मन की आवाज़ - आशापूर्णा देवी Man Ki Awaz - Hindi book by - Ashapurna Devi
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मन की आवाज़

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :80
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6382
आईएसबीएन :0000000000

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मृणाल की पत्नी खो गई, नयी ब्याही गायब हो गयी। खोजने पर उसके स्थान पर दूसरी तरुणी मिल गई। लेकिन तीन साल बाद जब वह गायब हुई बहू मिल गई तो सारी योजना कैसे गायब हो गई, क्या हुआ....

Man Ki Awaz

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका, आशापूर्ण देवी का एक नया उपन्यास।
आशापूर्णा देवी का लेखन उनकी निजी संसार नहीं है वे हमारे आस पास फैले संसार का विस्तारमात्र है।
इनके उपन्यास मूलत: नारी केन्द्रित होते हैं। सृजन की श्रेष्ठ सहभागी होते हुए भी नारी का पुरुष के समान मूल्यांकन नहीं? पुरुष की बड़ी सी कमजोरी पर समाज में कोई हलचल नहीं, लेकिन नारी की थोड़ी सी चूक उसके जीवन को रसातल में डाल देती है। यह है एक असहाय विडम्बना!

बंकिम, रवीन्द्र, शरत् के पश्चात् आशापूर्णा देवी हिन्दी भाषी आँचल में एक सुपरिचित नाम है- जिसकी हर कृति एक नयी अपेक्षा के साथ पढ़ी जाती है।
जिन्दगी में कैसे उल्ट-फेर हो जाते हैं !
मृनाल की पत्नी खो गई, नयी ब्याही गायब हो गई। खोजने पर उसके स्थान पर दूसरी तरुणी मिल गई। फिर उसे ही सहेज-बटोर कर परिवार में एक कम गए प्राणी की कमी पूरी करने की योजना बनी। लेकिन तीन साल बाद जब वह गायब हुई बहू मिल गई तो सारी योजना कैसे गायब हो गई ! क्या हुआ ? मृनाल ज्योति, मालविका, मॉ, पिताजी सबकी अलग-अलग बात, लेकिन समस्या का हल क्या निकला ? आशापूर्णा देवी की सशक्त लेखनी से नितांत पारिवारिक जीवन की अन्तरंग झॉकी।

मन की आवाज़
एक


उसके बाद, एक भयानक आँधी-तूफान के बाद उस रात पानी बरसना शुरू हुआ। वह पानी का बरसना भी भयंकर ही था।
बढ़ती ही जा रही थी उसकी गति, बढ़ रहा था तर्जन, गर्जन। पानी, पानी अथाह पानी। यूँ लगने लगा मानो प्रलय की वर्षा हो, मानो घोषणा हो गई है कि आज पृथ्वी का यह अंतिम दिन है।
सोता हुआ आदमी भी जाग उठा था। जग कर शरीर के चारों ओर चद्दर, कम्बल, कपड़ा अच्छी तरफ से ढँककर लेट रहा था। अपने आस-पास लेटे प्रियजनों के गले से चिपटकर या गोद के पास लेटे शिशु को छाती से चिपका कर लेटने पर भी डर कर सिहर रहे थे लोग। यह रात शायद ही खत्म हो। यह वर्षा तो पृथ्वी को खींचकर पहुँचा देगी अन्तिम दिन तक।
परन्तु उनका क्या हुआ, जो उस रात बिस्तर पर बैठ तक न सके थे ?
जो तूफान के चपेट में आकर विध्वस्त हो गए थे ? वे लोग ?
वे शायद यही आशा कर रहे थे, यही प्रार्थना कर रहे थे। यह रात खत्म न हो, दिन न निकले, यह बरसना न रुके। बढ़ जाए गर्जन, बढ़े गति, बढ़े आक्रोश। मिट जाए पृथ्वी का नामोनिशान, धुल-पुँछ कर साफ हो जाए विधाता की सृष्टि की कलंक-कालिमा। कलंक के सिवा और क्या है ?
बरसना प्रकृति का है परन्तु तूफान का यह तांडव तो मनुष्य का है। या तो फिर पशु का है, जो पशु विधाता की सृष्टि है। शायद पश्चात्ताप करते विधाता ने, इस पशुत्व को देखकर ही अपनी सृष्टि की ग्लानि को छिपाने के लिए लज्जा और धिक्कारवश पृथ्वी के रंगमंच पर यह पर्दा डाल देना चाहा था। यह भी हो सकता है अविरत वर्षा द्वारा वे असतर्क क्षणों में लगे कलंक धो डालना चाहते थे। ऐसा कुछ न होता तो उसे भयंकर समय में अकस्मात् इस तरह से पानी क्यों बरसने लगता ?
अकस्मिक ही।
शाम होते ही चांदनी छिटकी थी। तालाब के किनारे घास पर पाँव फैलाकर बैठी थी ज्योति। बोली- आज कौन-सी तिथि है जी ?’’
मृनाल ने उत्तर दिया था- कौन जाने ? कौन पत्रा देखता है ? पर लग रहा है, पूर्णिमा के आसपास की कोई तिथि होगी।’
‘शायद चतुर्दशी हो। माँ ने कहा था, कल पिताजी चावल नहीं खाएँगे।’
‘मृनाल ने हँसकर कहा- ‘माँ-पिताजी यहाँ आकर बड़े मौज़ में हैं। क्यों हैं न ?’
‘हम भी तो मौज़ में ही हैं।’
‘अरे, हम तो मौज़ में रहेंगे ही। हमारा मौज मारना कौन रोक सकता है ? कलकत्ते के उस दस फुट बाई बारह फुट के बाहर कमरे में क्या हम मौज़ से नहीं रहते हैं ? माँ और पिताजी को ही ठूँस-ठाँस कर रहने में तकलीफ होती है।’
‘कौन कहता है, तकलीफ होती है ?’
‘कहने की क्या ज़रूरत है ? रात-दिन के झगड़े से ही मालूम हो जाता है।’
‘उस झगड़े का कोई मतलब नहीं, ‘ज्योति हँसने लगी- देखना तो यह रहता है कि दोनों एक दूसरे से दूर-दूर तो नहीं रह रहे हैं। यही चीज़ खराब होती है। झगड़ना तो अच्छा होता है।’
‘ऐसी बात है ? तब तो हमें भी कोशिश करनी चाहिए।’ हँसने लगा मृणाल।
ज्योति भी हँसी- ‘कोशिश करने से झगड़ा नहीं होता है। बालों पर पाउडर छिड़कने से बाल नहीं पकते हैं जनाब, पकने को होते हैं तब पकते हैं।’
आयोजनहीन इधर-उधर की नाना प्रकार की बातें। दोनों के एक दूसरे से उलझे रहने के लिए बातें। हो सकता हैं अर्थहीन हों। बात करने के लिए बात करना।

उसी बेखबरी में कब चाँदनी छिपी, कब आसमान बादलों से घिर गया, पता नहीं चल पाया। अचानक चौंक पड़े दोनों।
‘अरे देखो, रात बढ़ रही हे। और ज्यादा देर तक बाहर रहेंगे तो पिताजी नाराज़ होंगे।’ ज्योति बोली।
‘लगता तो नहीं है, पिताजी डाटेंगे।’ मृनाल ने कहा।
‘लगता क्यों नहीं है ?’
‘ऊँह! हम जब तक बाहर रहेंगे, तब तक वे दोनों अकेंले रहने का सुख उठाएँगे।’
ज्योति बिगड़कर बोली- ए ! बेकार की बातें मत करो। गुरुजन हैं न ?’
>मृनाल इसके लिए शर्मिन्दा नहीं।
बड़े सहज ढंग से बोला- इससे क्या होता है ? गुरुजन हैं तो क्या प्रियजन नहीं हैं ? फिर ? प्रियजन को सुखी, खुशी और प्यार देखकर खुश होने पर भी कोई रुकावट है क्या ? मैं तो आकर देख रहा हूँ कि उन लोगों की उम्र मानों कई साल कम हो गई है। उस दिन पिताजी कितने खुश नज़र आ रहे थे माँ ने कहा था, ‘इसी आँगन में मैं ब्याह कर आई थी तब खड़ी हुई थी। तुम आकर मेरे पास खड़े हुए थे, वह समय याद है ?’ उस समय तुमने कुछ ख़्याल किया था?’

मुस्कुराकर ज्योति ने कहा- ‘ख्याल क्यों नहीं करूँगी ? उस दिन माँ पिताजी से हँस-हँसकर धीरे-धीरे कह रही थीं, कमरे की याद है ? हमारी सुहागरात का कमरा।’
मैं उधर ही से जा रही थी, भाग खड़ी हुई।
‘प्यार कभी बूढ़ा नहीं होता है।’ मृनाल बोला। जेब से सिगरेट निकाली उसने- ‘पी सकती हूँ ?’
ज्योति उसे धकेलकर बोली- ओहो, इज़ाजत ली जा रही है !’
‘लेना उचित भी तो है।’
सिगरेट सुलगाकर गम्भीर स्वरों में या शायद आवेगवश बोल उठा- लेकिन हम बूढ़े होने पर कहीं खड़े होकर यह न कह सकेंगे, ‘देखों, तुम्हें क्या याद है इसी कमरे में हमने सुहागरात मनाई थी.....’
ज्योति भी गम्भीर हो उठी परन्तु हल्के स्वरों में बोली- तब तो फिर उसी करुणामयी बालिका विद्यालय की बिल्डिंग में जाना पड़ेगा।’
‘ठीक कहा है।’ हाथ में पकड़ सिगरेट जलती रही।
ज्योति बोली- ‘जबकि तुम लोगों का इतना बड़ा मकान है। जो भी कहो, शादी-वादी अपने घर से ही करनी चाहिए। सिर्फ धूमधाम करने का मतलब तो शादी नहीं हैं। यहाँ आकर बराबर लग रहा है कि सात पुश्तों से तुम्हारे पूर्वज यहाँ रहते रहे थे, तुम्हारी दादियाँ यही ब्याह कर आई थीं, इसी आँगन में दूध-आलता की थाली में खड़ी हुई थीं, इसी कमरे में बैठकर लक्ष्मी की कथा सुनी थी। इससे रोमांचित नहीं होता है शरीर ?’

‘हूँ, सुनकर लग तो रहा है।’
‘न’ सुनते तो कुछ नहीं लगता ?’
मृनाल हँसा- ‘बिल्कुल नहीं कैसे कर दूँ ? सच कहूँ, उस दिन पिताजी की बात सुनकर पछतावा-सा हुआ था।......लगा था याद रखी जाए, ऐसी एक जगह होनी चाहिए। लेकिन जिम्मेदार तो मैं ही हूँ। पिताजी ने एक बार बात छेड़ी थी, शादी के लिए पूजा-पाठ का कार्यक्रम घर पर किया जाए। मैं एकलौता लड़का भी हूँ, पर मैंने ही बात उड़ा दी। बोला, इतने दिनों से गाँव छूट गया है, अब उस टूटे घर में.......’

‘ऐसा कुछ टूटा नहीं है, उस पर कितना बड़ा है। कितने कमरे, कितना बड़ा आँगन और यह तालाब, बगीचा ! कुछ भी कहो, सोचती हूँ तो अवाक् रह जाती हूँ कि यह सब तुम लोगों का अपना है।’
‘हम ही लोगों का है ? तुम्हारा नहीं ?’
ठीक है भई, हमारा भी है। और देखो हम उन दो कमरों के फ्लैट में पड़े हैं। मकान अगर किसी वैज्ञानिक कौशल से उठा कर ले जाया जा सकता......’
मृनाल हँसकर बोला- ‘कोशिश करके देखना चाहिए, विज्ञान जैसे-जैसे करिश्में कर रहा है ! लेकिन चिन्ता तो इस बात की है कि उसकी स्थापना कहाँ होगी। एक ही उपाय है अगर सिर पर लिये फिर सको।....’
‘नहीं नहीं, तुम कुछ भी कहो, इस बरबादी का मुझे भयानक अफसोस है। अच्छा, तुम लोग यहाँ कब से नहीं आए थे ?’
मृनाल बोला- ‘ब......होत दिन हो गए। न जाने कब बचपन में। अरे, समझ लो कि देश-विभाजन के पहले से ही हम गाँव छोड़ चुके थे। बाद में पिताजी एक आध बार आए थे, फिर भी बन्द हो गया। इतने बार्डर पर हैं, हाथों से निकला ही जा रहा था। यह तो किस्मत जोरदार थी कि अन्त में इधर के हिस्से में आ गया। उस पर भी शुरू-शुरू में कम झमेले नहीं। यह समझो कि ताऊजी थे इसलिए बेदखल नहीं हुआ, वरना वह भी हो गया होता। ताऊजी मर गए, अब..........’

‘अब हम लोग कब्जे में रखेंगे......’ ज्योति ने दृढ़ता से कहा- ‘सच कहती हूँ, शादी होने के बाद से ही हमेशा मेरी इच्छा यहाँ आने की थी। मैंने कभी गाँव नहीं देखा था।’
‘यह भी तो सच है कि तुम्हारी ज़िद के कारण ही यहाँ आना हुआ है। लेकिन अब अच्छा लग रहा है। अफसोस हो रहा है कि इतने दिनों में आए क्यों नहीं।’
‘और कितनी छुट्टी बाकी है तुम्हारी ?’ हल्की आवाज़ में ज्योति ने पूछा।
‘और कितनी बार यही प्रश्न पूछोगी ?’ मृनाल ने हँसकर कहा- परसों ही तो जाना पड़ेगा।’
‘हम लोग फिर आएँगे लेकिन।’
‘आ ही सकते हैं। दूर ही कितना है ? खर्च भी कोई खास नहीं।’
‘जबकि बीस साल से आए नहीं। इसका मतलब हुआ अपने गाँव से तुम्हें प्यार नहीं है।’

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