मानसिक शक्ति के चमत्कार - सत्यकाम विद्यालंकार Manasik Shakti ke Chamatkar - Hindi book by - Satyakam Vidyalankar
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मानसिक शक्ति के चमत्कार

सत्यकाम विद्यालंकार

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2015
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 626
आईएसबीएन :9788170286172

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मनोबल बढ़ाने के व्यावहारिक उपायों की उत्कृष्ट प्रस्तुति...

Manasik Shakti ke Chamatkar - A hindi Book by - Satyakam Vidyalankar मानसिक शक्ति के चमत्कार - सत्यकाम विद्यालंकार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

मानसिक समस्याएँ सभी आम-खास लोगों के साथ होती हैं। उनसे कैसे निपटा जाए और मन की शक्ति को बढ़ाने के लिए कौन से व्यावहारिक उपाय अपनाये जायें इस पुस्तक में अनुभवी और प्रतिष्ठित लेखक ने इसी पर प्रकाश डाला है। मानसिक विकृतियों से ग्रस्त रोगियों के लिए भी यह पुस्तक उपयोगी है, सरल-सुबोध भाषा और रोचक बोधगम्य शैली।

 

पुस्तक का प्रयोजन

क्या यह सम्भव है कि हम मानसिक शक्ति को उन्नत करने की कोई निश्चित योजना बना सकें ? या उसे अस्वास्थ्य व उन्माद से बचाने के लिए कुछ ऐसे उपाय निकाल सकें जिनसे हमें कभी मानसिक निर्बलता अनुभव न हो ? मैं इसे संभव मानता हूँ। हमने चिकित्सा के क्षेत्र में आश्चर्यजनक आविष्कार किए हैं, किन्तु उनका विषय अभी तक शारीरिक रोग ही रहे हैं। मानसिक रोगों के अवरोध के लिए हम अभी प्रयत्नशील नहीं हुए; यह हमारा दुर्भाग्य है। इस क्षेत्र को रहस्यमय कहने से ही हम इसके परिणामों से बच नहीं जाते। इसे देवता का अभिशाप कहकर असाध्य कोटि में रखने में भी हमारा काम नहीं चलता। केवल धार्मिक विश्वासों के आधार पर भी हम मनोवैज्ञानिक ग्रन्थियों का युक्तियुक्त समाधान नहीं कर सकते।

मानसशास्त्र ने इस दिशा में सराहनीय प्रयत्न किए हैं। मानसशास्त्र कोई कल्पित विज्ञान नहीं हैं, जीवन के अनुभवों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने कुछ स्थापनाएँ बनाई हैं। इस यत्न को प्रारम्भ हुए पचास-साठ वर्ष से अधिक व्यतीत नहीं हुआ। इतने काल में मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य की मानसिक अवस्थाओं का अध्ययन करके कुछ ऐसे सत्य सामने रखे हैं जो मनुष्य-जीवन में असाधारणतया सभी जगह घटित होते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा सर्वसाधारण के लिए भी उपयोगी है; केवल मानसिक रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए नहीं। जिस तरह शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों का अनुशीलन केवल रोगियों के लिए ही उपयोगी नहीं होता बल्कि स्वस्थ व्यक्तियों की स्वास्थ्य-रक्षा के लिए भी होता है, मानसिक रोगों का विश्लेषण भी इसी तरह प्रत्येक स्वस्थ व अस्वस्थ व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सकता है। आजकल का संघर्षमय जीवन मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत संकट का है। विज्ञान और सभ्यता के विस्तार ने मनुष्य की मानसिक वृत्तियों को भी बड़े विकट संघर्ष में डाल दिया है। मानसिक संतुलन आज से वर्षों पूर्व जितना कठिन था, आज उससे दस गुना अधिक हो गया है। मानसिक रोगों के अस्पतालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है। उन्माद के रोगियों की संख्या में भी प्रतिवर्ष हज़ारों की वृद्धि हो रही है। अमेरिका जैसे सभ्य देशों में प्रतिवर्ष कई हज़ार मानसिक उन्माद के नये रोगी चिकित्सा के लिए जाते हैं। हमारे देश में मानसिक स्वास्थ का पतन इतना विकट नहीं हुआ है, फिर भी संघर्षमय जीवन की वृद्धि होती जा रही है।

अभी तक हमारे देश के साहित्य में, मानसशास्त्र व मानस-चिकित्सा के संबंध में उपयोगी पुस्तकों का अभाव-सा है। प्राचीन साहित्य में दर्शनकारों ने मानसिक विज्ञान का पर्याप्त अन्वेषण किया है। किन्तु वह प्रयत्न केवल अध्यात्मिक दृष्टि से किया गया था। हमारे शास्त्रों का लक्ष्य प्राय: मनुष्य की मानसिक वृत्तियों को मोक्ष की सिद्धि के लिए तैयार करना था। पातञ्जल योगशास्त्र प्राचीन मानस-विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। किन्तु उसके अनुसार भी मनुष्य के मन की अन्त:-प्रवृत्तियों को मोक्ष-साधन में अवरोध माना गया है। उस समय के अन्य मानसशास्त्रों ने भी मनुष्य की वृत्ति को स्वभावत: पाप की ओर ले जानेवाला कहा है। उनके अध्ययन से जनसाधारण यही निष्कर्ष निकालता है कि मनुष्य की अन्त:प्रवृत्तियाँ पापमूलक हैं। इस विकृत कल्पना के आधार पर ही हमारे काल के नीतिशास्त्रों और धर्मशास्त्रों की रचना हुई है।

जो स्वाभाविक है, वह अनैतिक है; और जो कार्य हमारी सहज प्रवृत्तियों का उच्छेद करते हैं, वही नैतिक कार्य है, यह कल्पना ही इन शास्त्रों का आधार रही। इसके परिणामस्वरूप ही मानसशास्त्र के प्रति हमारी सदा अरुचि रही है। मानव मन दुष्ट है, पापी है- यह धारणा स्थिर होने के बाद मानसशास्त्र की ओर प्रवृत्त ही कौन हो सकता था ? ध्यान, धारणा द्वारा निरोध करना जिस मन के लिए विहित था उसके अध्ययन की इच्छा ही कैसे पैदा होती ? इसीलिए हमारे ग्रन्थकारों ने मानवी मनोव्यापार तथा मनोव्यापार-प्रेरित वैयक्तिक व सामाजिक व्यवहार के अध्ययन की अवश्यकता ही नहीं समझी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हठवादियों और तांत्रिकों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया है। मानसिक अध्ययन का ठीक रास्ता न मिलने पर सर्वसाधारण ने इन्हीं तान्त्रिकों को मानस-चिकित्सक मान लिया। मानसिक रोगों को भूत-प्रेतों का चमत्कार माना गया।
इस वैज्ञानिक युग में हम इन हठवादियों और तांत्रिकों को अपना प्रमाण नहीं मान सकते। संस्कृत के प्राचीन शास्त्रों को भी हम एकमात्र पथ-प्रदर्शक नहीं बना सकते। उसमें सब कुछ इतना सूत्ररूप से कहा गया है कि व्यावहारिक जीवन में उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। अत: आवश्यकता है कि हम नवीन मानसशास्त्र का अनुशीलन करके अपने मन, उसके धर्म, उसके व्यापार और उसके नियमों का निश्चय करें। मन का शरीर और आत्मा से घनिष्ठ संबंध है। मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य की पहली शर्त है। मन अस्वस्थ होगा तो शरीर भी अस्वस्थ होगा। शारीरिक स्वस्थ्य की रक्षा के लिए हम बहुत सतर्क रहते हैं, किन्तु यह भूल जाते हैं कि शरीर का आरोग्य, मन के आरोग्य पर निर्भर है। पश्चिम के चिकित्सकों ने बहुत अनवेषण के बाद यह खोज की है कि शरीर की आधी बीमारियाँ मानसिक अस्वस्थता के कारण होती हैं। उनका उपचार भी रोगी की मानसिक अस्वस्थता को दूर करने से ही होता है। रासायनिक उपचार केवल रोग की तीव्रता को शान्त करने में सफल होते हैं।

इस पुस्तक का प्रयोजन मानसिक विकृतियों से ग्रस्त रोगियों का पथ-प्रदर्शन करना ही नहीं है, बल्कि सर्वसाधारण को मानसिक विकृतियों से दूर रहने के लिए सावधान करना और मन की शक्ति को बढ़ने के लिए क्रियात्मक उपायों पर प्रकाश डालना भी है।

मानसिक स्वास्थ्य का विषय हम सबके लिए उपयोगी है। यह संभव है कि आपको अपने मन में विकृति के कोई लक्षण नज़र न आते हो, किन्तु यह संभव नहीं है कि आपको अपने आसपास या किसी भी प्रियजन में किसी भी प्रकार की मानसिक विकृति के चिह्न न दीखते हों। साधारणतया हम इन विकारों की उपेक्षा कर देते हैं, किन्तु उपेक्षा से ही उनका समाधान नहीं हो जाता, धीरे-धीरे वे ही विकास हमारे मन की ग्रन्थियाँ बन जाते हैं और यथासमय उपचार न करने पर यही विकार प्रचण्ड उन्माद का रूप धारण कर लेते हैं। हमारा कर्तव्य है कि रोग की प्रथम अवस्था में ही हम सावधान हो जाएँ और अपनी सतर्कता से उसका उपचार करें।
प्रथम अवस्था में ही अस्वास्थ्य पर सफलता से विजय पा सकते हैं। हममें से प्राय: सभी किसी न किसी रूप में मानसिक विकृति के शिकार होते हैं। अपनी परीक्षा हम स्वयं ही कर सकते हैं। अपनी अस्वस्थता का ज्ञान केवल हमें ही हो सकता है, अन्य कोई निकट से निकट व्यक्ति भी प्रामाणिक रूप से रोग की परीक्षा नहीं कर सकता। इसलिए हमें पूरी ईमानदारी से अपनी मानसिक विकृतियों का विश्लेषण करना होगा, और बिना संकोच अपने मनोविकारों की सभ्यता के लिए यत्नशील होना होगा। हम सभी इन विकृतियों से किसी न किसी रूप में ग्रस्त होते हैं। कभी प्रियजनों के वियोग पर हम अतिशय विरक्त हो जाते हैं, एकान्तसेवी हो जाते हैं, कभी अपने मनोरथों के भंग होने पर हमारा मन समस्त संसार के लिए विद्वेषी हो जाता है, कभी हम अनागत भयों से भी व्याकुल हो उठते हैं; कभी संशय संदेह से प्रेरित होकर यह कल्पना करने लगते हैं कि दुनिया का चक्र हमें कुचलने को ही घूम रहा है; कभी अपनी विफलताजन्य ग्लानि से परित्राण पाने के लिए झूठे अभिमान का आश्रय लेते हैं- ये सब हमारी मानसिक विकृति के बाह्य चिह्न हैं।

प्राथमिक अवस्था में इन विकारों का मन पर स्थायी प्रभाव नहीं होता, किन्तु प्रतिकूल अवस्थाओं से बारम्बार प्रताड़ित होने के बाद यही विकार विकट रूप धारण कर लेते हैं। धीरे-धीरे इनका उद्वेग बढ़ता जाता है। एक दिन भी आ जाती है कि मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व संकट में पड़ जाता है। अत: इसका उपचार प्राथमिक अवस्था में ही होना चाहिए। यह वही अवस्था है, जबकि रोगी अपने रोग के लक्षणों को पहचान सकता है और पूरे संकल्प से रोग का इलाज रोगी की संकल्प शक्ति पर ही अधिक निर्भर करता है। वह अपना चिकित्सक स्वयं ही होता है। मानस-रोगों का बाहरी चिकित्सक यह काम सफलतापूर्वक नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास इलाज के लिए रोगी तभी जाता है जबकि उसके मानसिक स्नायुओं का तनाव भग्नता के निकट पहुँच जाता है। उस समय चिकित्सक उन्माद के कारणों की पूरी पूछताछ नहीं कर सकता। रोग का निदान ढूँढ़ने में चिकित्सक तो बड़ी कठिनाई होती है। रोगी अपने में इतना खोया होता है कि उसे अपनी वर्तमान चेष्टाओं का ज्ञान नहीं होता। बीती बातों की याद तो हो भी नहीं सकती। रोग का प्रारम्भ कैसे हुआ, क्रमिक विकास किस रीति से हुआ, कौन-से आनुषंगिक कारण रोग की विकटता में हेतु बन गए इत्यादि प्रश्नों का उत्तर पाना चिकित्सक के लिए कठिन हो जाता है। रोगी की स्मरण-शक्ति नष्ट हो चुकी होती है, चेतन जगत् से नाता तोड़े अरसा बीत चुका है, अत: वह भी रोग का निदान ढूँढ़ने में चिकित्सक की सहायता नहीं कर सकता। अपने एक मित्र श्यामलाल का उदाहरण याद आता है।

तरुणावस्था में वह बहुत संकोची और एकान्त व्यक्ति था; अवस्था बढ़ने पर वह किसी तरह समीप के बन्धु-बन्धवों से विरक्त होता गया, संपूर्ण चेतन जगत की वास्तविकताओं से उसका साथ छूटता गया; सारी दुनिया उसके लिए अजनबी हो गई; सबके लिए उसने मन में भय-संशय की दीवार खड़ी होती गई; अपने विफल प्रयत्नों का दायित्व वह दुनिया के कल्पित षड्यन्त्रों पर डालता रहा; इस संपूर्ण प्रक्रिया को उसका चिकित्सक नहीं जान सकता था। श्यामलाल किसी को आत्मीय नहीं बनाता था, किसी का भरोसा नहीं करता था, किसी से अपने मन का भेग नहीं कहता था। इसके अतिरिक्त उसके व्यक्तित्व में जो परिवर्तन आ गए थे वे उसकी परिस्थितियों के नहीं, बल्कि उसके आन्तरिक जगत् के थे; उस दुनिया के थे जहाँ किसी की पहुँच नहीं थी; चिकित्सक का ज्ञान केवल उसी व्यक्ति तक सीमित था जो अपना विवेक खो चुका था; जो रोगी था वही अपना चिकित्सक हो सकता था। यदि मानसिक अस्वास्थ्य की प्रारंभिक अवस्था में ही यह ज्ञान हो जाए कि ये विकार उसके मानसिक रोग के आक्रमण के प्रथम संकेत हैं, इनका यथसमय उपचार न हुआ तो किसी भी समय वह संपूर्ण विवेक-शक्ति को खो बैठेगा, तब निस्संदेह वह सतर्क हो जाता है। यह सतर्कता उसे मानसिक रोग के अन्तिम संकट से ही नहीं बचाती, बल्कि भविष्य के लिए सावधान भी कर देती है।

सच तो यह है कि जब हम सावधान हो जाते हैं तब हमारे पैर स्वयमेव विनाश का मार्ग पर आगे बढ़ने से रुक जाते हैं। सतर्कता ही हमारी औषधि बन जाती है। प्रस्तुत पुस्तक का प्रथम प्रयोजन ही आपको सतर्क करना है। जब तक हमें अपने मनोव्यापारों, अपनी अनत:प्रवृत्तियों और मानसिक विकृतियों का अन्तर्बोध नहीं होगा तब तक हम यह भी नहीं जान सकेंगे कि कब हमारी मानसिक विकृतियाँ रोग के रूप में बदल गई, तब तक हमें अपने व्यक्तित्व का और व्यक्तित्व के पतन की संभावनाओं का भी ज्ञान नहीं होगा। यह ज्ञान अभी तक मानसशास्त्र के पण्डितों या मानस-चिकित्सकों तक ही सीमित है। जो साहित्य प्रकाश हुआ है वह भी गूढ़ परिभाषाओं के कारण इतना दुर्बोध हो गया है कि जनसाधारण के लिए उसका कुछ उपयोग नहीं रहा। इस ज्ञान को सुबोध और सरल बनाना ही पुस्तक का प्रयोजन है।



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