समग्र उपन्यास - कमलेश्वर Samagra Upanyas - Hindi book by - Kamleshwar
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समग्र उपन्यास

कमलेश्वर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :712
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 625
आईएसबीएन :9788170285083

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कमलेश्वर के श्रेष्ठ दस प्रसिद्ध उपन्यासों की समग्र प्रस्तुति....

Samagra Upanyas - A hindi Book by - kamleshwar समग्र उपन्यास - कमलेश्वर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रख्यात कथाकार तथा मीडियामैन कमलेश्वर ने ज़मीन और ज़िन्दगी से सीधे जुड़े स्त्री-पुरुषों के जीवन का चित्रण करने और उनकी छोटी-बड़ी आशा-आकांक्षाओं, संघर्षों इत्यादि को व्यक्त करने में विशेष कमाल हासिल किया है इसी कारण कहानियों के अलावा बिलकुल पहले उपन्यास से ही उन्होंने साहित्य जगत में अपनी विशिष्टता कायम कर ली और एक के बाद दूसरी छोटी परन्तु महत्वपूर्ण रचना देकर अग्रणी उपन्यासकारों में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया। उनके यथार्थपरक लेखक ने रचनात्मकता के साथ-साथ जीवन तथा इतिहास के चिन्तन के नये द्वार भी खोले हैं-‘कितने पाकिस्तान’ जिसका विलक्षण उदाहरण है।

कहानियों के साथ कमलेश्वर के समग्र उपन्यासों का भी विशिष्ट ऐतिहासिक महत्त्व है, जिनका अध्ययन किया जाता रहेगा। प्रस्तुत संकलन में कालक्रमानुसार उनके दस उपन्यास प्रस्तुत किय गए हैं-एक सड़क सत्तावन गलियाँ, लौटे हुए मुसाफिर, तीसरा आदमी, डाक बंगला, समुद्र में खोया हुआ आदमी, काली आँधी, आगामी अतीत, वही बात, सुबह...दोपहर.. शाम.. रेगिस्तान। इन सबके लिए उन्होंने नयी भूमिकाएँ भी लिखी हैं।

प्रस्तुत संकलन में कमलेश्वर के दस उपन्यास- एक सड़क सत्तावन गलियाँ, लौटे हुए मुसाफिर, तीसरा आदमी, डाक, बंगला, समुद्र में खोया हुआ आदमी, काली आंधी, आगामी अतीत, वही बात, सुबह....दोपहर....शाम...., रेगिस्तान-कालाक्रमानुसार दिए गए हैं। साथ ही प्रत्येक उपन्यास के लिए उन्होंने नयी भूमिकाएं भी लिखी हैं।

हिन्दी के कथाकारों में कमलेश्वर का अपना बिलकुल अलग और विशिष्ट स्थान है, जो ‘कितने पाकिस्तान’ के प्रकाशन के बाद सफलता और यश के शिखरों को छूने लगा है। वास्तविक जिन्दगी की उनकी पकड़ आश्चर्यजनक रूप से मजबूत है और उनके कथा साहित्य ने रचनात्मकता के साथ-साथ जीवन और इतिहास के चिन्तन के नये द्वार भी खोल दिए हैं।


ये मेरे उपन्यास.....

 


जब मैंने अपना पहला उपन्यास ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ’ लिखा, तब मुझे उपन्यास की परिभाषा नहीं मालूम थी। यह तो बाद में मालूम हुआ कि पश्चिम में औद्यौगिक क्रांति के बाद मध्यवर्गीय महिलाओं के पास समय बहुत बचने लगा। मशीनों ने उत्पादन की अधिकांश जिम्मेदारी उठा ली.....और यहाँ पर तथ्य की ओर इशारा ही किया जा सकता है कि औद्योगिक क्रांति को अपनाने वाले पश्चिमी देशों के पुरुष समाज ने अपनी महिलाओं को व्यक्तिगत उत्पादन की मशीन बना लिया। यहीं से स्त्री-पुरुष संबंध एक दूसरे धरातल पर तय होने लगे और इस महिला वर्ग का ‘चरित्र’ बदलने लगा....औरत पसीने की जगह परफ्यूम से नहाने लगी। शायद इसलिए हमें बताया गया है कि महिला वर्ग के खाली समय को भरने और उनका मनोरंजन करने के लिए उपन्यास विधा का जन्म हुआ।

पर हमारे पास तो आख्यानों और वृत्तांतों की सदियों पुरानी लेखक-कथन की परम्परा थी। उस पूरे इतिहास में जा सकने की यहाँ ज़रूरत नहीं है। मुझे उपन्यास लिखने से पहले यह सब भी अधिक नहीं मालूम था। कहानी से मेरा पहला साबका अम्मा की सुनाई कहानियों से पड़ा था। यह अर्ध-धार्मिक, अर्ध-मिथिकीय लोककथाएं थीं जो कृषि सभ्यता में जन्मी थीं। पूजा-अर्चना के कर्मकाण्डों में भी उन कहानियों का आवश्यक स्थान था। अम्मा कहानियाँ सुनाती थीं, उनमें दुःख-दर्द, न्याय-अन्याय का बखान हमेशा रहता था। और फिर साथ घटित होते किसी घटना-प्रसंग के सहारे वे अपनी कहानी को सुखांत में यह कह कर, समाप्त कर देती थीं कि ‘जइसे उनके दिन बहुरे, वइसे ही इनके दिन भी बहुरें’ ....अम्मा की इन कहानियों में एक अजीब-सा तैरता हुआ यथार्थ भी रहता था जो मुझे अपने आस-पास आंशिक रूप में मौजूद दिखाई देने लगता था। उनकी कहानी का कोई प्रसंग या उससे उपजी स्थितियों की लाचारी या बेबसी मुझे कहीं न कहीं तैरती हुई दिखाई दे जाती तब अम्मा की कहानी मेरे मन पर सच्चाई की तरह अपना अक्स छोड़ जाती। मुझे लगता कि कहानी भी एक सच्ची बात कहती है। और फिर उनकी कहानियों का वह सुखांत मेरे वाक्य-‘जइसे उनके दिन बहुरे, वइसे इनके दिन भी बहुरें’, मेरे लिए सतत उम्मीद की जमीन तैयार करने में यादगार साबित हुआ। और शायद इसी वाक्य ने मुझे कहानी की परिवर्तन-कामी सोच से भी जोड़ा।

बेअक्स, तैरता हुआ यथार्थ, दुःख-दर्द, न्याय-अन्याय का बखान, सतत उम्मीद की जमीन और परिवर्तन की कामना ने ही शायद मेरे समकालीनों की ऐतिहासिक नियति थी। कि हमने जन सामान्य की अपराजेय जिजीविषा का गौरवशाली पर्व भी आजादी के रूप में देखा था और विभाजन की विभीषिका के महासंताप को भी झेला था.....उत्सव के पीछे चलती आर्थियों को देखा था।
वही सच्चाइयाँ अब तक मेरे साथ हैं...वही सच्चाइयाँ जब मन में कौंधती हैं तो पिछले समय के साथ मौजूदा वक्त घुल-मिल जाता है और भविष्य की ओर देखने का साहस देता है....
और अंत में यही कह सकता हूँ कि विधागत रूप में यह उपन्यास है पर असलियत में यह उपन्यास मेरे सपनों की इबारतें हैं !



कमलेश्वर

 

यह मेरा पहला उपन्यास है। लिखा सन् ’56 में गया था। यह उस समय पूरा का पूरा ‘हंस’ में छपा था। भाई अमृतराय ने छापा था। उसी समय श्री कृष्णचन्द्र बेरी ने इसे हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय वाराणसी से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया। फिर सन् 68-69 या शायद इसके बाद श्री प्रेम कपूर ने इस फ़िल्म बनाई- ‘बदनाम बस्ती।’

इस फ़िल्म के बनने से पहले मैं दिल्ली में रहता था। वे दिन बहुत तक़लीफ़ के दिन थे। ज़िन्दा रहने और आत्महत्या न करने की ज़िद के दिन थे। उन्हीं दिनों मजबूरी में मुझे इस उपन्यास को बेच देना पड़ा। पंजाबी पुस्तक भण्डार के श्री अमरनाथ ने कृपा करके 800 रु. में इसके सारे अधिकार खरीद लिए। इस उपन्यास पर लेखक के रूप में मेरा नाम रह गया पर मेरा कोई हक नहीं रह गया।

मेरे लिए यह उपन्यास उतना ही प्रिय है जितनी प्रिय मेरी माँ मेरी जन्मभूमि मैनपुरी रही थी। इसे बेचकर करीब 20 साल मेरी आत्मा दुखती रही- लगता रहा, जैसे मैंने अपनी जन्मभूमि या माँ बेच दी हो !
तब यह उपन्यास ‘बदनाम बस्ती’ के नाम से हिंदी, पंजाबी और उर्दू में छपा और बिकता रहा।

20 साल बाद मेरी इस तकलीफ़ को मेरे अभिन्न दोस्त जवाहर चौधरी ने समझा और उन्होंने श्री अमरनाथ से बात की। श्री अमरनाथ को भी इस जानकारी से दुःख हुआ और उन्होंने इस उपन्यास के सर्वधिकार मुझे बेहद शालीनता और अपनेपन के वापस कर दिए। मेरा शहर मैनपुरी तो मुझसे छूट गया पर श्री अमरनाथ ने मेरी मैनपुरी मुझे लौटा दी, तो मैंने फिर से जीने लगा। जब से उपन्यास बेच दिया था, मैनपुरी जाते अपराध का बोध होता था। इन्हीं अपराध-बोध के दिनों में मेरी माँ को बहुत कष्ट हुआ कि मैं मानपुरी क्यों नहीं आता। आखिर उन्होंने मैनपुरी से बाहर निकलना शुरू किया और वे बड़े भाई साहब के पास इलाहाबाद जाने लगीं या मेरे पास दिल्ली-मुम्बई आने लगीं !

मैं मैंनपुरी नहीं जा पाया। गया भी तो रुक नहीं पाया-अपराध-बोध के इन्हीं दिनों के बीच मेरी माँ और मेरे बचपन के दोस्त बिब्बन (श्यामस्वरूप श्रीवास्तव) का देहान्त हो गया। मेरे लिए मेरा शहर पराया हो गया।

जब श्री अमरनाथ ने इसके सर्वाधिकार दे दिए तो मन को कुछ राहत मिली। उन्होंने प्रकाशकीय उपकार तो किया ही-कितना गहरा मानवीय उपकार मुझ पर किया-इसका उन्हें नहीं पर जवाहर चौधरी को पता है। तो मेरी ही तरह गर्दिश में चमकता हुआ यह उपन्यास इसके बाद अपने मूल नाम से विश्वनाथ जी के यहां राजपाल एण्ड सन्ज़ से छपाः ‘एक सड़क सत्तावन गलियाँ !’

करीब 45 वर्षों बाद, प्रूफ देखते हुए मैंने अपने इस उपन्यास को फिर पढ़ा, कॉपीराइट बेच देने के बाद हिंदी, और पंजाबी (तीनों भाषाओं) में इसके लगभग 30 संस्करण हुए। यह मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रूफ रीडिंग के दौरान इसके मूल-पाठ के साथ इतना और इतनी बार दुर्व्यवहार हुआ कि कई जगह मेरे लिए अपने ही पाठ, भाषा और संदर्भों को समझना कठिन हो गया। वाक्य-विन्यास को तो प्रूफ रीडरों ने इतना बदला (सुधारा !) कि मेरी अपनी भाषा और लहज़ा मेरा नहीं रह गया। यह बहुत ही व्यथित करनेवाली स्थिति थी।
मैं अपने सभी प्रकाशक बंधुओं से अपील करता हूं कि वे प्रूफ रीडरों से रचना की रक्षा करें, कोई भी पुस्तक या उसका संस्करण छापने से पहले मूल लेखक का सहयोग लें और प्रूफ रीडर द्वारा प्रूफ पढ़े जाते समय कॉपी-होल्डर की परम्परा का पालन अवश्य करें...मुझे अब 45 वर्षों के बाद नहीं मालूम कि इस उपन्यास के कितने अंश या पंक्तियां तिरोहित हो चुकी हैं। बहरहाल ....

जितना और जिस हद तक मैं मूल पाठ को सँभाल सकता था, उतना मैंने सँभाला है।
यह उपन्यास मेरी आरम्भिक और मौलिक लेखकीय स्मृतियों का प्रथम स्रोत है। मेरे अपने छोटे-से कस्बे का आख्यान। यह मुझे अभी भी बहुत प्रिय है....


कमलेश्वर


एक सड़क सत्तावन गलियाँ

 


मयन देवताकी बसाई हुई इस बस्ती की ज़िन्दगी की धुरी है- यह रिकटगंज की सराय, झम्मनलाल की मंडी और मोटरों के अड्डे। औरतों के अपने तीज-त्यौहार, मनौती-पूजा के ठिकाने हैं- शीलता देवी, गमा देवी, सैयद की मज़ार, बाबा का थान और नीम के नीचे पड़ी मयन देवता की मूरत। दो-चार मौके ऐसे ज़रूर आते हैं, जब मर्द-औरतों का सम्मिलित रूप दिखाई देता है- सदानन्द आश्रम में साधु-समागन हो या मंडी में रामलीला शुरू हो।

जिले की पाँच तहसीलों में सिर्फ दो को रेल जोड़ती है, बाकी तहसीली के लिए आवागमन के ज़रिए दो ही हैं- मोटर और इक्के। बरसात में जब मौसमी नदियाँ और नाले इतराने लगते हैं तो रास्ते कट जाते हैं, कच्चे दलदलों में बदल जाते हैं, इक्के वाले हाथ रखकर बैठ जाते हैं और घोड़े; उनके सिर्फ दो ही काम रह जाते हैं- पूछ से मक्खियाँ उड़ाना और हिनहिनाना।

नदियाँ घहरा उठती हैं, पर आदमी का आना-जाना नहीं रुकता। नदियों में कड़ाह पड़ जाते हैं और इन छोटी-छोटी बस्तियों के दिलेर लोग उन कड़ाहों में बैठकर बड़ी-बड़ी भँवरें, हाथी-डुबाऊ गहराइयों और चौड़े पाट पार कर जाते हैं। जानवरों तक को लँघा ले जाते हैं। खासतौर से अषाढ़ में मंडी की नाड़ी धीमी पड़ जाती है.....पूरी बस्ती पर उदासी छा जाती है। सब कामों के सिलसिले टूट जाते हैं। नाज की लदाई बन्द हो जाती है। पल्लेदार और तौला बेकार हो जाते हैं। सौदागरों का आना-जाना बन्द। और फिर आढ़तियों की अपनी तिकड़मी। बरसात के लिए जिन दिनों अन्न की बेहद खींचातानी पड़ती है, गोदान भर लिए जाते हैं। थोक बिक्री में तब उनका मन नहीं रमता.....ब्याने के वक्त भला कोई अपनी गाय बेचता है ! यह तो पाप का भागी होना हुआ। कोई हिम्मतवाला सौदागर मंडी में आ ही गया तो टका-सा जवाब मिल जाता है- अपने शहर के लिए भी कुछ रखेंगे सेठ जी बरसात बाद में आना।

मंडी की नाड़ी धीमी पड़ते ही पूरी बस्ती उदास हो जाती है। सच पूछा जाए तो शहर के मध्य में स्थित यह मंडी ही दिल इसका है। इसी की धड़कनों के साथ जीवन की गति बंधी है। सड़कें वीरान हो जाती हैं, गलियों का उछाल मूर्छित हो जाता है। तहसील-कचहरी के बाबू लोग पैजामा-कुरता में-छतरी या तौलिए डाले झमझाते पानी में भी निकल पड़ते हैं, बाकी लोगों के गोल के गोल बैठते हैं।


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