24 घंटे में जिंदगी बदलें - जिम हार्टनेस और नील एस्केलिन 24 Ghante mein Zindagi Badalen - Hindi book by - Jim Hartness and Neil Askelin
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24 घंटे में जिंदगी बदलें

जिम हार्टनेस और नील एस्केलिन

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6201
आईएसबीएन :9788183221580

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समयसिद्ध सलाह और प्रेरक उदाहरणों के माध्यम से जिम हार्टनेस और नील एस्केलिन आपको अपनी ज़िंदगी बदलने की चुनौती देते हैं।...

24 Ghante mein Zindagi Badalen - A Hindi Book - by Jim Hartness and Neil Askelin

परिवर्तन की राह में सबसे बड़ी बाधा है पहला क़दम—इसे करने का अटल निर्णय लेना। इसके बाद कुछ भी संभव है। इस निर्णय में बस एक पल लगता है, लेकिन इसका प्रभाव ज़िंदगी भर तक रह सकता है।

जिम हार्टनेस ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलाइना ग्रैजुएट स्कूल से साइकोथैरेपी का प्रशिक्षण लिया और वे एक पादरी, परामर्शदाता तथा एस्केप : फ़्रीडम फ़्राम लाइफ़्स ग्रेटेस्ट ट्रैप्स के लेखक हैं। नील एस्केलिन प्रसिद्ध प्रेरक वक्ता हैं और लीडिंग विद लव तथा व्हॉट टु डू व्हेन यू डोन्ट नो व्हॉट टु डू के लेखक हैं।

पहला घंटा

आपके सबसे बड़ा निर्णय


क्या महज़ 24 घंटों में सकारात्मक और स्थायी परिवर्तन संभव है ? क्या एक ही दिन में जीवन बदलना संभव है ?
यह न सिर्फ़ संभव है, बल्कि मुमकिन भी है।

यह पुस्तक एक बहुत ही सरल अवधारणा पर केंद्रित है। हमारा मानना है कि जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तनों के निर्णय लंबे समय में धीरे-धीरे नहीं लिए जाते हैं, वे तो चंद पलों के सचेतन निर्णयों का परिणाम होते हैं। हालाँकि, ये चुनाव जल्दबाज़ी में नहीं किए जाते हैं, बल्कि ये तो गहरी जड़ों वाले संकल्प होते हैं, जिनकी बदौलत आपके विचारों और कार्यों में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं।

मिसाल के तौर पर, हो सकता है कि आपका लक्ष्य डाइटिंग करके अपना वज़न बीस पौंड कम करना हो और इसमें छह महीने लग जाएँ। लेकिन सच तो यह है कि आपने यह युद्ध छह महीने में नहीं, बल्कि बहुत कम समय में जीत लिया था—जिस घंटे आपने इस बात का सच्चा संकल्प किया था। यही प्रक्रिया उन सभी परिवर्तनों पर भी लागू होती है, जो हम अपने जीवन में चाहते हैं।

कायाकल्प की यह प्रक्रिया कब शुरू होगी ? जिस पल आप बदलने का फ़ैसला करेंगे। हर परिवर्तन उस घंटे में होगा, जब आप अपने सामने मौदूज किसी बड़ी चुनौती का सामना करेंगे। इस पुस्तक में आपसे एक दृढ़ और व्यक्तिगत संकल्प करने को कहा जा रहा है।

यह पुस्तक इस तरह से तैयार नहीं की गई है कि इसे एक निश्चित समयसीमा में पढ़ना ज़रूरी हो। हम आपसे सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप हर अध्याय सर एक घंटे का समय पूरी तरह से केंद्रित करें। इसे पढ़ें, इसके बारे में अच्छी तरह सोच-विचार करें और दिल की गहराई से निर्णय लें, जो परिवर्तन के लिए आवश्यक है।

आइए देखते हैं कि इससे आपको क्या मिलेगा। कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जब आप संकल्प लेंगे और समर्पित हो जाएँगे, तो ये निर्णय आपस में जुड़ते जाएँगे और आपको ऐसी अविश्वसनीय शक्ति मिलेगी, जिसे आपने सपने में भी संभव नहीं माना होगा। इसका आपके काम-काज, आपके शारीरिक स्वास्थ्य, आपके व्यग्तिगत संबंधों और आपके पूरे नज़रिए पर सकारात्मक असर होगा।

यह सारी प्रक्रिया कहाँ से शुरू होती है ? किसी भी मनोवैज्ञानिक, परामर्शदाता या मनोचिकित्सक से पूछ लें; आपको एक ही जवाब मिलेगा : परिवर्तन के निर्णय के बिना कुछ भी नहीं होता है।

यह पुस्तक पढ़ते समय आपसे अपने विचारों, लक्ष्य, नज़रिए और आदतों के बारे में निर्णय लेने के लिए कहा जाएगा। लेकिन विशिष्ट परिवर्तनों के बारे में निर्णय लेना तब तक निर्र्थक है, जब तक कि आप सबसे महत्वपूर्ण निर्णय न ले लें—परिवर्तन करने के लिए इच्छुक और तत्पर होने का निर्णय।
आप कह सकते हैं, ‘‘मैंने पहले भी कई बार इसकी कोशिश की है, लेकिन कुछ नहीं होता है।’’

यही बात एक पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुँचने की तीन असफल कोशिशों के बाद कह सकता था। लेकिन इसके बजाय उसने शिखर की ओर देखकर यह कहा, ‘‘तुमने मुझे एक बार हरा दिया। तुमने मुझे दो बार हरा दिया। तुमने मुझे तीन बार हरा दिया। लेकिन पहाड़, किसी दिन मैं तुम पर विजय पा लूँगा, क्योंकि तुम इससे ज़्यादा बड़े नहीं बन सकते हो, लेकिन मैं बन सकता हूँ।’’

चाहे आप इसे जानते हों या नहीं, लेकिन हर चीज़—जिसमें आपका शरीर भी शामिल है—परिवर्तन की निरंतर प्रक्रिया में रहती है। जब आप उसी पहाड़ पर दोबारा चढ़ते हैं तो यह बिलकुल नया अनुभव होता है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक हेराक्लिटस ने कहा था, ‘‘आप उसी नदी में दोबारा क़दम नहीं रख सकते।’’ नदी में पानी लगातार बहता रहता है और सुमद्र में मिलता रहता है।

ग्रांड कैनयन के बारे में सोचें और याद रखें कि ये रंगीन दर्रे कोलोरैडो नदी के तेज़ बहाव वाले पानी का परिणाम हैं। मिट्टी नदी में घुलती रहती है—कैलिफ़ोर्निया के मोजावे रेगिस्तान तक। ग्रांड कैनयन बदल रहा है—एक समय में मिट्टी के एक कण की दर से।

परिवर्तन से घबराने की ज़रूरत नहीं है। यह तो जीवन की निशानी है। अगर आपके शरीर की सभी कोशिकाएँ लगातार ख़ुद को न बदलें, तो आप मर जाएँगे। शब्दकोश में परिवर्तन की परिभाषा है, ‘‘किसी चीज़ की जगह दूसरी चीज़ रख देना।’’ यह बदलाव और विस्थापन की प्रक्रिया है।

कहाँ परिवर्तन करें ?


कुछ भी स्थायी नहीं है। आपका व्यक्तित्व, आपकी भावनाएँ और आपकी अनुभूतियाँ सभी सतत परिवर्तन की प्रक्रिया में हैं। बहरहाल, भयावह स्थिति यह है कि ज़्यादातर लोगों में होने वाले अधिकांश परिवर्तन बग़ैर किसी दिशा, पूर्व विचार या व्यक्तिगत नियंत्रण के होते हैं। जब हम स्वयं में परिवर्तन करने के बारे में नहीं सोचते हैं, तो परिस्थितियों के बदलने पर हमें अक्सर हैरानी या निराशा होती है। हम ख़ुद को किस तरह बदलें, यह फ़ैसला करने के बजाय हम बाहरी परिस्थितियों पर ही प्रतिक्रिया करते रहते हैं।

प्रतिक्रिया करने का एक आम तरीक़ा नौकरी, जीवनसाथी या दोस्त बदलना है। लोग सोचते हैं कि अगर उनका बॉस या जीवनसाथी या मकान आदर्श होता, तो सब कुछ बेहतरीन होता। लेकिन ज़्यादातर लोग कभी भी चेतन दृष्टि से ख़ुद को बदलने के बारे में नहीं सोचते हैं।

ज़रा अपने चारों तरफ़ नज़र डालें। आपको दो तरह के लोग दिखेंगे : जो बदल रहे हैं और जो परिवर्तन का प्रतिरोध कर रहे हैं, यहाँ तक कि इससे बच रहे हैं। बाद वाले लोगों को वॉशिंगटन इर्विंग के इन शब्दों से लाभ होगा, ‘‘मैंने स्टेजकोच में यात्रा करते समय पाया है कि अक्सर अपनी स्थिति को बदलने और एक नई जगह पर घायल होने में सुकून मिलता है।’’

उन कर्मचारियों का क्या हुआ, जिन्होंने कहा था, ‘‘मैं कभी कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करूँगा’’ ? वे आज या तो निहायत ही घिसा-पिटा और बिना तरक्क़ी वाला काम कर रहे हैं या फिर उन्होंने डाटा प्रोसेसिंग क्रांति में शामिल होने का फ़ैसला कर लिया है। कामयाब लोग ‘‘परिवर्तनशील’’ होते हैं। वे वह काम करते हैं, जिसे करने से दूसरे घबराते हैं।

अगर कॉरपोरेशन्स ग्राहकों की माँगों के हिसाब से ख़ुद को न बदलें, तो उनका दिवालिया होना तय है। आपने ‘‘नया और बेहतर’’ आइवरी सोप कितनी बार देखा होगा ? आपको कैसा लगेगा, अगर आपका डॉक्टर आपका ऑपरेशन करते वक़्त हाई टेक लेज़र यंत्र के बजाय पुराने ज़माने का चाक़ू निकाल ले ?

आपको वह कहानी याद होगी, जो ईसा मसीह ने पुरानी वाइनस्किन्स के बारे में कही थी ? वे कड़क और सुखी थीं—उनमें फैलने की क्षमता नहीं थी। कई लोग भी इसी तरह के होते हैं। वे पुराने विचारों को ही जकड़े रहते हैं और अपनी ग़लती मानना ही नहीं चाहते हैं। ईसा मसीह ने चेतावनी दी थी कि हमें ‘‘नई शराब पुरानी वाइनस्किन्स में नहीं रखनी चाहिए, वरना वाइनस्किन्स फट जाएँगी, शराब फैल जाएगी और वाइनस्किन्स बर्बाद हो जाएँगी। उन्होंने नई शराब नई वाइनस्किन्स में रखी और दोनों ही सुरक्षित रहे’’ (मैथ्यू 9:17)।

परिवर्तन के लिए लचीलेपन, अनुकूलनशीलता और पुराने विचारों की जगह नए विचार रखने की इच्छा की ज़रूरत होती है।
इस ख़बर पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी कि आज से दस साल बाद आपका जीवन ठीक वैसा ही होगा, जैसा कि इस वक़्त है ? आप शायद इस भविष्यवाणी से बहुत रोमांचित नहीं होंगे ? इसीलिए अपने जीवन के कायाकल्प का सचेतन निर्णय लेना महत्वपूर्ण है।

यह ऐसी बात नहीं है, जिसमें देर की जाए। प्रक्रिया तत्काल शुरू की जानी चाहिए। एक पुरानी कहावत है, ‘‘हम निर्णय लेकर ही निर्णय लेना सीखते हैं।’’
शुरुआत में परिवर्तन का संकल्प करते समय चार बातें जानना बहुत महत्वपूर्ण है :

एक। निर्णय भले ही ग़लत हो, लेकिन फिर भी निर्णय लेना सकारात्मक शुरुआत और प्रगति की निशानी है। काम किस तरह पूरा किया जाएगा, उसकी विस्तृत रूपरेखा तो बाद में बनेगी। सबसे पहले तो शुरू करने का निर्णय लेना होगा। इस निर्णय से ही हमारी रचनात्मकता और ऊर्जा बाहर आती है, जो आगे के काम की रणनीति बनाने के लिए ज़रूरी है। बहरहाल, ज़्यादातर लोग निर्णय लेने की प्रक्रिया ही पूरी नहीं कर पाते। वे शुरु्रआत में ही यह जानना चाहते हैं कि इसे कैसे करना है। शायद वे इसकी विस्तृत योजनाएँ भी बना लें। लेकिन वे संकल्प नहीं कर पाते। अगर अनिर्णय की स्थिति ज़्यादा समय तक चले, तो इसका परिणाम होता है, शंका और डर का आत्मघाती चक्र। ग़लती के बारे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है, इससे मिलने वाला सबक़। आप उन ग़लतियों से नहीं सीख सकते, जो आपने की ही नहीं।

ईसा मसीह ने पानी पर चलने के पीटर के निर्णय का सम्मान किया—जबकि वे जानते थे कि पीटर पानी में गिर सकते हैं। उन्होंने पीटर को असफल होने दिया क्योंकि यही सीखने और विकास करने का एक रास्ता है।

दो। ग़लत निर्णय सुधारे जा सकते हैं लेकिन ‘‘शून्य’’ निर्णय नहीं। हमारे पास चुनाव करने की स्वतंत्रता है। इसका मतलब यह है कि हमारे पास ख़ुद को मूर्ख साबित करने की भी स्वतंत्रता है। हमारे पास असफल होने की भी स्वतंत्रता है। जब हमारे पास असफल होने की स्वतंत्रता हो, तभी हम जाँच करने, अन्वेषण करने और विकास करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। वैसे, अगर हम अपने क्षितिजों का विस्तार करना चाहते हैं, तो हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हम ग़ैर-जिम्मेदारी से असफलता का चुनाव न करें।

तीन। मार्गदर्शन सिर्फ़ गतिमान चीज़ों को ही मिलता है। खड़ी हुई कार को दिशा बताने की ज़रूरत नहीं होती लेकिन जैसे ही कार चालू हो जाए और पहिए घूमने लगें, तो आप इसे उस दिशा में मोड़ सकते हैं, जिधर आप यात्रा करना चाहते हैं। जब आप निर्णय ले लेंगे और उस पर अमल करने लगेंगे, तो आपको तत्काल अपने भीतर शक्ति का एहसास होगा। यह योजना को नियंत्रित करने और उसे मार्गदर्शन देने का परिणाम है।

चार। कोई भी चीज़ हिलने के निर्णय के बिना हिलती नहीं है। अगर परिस्थितियों और बाहरी प्रभावों के भरोसे रहेंगे, तो आपका जीवन दिशाहीन हो जाएगा। ज़िंदगी बिना किसी उद्देश्य के चलती रहेगी। इसीलिए परिवर्तन के अत्यावश्यक निर्णय लेने से बचना इतना ज़्यादा ख़तरनाक है। असफलता से पूरी तरह बचने की कोशिश पराजय का अचूक मार्ग है।

वैज्ञानिक प्रगति शोध से होती है। किसी छोटी खोज के लिए सैकड़ों-हज़ारों असफल प्रयोग आवश्यक हैं। प्रगति के संदर्भ में असफलता और शोध पर्यायवाची हैं।

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