अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है - राजेन्द्र अग्रवाल Achchhe Logon Ke Sath Bura Kyoun Hota Hai - Hindi book by - Rajendra Agrawal
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अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है

राजेन्द्र अग्रवाल

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :184
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6297
आईएसबीएन :81-288-1727-2

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हम जीवन में अपने द्वारा किए जाने वाले कार्यों के लिए यह मानने लगते हैं कि ईश्वर हमारे साथ कभी भी कुछ बुरा नहीं होने देगा।

Achchhe Logon Ke Sath Bura Kyoun Hota Hai a hindi book by Rajendra Agrawal - अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है -राजेन्द्र अग्रवाल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

समर्पण

मेरी यह पुस्तक पूज्यनीय (स्वर्गीय) दादा श्री मुंशी राम व आदरणीय (स्वर्गीय) पिता श्री रामेश्वर दयाल अग्रवाल को समर्पित है जिन्होंने मुझे जीवन में सत्य बोलना, कठिन परिश्रम करना व अपनी क्षमता से अधिक दूसरे लोगों की मदद करने की प्रेरणा दी।

आभार


इस पुस्तक के लिखने के दौरान सलाह व प्रूफ रीडिंग में मेरी धर्म पत्नी रीता अग्रवाल, छोटे भाई की पत्नी रजनी अग्रवाल, सुपुत्री प्रीति गुप्ता व प्रिय वसुन्धरा लाल ने जो मेरी मदद की है उसके लिये ये सभी धन्यवाद के पात्र हैं।

मेरी ओर से....


जीवन बहुरंगी है। इसमें तरह-तरह के रंग है। इसमें विरोधी ध्रुवों का समन्वय-सामंजस्य और टकराव है। कुछ लोग जीवन को धूप-छांव भी कहते हैं। हम देखते हैं कि जीवन में हर्ष है तो उसके साथ ही विषाद भी उपस्थित रहता है। निराशा के घोर क्षणों में भी जीवन आशा की डोर से बंधा रहता है। सफलता की मंजिल पर कुलांचे भरते आदमी की राह में डोर से बंधा रहता है। सफलता की मंजिल पर कुलांचे भरते आदमी की राह में असफलता बाधा के रूप में अड़चन बनकर खड़ी हो जाती है विवेक के आधार पर अपने जीवन की गाड़ी खींचने वाला व्यक्ति भी कभी-कभी विवेकहीनता का शिकार हो जाता है। शीघ्र निर्णय जीवन की बेहतरी के लिए आवश्यक माने जाते जाते हैं, कभी-कभी निर्णय की शीघ्रता मनुष्य को ऐसी भूल करने पर मजबूर कर देती है जो भुलाए भी नहीं भूलती। दरअसल यही जिन्दगी का बहुरंगीपन है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है उसके भंडार में जो कुछ श्रेष्ठ उपलब्ध है, उन सबका उपयोग वह मनुष्य के निर्माण में करता है। वह मनुष्य के भीतर आस्था भी कूट-कूट कर भरता है तो अनास्था के बीज भी साथ ही बो देता है। मनुष्य ईश्वर की शक्ति पर बेहद विश्वास करता है।
अपने अधिकांश क्रिया-कलापों में वह ईश्वर को साक्षी मानता है। यहाँ यह बात कह देना अधिक महत्वपूर्ण है कि ईश्वर की सत्ता के प्रति किसी भी धर्म या संप्रदाय में संदेह नहीं है। ईश्वर को साक्षी मानने के बावजूद जब कभी कुछ अप्रिय घटित होता है या अनचाहा होता है, वांछित परिणाम नहीं मिलता तो मन में ईश्वर के प्रति अनास्था का बीज तेजी से पनपने लगता है। अपनी सफलता का दायित्व ईश्वर को देने वाला व्यक्ति, असफलता के कारणों को जानने- समझने के बजाय ईश्वर को ही उसका दोषी मानने लगता है। जिस मनुष्य को ईश्वर ने बनाया है उसने सफलता की डगर को बिलकुल सीधा-सपाट नहीं बनाया। वह इस हकीकत से भी परिचित है कि जो उसकी जीवंत रचना है उसकी मानसिक बनावट में अहंकार का तत्व भी मौजूद है। इसलिए जीवन में एक साथ कई विरोधी ध्रुव मौजूद रहते हैं।
हम जीवन में अपने द्वारा किए जाने वाले कार्यों के लिए यह मानने लगते हैं कि ईश्वर हमारे साथ कभी भी कुछ बुरा नहीं होने देगा। हम अपने अच्छे कार्यों को अपना कवच मानते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि ईश्वर ने हमें हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों के परिणामों की कोई गारंटी नहीं दी है।
इसलिए हमें निराशा, असफलता, दुर्घटना या बाधाओं के बीच भी ईश्वर की सत्ता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इन तमाम स्थितियों में भी हमें इनसे कुछ उबरने के लिए भी ईश्वर की सत्ता पर पूर्ण आस्था बनाए रखकर अपना कर्म करना चाहिए। संभवतया हमारा यह आचरण हमारे जीवन में नई उर्जा और स्फूर्ति भर देगा। हम और अधिक विश्वास के साथ अपनी मंजिल की ओर बढेंगे। इसलिए ईश्वर की सत्ता पर प्रश्न करना निरर्थक है। बुरा केवल बुरे लोगों के साथ नहीं होता, बुरा सबके साथ होता है। अंतर केवल मात्रा का है।

इसलिए हमें प्रयास करके अपने भीतर से इस धारणा को निकालना चाहिए कि अच्छे लोगों के साथ बुरा नहीं हो सकता। इस धारणा से मुक्त होकर ही हम अपने जीवन युद्ध को ठीक ढंग से लड़ पाएंगे।

नानक चन्द
सचिव, हिन्दी अकादमी

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मैंने यह पुस्तक क्यों लिखी ?


यह पुस्तक उस व्यक्ति द्वारा लिखी गई है जिसका ईश्वर में और संसार की अच्छाइयों में गहरा विश्वास। जो अपनी जिंदगी का अधिकतर भाग इस प्रयास में बिता चुका है कि उसके आस-पास जितने भी लोग हैं उनकी अपनी क्षमता अनुसार अधिक से अधिक मदद की जाये ताकि उनका तथा उनसे जुड़े अन्य लोगों का भी अच्छाई और ईश्वर पर विश्वास बना रहे।
बचपन से ही हमने पढ़ना शुरू कर दिया था ‘झूठ बोलना पाप है’,
‘सच बोलना धर्म’, ‘हमें किसी को सताना नहीं चाहिए’, ‘सदैव दूसरों की मदद करनी चाहिए’। ‘ईश्वर उनका भला करता है जो दूसरों की मदद करते हैं’। सभी फकीर और भिखारी कहते हैं, ‘तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा’। जो अच्छे कार्य न करके दूसरों को सताएगा ईश्वर उसको सजा देगा (कष्ट भोगेगा या नर्क में जाएगा)। इन सब बातों में आस्था के कारण ही व्यक्ति सदाचारी, ईमानदार बना रह कर करूणा के वशीभूत हो कर कार्य करता है। यदि अच्छे आचरण के बावजूद उसे कष्टों व कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो अच्छे विचारों के प्रति उसके मन में अविश्वास की भावना उत्पन्न हो जाती है। उसके मन में प्रतिकूल प्रतिक्रियायें शुरू हो जाती हैं क्या मैंने जो अब तक किया, ठीक किया ? क्या ईश्वर है ? यदि वह है तो उसने मुझे कष्ट क्यों दिया ? मैंने किसी को कष्ट नहीं दिया तो मेरे हिस्से में कष्ट क्यों आए ?

आम तौर पर कष्ट दो तरह के होते हैं। प्रथम सामूहिक कष्ट जैसे, विश्व युद्ध में मारे गये या सताये गए लोग; प्राकृतिक आपदाओं या हवाई जहाज दुर्घटना आदि में मारे गये लोग इत्यादि। इस प्रकार की घटनाओं के शिकार हुए लोगों के पीछे रह गए परिजन दोहरा कष्ट भोगते हैं। पहला, अपनों को खोने का गम तथा दूसरा, बची हुई जिंदगी को दिक्कतों और मुसीबतों में जीने का गम।
इन सामूहिक आपदाओं को हम सरलता से ‘प्राकृतिक आपदायें’ मान लेते हैं और चूंकि वह कष्ट सभी लोगों पर आया है जान कर शीघ्र ही इसको स्वीकार कर लेते हैं।
दूसरे प्रकार के कष्ट हैं व्यक्तिगत (या पारिवारिक) जैसे, परिवार में असमय किसी जवान या बच्चे की मृत्यु, दुर्घटना में गंभीर चोट, शरीर के किसी हिस्से का न रहना, लम्बी बीमारी, धन व यश का ह्नास आदि।
जब हम निजी या पारिवारिक कष्टों में घिरे होते हैं तो हमारे दिमाग में तरह-तरह के सवाल कुल-बुलाने लगते हैं जब मैंने किसी के साथ बुरा नहीं किया तब भी ईश्वर मुझे क्यों कष्ट दे रहे हैं ? मेरा पड़ोसी जो इतना व्यभिचारी और बेईमान है, उसे कोई कष्ट नहीं है। मुझे भगवान ने ऐसा कष्ट क्यों दिया ? क्या ईश्वर में मेरी आस्था होना सही था आदि ?
मैं एक ईमानदार, कर्त्तव्यपरायण और धर्मनिष्ठ व्यक्ति था।
ईमानदार और मेहनत से कार्य करते हुए मैंने जो सफलता अर्जित की थी उसमें मैं काफी संतुष्ट था। लेकिन जीवन की इस सुखद यात्रा में एक ऐसी, दुर्घटना घटी जिसने मेरा धन, यश, सुख-चैन सब छीन लिया। मेरी दुर्घटना को आप इस उदाहरण द्वारा आसानी से समझ सकते हैं कि एक व्यक्ति अपनी राह चला जा रहा था, रास्ते में उसे पानी में डूबते हुए एक व्यक्ति की ‘बचाओ-बचाओ’ की आवाज सुनाई दी। पहला व्यक्ति जिसने कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाया था, सबकी मदद करना ही जो अपना धर्म मानता था, अपनी अंदरूनी भावना के कारण डूबते व्यक्ति को बचाने के लिए कूद पड़ा। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि पहले व्यक्ति ने डूबते को तो बचा लिया लेकिन खुद बाहर आने से पहले ही वह पानी में डूब गया। संसार के लिए तो पहले व्यक्ति ने मानवता का बड़ा कार्य किया लेकिन अपने परिवार के प्रति उसने सबसे अधिक मूर्खता का कार्य किया क्योंकि उसके न रहने से परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा।
मैंने मुसीबतों में फँसे जिस व्यक्ति की धन, मन व शक्ति से मदद करके उसे संकट से बाहर निकाला उसने मेरा धन, यश व सुख चैन सब छीन लिया।
मैं एक सच्चरित्र, ईमानदार, दूसरों की मदद करने वाला इंसान था। हमेशा वही कार्य करने का प्रयास करता था जो ईश्वर की निगाह में सही था। अपने आस-पास के व्यक्तियों और परिवारों की अपेक्षा मैं ईश्वर और मानवता के प्रति अधिक समर्पित जीवन व्यतीत कर रहा था। मैं सदैव वही कार्य करता था
जिससे किसी अन्य को कोई कष्ट न हो, तो फिर मेरे परिवार पर मुसीबत क्यों आई ? यदि वास्तव में ईश्वर की सत्ता है और वह न्यायपूर्ण और क्षमाशील है तो उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ? यदि मैं खुद को यह भी समझा लेता कि शायद कभी ईश्वर की अपेक्षा या किसी बड़े घमण्ड के कारण जिसकी मुझे जानकारी नहीं मैं इस दण्ड के योग्य हूँ तो आखिर उसकी सजा मेरे परिवार व बच्चों को क्यों ? मेरे बच्चों को मेरी गलती की सज़ा क्यों ? जिन बच्चों ने अब तक खुशहाल जीवन बिताया जब वे बड़े हुए तो मेरे पास उन्हें पांव पर खड़ा करने योग्य भी सामर्थ्य नहीं रही, ऐसा क्यों ?
मैं और मेरा परिवार भी अधिकतर लोगों की तरह ईश्वर की एक ऐसी छवि मन में लिए बड़े हुए हैं कि वह सबसे बुद्धिमान है और सबसे शक्तिशाली सांसारिक माता-पिता की तरह ही वह हमारी देख-भाल करता है। हमारे दुखों और सुखों को समझता है और शायद माता-पिता से भी कहीं ज्यादा अच्छी तरह हमारा पालन-पोषण करता है।
यहि हम आज्ञाकारी और योग्य हैं तो हमें उसका ईनाम देगा। यदि हम धर्म और मानवता के रास्ते से भटके तो वह हमारी इच्छा न होते हुए भी कठोरता से हम पर नियंत्रण रखेगा। आवश्यक हुआ तो हमें दण्ड भी देगा। कोई हमें चोट पहुँचाता या फिर हम खुद परेशान होते हैं तो वह हमारी रक्षा करता है। हमेशा इस बात का ध्यान रखता है कि जिंदगी में हमें सब कुछ मिले जिसके हम पात्र हैं।
अधिकतर लोगों की तरह मैं भी ऐसी मानव त्रासदियों से परिचित था जो जीवन में अंधेरा भर देती हैं- कार दुर्घटनाओं में मरने वाले जवान लोग, भयंकर बीमारियों से संघर्ष करते लोग, अपंग व असहाय लोग, मानसिक रूप से बीमार बच्चों वाले पड़ोसी या रिश्तेदार, पुलिस या फौज में परिवार द्वारा खोये जवान पुरुष। यह सब बातें भी मुझे भगवान के न्याय के प्रति विचलित नहीं कर पायीं, न ही कभी मैंने उसकी सत्ता पर कोई सवाल खड़ा किया था। मैं यह मानता था कि वह संसार के बारे में मुझसे कहीं ज्यादा जानता है और उसके फैसलों पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता।

लेकिन एक व्यक्ति जब स्वयं इस प्रकार की कठिनाइयों, मुसीबतों और अभावों में घिरता है तो उसका भरोसा हिल जाता है। उसका इंसान और यहाँ तक कि ईश्वर से भी विश्वास डगमगाने लगता है। उसके जेहन में अनेक सवाल उठने लगते है मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? उस व्यक्ति को तो ईश्वर ने कोई कष्ट नहीं दिया जो सबके साथ अव्यावहारिक है और दूसरों को सताता है। मेरे जेहन में भी ऐसे सवाल आये।
ऐसी हालत में इंसान पर दो में से एक तरह का प्रभाव हो सकता है। एक किस्म उन लोगों की है जिन पर यदि कष्ट आते हैं तो वह बदले की भावना से स्वयं अत्याचारी हो जाते हैं। सौभाग्य से ऐसे लोगों की समाज में संख्या कम है। दूसरे किस्म के लोग वो हैं जो ऐसे समय में ज्यादा संवेदनशील और विनम्र हो जाते हैं सोचने लगते हैं कि मुझसे ऐसी क्या गलती हुई जो ईश्वर ने मुझे यह कष्ट दिया ?

मेरे साथ जब यह दुर्घटना घटी, उससे पूर्व भी ईश्वर और मानवता में मेरी पूरी आस्था थी लेकिन मैं रोजाना पूजा अर्चना नहीं किया करता था और न ही मन्दिर जाया करता था। इन कष्ट के दिनों में अधिकतर दोस्त व रिश्तेदार आपसे दूरी स्थापित कर लेते हैं लेकिन कुछ ऐसे दोस्त-रिश्तेदार या सद्पुरुष भी होते हैं
जो उन कष्टपूर्ण दिनों में भी आपकी मदद करते हैं और सही सलाह देते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों ने मुझे भी प्रतिदिन पूजा-पाठ की सलाह दी, सप्ताह में एक बार मन्दिर जाने को भी कहा। ईश्वर के प्रति निष्ठा में मेरी इस घटना से पूर्व भी कोई कमी नहीं थी, फिर भी अपने कष्टों से निवारण के लिये यह मानते हुए कि ऐसा करने में बुरा क्या है ? यदि फायदा नहीं हुआ तो मन्दिर जाने से नुकसान तो नहीं होगा, मैंने सप्ताह में एक बार मन्दिर जाना शुरू कर दिया।
ईश्वर ने मुझे पुन: धन, मान व सुख सब लौटा दिया। वो लोग फिर मेरे नजदीक आ गये जिन्होंने कष्ट के समय मुझसे दूरी बना ली थी। इन सुखद क्षणों की वापसी के समय मेरे मन में इस विचार ने जन्म लिया कि एक दिन मैं अपने इन अनुभवों पर एक पुस्तक लिखूँ और वो कुछ महत्वपूर्ण बातें जो मुझे पता चलीं, जिन्हें मैंने जाना उन्हें शब्दों में ढालूँ ताकि उन लोगों की मदद कर सकूं जो शायद (ईश्वर न करे) सुख को किसी दिन इस परिस्थिति में पायें।
मैं उन सब लोगों के लिये लिखूं जो अपने विश्वास और निष्ठा को बनाये तो रखना चाहते हैं लेकिन ईश्वर के प्रति उनका क्रोध उनके विश्वास बनाये रखने और मर्यादा में रहने के तालमेल में मुश्किलें पैदा करता है। उन लोगों के लिए लिखूं जो ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण के कारण अपने कष्टों के लिए खुद को ही दोषी मानते हैं और खुद को समझाते हैं कि वे इसी के योग्य हैं। यह पुस्तक ईश्वर और अध्यात्म का सार नहीं हैं। न ही मैं कोई दार्शनिक हूँ जो कोई दर्शन प्रस्तुत करना चाहता है। यह पुस्तक सामान्य ज्ञान रखने वाले उन लाखों-करोड़ों व्यक्तियों के लिए उनके कठिन क्षणों में धैर्य बनाए रखने व कठिनाइयों से बाहर निकलने के लिए सरल मार्ग दर्शन का एक प्रयास है।
मैं मूल रूप से एक धार्मिक व्यक्ति हूँ। मानव सेवा में विश्वास रखता हूँ। ईश्वर की उपस्थिति और उनकी शक्तियों में पूर्ण निष्ठा है। मैं एक ऐसी किताब लिखना चाहता हूँ जो जिंदगी में- मौत, चोट, बीमारी, धन हानि, उपेक्षा या निराशा जैसे विभिन्न कष्टों में ग्रसित उस इंसान को दी जा सके जो मानता है कि अगर संसार में न्याय है तो वह प्राप्त सुखों से ज्यादा प्राप्त करने योग्य था। ऐसी परिस्थिति में उस व्यक्ति के लिये ईश्वर का क्या मतलब हो सकता है ? खुद को हिम्मत और उम्मीद बंधाने के लिए वो कहाँ जा सकता है ?
यदि आप ऐसे इंसान हैं, जो ईश्वर की अच्छाइयों और न्याय पर विश्वास तो रखते हैं लेकिन आपकी और उन सभी लोगों की जिनकी आप परवाह करते हैं के साथ घटी घटनायें आपको ऐसा करने से रोकती हैं तब यदि यह किताब आपको ईश्वर की तरफ मोड़ने में मदद करती है और कष्ट के क्षणों में व्यक्ति को थोड़ी सांत्वना प्रदान करती है। तो मैं समझूंगा कि मेरा यह प्रयास सफल रहा।

2.


आखिर सच्चा इंसान ही क्यों दुख झेले ?



वास्तव में एक ही सवाल है जो बार-बार उठाया जाता है वो यह कि आखिर अच्छे इंसान के साथ बुरा क्यों होता है ? अध्यात्म से संबंधित सभी बातें मानसिक रूप से भटकाने वाली होती हैं। कुछ उसी तरह से जैसे रविवार के अखबार में आने वाली वर्ग पहेली को हल करके हमें सिर्फ मानसिक सन्तुष्टि मिलती है, कोई धन या मान की प्राप्ति नहीं होती। इस तरह ही आध्यात्ममिक वार्तालापों में कोई दूरगामी परिणाम नहीं होते।

वस्तुत: ईश्वर और धर्म के विषय में जब भी मेरी लोगों से अर्थपूर्ण बातचीत हुई है वह या तो उपरोक्त प्रश्न के साथ शुरू होती है या इस के चारों और घूमती है। डॉक्टर के रोग-निदान के उपाय से निराश होकर वापस लौटने वाले परेशान स्त्री-पुरुष ही नहीं, बल्कि कॉलेज का वो विद्यार्थी भी जिसे अपनी परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं हुई कहता है कि उसे यकीन हो गया है कि ईश्वर नहीं है। वह सवाल पूछता है, ‘आखिर आप कैसे कह सकते है कि ईश्वर सबके साथ न्याय करता है ?’ इस तरह के सभी इंसानों में एक बात समान है। ये भी संसार में दुखों के अन्यायपूर्ण विधान के सताये हुए लोग हैं।
अच्छे लोगों का दुर्भाग्य सिर्फ उन सताये हुए लोगों या उनके परिवारों के लिए ही समस्या नहीं है यह उन सभी लोगों के लिए भी समस्या है जो सही, न्यायपूर्ण और जीने योग्य संसार की परिकल्पना पर विश्वास करना चाहते हैं। वे अनिवार्य रूप से ईश्वर की अच्छाई, दयालुता, यहाँ तक कि उसके अस्तित्व पर भी सवाल खड़े कर देते हैं।


विनामूल्य पूर्वावलोकन

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