सर्पदंश - आशापूर्णा देवी Sarpdansh - Hindi book by - Ashapurna Devi
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सर्पदंश

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :107
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6389
आईएसबीएन :0000000000

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अभिशप्त प्रेम और पारिवारिक विघटन की एक त्रासद गाथा......

Sarpdansh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पल्लविनी

आखिरकार देवी जी विदा हुई।
कार की आवाज से पता चला। अपने कमरे में बैठे-बैठे ही मैं समझ गई। दोतल्ले के अपने कमरे में बैठे-बैठे मैंने चिरपरिचित वही दो ध्वनियाँ सुनी। धड़ाम् से कमरा बन्द होने की और कार स्टार्ट होने की। बचपन से ही कार स्टार्ट होने की आवाज सुनकर लगता है जैसे कुछ खो गया, कोई बहुत प्रिय चीज हाथ से निकल गई।
पर आज वैसा नहीं लगा। आज तो जैसे मैंने राहत की साँस ली। हालाँकि आज दरवाजा बन्द किए जाने की सुचना देने वाली ‘धड़ाम’ की ध्वनि बेहद कड़ी और क्रूर लगी।
मुझे पता है ट्रेन छूटने में अभी काफी देर है। स्टेशन पर देर तक उन्हें हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना होगा। इससे ज्यादा बोर करने वाली कोई चीज नहीं। फिर भी घर छोड़कर स्टेशन पहुँचने की कितनी जल्दी, कितना उत्साह। आँखों में जो शर्म की चादर होती है, जो इनकी आँखों में और भी झीनी थी, और जिसे खींच-तानकर आज तक देवी जी किसी तरह सब कुछ ढँक –तोप कर चल रही थीं, आज उसे इन्होंने अपने ही हाथों से तार-तार कर डाला है, चींथकर उसकी धज्जियाँ बिखेर दी हैं। जैसे चाय पीकर सकोरा रेलयात्री खिड़की के बाहर उछाल देता है।
तो फिर ?
तो फिर दूसरों को ही क्या पड़ी है कि वे तार –तार चादर को उठाकर अपनी लज्जा ढँकने की असफल कोशिश करें। हो सकता है इस बार देवी जी इस घर से हमेशा के लिए ही विदा हो गई हों। फिर भी मैंने पहले की तरह गेंट तक जाकर ‘सी-आफ’ करने की जहमत नहीं उठाई।
न ही उस झूठे आवरण से अपने को ढँकने के लिए बीमारी का ही बहाना बनाया। हमारे इस मध्यवर्गीय समाज में बीमारी का बहाना बनाकर हर तरह की गलती की माफ़ी पाई जा सकती हैं।
इस घर के मालिक ने एक बार मुझे उस इम्तिहान में डालने की कोशिश की थी। मेरे कमरे के बाहर बन्द दरवाजे के समाने खड़े होकर श्रीमान जी ने कहा था, ‘‘क्यों, अभी सोई पड़ी है क्या ? कहीं तबियत तो नहीं खराब हो गई ? शाम होने को आई।’’
मुझे उनका मतलब समझने में देर नहीं लगी। यह प्रश्न नहीं था, यह मुझे एक तरह का आदेश था, जान-बूझकर की गई अवहेलना के आवरण को और पक्का करने की चालाकी।
मगर मैं उनकी चालाकी की शिकार क्यों बनती ? उनकी इस कोशिश को और सुघड़ बनाने की मुझे क्या जरूरत थी कि मैं कहती, ‘‘जी हाँ, जी कुछ अच्छा नहीं है, बड़ी थकान लग रही है’’।
नहीं, वह सब नाटक मैंने नहीं किया। दरवाजे के पास जाकर साफ शब्दों में कहा था, ‘‘तबियत खराब हो मेरे दुश्मनों की मेरी तबियत क्यों खराब होगी ?’’ जैसे तबियत खराब होना कोई अनहोनी बात हो या मैं जैसे कभी बीमार ही न पड़ती होऊँ।
मेरे उस तीखे क्यों के जवाब में इस घर के मालिक ने बेहद नरमी से कहा, ‘‘ क्यों खराब होगी यह तो कहना मुश्किल है। किसी की भी तबियत कभी अचानक खराब हो सकती है। दोपहर में सो रही थी, इसीलिए ऐसा...।’’
नरमी से कही गई बात को भी श्रीमान् गृहस्वामी ने काफी बुलन्द स्वर में उचारा था कि जिससे घर में सभी वह बात सुन लें। सभी यानी घर के नौकर-चाकर और वह देवी जी, जो उस समय तक कार में नहीं बैठी थीं अभी घर में ही थीं।
लग रहा था अपने विलासमय स्नानगृह का उपभोग अन्तिम बार अच्छी तरह कर लेना चाहती थीं।

मैंने आवाज और भी ऊँची की थी। ‘‘कौन कहता है सो रही थी ? जरा भी नहीं सोई मैं ऐसे ही पड़ी हूँ कमरे में, बेकार में बेहया की तरह इधर-उधर घूमना मुझे अच्छा नहीं लगता ?’’
मैंने पेड़ की जड़ पर ही कुल्हाड़ी चला दी थी, जिससे डाल-पात निकलने की कोई सम्भावना ही न रह जाए। जिससे स्नानगृह से निकलकर, पाउडर-सेंट की महक छोड़ती देवी जी मेरे कमरे के सामने न आ खड़ी हों।
फिर भी अगर देवी जी धृष्टता की पराकाष्ठा दिखाने की कोशिश करें और मेरे कमरे के सामने आ खड़ी हो, तो कौन –कौन –सी दिल को चीरने वाली बातें उन्हें सुनाऊँगी. इसका रिहर्सल भी मन ही मन करती रही थी।... फिर सोचा कोई कड़वी बात कहे बिना ही उनके मुँह पर दरवाजा बन्द कर दूँगी। मगर वह सब रिहर्सल बेकार गया। परिस्थिति धीरे-धीरे ठण्डी होती गई। सब चुप और निस्तब्ध, दोनों सूटकेस भी चुपचाप नीचे उतार लिए गए।

फिर भी लगा, नाटक का आखिरी दृश्य निचले तल्ले में चल रहा था। चलो, इतने दिनों बाद इस नाटक का यवनिका-पात हुआ। दरवाजा बन्द होने की ‘धड़ाम्’ और कार स्टार्ट होने की घुरघुराहट –इन दोनों ध्वनियों ने यवनिका –पात की सूचना दी। अगर जान-बूझकर मैंने वैसे लहजे में बात न की होती तो शायद परिस्थिति कुछ दूसरी होती। शायद मेरे जान-बूझकर कमरे से बाहर न निकलने का कुछ और ही अर्थ लगाया जाता। और शायद दूसरा पक्ष इससे थोड़ा दुःखी या परेशान होता। पर मैंने समझ-बूझकर अपनी आवाज को इतना तेज किया था।

फिर भी नाटक के अन्तिम दृश्य तक एक व्यक्ति ने निश्चय ही बेहया की भूमिका निभाई होगी और वह व्यक्ति हैं- इस घर के मालिक, किसी मध्यम श्रेणी के शिल्प प्रतिष्ठान के चीफ इंजीनियर श्री आर. एम. मुखर्जी, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने भी बेहया का पार्ट कर गए हैं।
कार स्टार्ट होने के पहले मुखर्जी साहेब वहीं रहे होंगे, गाड़ी में कोई असुविधा न हो, इसके लिए जो भी उपकरण जरूरी थे, वह सब कार में रख दिय गए या नहीं, जो भी सावधानी बरतनी चाहिए थी, सब बरती गई या नहीं सब लेकर पसीना-पसीना हो रहे होंगे। यह भी जानती हूँ कि कार स्टार्ट होने के एक मिनट पहले, जैसे अचानक याद आ गया हो, वह जेब से नोटों की एक मोटी गड्डी देवीजी की गोद में डालकर कहेगें, ‘‘इसे रखो। जरूरत पड़ने पर और पैसे भेज दूँगा।’’
हाँ, ऐसा वह अन्तिम क्षण में ही करेगें।
जिससे कार की खिड़की से सड़क पर फेंक देने के अलावा उस गड्डी को अस्वीकार करने का कोई रास्ता न रह जाए।
जी हाँ, यह सब कुछ करेगें मि. मूखर्जी। इसमें कोई व्यक्तिक्रम नहीं होगा यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ। इस आदमी को मैं उस औरत से भी ज्यादा घृणा करती हूँ। आज वह घृणा और तीखी हो उठी है। इसे अपना गुरूजन मानना तो दूर की बात, यह मेरा कुछ लगता है इसी बात से मेरी देह पर कीड़े रेंगने लगते हैं।

धीरे-धीरे मैं अपने से भी नफरत करने लगी हूँ, क्योंकि इस व्यक्ति के साथ मेरा जो सम्बन्ध है, उसे मैं अस्वीकार भी तो नहीं कर सकती। मन से वह सम्बन्ध निश्चित कर देने पर भी समाज में तो उसे ढोते रहना होगा, इसी घर की छत-तले रहना होगा और इसी घर के रसोई घर में बना खाना हजम करना होगा।

कोई रास्ता नहीं, इसके अलावा कोई उपाय नहीं।
इस घर की आबोहवा में दम भी घुट जाए, तो भी इसी हवा में साँस लेना होगा मुझे। इसकी वजह यह है कि मैं एक नवयुवती हूँ, जिसने अभी-अभी अपनी जिन्दगी के उन्नीसवें वर्ष में कदम रखा है। किसी की शरण में रहने के अलावा मेरी और कोई गति नहीं। इसके अलावा अभी एम. ए. पास करने में एक साल की देर है। यहीं डिग्री आजाद होने के मेरे सपने का सहारा बनेगी।

पता नहीं सपना सच होगा या सपना ही रह जाएगा। सपनों का सच न होना ही तो स्वाभाविक है। मिस पल्लविनी मुखर्जी बेकारों की भीड़ में एक इकाई बनकर रह जाए यही ज्यादा सम्भव लगता है। फिर भी इसी सपने का संबल लेकर मैं निकल पड़ी हूँ। घर की हालत पढ़ाई-लिखाई के उपयुक्त नहीं हैं। इसलिए सीमा के घर पर ही पढ़ती-लिखती हूँ।

निश्चय ही सीमा मेरे घर की असली हालत को नहीं जानती ऐसा वह कल्पना भी नहीं कर सकती। सोचती होगी बड़े घर की लड़की की यह भी एक खामखयाली है। नहीं तो इतनी बड़ी कोठी में क्या मुझे पढ़ने-लिखने लायक जगह नहीं मिलती। जो लोग आते-जाते है वे मिस्टर मुखर्जी के पास आते हैं या मिसेज मुखर्जी का पास। वे सभी क्या मिस मुखर्जी के कमरे में पाँव तोड़कर जा बैठते होगे ? इसके अलावा क्या उस कोठी में और कमरे नहीं हैं ? इतने पैसे लगाकर ढेर सारी दुर्लभ पुस्तकों से सजी लाइब्रेरी भी तो है घर में। वहाँ कौन इसे डिस्टर्ब करने जाएगा ? पूरा तितल्ला मि. मुखर्जी ने लाइब्रेरी को दे रखा है। आधी छत तक दीवारों पर लगी हुई पुस्तकों से लदी रैकों, अलमारयों से भरा हाँल। शेष भाग में रेंलिगं से घिरा बरामदा, जिसमें कई मेजें और कुर्सियां। साहित्य के विधार्थी के लिए ज्ञानराशि का यह संचय कितना लोभनीय हो सकता है। आर. एम. मुखर्जी नामक यह व्यक्ति भले ही पेशे से इंजीनियर हो, साहित्य का प्रेमी ही नहीं अच्छा मर्मज्ञ है। कभी कुछ लिखता भी रहा है। जीवन में आर्थिक सम्पन्नता की वृद्धि के साथ-साथ इस व्यक्ति ने अपने उस साहित्य-प्रेम के लिए एक स्मारक के रूप में इस लाइब्रेरी का निर्माण किया है। मगर दिन-भर क्या वह व्यक्ति लाइब्रेरी में एक बार भी कदम रखता हैं ?

नहीं, दिन –भर उसके कदम एक बार भी वहाँ नहीं पड़ते, पड़ते हैं आधी रात को। सब काम से निवृत्त होकर लाइब्रेरी की चाबी लेकर वह अन्दर जाता है। अक्सर रात –भर नीचे नहीं उतरता। सुनती हूँ पढ़ते-पढ़ते वही कुर्सी पर बैठे-बैठे या एक किनारे पड़े दीवान पर लुढ़क जाता है।
अभी-अभी जो महिला यहाँ से विदा हुई है, अक्सर कहती थीं कि लाइब्रेरी में सिर्फ सोने नहीं जाते थे मि. मुखर्जी, पढ़ते भी थे। ऐसा हो भी सकता है। इस बारे में मुझे सिर खपाने की क्या जरूरत है ? उन दोनों में से किसी पर मेरी इतनी श्रद्धा नहीं है कि इस बात की सचाई का पता लगाने की इच्छा होती।

मिस्टर मुखर्जी की यह लाइब्रेरी न केवल पढ़ने के अनुकूल है, बल्कि वातानुकूलित भी है। गर्मी की दोपहर में इस हिमशीतल लाइब्रेरी कक्ष को छोड़कर जब मैं सीमा के कमरे में पढ़ती हूँ, जहाँ बैलगाड़ी की तरह चूम-चरर करता वह पुराना सीलिंग फैल गरमी को कम करने की बजाय बढ़ाता ही लगता है, तो सीमा की व्यंग्योक्ति और हमारी बुद्धि के बारे में उसकी हताशा मुझे बहुत ही स्वाभाविक लगती है। यह भी समझना बाकी नहीं रहता कि सीमा मेरे घर आकर पढ़ना चाहती है, चाहती हैं मैं उससे प्रस्ताव करूँ कि अब मेरे घर पर उसी वातानुकूलित लाइब्रेरी कक्ष मे हमारी पढ़ाई-लिखाई हो। मगर सीमा ने कभी सीधे यह प्रस्ताव नहीं किया मुझे इसकी आशंका रहती है, पर अभी तक उसने ऐसा नहीं किया हैं।

इसलिए सीमा का वह छोटा कमरा ही मेरा भी अध्ययन-कक्ष बना हुआ है। सीमा के घर मुझे इतना अच्छा क्यों लगता है, इसका विश्लेषण करके मैंने समझा है कि मुझे उसका घर इसलिए अच्छा लगता है कि सीमा की माँ नहीं हैं। सीमा की माँ बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार गई थीं। सीमा को माँ की कोई खास याद नहीं हैं। माँ की याद के रूप मे हस्पताल के बेड पर पड़ी एक छाया ही स्मृति में रह गई है। सीमा के इसी सुख से मुझे ईर्ष्या होती है। सीमा के पिता जी हैं, मगर मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। वे शायद अपने कर्म जीवन का ऋण चुकाने के लिए सुबह और शाम का वक्त पूजा में ही बिताते हैं। ऐसे लोगों के रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

सीमा मुझसे पारी बदलने यानी मेरे घर पर पढ़ाई-लिखाई करने का प्रस्ताव क्यों नहीं कर पाती, यह भी मैं जानती हूँ। कारण यह है कि मेरे और उसके आर्थिक स्तर में बहुत अन्तर है।
उच्च स्तर वाले जब चाहे उतरकर निम्न स्तर वालों की पतंग में बैठ सकते हैं, क्योंकि वह उनकी ‘सरलता’, ‘विनम्रता और ‘सदाशयता’ मानी जाती हैं। पर निम्न स्तर के लोगों की पतंग में नहीं बैठ पाते, क्योंकि ऐसा करना उन्हें बेहयाई लगती हैं। मैं जानती हूँ सीमा मेरे लाइब्रेरी –कक्ष में आकर खुश तो होगी पर सहज नहीं हो पाएगी।
मैं जैसे अनायास नमक –तेल लगी उसकी लाई या मुरमुरे की कटोरी में बँटवारा कर लेती हूँ, क्या सपने में भी वह मेरे घर के पकवानों की प्लेटों पर उसी स्वच्छन्दता के साथ हाथ साफ कर पाएगी ?
मगर क्या मैं कल से सीमा के घर पढ़ने जा सकूँगी ? जाते ही इस घर की महिला माल-असबाब लेकर कहाँ गई यह बात वह पूछ बैठी तो ? वह भी अकेली। अकेली क्यों गई, यह बात सीमा पूछेंगी तो मैं जवाब दूँगी ?
वैसे उनका अकेली घर से बाहर जाना पहली बार नहीं हुआ है।

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