कृपया दायें चलिए - अमृतलाल नागर Kripya Dayen Chaliye - Hindi book by - Amritlal Nagar
लोगों की राय

हास्य-व्यंग्य >> कृपया दायें चलिए

कृपया दायें चलिए

अमृतलाल नागर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :107
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 6310
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

275 पाठक हैं

कृपया दायें चलिए पुस्तक का कागजी संस्करण...
यह पुस्तक वेब पर पढ़ने के लिए उपलब्ध है...

Vyakaran Pustak

कागजी संस्करण



कृपया दायें चलिए

 

यह लोकप्रिय लेखक अमृतलाल नागर के चुने हुए हास्य-व्यंग्य के निबंधों का संग्रह है। इसमें लेखक की नई रचनाओं के अतिरिक्त कुछ वे पुरानी रचनाएँ भी हैं जो अपने समय में बहुत चर्चित हुई थीं और जो अब प्राप्य नहीं हैं। सभी रचनाएं लेखक की अपनी विशिष्ट शैली में लिखी हैं और मनोरंजक होने के साथ ही उद्बोधक भी हैं। हास्य-व्यंग्य की रचनाएं लिखने में अमृतलाल नागर सिद्धहस्त हैं। ये पाठक को स्वस्थ्य मनोरंजन प्रदान करती हैं और समाज की सड़ी-गली कुरीतियों पर चोट करके उसे भी बदलने का अवसर देती हैं।

 

एक घोषणा-पत्र

 

इस बार भी अगस्त के महीने में जब हमारी किताबों की रायल्टी की राशि चढ़ती महंगाई के मुकाबिले में एकदम औसत ही आई, तो हम अपने पेशे की आय रूपी अकिंचनता से एकदम चिढ़ उठे, हमने यह तय किया कि अब लिखना छोड़कर कोई और धंधा करेंगे। मगर क्या करें, यह समझ में न आता था। कई बिगड़े रईसों के बारे में सुना था कि जिन आदतों से वे बिगड़े थे, उन्हीं में नये लक्ष्मीवाहनों के पट्टों को फंसाकर रईस बन गए थे। हमारी लत तो बुरी ही नहीं निकम्मी भी थी, यानी साहित्यकार बन गए थे। और यह साहित्यिकता आमतौर से रईस छौनों के मनबहलाव की वस्तु ही नहीं होती, इसलिए हमारे वास्ते यह साहित्यिक इल्लत उस रूप में भी बेकार थी। दूसरा विचार आया कि पान और भंग-ठण्डाई की दुकान खोल लें। जगत्-प्रसिद्ध साहित्यिक नहीं बन सके, तो न सही, ‘जगत्-प्रसिद्ध तांबूल विक्रेता’ का साइनबोर्ड टांगने का शानदार मौका मिल जाना भी अपने-आप में कम-महत्त्वपूर्ण उपलब्धि न होगी। ठंडाई के तो हमें ऐसे-ऐसे नुस्खे मालूम हैं कि शहर के सारे ठंडाईवाले हमारे आगे ठंडे हो जाएंगे। सीधे गर्वनर से ही दुकान का उद्धाटन कराया जाएगा; उन्होंने अपने शासनकाल में अब तक हर तरह के उद्घाटन कृपापूर्वक कर डाले हैं, बस पान-ठंडाई की दुकान ही अब तक नहीं खोली, खुशी से चले आएंगे। धूम मच जाएगी। बस यही होगा कि चार हमारा मज़ाक उड़ाएंगे कि नागरजी ने पान-ठंडाई की दुकान खोली है। अरे उड़ाया करें, ‘आहारे-व्यवहारे, लज्जा नकारे।’ जब इतने बड़े महाकवि जयशंकर प्रसाद अपने पैतृक-पेशेवश सुंघनीसाहु कहलाने से न सकुचाए, तो पान-ठंडाई-सम्राट कहलाने से भला हम ही क्यों शर्माएं !

भांग के गहरे नशे में इस स्कीम पर हम जितना ही अधिक गौर करते गए, उतनी ही हमारी आस्था भी बढ़ती गई। हमें यही लगा कि जैसी आस्था हमें इस व्यापार-योजना में मिल रही हैं, वैसी किसी साहित्यिक योजना से अब तक मिली न थी। अस्तित्ववाद, शाश्वतवाद, रस-सिद्धान्त, पूंजीवाद, लोकतंत्रवाद, भारतीय संस्कृतिवाद, आदि हर दृष्टि से हमारी यह दुकान-योजना परम ठोस थी। इसलिए मन पोढ़ा करने हमने अपने दोनों लड़कों को बुलाकर अपने मन की बात कही। छोटा बोला, ‘‘बाबूजी, मैं तो सपने में भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि आप दुकानदार बन सकते हैं !’’ हमने आस्थायुक्त स्वर में उत्तर दिया, ‘‘बेटे, यथार्थ सदा कल्पना से अधिक विचित्र रहा है। जहां इच्छा है, वहां गति भी है। जवाहरलाल नेहरू का एक वाक्य है कि सफलता प्राय: उन्हीं को मिलती है, जो साहस के साथ कुछ कर गुजरते हैं; कायरों के पास वह क्वचित् ही जाती है।’’ बड़े बेटे ने कहा, ‘‘आप जैसे जाने-माने लेखक के लिए यह शोभन नहीं लगता, बाबूजी। यदि अपनी नहीं, तो कम से कम हम लोगों की बदनामी का ही खयाल कीजिए।’’ हमने तुर्की-बतुर्की जवाब दिया, ‘‘तुम लोगों का यह आबरूदारी का हौवा निहायत पेटी बुर्जूआ किस्म का है। हम घर आती हुई छमाछम लक्ष्मी को देख रहे हैं। तुम लोग क्यों नहीं देखते कि दुकान की सफलता के लिए हमारी साहित्यिक गुड़विल, पान और भांग-रसिया होने के संबंध में हमारी अनोखी किंवदंतियों-भरी ख्याति कितनी लाभकारी सिद्ध होगी। चार-पांच हजार रूपये महीने से कम आमदानी न होगी। तुम लोग चाहे कुछ भी कहो, हम दुकान जरूर खोलेंगे। हज़ार-दो हजार की लागत में लाखों का नफ़ा। हम यह अवश्य करेंगे।’’ लड़के बेचारे हमारे आगे भला क्या बोलते। उठकर चले गए और जाकर अपनी मां के आगे शंख फूंका।
तोप के गोले की तरह लाल-लाल दनदनाती हुई वह हमारे कमरे में आई और बोलीं, ‘‘ये दुकान खोलने की बात आखिर तुम्हें क्यों सूझी ?’’
‘‘पैसा कमाने के लिए।’’
‘‘पैसा तो खाने-भर को भगवान दे ही रहा है।’’ ‘‘हमें ऐश करने के लिए पैसा चाहिए।’’
‘‘इस उमर में ! अब भला क्या ऐश करोगे ! जो करना था, कर चुके।’’
‘‘ऐश का अर्थ सिर्फ औरत और शराब ही नहीं होता, देवी जी। हम कार, बंगला, रेफ्रिजिरेटर, कूलर और डनलोपिलो के गद्दे चाहते हैं। प्राइवेट सेक्रेटरी हो, स्टेनोग्राफर हो, हांजी-हांजी करने वाले दस नौकर हाथ बांधे हरदम खड़े रहें, तब साहित्यिक की वकत होती है आजकल। साले पेटभरू, चप्पल चटकाऊ साहित्यिक का भला मूल्य ही क्या रह गया है, भले ही वह तीस नहीं, एक सौ तीस मारखां ही क्यों न हो ! हम पूछते हैं, क्या तुम्हें चाह नहीं होती इस वैभव की ?
’’पत्नी शांत हो गई, गंभीर स्वर में बोलीं, ‘‘जब मुझे चाह थी, तब तो यह कहते थे कि साहित्य का वैभव साहित्यिक होता है.....’’
‘‘वो हमारी भूल थी। सोशलिस्ट विचारों ने हमारा दिमाग खराब कर दिया था।’’
‘‘पर मैं तो समझती हूं कि तुम्हारी वह दिमाग-खराबी ही बहुत अच्छी थी।’’
‘‘तुम कुछ भी समझती रहो, पर हम तो अब पैसे वाले बनकर ही रहेंगे।’’
‘‘बनो, जो चाहो सो बनो, पर कान खोलकर सुन लो, मैं इस काम के लिए एक कानी कौड़ी भी न दूंगी इस रायल्टी की रकम में से।’’ पत्नी अब तेज हो चली थीं।
हमने भी अकड़कर कहा, ‘‘न दो, हम एक नया उपन्यास लिखकर एडवांस रायल्टी ले लेंगे।’’
‘‘जो चाहो सो करो। जब अपनी बनी तकदीर बिगाड़ने पर तुल ही गए हो, तो कोई क्या कर सकता है ! हि:, रूपये की दो अठन्नियां भुनाना तो आता नहीं, बिज़नेस करेंगे ये !’’ पत्नी तैश में आकर बड़बड़ाती हुई बाहर चली गई और बरामदे में खड़ी होकर गरजने लगीं, ‘‘ये बिज़नेस करेंगे ! अरे, चार बरस पहले नरेन्द्र जी का लड़का परितोष आया था। कितना छोटा था तब वह, फिर भी खेल ही खेल में इन्होंने जब उससे कहा कि हम-तुम साझे में पान की दुकान खोल लें, तो वह बोला कि नहीं चाचाजी, आपके साथ साझा करने में घाटा हो जाएगा। सारे पान और भांग तो ये और इनके यार-दोस्त ही गटक जाएंगे। न ये अपनी आदतें छोड़ सकते हैं और न मुहब्बत। बिज़नेस करेंगे मेरा कपाल !’’ कविवर नरेन्द्र जी के बेटे वाली बात ध्यान में आ जाने से गुस्से का चढ़ाव न चाहते हुए भी थमने लगा। यह झूठ नहीं कि ठंडाई और पान के शौक में ऐसे बहुत-से परिचित मित्र हमारी दुकान पर रोज़ आ जाएंगे, जिनसे पैसा वसूल करना हमारे लिए टेढ़ी खीर हो जाएगा। सोचा कि घरैतिन ठीक ही कहती है, इस धंधे में घाटा होने की संभावना ही अधिक है। फिर धीरे-धीरे मन यहां तक मान गया कि हम न तो धंधा करने के योग्य हैं और न कोई नौकरी ही, चाहे वह बढ़िया वाली ही क्यों न हो। अपनी अयोग्यता और अभागेपन पर झुंझलाहट होने लगी।

दूसरे दिन इतवार था। इतवार औरों के लिए छुट्टी और हमारे लिए सिर दर्द का दिन होता है। अभी घड़ी में पूरे-पूरे सात भी न बजे थे कि बेटी ने आकर मोहल्ले के कई व्यक्तियों के पधारने की सूचना दी। हमने सोचा कि शायद मध्यवधि चुनाव के सिलसिले में किसी उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव लेकर आए होंगे। इस विचार ने मन को स्फूर्ति दी। सोचा, इस बार हम क्यों न खड़े हो जाएं। पान की दुकान न सही, नेतागिरी सही, इन दोनों ही पेशों की आमदानी सदा इनकमटैक्स विभाग वालों की पकड़ से बाहर ही रहती है। इस विचार से एक बार फिर आस्था रूपी जीवनमूल्य की उपलब्धि हुई। तब तक हाथ में अपना हुक्का उठाए हुए बड़े बाबू, लल्लों बाबू, पत्तो बाबू, सत्तो बाबू, सुनत्तो बाबू वगैरह-वगैरह ढब-बेढब नामों के चार-पांच शिष्ट जन पधारे। बड़े बाबू आते ही बोले, ‘‘पंडित जी, गली वाली नाली देखी आज आपने ? गंगा-गोमतियां फ्लडियाया करती थीं, अब साली नाली में फ्लड आता है। ये ज़माना है, ये गवरमेंट है साली!’’‘‘आज पूरी गोबरमिंट है साहब, राज की गोबरनर का है। हम तो कहते हैं कि इस बार मध्यावधि चुनाव में इसे पूरी तरह बदल डालिए’’ अपनी भावी वोटर भगवान को जोश दिलाने की कामना से हमने ज़रा नेता मार्का नाटकीय अंदाज साधा।

‘‘कहते तो आप ठीक ही हैं पंडित जी, मगर मध्यवधि चुनाव के अभी चार-पांच महीने पड़े हैं, आप तत्काल की बात सोचिए। कार्पोरेशन में किसी बड़े अफसर को फोन-वोन करके ये गंदगी ठीक करवाइए जल्दी से, अंदर से मैनहोल उभर रहा है। बड़ी बदबू फैल रही हैं बाहर।’’खैर, किस्सा कोताह यह कि मेयर, डिप्टी मेयर, हेल्थ अफसर आदि और उस सफलता के तुफैल में हमने भावी चुनाव में खड़े होने का इशारा भी फेंक दिया। चार दिन में धूम मच गई कि हम खड़े हो रहे हैं। पत्नी फिर सामने आई, ‘‘इलेक्शन लड़ोगे?’’‘‘हां, अब मिनिस्टर बनने का इरादा है।’’‘‘पैसा कौन देगा ?’’
हमने कहा, ‘‘बुद्धिजीवी जब अपना ईमान बेचता है, तो पैसों की कमी नहीं रहती।’’
तभी लड़के आए, उन्होंने पूछा, ‘‘आप किस पार्टी से इलेक्शन लड़ेंगे ?’’
हम बोले, ‘‘इस समय तो हमारी गुडविल ऐसी जबरदस्त है कि सभी पार्टियां हमें टिकट देना चाहती हैं।’’
बड़ा बोला, ‘‘मगर इस समय तो इन सब पार्टियों की साख गिरी हुई है। इनमें से एक भी पूरी तरह सफलता नहीं पाएगी।’’
‘‘हमने कहा, ‘‘सही कहते हो। हम बुद्धिमत्ता से काम लेकर अपनी पार्टी बनाएंगे।’’
‘‘आपका मेनिफेस्टो क्या होगा ?’’

हम गौर करने लगे। अपना स्वार्थ साधने के लिए ऐसा मेनिफेस्टो बनाना चाहिए, जो औरों से अलग लगे और साथ ही पैसा मिलने के साधन भी जुट जाएं।
हमने कहा, ‘‘देखो, इनमें से कोई भी पार्टी इस बार बहुमत नहीं पाएगी। क्योंकि जनता सबमें अपना विश्वास खो बैठी है। और यहां के सेठ हमें पैसा ही नहीं देंगे, क्योंकि इनमें से कुछ कांग्रेस के साथ हैं और कुछ जनसंघ के। इसलिए हमारा पहला नारा यह होगा कि भारत के जिन-जिन प्रदेशों में इस समय मध्यावधि चुनाव हो रहा है, उनमें स्थायी शांति और सुशासन लाने के लिए दस बरसों तक पाकिस्तान, अमरीका और ब्रिटेन का सम्मिलित राज होना चाहिए। इससे हिन्दू-मुस्लिम एकता और स्थायी शांति बढ़ेगी तथा इन तीनों की तरफ से मुख्यमंत्रित्व का भार हम संभालेंगे। इस त्रिदेशीय फार्मूले से हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के सारे मसले हल हो जाएंगे। इस तरह देश की पूर्वी और पश्चिम सीमाओं पर नि:शस्त्रीकरण की नीति को अमल में लाने के लिए एक रास्ता खुल जाएगा।’’
‘‘ठीक। और क्या होगा आपके मेनिफेस्टो में?’’
विचारों की रोशनी से हमारी आंखें सहसा चौंधिया उठीं। हमने फौरन अपना धूप का चश्मा चढ़ा लिया और गंभीर पैगंबरी स्वर में कहा, ‘‘हम अपरिवर्तनवाद का सिद्धान्त चलाएंगे- हिन्दू हिन्दू रहे और मुसलमान मुसलमान। इन्हें एक भारतीय समाज हरगिज़ न बनने देना चाहिए, हम एक और अखंड भारत के खिलाफ हैं।’’
‘‘और भाषा ?’’
‘‘भाषा का भूमि और संस्कृति से कोई संबंध नहीं। पाकिस्तान, अमरीका और ब्रिटेन में से जो हमारे इलेक्शन का खर्च उठाने को राजी हो जाएगा, उसकी भाषा का समर्थन करेंगे। वैसे अपनी जनता की सुविधा के लिए हम अंग्रेजी को भारत की राष्ट्रभाषा...........’’
‘‘क्या कहा ? अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाओगे ! अपने स्वार्थ के लिए हर झूठ को सच बनाओगे ?’’
पत्नी के तेहे पर हमने अपनी बौद्धिक मार्का हंसी का गुल खिलाया और कहा, ‘‘अरी पगली, नेता और वकीलों की सफलता ही इस बात पर निर्भर करती है।’’
‘‘झाड़ू पड़े तुम्हारी नेतागिरि पर। मैं आज से ही तुम्हारा खुला विरोध करूँगी।’’
‘‘अरे, पूरी बात तो सुन लो ! देश में इस वक्त अन्न की कमी है......’’ हम बोले, तो पत्नी ने बात बीच में काट दी, तुम्हें कौन खाने पीने की तकलीफ है...जो......’’
हमसे आगे सुना नहीं गया। हमने अपना तेहा दिखाया, ‘‘ज्यादा बकबक मत करो.........ज्यादा बात करने से भूख भी ज्यादा लगती है......जब तक भारत में औरतों के मुंह पर पट्टी नहीं बांध दी जाएगी, तब तक अन्न-समस्या हल होने वाली नहीं है।
अन्न मंगवाने के लिए हमने तय किया है कि एक टन गेहूं के बदले में हम एक नेता उस देश को सप्लाई करेंगे, जो हमें अन्न देगें।’’

पत्नी मुंह बाये सुन रही थीं। मौका देखकर हमने और खुलासा किया, ‘‘हमारी पार्टी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में मंजूर करती है, बगैर तकल्लुफ के कहीं राज चलते हैं ? घूसखोरी का तकल्लुफ हमारे राज में बराबर जाएगा ! रोजी-रोटी मांगने वालों की खाल खिंचवाकर बाटा वालों को सप्लाई की जाएगी, ताकि रूस से आने वाली जूतों की मांग पूरी की जा सके।

‘‘गीता का यह श्लोक हमारा सिद्धान्त वाक्य होगा और नारा भी.....’’
‘‘स्वधर्मे निधनं श्रेय: परमधर्मो भयावह:’’
‘‘दकियानूसियों ने इस श्लोक की रेढ़ मारके रख दी है। हम इसका सीधा, सरल और सही अर्थ अपनी धर्मप्राण जनता को समझाएंगे।’’
‘‘क्या?’’ पत्नी ने बिफर के पूछा।
‘‘अरे भई, सीधी-सी बात है। हर आदमी का अपना-अपना धर्म है। चोर का धर्म चोरी करना, डकैत का डाका डालना, बेईमान का बेईमानी करना, इसी तरह गरीब का धर्म है गरीबी और अमीर का अमीरी। गरीब को अमीर का धर्म अपनाने की छूट नहीं दी जाएंगी और न अमीर को गरीब का धर्म अपनाने की। हम इस धर्म-परिवर्तन के सख्त खिलाफ हैं।

इस धर्मवादिता से जनसंघ के समर्थक भी हमारी पार्टी में आ सकते हैं.....’’
पत्नी हमारे विरुद्ध प्रचार करने लगी हैं। हमारा चुनाव का सपना डांवाडोल हो रहा है और जनता के क्रोध से बचने के लिए हम इस समय बंबई भाग आए हैं। क्रोध के बराबर यहीं बात मन में फूटती है कि सत्यानाश हो इस जनता का, जो हमें नेता नहीं मानती।

~

मैं ही हूँ



मैं- वाह रे मैं, वाह। मैं तो बस मैं ही हूं- मेरे मुकाबले में भला तू क्या है ! इस मैं और तू को लेकर हमारे सन्तों और बुधजनों ने शब्दों की खासी खाल-खिंचाई भी की है। कबीर साहब का एक दोहा है कि

 

‘‘जब मैं था तब तू नहीं, जब तू हैं मैं नायं।
प्रेम गली अति साकरी तामैं दो न समायं।’’

 

ऐसे ही किसी कवि का एक और दोहा भी मुझे याद आ रहा है। वो कहते हैं कि-

 

मैना जो ‘मैं-ना’ कहे दूध-भात नित खाय।
बकरी जो ‘मैं-मैं’ कहे उल्टी खाल खिंचाय।।

 

इस तरह के बहुत-से दोहे और उपदेश वाक्य हरदम मैं-मैं करने वालों के खिलाफ आपको खोजे से मिल जाएंगे, मगर फिर भी मैं तो मैं ही है। हम चुनी दीगरे नेस्त। हम चौड़े बाजार सकड़ा। मैं की शान में भी कुछ कम कसीदे नहीं कहे गए।

अच्छा, अगर एक मिनट के लिए अपने आध्यात्मिक दृष्टिबिन्दु को बलायेताक रखकर हम मैं वालों की दुनियावी शान-शौकत को देखे तो यह मानना ही पड़ेगा कि मैं मैं ही है। आपको एक आंखों देखा हाल सुनाता हूं।

कई बरस पहले पच्छुं के एक छोटे-से नगर में मुझे एक फिल्म लेखन और निर्देशन के निमित्त कुछ महीनों तक रहना पड़ा था। वहां एक बंगले के आधे हिस्से को किराये पर लेकर रहता था। आधे में मकान-मालिक स्वयं सपरिवार रहते थे। बेचारे बड़े ही शरीफ थे। दो पीढ़ियों पहले उनके बाप-दादे खासी शान-शौकत वाले थे, मगर हमारे मालिक-मकान के बचपन में वह पुरानी शान-शौकत धूल में मिल चुकी थी। बेचारे एक मिल में मजदूरी करके सड़क के लैम्प-पोस्ट के नीचे पढ़े और बाद में अंग्रेज़ सरकार की नौकरी पाकर धीरे-धीरे फिर अपने पैरों पर खड़े हुए। एक बंगला बनवा लिया और बुढ़ापे में रिटायर होकर बाइज़्ज़त रहने लगे। उनके दो लड़के थे। बड़ा साधारण हैसियत का ईमानदार था मगर अपने-आप में खुशहाल था। छोटा लड़का सरकार में डिप्टी कलक्टर साहब का पेशकार पी.ए. या ऐसे कुछ हो गया था। अजी साहब, बड़ी शान हो गई थी उसकी, जमीन पर उसका पैर रखना मुहाल था, मिजाज आसमान में रहते थे। खैर, मकान-मालिक के बड़े बेटे की लड़की का विवाह होने वाला था, अपनी पोती का शुभ कारज करने का उनके मन में काफी हौसला भी था, अपने बहुत-से नाते-रिश्तेदारों को आमंत्रित किया। छोटे साहबज़ादे भी स्वाभाविक रूप से साग्रह बुलाए गए थे।

हमारे बूढ़े मकान-मालिक बेचारे जब-तक शाम को मेरे पास आकर दो घड़ी बैठ जाते और मनुष्य स्वभाव के अनुसार ही अपना जी खोल जाया करते थे। एक दिन आए, कहने लगे, ‘‘नागर साहब, आपको दो-चार दिन के लिए कष्ट देना चाहता हूं। मेरा छोटा लड़का सपरिवार आ रहा है। वो ज़रा इंगलिश स्टाइल में स्वतंत्र रहने का आदि हो गया है, आप वाले हिस्से में उसे टिकाने की आज्ञा चाहता हूं।’’ मैंने कहा, ‘‘हां, हां, खुशी से टिकाइए। मुझे कोई कष्ट न होगा।’’ खैर, एक दिन शाम को जब स्टूड़ियो से घर आया तो देखा कि एक साहब अपने नाइट गाउन और पजामे में बड़ी शान से बैठे हुए एक स्त्री पर अंग्रेजी में गरमा रहे थे, ‘‘उन लोगों ने मुझे समझ क्या रक्खा है। अगर मेरी उचित व्यवस्था नहीं कर सकते थे तो मुझे बुलाने की क्या जरूरत थी ! आखिर बप्पा साहब को यह सोचना चाहिए था कि वो एक वी.आई.पी. को अपने यहां बुला रहे हैं। मैंने अपने खाने-पीने-नाश्ते आदि का समय और मीनू इसलिए पहले से भेज दिया था कि सब प्रबन्ध ठीक-ठीक रहे।.........’’

अपने सोनेवाले कमरे में जाने के लिए ड्राइंग रूप में घुसा। उन दोनों ने मुझे देखा, साहब ने कुछ त्योरियां चढ़ाकर देखा; मगर मैं उन्हें उचटती दृष्टि से देखता हुआ कमरे का ताला खोलकर अन्दर चला गया। साहब की आवाज कानों में आती रही। वे कह कह रहे थे, ‘‘ये चाय आई या गुड़ का गरम पानी था ? और मैंने लिख दिया था कि शाम के नाश्ते में आमलेट और पकौड़े ही खाता हूं, घर पर इंतजान न हो सके तो किसी अच्छे होटल-रेस्तरां से प्रबन्ध कर लिया जाए।’’

‘‘अच्छा, अच्छा, अब शान्त हो जाओ। चार दिन के लिए किसी के घर आए हो-’’
नारी-स्वर कटा साहब-स्वर भड़का। वे गरजकर बोले, ‘‘चार दिनों से क्या मतलब है जी। मैं तुमकों यहां क्यों लाया ? तुम तो चार दिनों के लिए मेरे जीवन में नहीं आईं। तुम्हें तो मालूम हैं कि मैं क्या चाहता हूं और क्या नहीं चाहता।’’
‘‘अरे, तो पराये घर में मैं कर ही क्या सकती हूं?’’

पराया नहीं, ये मेरा घर है। मैं आधे हिस्से का हकदार हूं.......’’ वगैरह-वगैरह। लगभग दस-बारह मिनटों तक साहबोवाच चलता रहा। इतने में ही मेरा नौकर ट्रे में चाय लेकर मेरे कमरे में आने के लिए ड्राइंग रूम में दाखिल हुआ। साहब की आवाज़ आई, ‘‘एऽ ! चाय इधर लाओ।’’
मेरे नौकर ने कहा, ‘‘जी, ये साहब के लिए है।’’
‘‘साहब?’’ मेरे सिवा कौन साहब है यहां ?’’
‘‘अपने साहब के वास्ते लाया हूं।’’ कहता हुआ वो कमरे में दाखिल हुआ। पीछे साहब का बड़बड़ाना सुनाई पड़ता रहा। हम समझ गए कि हमारे मकान-मालिक के ये पी.ए. पुत्तर ‘हम चुनी दीगरे नेस्त’ वाली गोत के हैं। चार दिनों में उन्होंने चार सौ बीस नाटक दिखला दिए। घर में चाहे कोई काम हो या न हो, घरातियों, बारातियों, समघी-दामाद की खातिर में उन्नीस-बीस की कसर बाकी रहे तो भले ही रह जाए मगर पी.ए. साहब की सेवा में कोई कसर न रहे। दिन-भर अपनी पत्नी, नौकर, बड़े भाई की पत्नी, बड़े भाई, उनके बच्चों यहां तक कि अपने बाप तक पर गरमाते ही रहते थे। बस, एक मेरा नौकर ही ऐसा था जो उनकी हुक्म-उदूली करके उसकी साहबी को भड़का देता था एक दिन मेरे स्टूड़ियो जाने के बाद उन्होंने मेरे नौकर से मेरी आराम कुर्सी बाहर निकाल देने को कहा। उसने कह दिया, कुर्सी पर मेरे साहब शाम को आराम करते हैं। बस, पी.ए. साहब बारुद हो गए। उसी दिन घर में बारात आई थी। सबको बारातियों के स्वागत-सत्कार की चिन्ता थी और पी.ए. साहब को आराम कुर्सी न मिलना ही परेशान कर रहा था। अपने बाप तक पर गर्मा उठे, अपनी पत्नी को बिस्तर बांधने और तुरन्त लौट चलने का आदेश दे दिया। उनका भतीजा किराये की आराम कुर्सी लाने के लिए फर्नीचर की दुकानों पर भटका, पर न मिल सकी। हारकर वह लड़का मेरे स्टूड़ियो पहुंचा और रोने लगा: ‘‘काका ने आराम कुर्सी के लिए आफत जोत रक्खी है।’’ मैंने नौकर के लिए एक हुक्मनामा लिखकर दिया तब कहीं जाकर मामला थमा।

मेरे कहने का मतलब है कि ऐसे भी बहुत-से ‘मैं’ वादी घमंड़ी होते हैं जो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं, अपने घर वालों तक को अपना तुच्छ गुलाम समझते हैं।
अब एक दूसरी कहावत और उसका एक दृष्टान्त भी सुनिए। कहावत है:‘‘मैं और मेरा मन्सुगआ, तीजे का मुँह झुलसुआ।’’ यही कहावत थोड़े रूपान्तर के साथ भी मैंने सुनी है जो इस प्रकार है :‘‘मैं और मेरा भतार बाकी सब दाढ़ीदार।’’ इस कहावत की मिसालें तो खूब मिलती हैं, जहां चार औरतें मिलीं नहीं कि ‘हम और हमारे साहब’ की भागवत बंकने लगती है। ‘‘हम ऐसे और हमारे साहब ऐसे ! हमारे साहब को ये पसन्द है और हमारे साहब को ये नापसन्द है।’’ चार औरते बैठी हों तो चारों अपनी ही सुनाएंगी। कोई किसी से कम नहीं, ‘‘मैं भी रानी तू भी रानी, कौन  भरे कूयें से पानी’’ वाली कहावत अक्षरश: चरितार्थ होने लगती है। सबको अपनी ही शान-गुमान की चिन्ता रहती है- हमारे बच्चे बच्चे, औरों के लुच्चे। अपना पूत पराया धतिंगड़। मज़ा तब आता है जब फलानी ढिमाकी के बच्चों को बुरा बतलाती है और ढिमाकी फलानी के बच्चों को। इस दूसरी कोटि के ‘मैं’ वादियों में पहली कोटि के गुमानियों से बस इतना ही अंतर होता है कि वह केवल अपने ही को उच्च मानता है और यह लोग अपनी उच्चता में अपने साथ-साथ अपने पतियों या पत्नियों और बाल-बच्चों को भी शामिल कर लेते हैं।

घमंडियों की एक तीसरी कोटि और भी होती है- ये लोग अपनी या अपनों की बुराइयों को भी बड़ी बड़ाई के रूप में पेश करते हैं। हिन्दी में एक कहावत है जो शर्तिया किसी सपूत की मां से अपने लाड़ले के सत्संगियों की प्रशंसा सुनकर किसी कपूत मां के बखानों पर बनी होगी। कहावत है, ‘मेरे लाल के सौ-सौ यार चोर जुआरी और कलार।’ अब बोलिए, दाद दीजिए इस ‘मैं’ की शान की, जो अपने बेटे के बुरेपन तो भी शान से बखानती है।

इन ‘‘मैं’’ वादी घमंड़ियों की एक कोटि वह भी होती है जो अपनी दीन स्थिति को नजर अंदाज करके अपने पुरखों का वैभव बखानकर अपनी शान जतलाते हैं। ऐसों पर भी एक कहावत हिन्दी में बहुत उम्दा है। कहते हैं ‘‘मेरे बाप ने घी खाया था सूंघो मेरा हाथ।’’ अब बोलिए, इस शान पर भला आप क्या कहिएगा। ऐसे मैं-मैं करने वाले लोग अपने मुंह मियां मिट्ठू भले ही बन लें पर दूसरे उनकी इज्जत दिल से कभी नहीं कर पाते। यह काहवत बिल्कुल सच है कि खुदी और खुदाई में बैर है। जहां इतना संकीर्ण आत्मप्रेम होता है वहां परमात्म भाव कभी उपज ही नहीं सकता। घमण्डी का सिर कभी न कभी नीचा होकर ही रहता है। इसलिए यह मैं-मैं पन हमें तो नहीं सुहाता, हम तो उस साधुवाणी के कायल हैं जो कहती हैं :

 

हम वासी वहि देश के जाति वरण कुल नाहिं,
शब्द मिलावा होत है, अंग मिलावा नाहिं।।

 

इस भाव में तो मुक्त मन से सानन्द कह सकता हूं कि मैं ही हूं। मैं सर्वव्यापी हूं। इसलिए सब तज, मैं भज। गीता में भी यही लिखा है।

~

कवि का साथ

 

आपने भी बड़े-बूढ़ों को अक्सर यह कहते शायद सुना होगा कि हमारे पुरखे कुछ यूं ही मूरख नहीं थे जो बिना सोचे-विचारे कोई बात कह गए हो या किसी तरह का चलन चला गए हों। हम तो खैर अभी बड़े-बूढ़े नहीं हुए, मगर अनुभवों की आंचों से तपते-तपते किसी हद तक इस सत्य का समर्थन अवश्य करने लगे हैं। हमारे पुरखे सदा अनुभव का मार्ग अपनाते थे। संगी-साथियों का भला-बुरा, तीखा-कड़वा अनुभव उठा लेने के बाद ही उन्होंने यह सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक तत्व पाया कि- ‘ना कोई तेरा संग-संगाथी, हंस अकेला जाई बाबा।’

बड़े गहरे तजुर्बे की बात है। और मैं तो सेर पर पंसेरी की चोट लगाकर यहां तक कहना चाहूंगा कि ‘बैर और फूट’ का महामंत्र भी इसी महानुभाव की देन है। न रहे बांस और न बजे बांसुरी। लोगों में यदि आपस में बैर-फूट फैल जाए तो फिर ‘साथी-संगी’ शब्द ही डिक्शनरी से निकल जाएंगे- जब साथी न रहेंगे तो साथ निभाने की जरूरत भी न रहेगी, चलिए जैजैराम-सीताराम, कोई टंटा ही न रहेगा। इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता के आलस्य सभ्य स्वर्मिण युग की कल्पना शायद कभी साकार हो जाए। ‘बैर और फूट’ के मंत्रसिद्ध देश में जन्म लेकर, इतने बड़े उपदेश के बावजूद हम-आप सभी संगी-साथियों के फेरे में पड़े रहते हैं। इसे कलिकाल का प्रभाव न कहें तो और क्या कहें।

हद हो गई कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के भयंकर समर्थक प्रति वर्षोत्तरी पीढ़ियों के नौनिहाल नौजवान भी दिन-रात किसी न किसी का साथ निभाने के पीछे अपने-आपको तबाह किए रहते हैं। लड़कियों को सखा और सखाओं को सखियां भी चाहिए। मां-बाप प्रबंध करें या वे स्वयं-स्त्री-पुरुष दोनों को ही जीवन-साथी की चाहना भी अब तक हर वर्ष होती है।

अगर यही तक बात थम जाती तो भी गनीमत थी, मगर एक जीवनसाथी के अलावा हर एक को काम के साथियों की आवश्यकता भी पड़ती है और मनबहलाव के साथियों की भी। काम और मनबहलाव दोनों ही अच्छे-बुरे होते हैं और साथ भी दोनों ही प्रकार के होते हैं। यहां तक तो दुभांत चलती है, मगर इसके बाद जहां तक साथ निभाने का प्रश्न है, वह चाहे अच्छा हो या बुरा, हर हालत में बड़ा कठिन होता है।
एक दिन मेरे परिचित सज्जन मुझसे अपना दुखड़ा रोने लगे। बेचारे बड़े भले आदमी हैं। पढ़े-लिखे औसत समझदार, भावुक और काव्य-कलाप्रेमी युवक हैं। इनके दुर्भाग्य ने इनके साथ यह व्यंग्य किया कि इनके बचपन के एक सहपाठी मित्र को अंतराष्ट्रीय ख्याति का कवि बना दिया।

 एक समय में स्कूल ख्यात कवि थे; वह कुछ भी नहीं था।.......इसी संदर्भ में इन सज्जन को कवियों के संग-साथ का चस्ता लगा। उस दिन उन्हें उदास देखकर जब मैंने बहुत कुरेदा तो बोले : ‘‘आपसे क्या कहें, साथ निबाहनें के फेर में हम तबाह हो गए। और हमारा तो ठहरा कवियों का साथ, गोया करेले पर नीम चढ़ गया है। कच्चे धागों में मन को बांधकर जीने वाले इन कवियों-कलाकारों का साथ दुनिया-दिखावे के लिए तो अवश्य बड़े गौरव की बात है। बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय ख्याति के कवियों के साथ घूमते हुए देखकर लोगबाग हमें भी पांच सवारें में मानते हैं। मगर इसके बाद का हाल ?- अजी कहां तक कहें, मजहबी यह है कि हमारे पास शेषनाग की तरह हजा़र बातें नहीं हैं।’’

हमारे एक कवि साथी एक बार एक बड़ा दरबारी किस्म के कवि सम्मेलन में जाते समय हमारी नई घड़ी मांग ले गए। हम कोई घन्ना सेठ नहीं, हां, उम्दा चीज़ें रखने का शौक है। इसलिए धीरे-धीरे बचत के रुपये जोड़कर कभी अपनी मनचीती वस्तु खरीद लिया करते हैं। साढ़े तीन सौ का नया माल अपने कवि साथी को टेम्परेरी तौर पर भी सैंप देने में हमें संकोच हुआ। भले ही हमें उनकी नीयत पर शक न हुआ हो, मगर यह भय तो था ही कि मूडी और लापरवाह स्वभाव के कवि जी मेरी घड़ी कहीं इधर-उधर रखकर भूल आएंगे और हें-हें करके बैठ जाएंगे, इधर हम बेमौत मारे जाएंगे। घड़ी की घड़ी जाएगी, ऊपर से जीवन-संगिनी महोदया की हज़ार अलाय-बलाय सहनी पड़ेगी। हमारा संकोच देखकर कवि जी के मन का एक कच्चा धागा टूट गया, तपकर बोले : ‘‘तुम ! तुम बुर्जुआ हो, अपने एक कवि मित्र का गौरव नहीं सहन कर सकते। तुम चूंकि कविता नहीं कर सकते मगर घड़ी खरीद सकते हो, इसलिए मेरे मान-सम्मान को अपने पैसे की शक्ति से दबाना चाहते हो......।’’

फिर तो, मित्रवर कवि ठहरे, एक ज़बान से सौ-सौ वार कर चले। हार कर मैंने घड़ी दे दी। फिर......जिसका डर था वही हुआ। कवि जी ने आकर कह दिया कि घड़ी खो गई। सुनकर जब मेरा चेहरा उतर गया तो वो गरज कर बोले : ‘‘मैं ब्लड़ बैंक में अपना खून बेच-बेचकर चाहें क्यों न जमा करूं, मगर साढ़े चार सौ रुपये कहीं से भी लाकर तुम्हारे मुंह पर फेंक जाऊंगा। तुम महानीच हो, मेरे जैसे महान कवि के मित्र कहलाने के योग्य नहीं। आते ही तुमसे यह तो न पूछा गया कि कहो मित्र तुम्हें वहां कैसा यश मिला ? बल्कि अपनी ही घड़ी का रोना रोने बैठ गए।’’ जोश में आकर कवि जी कह चले : ‘‘तुमने-तुमने अपनी घड़ी खो जाने की चोट को एक बार भी मेरे अंतरत में, मेरे मर्मस्थल में टटोलकर नहीं देखा और मुंह लटकाकर बैठ गए। तुम्हें क्या मालूम कि उसके खो जाने की पीड़ा से तड़पकर मैंने एक कविता सिखा डाली है। अगर मालूम होता तो तुम्हे


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book