धाँधलेश्वर - गोपाल चतुर्वेदी Dhandhleshwar - Hindi book by - Gopal Chaturvedi
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धाँधलेश्वर

गोपाल चतुर्वेदी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :497
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6329
आईएसबीएन :978-81-263-1459

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देश में नौकरशाही, लालफीताशाही, और अफसरशाही पर गोपाल चतुर्वेदी द्वारा किए गए व्यंग्य...

Dhandhleshwar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वर्तमान-समय में व्यंग्य के रचनाकारों में गोपाल चतुर्वेदी का नाम शीर्षस्थ है। विषयों के वैविध्य और विसंगतियों को रचाव के साथ प्रस्तुत करते हुए वे मूल्यों के बचाव के प्रति सजग रहते हैं। देश दुनिया के चप्पे-चप्पे, वस्तु जगह के रेशे-रेशे, भाँति-भाँति के मानवीय स्वभाव के चितेरे गोपाल चतुर्वेदी उसके अन्तरंग और बहिरंग का खाका कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि पाठक वाह ! वाह ! कर उठता है।

गोपाल चतुर्वेदी ने नौकरशाही, लालफीताशाही और अफसरशाही को इतना नज़दीक से देखा है कि उनके  बेबाक चित्रण में उन्हें अपनी कलम का कमाल दिखाने का मौका मिल गया। सरकार में उच्च पदों पर वर्षों रहने के बावजूद उन्होंने बाबुओं के दर्द को भी बखूबी समझा कि उसमें से करुणा के कणों को बटोरने में वे पूर्णतः सफल हो सके। इसी कारण गोपाल चतुर्वेदी प्रामाणिक व्यंग्य के लेखक के रूप में स्वयं सामने आये।
विषयानुसार शैली के चुनाव और उसमें फन्तासी, संवाद और भाषाई रंगत का तालमेल गोपाल चतुर्वेदी की अपनी विशेषता है। उन्हें पढ़ना आज के समाज, मनुष्य, राजनीति और जाने क्या क्या से सीधे जुड़कर सबकी भीतरी पर्तों में झाँककर मनोरम अनुभव है। प्रिया की सीख और गोपाल चतुर्वेदी के आत्मीय व्यंग्य को यदि पर्याय मान लिया जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।

शेरजंग गर्ग

भारत में जीव्स


दरअसल चार-पाँच दशकों से पी. जी. वुडहाउस के पन्नों से निकलकर जीव्स की आत्मा इंग्लैंड में परेशान भटक रही थी। उसने बर्टी वूस्टर जैसे रईस, ऐयाश, दिलफेंक और पूरी तरह से बेकार मालिक बिजली की रोशनी और सूरज के उजाले में तलाश किये, पर नहीं मिले। जीव्स जीते-जी कभी खाली नहीं बैठा। उसकी आत्मा कैसे खाली बैठती ! कभी इस डाली पर फुदकती, कभी उस पर। (यह केवल अनुमान है। शरीर भारी है, चलता है। आत्मा तन के भार से हल्की होकर उड़ती नहीं तो फुदकती जरूर होगी। अगर आपको आत्मा की चाल-ढाल की और जानकारी हो तो कृपया सूचित करने की कृपा करें।) इंग्लैंड मन्दी के दौर से गुजर रहा है। पढ़े-लिखे नौकरी करते हैं और बाकी सरकारी राहत या ‘डोल’ पर जिन्दा हैं। घर बैठकर बाप-दादा का पैसा जिनको उड़ाना था, उड़ा चुके। जीव्स जैसे नायाब ‘वैले’ की सेवाएँ लेने योग्य कोई बचा ही नहीं हैं। जिस डाल पर जीव्स की आत्मा फुदककर आयी थी, उसी पर आजादी के बाद हिन्दुस्तान से लौटकर आये एक आई.सी.एस. अँग्रेज अफसर का प्रेत भी लटका था। (सुना है कि भूत-प्रेत अकसर पेड़ों पर रहते हैं। पेड़ जमीन और आसमान के बीच, लिहाजा वे लटकते ही होंगे। हिन्दुस्तान में आत्मा से लोग भले अनिभज्ञ हैं, प्रेत विद्या में माहिरों की कमी नहीं है। पेड़ पर भूत के व्यवहार, उनके लेटने-बैठने या लटकने की सही सूचना के लिए लेखक आभारी होगा) पहले दोनों ने मौसम की बात की –

‘‘आज की रात क्या सर्द हैं !’’ जीव्स की आत्मा ने प्रश्न किया

‘‘नंगे बदन ठंड ज्यादा ही लगती है।’’ भूत ने उत्तर  दिया। (भारतीय आत्माओं की तरह अँग्रेज आत्माएँ शायद गरमी, सर्दी, आग-पानी के प्रभाव से ग्रस्त नहीं हैं।) भूतपूर्व अफसर का भूत सरकार के किसी भी निर्णय की तरह लटकता रहा, जीव्स की आत्मा दौड़ के पहले धावक–सी फुदकती रही। फिर जैसे भूत को अपने जानदार अतीत की याद आ गयी। भूत हुए मन्त्रियों और अफसरों के साथ अक्सर ऐसा होता है। उसे पेड़ पर फुदकता श्रोता बहुत दिनों बाद मिला था। उसने जीव्स के सामने संयत अँग्रेज की आचार–संहिता भंग करते अपने निजी जीवन और अनुभव सा खजाना खोला। जीव्स फुदकते-फुदकते थक गया, पर भूत की बात जारी रही। रात बीत गयी, जाकर उसने जीव्स को सलाह दी
‘‘अगर तुम्हें वूस्टर जैसे मालिक की तलाश है तो भारत जाओ। इक्कीसवीं सदी में सामन्ती मानसिकता अगर कहीं है तो हिन्दुस्तान में शेष है। राज्य चले गये, पर अब राजा-ही-राजा हैं। समाज में परिवार बिखर रहे हैं, पर राजनीति में उनका ही वर्चस्व है।’’

जीव्स की आत्मा ने जैसे मंजिल पा ली। अगर वूस्टर की तरह का मूर्ख मालिक मिल जाए तो फैसले के दिन तक उसका शरीर कब्र में आराम करेगा और आत्मा काम के मजे लूटेगी। हमें यकीन है कि आत्मा मक्खी-मच्छर की तरह सूक्ष्म आकार की होती है। जीव्स को ‘एअर इंडिया’ का जहाज प्रवेश के लिए आकर्षक लगा। वहाँ संग–साथ के लिए मक्खी–मच्छर कॉकरोच, खटमल आदि कई सूक्ष्म शरीर धारी थे। पर जीव्स के देश–प्रेम ने जोर मारा। वह ब्रिटिश एअरवेज के जहाज में घुस गया। वहाँ गोरी से ज्यादा काली चमड़ी वालों को देखकर जीव्स को ताज्जुब हुआ। कभी गोरे संसार के शासक थे। यह कैसा मजाक है कि आज उनके ही देश और विमान-सेवा में काले छाये हैं। उसके देश प्रेमी दिल को ठेस लगी। थोड़ी ही देर में उसके दिल को दिलासा मिली, जब उसने देखा कि काले यात्री काली विमान परिचारिका से किसी जरखेज गुलाम की भाँति पेश आ रहे हैं। उसकी हालत वैसी ही है जैसी सरकारी दफ्तर में किसी अरजी की होती है। हर बाबू उसे हिकारत से घूरता और इधर-उधर फेंकता हैं। वहाँ गोरी होस्टेस का ऐसा सम्मान है जैसे हिंदुस्तान के किसी दफ्तर-संस्थान में भ्रष्टाचार का। उससे बात करने वाले जैसे शराफत की प्रतियोगिता में लगे हैं।

जीव्स की आत्मा फुदककर एक हिन्दुस्तानी लड़की की नाक पर बैठ गयी।
हिन्दुस्तानी नाकों को मच्छर–मक्खी की आदत होती है। उस लड़की ने नाक पर फुदकती आत्मा को नोटिस तक नहीं लिया। उसके साथ बैठा उसका पति अपनी गोरी प्रेमिका के विछोह में दुःखी मन से हिन्दुस्तान का एक अँग्रेजी अखबार पढ़ने लगा। नाक पर बैठे जीव्स को खुशी हुई, वह अपने देश में जा रहा है। काले हैं तो क्या हुआ, अँग्रेजों ने इन्हें कितना सभ्य बना दिया है, इनको अँग्रेज़ी सिखा दी है ! उसने मन-ही-मन पेड़ पर लटके भूत को धन्यवाद दिया। भूत ने हिन्दुस्तान में रहकर अपना कर्तव्य बखूबी निभाया ! अँग्रेजी के अखबार की एक खबर ने उसका ध्यान आकर्षित किया। बिहार नामक भारत के किसी प्रान्त के पटना शहर में किसी मन्त्री ने उपने नौकर को इतना मारा कि वह जान से हाथ धो बैठा।
पुलिस आज तक उस नौकर की तलाश कर रही है। जीव्स की आत्मा को किसी शरीर की खोज थी। उसे थोड़ी निराशा हुई। जब तक हिन्दुस्तान पहुँचेगा, लाश पता नहीं कहाँ पहुँच चुकी होगी ! उसे सन्तोष भी मिला, वह सही जगह जा रहा है। भूत ने दुरुस्त फरमाया था यहाँ लोकतन्त्र पर सामन्ततन्त्र अभी तक हावी है। उसने अंग्रेजी अखबार को आगे पढ़ा। मुम्बई, जहाँ उसकी फ्लाइट जा रही थी, वहाँ तो इटैलियन माफिया की तर्ज पर भाई लोगों का साम्राज्य है। रोज ही आठ-दस सुपारी खा-खिलाकर, नहीं तो आपसी संघर्ष में ऊपर जाते होंगे। जीव्स को लगा कि उसका पटना जाना जरूरी नहीं है। अपना मनचाहा शरीर वह मुम्बई में ही पा सकता है।

इतने में जहाज में हलचल हुई। वह नाक पर आसन जमाये बैठा था कि लड़की का पति उठकर आगे की ओर जाने लगा। वह फुदककर उसके कन्धे पर जा बैठा। पता लगा कि इसी फ्लाइट से बॉलीवुड की एक नायिका मुम्बई जा रही है। जीव्स के नासिका-घोंसले का पति उसी के दर्शनार्थ पहली ‘रो’ की तरफ बढ़ रहा है। जीव्स को लगा कि यह आदमी बर्टी वूस्टर-सा दिलफेंक हैं। अगर यह मुम्बई का निवासी है तो इसकी सेवा में रहना बुरा नहीं है। हीरोइन के पास पहुँचकर जीव्स और कन्धे के स्वामी दोनों को निराशा हुई। नायिका ने मुफ्त की शराब ज्यादा पी ली थी। हल्ला तब मचा था जब वह नशे में सीट से नीचे–लुढ़क गयी थी। बमुश्किल तमाम उसे सीट पर फिर से स्थापित कर सीट-बेल्ट का सहारा दिया गया। इस वक्त उसकी नाक से नगाड़ा–संगीत प्रवाहित हो रहा था, जिसे ‘खर्राटे’ के नाम से भी जाना जाता है। वह पूरी तरह अंटागफील थी। उसका मेकअप पुंछ चुका था, जैसे भूकम्प के बाद ‘भुज’ कुछ न रहा हो। उसकी शक्ल भी भूचाल के बाद शहर के खँडहर जैसी लग रही थी। जीव्स की कन्धा-सवारी वापस लौट चली। जीव्स ने सुना, एक यात्री वितृष्णा से दूसरे से कह रहा है, ‘‘इसमें ऐसा क्या है जो भारत में इसके लाखों दीवाने हैं !’’

दूसरे ने उत्तर दिया, ‘‘दरजी आजकल जेंटलमैन बनाते हैं और मेकअपमैन चेहरे पर सुन्दरता सजाते हैं। इसका मेकअपमैन काफी हुनरमन्द होगा।’’
जीव्स ने कन्धे से उचककर वार्त्तालाप करने वालों पर नजर डाली। दोनों दरजी द्वारा अपने जेंटलमैन बनाये जाने की उक्ति को सार्थक कर रहे थे। उसे मेकअपमैन द्वारा सुन्दरता के सृजन का कथन भाया। उसे लगा कि उसके युग से आज तक स्थिति में परिवर्तन नहीं हुआ है। असली सुन्दरता को रँगाई-चुँगाई की दरकार नहीं है।

इतने हादसों के बाद जीव्स को नींद आ गयी, जो यान के मुम्बई में ‘लैंड’ करने की सूचना के साथ ही खुली। वह कन्धे पर बैठे-बैठे पसर गया था और जागा तो हिन्दी फिल्मों के परिचित संवाद ‘मैं कहाँ हूँ’ बोलते-बोलते उठा। उसे यह महसूस कर राहत मिली कि वह लन्दन से इस युगल के बदन पर फुदकते-फुदकते मुम्बई आ गया। वह कन्धे पर सवार ही, जहाज से नीचे उतरा। उसके आयी उस अंटागफील हीरोइन का खयाल आया। उसने मुड़कर इधर-उधर देखा। वह भी उतर चुकी थी और उसका नशा भी। उसका चेहरा खंडहर से फिर शहर बन चुका था। काश ! भूकम्प के बाद पुच्छ और अहमदाबाद का भी यों ही काया–पलट हो पाता। वह आगे बढ़ी तो एक लाल शर्ट और जीन्स पहने, बाल रँगा अधेड़ उसे दिखा। वह दौड़कर उसकी बाँहों में कटे पेड़ की तरह गिर पड़ी। यात्रियों को इस फिल्मी दृश्य में मजा आया, जीव्स को भी। उसे लगा कि शायद नायिका ने पति के वियोग की वेदना को भुलाने के लिए ही जहाज में ज्यादा शराब पी ली थी। उसे प्रसन्नता हुई कि हिन्दुस्तान में शादी की संस्था अभी भी जीवित है। उसे याद आया कि उसके जमाने के इंग्लैंड में भी शादी एक पवित्र बन्धन था और तलाक की प्रथा को आज जैसी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली थी। अब तो लोग साथ रहते हैं, बच्चे पैदा करते हैं, शादी-तलाक की नौबत ही नहीं आती। उसने कन्धे पर बैठे-बैठे एक यात्री को कहते सुना-
‘‘यह बूढ़ा खूसट एअरपोर्ट के अन्दर कैसे आ गया ?’’
‘‘उसे अपनी वर्तमान प्रेमिका को ‘इम्प्रेस’ करना होगा। प्यारे ! यह इंडिया है। यहाँ नियम-कायदों से धन और प्रभाववालों को हमेशा छूट मिली रहती है।’’
‘‘पर एक फिल्मी पत्रिका में तो छपा था कि इस हीरोइन की शादी हो गयी है।’’
‘‘तो क्या हुआ ! शादी तो एक सुविधा है। पति कहीं और पेंगें बढ़ा रहा होगा। हीरोइन अपनी अगली फिल्म के लिए प्रोड्यूसर से चक्कर चला रही है।’’
‘‘पर कैसा हसबैंड है कि बीवी को रिसीव करने एअरपोर्ट तक नहीं आया !’’
‘‘समझदार है। कबाब में हड्डी क्यों बनता !’’
जीव्स की कन्धों की सवारी इस बीच इतनी आगे जा चुकी थी कि उसे यह ज्ञानवर्धक संवाद सुनायी देना बन्द हो गया। वह पुरानी पीढ़ी का था। उसके दिल को कहीं ठेस लगी कि आधुनिक भारत और इग्लैंड के जीवन–मूल्यों में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। इंग्लैंड में तो पेड़ के भूत ने उसे बताया था कि भारत एक नैतिकता-प्रधान देश है। वैसे संचार साधनों की सुगमता और अन्तरराष्टीय चैनल-दर्शन से भारत ने नैतिकता के मामलों में तो शारीरिक भोग का पश्चिमी मानक हासिल कर लिया है। देश के विकास में बस अब काहिली और करप्शन को थोड़ा और बढ़ाना है। यह कोर-कसर पूरी हुई नहीं कि हिन्दुस्तान अमेरिका नहीं तो लैटिन अमेरिका के समकक्ष तो आ ही जाएगा। जीव्स अभी तक हमारी इस उपलब्धि से अनजान था। उसके कन्धे के आसन पर जमे-जमे यात्रियों का सामान आ गया। लोग बाहर ‘इमिग्रेशन’ की बाधा पार करने लाइन में लग लिये।

जीव्स की आत्मा को अपनी श्रेष्ठता पर गर्व हुआ। आत्मा को किसी पासपोर्ट वीज़ा की जरूरत नहीं है। वह कहीं भी आ-जा सकती है। उसे खबर नहीं थी कि भारत से पिछली बार एक मक्खी ब्रिटिश एअरवेज की एक उड़ान से मुम्बई से लन्दन गयी थी। वहाँ का माहौल उसे रास नहीं आया। वहाँ गन्दगी थी तो, पर प्यारे मुम्बई से कम। उसे भारत की याद ने इतना सताया कि वह भी एक मुसाफिर के बैगेज पर सवार होकर उसी फ्लाइट से बिना वीजा-पासपोर्ट भारत लौटी थी। जीव्स को कन्धे पर बैठाये उस युवक ने पहले व्हिस्की की चार बोतलें खरीदीं, फिर पत्नी के साथ ग्रीन चैनल से बाहर जा रहा था कि उसे कस्टम निरीक्षण ने जा पकड़ा। ट्रॉली पर रखा हर सामान उतारकर खोलना शुरू हुआ।
युवक ने गुस्से के स्वर में अँग्रेजी में कहा–
‘‘मेरे पास घोषित करने को अपनी ईमानदारी के अलावा कुछ नहीं है।’’

‘‘वह तो आपके पास की चार व्हिस्की की बोतलों से जाहिर है। मेरा इरादा भी सिर्फ अपना कर्तव्य निभाने का है।’’ कहकर उसने बोतलों का झोला अपने कब्जे में कर लिया,‘‘ आज हमारे साहब के यहाँ पार्टी है।’’
उसने एक सूटकेस खोला। उसमें हैरिस ‘ट्वीड’ का एक कोट–लैन्थ था। उसी में से उसने एक कलाई घड़ी और रेडीमेट शर्ट बरामद की और दोनों व्हिस्की वाले झोले में डाल दीं। सूटकेस अभी भी खुला था और इसी खाना तलाशी के इन्तजार में थे।
उसके युवक दो देखा और मुस्कुराकर बोला, ‘‘अब आप जा सकते हैं। हमने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। पर्स से चालीस–पचास पाउंड भी कृपा करके दे जाएँ।’’
युवक ने जैसे मन-ही-मन कुछ हिसाब लगाया, पत्नी की ओर देखा। उसने पचास पाउंड बख्शीश देने के अन्दाज में कस्टम निरीक्षक की ओर बढ़ा दिये। उसके बाद युवक और इंस्पेक्टर ने भाईचारे की अनुकरणीय भावना से मिलजुलकर एक-एक सामान को सूटकेस में करीने से रखा। दोनों ने बिछुड़ते हुए दोस्तों की तरह एक–दूसरे से हाथ मिलाया। जीव्स यह सब बिखरने–बन्द होने का नजारा उचक-उचककर देख रहा था। अगर वह हिन्दुस्तानी होता तो शर्तिया हाँक लगाता कि ‘खत का मजमूँ भाँप लेते हैं लिफाफा देखकर।’ पर वह अँग्रेज था। वह कस्टम निरीक्षक की कर्तव्य परायणता से इतना प्रभावित हुआ कि उसे बधाई देने लगा।

आत्मा की दिक्कत है। वह सब देखती, सुनती, समझती है, बस बोल नहीं पाती है।


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