। लकीर के फकीर इसे पढ़कर सिर पीटने को स्वतंत्र हैं पर इसके माध्यम से मैंने कुछ देने का ही प्रयास किया है—कम-से-कम नये शिल्प-विधान को, कुछ नहीं तो एक नूतन कथ्य-संयोजन को।...’’

सतलज-तीर बसे आनन्दपुर में गुरु के उत्थान-पतन की प्रायः सभी घटनाएं घटती हैं। आनन्दपुर ही एक नौ वर्षीय किशोर-गुरु के आखेट, युद्धाभ्यास और पठन-पाठन का केंद्र बनता है। शिवालिक की पहाड़ियां महात्वाकांक्षी किशोर गुरु के अश्वों के खुरों से निरंतर विदीर्ण होती रहती हैं। सतलज सब कुछ देखती है। वह आनन्दपुर को ऐश्वर्यशाली बनते भी देखती है और उसे गुरु द्वारा त्यक्ता-परित्यक्ता होते हुए भी। युद्धों और किलाबंदियों की भी वह साक्षी है, रक्त-पिपासु शत्रुओं की पराजय और पलायन की भी।

आनन्दपुर छोड़कर गुरु ने सतलज को भले ही छोड़ दिया हो पर सतलज उन्हें कहां छोड़ने वाली थी ? वह उनकी आंखों में निरंतर बसी रही। उन्हीं की आंखों से सतलज भी सबकुछ देखती रही, उनकी जय भी, पराजय भी। सतलज से गुरु को विशेष प्रेम था। चांदनी रातों में उसके जल पर वितान-सी बिछती चांदनी उनके मन को बांधती रही। वे सतलज को कभी भूले हों, यह नहीं हो सकता। अतः सतलज साक्षी है गुरु के सारे अद्भुत् क्रिया-कलापों के साथ उनके संघर्षों और विपत्ति-भरे दिनों के भी।

इस पुस्तक के प्रणयन में जिन अंग्रेजी, पंजाबी अथवा हिन्दी इतिहासकारों की कृतियों से मैंने कथा का उपजीव्य संजोया है, उन सभी के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन।
कुछ पाठकों ने मुझे पत्र लिखकर ‘का के लागूं पांव’ की कहानी को पूर्णता तक पहुंचाने का बार-बार आग्रह किया। मुझे हर्ष है अकाल-पुरुष के अनुग्रहं से मैं यह करने में सफल हो सका। मैं उनकी प्रेरणा के लिए कृतज्ञ हूं।
भगवतीशरण मिश्र

1


झंझावात के गुजरने के पश्चात् प्रकृति को भी संतुलित होने में भी कुछ समय लगता है। किंतु समय व्यतीत होने के साथ-साथ सबकुछ सामान्य हो जाता है। काल-देवता बहुत कुछ विस्मृत करने के साथ ही सब-कुछ व्यवस्थित-संतुलित करने में बहुत बड़ा सहायक सिद्ध होता है। उसे देवता की संज्ञा यों ही नहीं दी गई।
आनन्दपुर के साथ भी यही हुआ। एक झंझावत; भीषण, अप्रत्याशित, अकल्पित और असामियक; गुरु तेग बहादुर की शहादत के रूप में उसके ऊपर से गुजर चुका था—आनन्दपुर ही क्या संपूर्ण सिख-संप्रदाय ने बहुत कुछ भोगा था, बहुत कुछ खोया, गंवाया। एक विशाल वट-वृक्ष का साया ही उसके सिर से उठ गया था। सभी के मनों में स्वभावतः एक हताशा और आशंका का भाव भरा पड़ा था। वर्तमान संत्रासक और अंधकार-ग्रस्त था तो भविष्य के गर्भ से सहसा कोई चमत्कारी स्वर्णिम किरण भी झांकती नहीं दीखती थी। मुगलों के आतंक के समक्ष सभी नत-मस्तक थे, भयातुर। न जाने ये आतंक और भय कब तक लोगों के मन में घर बनाए रहेंगे ? कब तक अंधकार का यह साम्राज्य आवेष्टित किए रहेगा पूरे आनन्दपुर को, संपूर्ण सिख-साम्राज्य को ?

नहीं, यह बात नहीं थी कि वर्तमान और भविष्य के सूची-भेद्य अंधकार के अंदर प्रकाश-किरण की संभावना का सर्वथा अभाव था। गुरु-पुत्र गोबिन्द राय के इर्द-गिर्द संपूर्ण सिख-संप्रदाय के सपने सज गए थे। प्रकाश की एक प्रखर किरण के रूप में सबके अंधकारयुक्त अंतर में वह आशा का एक दीप-सा ही प्रज्वलित कर रहा था। उसकी विलक्षण प्रतिभा और असीमित संभावनाएं संप्रदाय को एक बहुत बड़े संबल के रूप में प्राप्त थीं।
नहीं, यह सर्वग्रासी अंधकार, यह अनंत-सी प्रतीत होती आशंका शाश्वत नहीं था। सिक्खों के भाग्याकाश के पूर्वी क्षितिज पर गोबिन्द रूपी सूर्य का उदय इस भयावह तम, इस गहन् अंधकार को समाप्त कर पंथ के पथ को आलोकित करने को प्रस्तुत था।
‘‘बीत गया सो मृत है—अनावश्यक। वर्तमान ही सच है, यथार्थ : इसके गर्भ से ही भविष्य प्रकट होता है जो अतीत से अधिक स्वर्णिम और ग्राह्य हो सकता है, अधिक सुखप्रद।’’
मात्र नौ वर्ष के गोबिन्द राय ने सबको यह सीख देना आरंभ किया था। किले के अन्दर और बाहर के लोगों को भी।
जिस अकल्पित आत्मविश्वास और अद्भुत साहस से उसने किले और संप्रदाय के नेतृत्व को इस किशोर-वय में ही संभालने की क्षमता प्रदर्शित की थी, उससे सभी पंथ के वर्तमान और भविष्य दोनों के प्रति आश्वस्त होने लगे थे।
अगाध-दायित्व बोध ने उसकी आंखों के आंसुओं को बलात् सुखा ही दिया था, उसे बल प्रदान करने के लिए घर-परिवार के सभी लोगों ने अपने दर्द को अंदर-ही-अंदर पीकर उसे आंखों की राह बाहर आने से रोक दिया था। किले के अंदर आनेवाले शिष्य-समुदाय ने भी यही किया था। नए गुरु के लिए किसी के होंठों पर मुसकान हो या नहीं पर किसी की आंखों में आंसू भी नहीं थे। अंदर के हाहाकार को, चिंता को दबा-कुचलकर सभी किशोर गुरु के प्रति भक्ति-भाव से पूरित ही थे—श्रद्धा-नत।

आखिर वही अब पंथ का सर्वस्व था, उसका पथ-प्रदर्शक, कहें तो उसका भाग्य-विधाता। उसकी असीम संभावनाओं, उसके बल-वीर्य, साहस, संगठन-शक्ति और प्रखर-बुद्धि का पता उसके आनन्दपुर आने के पूर्व ही सबको था। यहां आ जाने पर तो उसकी कीर्ति हवाओं के कंधों पर सवार; सुदूर प्रदेशों, पंचनद-भूमि के कोने-कोने में फैल ही चुकी थी। संप्रदाय में अब तक इतने तेजस्वी बालक ने जन्म-ग्रहण नहीं किया था जो छोटी उम्र में ही अपनी प्रतिभा-किरणों से सबको चकाचौंध कर दे, अपने आत्मविश्वास से सबको चमत्कृत। लोग धीरे-धीरे उसको लेकर आश्वस्त हो गए थे। पिता शहादत को प्राप्त हुए तो क्या एक ओजस्वी पुत्र के रूप में संप्रदाय को ऐसा रत्न प्रदान कर गए जो एक दिन विशाल सिख-बिरादरी का मुकुट मणि ही बननेवाला था।

सिख-धर्म के अनुयायियों, गुरु-शिष्यों ने अपने दायित्व को भी समझा था और आनन्दपुर को पूर्व की अपेक्षा अधिक समृद्ध, शक्तिशाली और संपन्न बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया था। फलतः किले के अंदर भेंटों का अंबार लगने लगा था। कोई भी यहां रिक्त-हस्त नहीं आता था बल्कि वह अपनी शक्ति से अधिक ही धन-धान्य—हीरे, मोती, मणि-माणिक्य, रजत-स्वर्ण और शस्त्रास्त्रों तथा देशी एवं अरबी अश्वों—को साथ लेकर आता था।
पंथ को सुदृढ़ से सुदृढ़तम करने की भावना सबके अंतर में प्रचंड रूप में भर चुकी थी। आशंका और भय के भाव तिरोहित हो चुके थे।
गुरु, अब गोबिन्द राय जो थे।


2

 


गोबिन्द राय ने भी अपने कर्तव्य को पूरी तरह समझा था। लोगों की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं से भी उसका पूर्ण परिचय हुआ था। इसी वय में अपने स्कंधों पर भारी दायित्व के आ पड़ने से भी।
उसका आचरण भी स्थिति के अनुकूल होने लगा था।
उसके अपने शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य तो पिता गुरु तेगबहादुर के काल ही से आरंभ हो गया था, उसने इसे आगे बढ़ाने के साथ-साथ अपने अनुयायियों को भी शिक्षित-प्रशिक्षित करना आरंभ किया। गुरु होने के कारण अब केवल शिकार और शस्त्रास्त्रों के संचालन से कार्य नहीं चलने को था। वीरता और शौर्य के साथ अध्यात्म और भक्ति को भी जोड़ना था। पर दोनों का महत्व समान था, गोबिन्द राय को यह समझते देर न लगी। सैन्य-शक्ति यदि धर्म की, संप्रदाय की रक्षा के लिए आवश्यक थी तो भक्ति-भाव की आवश्यकता इस शक्ति में आत्मबल भरने के लिए थी। सैन्य बल के समक्ष एक आदर्श होना चाहिए जिसकी संरक्षा के लिए वह प्राणोत्सर्ग के लिए भी प्रस्तुत हो जाए। धर्म की रक्षा और प्रचार ही आनन्दपुर की सैन्य शक्ति का आदर्श हो आया, इस रक्षा कार्य और प्रचार-प्रसार में जो विघ्न बनता उसका विनाश भी।

प्रतिभा-संपन्न गुरु ने तत्काल आनन्दपुर को समयोचित गतिविधियों का जीवंत केन्द्र बना दिया। भूत का अवसाद शनैः-शनैः समाप्त हो गया और आस-पास की पहाड़ियां गुरु और उनके अनुयायियों के जंगी घोड़ों की टापों से गूंजने लगी थीं। शस्त्रास्त्रों का नियमित प्रशिक्षण आरंभ हो गया। युद्धाभ्यास सभी समर्थ व्यक्तियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया। आखेट के लिए वनों में सभी निकलने लगे।
इधर धर्म की भावना भी सबके अंदर प्रबल से प्रबलतम होती जा रही थी। किले के अन्दर से निकलती भजन-कीर्तन की तरंगें आस-पास की पहाड़ियों को भी ध्वनित-प्रतिध्वनित करने लगी थीं। प्रार्थनाओं के क्रम को नियमित कर दिया गया। सिख-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य संध्या की ‘सोहिला’ के साथ सभी दैनिक पांच प्रार्थनाओं का गायन आरंभ हुआ। किशोर, युवा, वृद्ध सभी के लिए धर्माचरण अनिवार्य था। जो जहां होता अपनी प्रार्थना अवश्य करता। आखेट में गए सिख-युवा भी प्रार्थना के समय अपने अश्व की लगाम किसी वृक्ष के तने से बांधकर, समय होते ही मनोयोगपूर्वक प्रार्थना पूरी करते।

वीरता और अध्यात्म दोनों का संगम गुरु के कठोर आदेश ने सहज ही संभव कर दिया।
आनन्दपुर का व्यावसायिक विकास भी संभव हुआ।

पहले से ही हिन्दू-सिख व्यापारी ईरान, ताशकंद, गजनी और काबुल आदि दूर देशों को व्यापार हेतु जाते थे। आनन्दपुर में उनकी वस्तुओं की मांग की वृद्धि के साथ ही व्यापार भी बढ़ चला। इन वस्तुओं की प्रकृति स्पष्ट थी। आनन्दपुर को अभी युद्ध-सामग्रियों और नस्ली अश्वों की सर्वाधिक आवश्यकता थी। इनके व्यापार में आशातीत वृद्धि हुई।
आनन्दपुर सचमुच, थोड़ा समय व्यतीत होते ही संपन्नता और समृद्धि का केंद्र बन आया। व्यवसायी, शिल्पकार और बेरोजगार युवा बड़ी संख्या में यहाँ आ जमे। शस्त्रास्त्रों के निर्माण के केंद्र भी खुल गए। गुरु की प्रेरणा ने सिख-संप्रदाय में उत्साह की एक नई भावना भरकर उसे एक तरह से स्वावलंबी ही कर दिया। विशेषकर आनन्दपुर अपने स्वावलंबी पैरों पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ा हो गया।

नहीं, धन की कमी हो पायी। न तो शस्त्रास्त्रों के संग्रह के लिए, न किले और बाहर के लोगों के लिए खाने-पीने-लंगर की व्यवस्था के लिए ही। सिख-संप्रदाय के अनुयायी संपूर्ण देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले थे। पूर्व गुरुओं और विशेषकर गुरु-पिता तेगबहादुर ने देश के अनेक भागों की यात्रा संपन्न कर पंथ के अनुयायियों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि कर दी थी।
इतना ही नहीं।

आदि गुरु नानकदेव ने सुदूर देशों की यात्राएं भी मार्ग की विघ्न-बाधाओं की परवाह किए बिना की थीं। उनके भक्त और अनुयायी तिब्बत, लंका, अफगानिस्तान और मध्य एशिया में दूर-दूर तक फैले थे।
नौंवे गुरु की शहादत की खबर को इन स्थानों पर भी पहुंचने में बहुत समय नहीं लगा था। संपन्न शिष्यों में प्रायः सभी ने संकट की इस घड़ी में आनन्दपुर की ओर मुख किया था और खाली हाथ नहीं आए थे वे। दान के रूप में गुरु अर्जुन देव के समय ही निर्धारित, आय के दशमांश से अधिक ही लेकर पहुंच रहे थे। आखिर यह सामान्य समय तो नहीं था। सभी ने सामर्थ्य से अधिक ही देना चाहा थ।

सबको पता था कि नौंवे गुरु की शहादत का क्या उद्देश्य था। सिख-धर्म को अधिकाधिक सशक्त करना था—बलशाली—ताकि वह शत्रुओं के अत्याचारों-अनाचारों को झलने में अधिक समर्थ हो सके, अतः भेंट में जो वस्तुएं आती थीं, वे अक्सर युद्ध-सामग्री ही होती थी। शस्त्रास्त्रों के विभिन्न प्रकार और घोड़ों की उत्कृष्ट नस्लें। युद्ध में प्रयुक्त होनेवाले परिधान। खंजरों और तलवारों का तो जैसे अंबार ही लग गया आनन्दपुर में। ठीक ही कहा समकालीन कवि हीर ने कि सिख बालक सिर पर पगड़ी बांधना बाद में सीखता था, तलवार-संचालन पहले।
गुरु तेगबहादुर की शहादत व्यर्थ नहीं गई। शायद, नियति को यही स्वीकार्य था कि उनके शव पर संप्रदाय एक नई ऊर्जा, एक नए समुत्साह और एक नई शक्ति से संपन्न हो, उठ खड़ा हो।
यही सब कुछ नए गुरु के नेतृत्व में हो रहा था। भक्तों-अनुयायियों के हृदय का कोलाहल, उनकी असह्य वेदना, एक दृढ़ निश्चय, संप्रदाय के प्रति एक नूतन समर्पण-भाव को जन्म दे रहे थे। एक नई चेतना ने आकार ग्रहण करना आरंभ किया था आनन्दपुर में।

एक नया राष्ट्र ही जन्म ले रहा था-एक धर्म-परायण किंतु शक्तिशाली राष्ट्र। पंजाब की संपूर्ण धरती ऊर्ज्वसित हो आयी थी अपने चमत्कारी, प्रतिभाशाली गुरु की असीम ऊर्जा का संबल पाकर।

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वैशाखी। सिखों के उमंग, उत्साह और आनंद-उल्लास का साक्षात् प्रतीक। वैशाखी—वर्ष का महोत्सव। मिलन-जुलन का महाअवसर। इस वैशाखी की प्रतीक्षा प्रत्येक सिख—बाल, वृद्ध और युवा—बड़ी उत्सुकता से करता था।
पर इस वर्ष की वैशाखी, 29 मार्च 1676 की वैशाखी, का विशेष ही महत्व था।
दसम गुरु गोबिन्द ने पिता के दिवंगत होने के पश्चात् पंथ-संचालन-सूत्र तो अपने हाथों में कुशलता से सहेज लिया था पर गुरु-गद्दी पर उनका विधिवत् अभिषेक अभी शेष था। इसी का आयोजन वैशाखी के इस पर्व पर करना था।
पर्याप्त समय पूर्व ही पंथ के सभी अनुयायियों, शिष्यों-भक्तों को संदेश प्रेषित कर दिया गया था।
निर्धारित तिथि के एक-दो दिनों पूर्व से ही आनन्दपुर में श्रद्धालुओं की भीड़ एकत्रित होने लगी। आस-पास के लोगों के अतिरिक्त सुदूर प्रदेशों से भी भक्त अपनी भेंट के साथ इस महत्त्वपूर्ण समारोह में सम्मिलित होने के निमित्त पहुंचने लगे। इस अवसर के अनुकूल ही सभी अपनी सामर्थ्य भर दान-सामग्री लेकर पहुंचे।

इन सामग्रियों में कुछ अत्यंत ही आकर्षक और महत्वपूर्ण थीं।
दुनीचन्द नामक एक गुरु-भक्त संप्रदाय के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित था। उसके अंदर एक महत्वपूर्ण किंतु उपयोगी परिकल्पना ने आकार ग्रहण किया।

उसने सोचा गुरु-अभिषेक का इतना बड़ा समारोह तो किसी कमरे-कोठरी में होने से रहा। खुले मैदान में भी इसे संपन्न नहीं किया जा सकता था। वैशाख की धूप जानलेवा होती है। आंधी-तूफान की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता था। भक्तों-अनुयायियों, दर्शकों के साथ-साथ खुले समारोह में कोमल-गात किशोर गुरु को भी कष्ट होगा।
‘‘तब ?’’ उसके मन में प्रश्न जागा। उसने पता किया कि दिल्ली के मुगल शासकों के पास ऐसे समारोहों के लिए तम्बू की व्यवस्था थी। बात बन गई। उसने अपने मन में ठान लिया, इस अवसर पर वह और वस्तुओं के अलावा एक विशाल तंबू भी भेंट करेगा। और तंबू भी ऐसा-वैसा नहीं। आकर्षक। गुरु की गरिमा के अनुकूल ही। वैसा कि मुगल साम्राज्य के अच्छे-से-अच्छे तम्बू को भी वह मुँह चिढ़ाए।

फिर क्या था ? उसने सामान्य कपड़े नहीं कीमती पशमीने से ही तम्बू बनवाया। उसे और बहुमूल्य और आकर्षक बनाने के लिए उसने उसके अन्दर और बाहर सोने और चांदी के तारों से कसीदाकारी करवाई। तरह-तरह के बेल-बूटे और पशु-पक्षियों के चित्रों की भी कढ़ाई करवाई।
सुरुचि-संपन्न गुरु इस तम्बू को देखते ही मुग्ध हो उठे और दुनीचन्द की दानवीरता के साथ ही उसकी मौलिक सूक्ष-बूझ के लिए भी, मुक्त-कंठ से सबके समक्ष प्रशंसा की।

बंग-भूमि का समृद्ध नगर गौरीपुर उधर के एक बहुत बड़े जमींदार, राजा राम राय की राजधानी था। गुरु तेगबहादुर के बंग-प्रवास के समय राजा राम राय सिख-पंथ का अनुयायी हो गया था। गुरु तेगबहादुर के प्रति उसकी श्रद्धा अत्यंत घनीभूत हो गई जब गुरु के आशीर्वाद से उस निस्संतान राजा को एक पुत्र-रत्न की प्रप्ति हुई। उसका नाम भी उसने रतन राय रखा।

पिता की असमय मृत्यु के पश्चात् वह सिंहासनारूढ़ हुआ। उसकी उम्र गुरु गोबिन्द के प्रायः बराबर ही थी।
उसने जब अपने समवयस्क गोबिन्द राय की गुरु के रूप में अभिषेक की बात सुनी तो वह भी भांति-भांति के बहुमूल्य भेंटों के साथ आनन्दपुर पहुंचा।

उसकी भेटों में विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्रों के अलावा कई उच्चकोटि के अश्व भी थे। किंतु इन सबों के अलावा जो सर्वाधिक आकर्षक भेंट थी वह था एक प्रशिक्षित हाथी। गुरु प्रसाद से उत्पन्न हुए और उसी को अपनी समृद्धि के मूल में मान इस राजपुत्र ने अपने इस हाथी का नाम भी ‘प्रसादी’ रखा था। यह हाथी भिन्न-भिन्न प्रकार की क्रीड़ा प्रदर्शित करने में दक्ष था।
दो-चार दिन पूर्व ही यह हाथी आनन्दपुर आ गया और तभी से इसके विभिन्न ‘करतबों’ से लोगों का अच्छा-खासा मनोरंजन हो रहा था। दर्शकों की भीड़ उसे सदा घेरे रहती। वह सूंड़ पर छोटे बच्चों को बड़े प्रेम से उठा लेता था और उन्हें धीरे-धीरे झुलाकर धीरे से धरती पर रखा देता। दूर फेंक दी गई वस्तु को उठाकर गुरु के हाथों में थमा देता। कभी वह गणेशजी की मुद्रा में पिछले पैरों पर बैठ जाता और आगे के दोनों पैरों को हाथों की तरह प्रार्थना मुद्रा में जोड़ लेता। उसका सर्वाधिक चमत्कारिक ‘करतब’ तो यह था कि वह पिछले दोनों पैरों पर मनुष्य की मुद्रा में खड़ा हो जाता और आगे के दोनों हाथों और सूंड़ को हिलाता हुआ इस तरह झूम-झूमकर नाचता कि लगता कि वह किसी देवता के समक्ष भक्ति-नृत्य प्रस्तुत कर रहा हो।

यह हाथी अन्य हाथियों से इस रूप में भी विशिष्ट था कि वह पूरी तरह सफेद था। दूध की तरह उज्ज्वल यह गजराज गुरु को बहुत पसंद आया और उसके रहने आदि के लिए विशेष व्यवस्था कराई गई।
गुरु का अभिषेक अत्यंत उत्साह तथा विधिपूर्वक संपन्न किया गया। गुरु गोबिन्द के स्नानादि सम्पन्न कर अपने को कीमती वस्त्रों से सजाया। उनका तीखे नाक-नक्शवाला लंबा छरहरा बदन उन्हें किसी राजकुमार की शोभा ही प्रदान कर रहा था।
उन्होंने सिर पर बहुमूल्य पगड़ी बांधी, उस पर कलंगी-पंख लगाए तथा तलवार, तीर-धनुष और भाला धारण कर शस्त्र-सज्जित हुए।
इस अवसर के लिए एक स्वर्ण सिंहासन निर्मित हुआ जो पशमीने के उस विशाल तम्बू में एक छोर पर रखा गया था। गुरु के वास-स्थल से वहां तक के नन्हें मार्ग को सुगंधित फूलों से सजाया गया था।

सिंहासन के आस-पास पढ़े-लिखे, गुरु-वाणी में निष्णात विद्वान सिख विराजमान थे।
गुरु गोविन्द हौले कदमों चलते हुए इस सिंहासन तक पहुंचे तो इन वृद्ध सिखों ने गुरु-वाणी से उनकी मंगल-कामना की। उनके मस्तक पर हाथ रख कर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और उनका हाथ पकड़कर उन्हें सिंहासनारूढ़ किया। इसके पश्चात् उन पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां बरसाई गईं।
गुरु के गद्दी आसीन होते ही उन सिख-विद्वानों ने आदि-ग्रंथ से पाठ आरंभ किया जो प्रायः एक घंटे तक चला।
पाठ समाप्ति के साथ ही वृद्ध और विद्वान सिखों ने मणि-माणिक्य जड़ित एक स्वर्ण-मुकुट अपने हाथों से उनके सिर पर सज्जित किया। पूरा पंडाल करतल-ध्वनि से गूंज उठा और लोगों ने प्रसन्नता से भरकर नारे लगाए—‘वाहे गुरु की जय।’

आदि गुरु नानक की जय।
गुरु तेगबहादुर की जय।
गुरु गोबिन्द राय की जय।
बोले सो निहाल।।

इन गगनभेदी नारों का स्वर अपने कक्ष में बैठी नानकी देवी और माता गूजरी देवी के कानों में भी पहुंचा और वे प्रसन्नता से पुलकित हो आईं। उनकी आंखों में आनन्द के आंसू छलछला आए।
मामा किरपालचन्द तो इस सारे आयोजन के मूल में ही थे। अतिथियों के स्वागत और रहने-ठहरने की व्यवस्था के अलावा अभिषेक-उत्सव को सफल बनाने का दायित्व उन्होंने अपने सिर पर लिया था। समारोह की सफलता पर उन्होंने वाहे गुरु का लाख-लाख शुक्र किया और मन-ही-मन तय किया कि अब जब गुरु के रूप में गोबिन्द विधिवत् अभिषिक्त हो गया है, वह पंथ के झंझटों से अपने को सर्वथा मुक्त कर जीवन के शेष दिन गुरु-वाणी के परायण और आदि ग्रन्थ के पूजा-पाठ में व्यतीत कर देंगे। दादी मां नानकी देवी तो पहले से ही विरक्त हो गईं थी किंतु आज इस अवसर पर अपने कक्ष में बैठकर यह सब देखने का लोभ का संवरण नहीं कर सकीं थीं।


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