दो औरतें - कृष्ण बिहारी Do Auratein - Hindi book by - Krishna Bihari
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दो औरतें

कृष्ण बिहारी

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :271
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6406
आईएसबीएन :81-7043-537-4

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ये कहानियाँ मार्ग दर्शन नहीं देती नजर आतीं बल्कि विचार एवं जिज्ञासा भी प्रदान करती हैं। अस्तु यायावर का झंझावात आपके सामने हैं...

Do Auratein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

केवल कुछ कहानियों से केन्द्र में आए कृष्ण बिहारी ने इधर सबका ध्यान अपनी ओर खींची है। उनकी ‘दो औरतें’ कहानी कुंठाहीन, खुलेपन और सशक्त कथ्य के लिए बार-बार याद की जाती है। तय करना मुश्किल है कि अश्लीलता के आरोपों के कारण कहानी इतनी लोकप्रिय है या गहरी मानवीय करुणा के लिए। सेक्स कृष्ण बिहारी का मुख्य सरोकार है, शायद इसीलिए उनकी प्रसिद्धि एक ‘बदनाम लेखक’ की तरह होती रही है। मगर सेक्स कहानी में सिर्फ एक बहाना होता है। वह सम्पूर्ण समाज का मेटाफर बनकर आता है। अल्बर्टो मोराविया या मंटो अपने सेक्सी कथ्य के माध्यम से जिस सामाजिक विडम्बना और गहरी मानवीय संवेदना को बार-बार जगाते हैं वही उन्हें बड़ा कथाकार बनाता है। कृष्ण बिहारी भी सेक्स की दुधारी तलवार को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उसी प्रक्रिया में उन्होंने अनेक कहानियाँ लिखी हैं। जहाँ सेक्स ही रचनाकार का लक्ष्य हो वहाँ सचमुच कहना ‘अश्लील’ होती है। कृष्ण बिहारी का दूसरा सरोकार है एक डायस्पोरा या आ-प्रवासी भारतीय का सांस्कृतिक और आर्थिक द्वन्द्व। वे भी नौकरी और आजीविका के लिए अबूधाबी जैसे कट्टर धार्मिक समाज में पढ़ रहे हैं, जहाँ बार-बार उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक होने के अपमान और धार्मिक अल्पसंख्यक होने की असुरक्षा से गुजरना पड़ता है। उनके अनेक कहानियाँ भारतीय आ-प्रवासियों की आपसी राजनीति या वहाँ की धार्मिकता के अन्तर्विरोधों पर लिखी गई हैं। अपने देश से बाहर और ‘खतरनाक बहुसंख्यकों’ के बीच रहने वाले अल्पसंख्यक अपनी पहचान बचाये रखने की प्रक्रिया में जिस तरह रूढ़िवादी, संकीर्ण सामाजिक और धार्मिक मानसिकता को ही अपनी ‘पहचान’ मान लेते हैं। कृष्ण बिहारी ने उसी खंडित व्यक्तित्व को पकड़ने की कोशिश की है। भारतीय सामन्ती मूल्यों और अबूधाबी पकड़ने के सामन्ती परिवेश में धर्म-संस्कृति की नाटकीय टकराहटें किसी भी कथाकार के लिए चुनौती हैं। वहाँ आधुनिकता के दबावों में एक संस्कृति बदलने के लिए कसमसा रही है तो दूसरी उसका आर्थिक लाभ उठाते हुई भी प्राचीन भारतीयता की पलायनी यातना से गुज़र रही है।

कृष्ण बिहारी की ये कहानियाँ अबूधाबी से अधिक भारतीय मनोविज्ञान को समझने के कथा-दस्तावेज़ हैं।

राजेन्द्र यादव

एक अनचाहा सफ़र.......


ठीक बारह बजे थे। अप्रैल के महीने में बारह बजे यहाँ दोपहर अपनी जवानी जी रही होती है। और, ठीक उसी समय टोलीफोन की घंटी घनघनाई थी। फोन सिरहाने ही था। उसने रिसीवर उठा लिया। दूसरी ओर इलियास था, स्कूल का चपरासी, ‘‘साब एक ताक है आपके नाम.....मैंने प्रिंसिपल साब को पढ़ के सुना दिया......उन्होंने कहा है कि आपको बता दूँ......’’ वह अचानक घबरा गया था, ‘‘पढ़ो, क्या है तार में !’’
‘‘फादर सीरियस......कम सून.....सुरेश’’
‘‘ह्वाट ?’’
एकबारगी दुनिया हिल-सी उठी। सब कुछ घूम-सा गया। लगा कि दिन में तारे इससे और खूँखार किसी और को क्या दिखाई पड़ते होंगे। उसका रोम-रोम सिहर उठा था। कँपकँपी किसी और तरह की नहीं होती। वह बदहवास था कि या फिर बौखला गया था, कुछ पता नहीं। बस इतना मालूम पड़ा कि रिसीवर उसके हाथ से छूट गया था और पत्नी उसे लगातार घूरे जा रही थी। बच्चों की आँखों में एक अजीब सी प्यास थी जिसे वे उसके उत्तर से बुझा देना चाहते थे। रिसीवर उसके हाथ से छूट गया था, और; दुबारा उसे उठा पाने की ताकत न तो उसके हाथों में थी, और न उसके जिस्म में। शायद दिल और दिमाग़ की भी इस तरह खो गई थी। जैसे मेले की भीड़ में कोई अबोध बच्चा अपने माँ-बाप की उँगली छोड़ बैठा हो, और बहुत याद करने पर भी उसे अपने आप का नाम और घर का पता याद न रहा हो। उसका हाल तो इससे भी विचित्र था-‘‘फादर सीरियस....कम सून....सुरेश।’’

सुरेश उसका छोटा भाई है। तार उसी ने भेजा है। वह उँगली फिर हाथ में आएगी या नहीं...कौन जाने ! वह बेबस था। लाचार था। शायद बुरी तरह बेजार था कि ऐसी खबर आ भी सकती है ? उसका बाप जिसे वह छह महीने पहले देखकर लौटा था। वह एक बेहद स्वस्थ इंसान था। बस, दो-चार महीने पहले हुआ रिटायर्ड। हर किसी ऐसी भौतिक इच्छा से परे। वहाँ, जहाँ लगे कि उम्र की उस चौखट पर वह किसी का मोहताज़ भी था ! फिर-कौन-सी बीमारी....या फिर दुर्घटना......हाँ, शायद दुर्घटना ही हो सकती है ! और, वह भी हिन्दुस्तान के उस शहर में जो मजदूरों का शहर है; वहाँ, जहाँ साइकिल चलाते लोग किसी भी सवारी की चपेट में कभी भी आ सकते हैं। वह आधा होश में था, और आधी बेहोशी में। उसका बाप साइकिल ही चला सकता था, और आधी बेहोशी में।
उसका बाप साइकिल ही चला सकता था....मगर।
पत्नी ने पास आकर पूछा, ‘‘क्या हुआ है ?’’...‘‘कुछ बोलते क्यों नहीं ?’’
‘‘कानपुर से सुरेश का तार है। बाबू जी गम्भीर अवस्था में हैं....बात कुछ साफ नहीं, ऐसा क्या कुछ हुआ है......ऐसा नहीं हो सकता....’’ वह उखड़े-उखड़े अलफाज़ में अपनी बात अधूरी छोड़ता है। उसे बात के पूरी होने में कोई तुक नहीं दीखता।

वह कानपुर में एक दोस्त का टेलीफोन नम्बर मिलाता है....घंटी बज रही है.....रिसीवर तुरन्त उठ गया है....‘‘हाँ, मैं बोल रहा हूँ अबूधाबी से.....एक तार मिला है सुरेश का.....क्या हुआ है मेरे बाबूजी को.....कुछ बताओ मुझे.....’’
तुम चले आओ तुरन्त.....उन्हें लीवर कैंसर हो गया है.....डॉक्टर कहते हैं कि अब बचेंगे नहीं...’’
रिसीवर उसके हाथ से फिर छूट गया है !

वह सोच रहा है.....ऐसा कैसे हो सकता है ? वह शख्स जिसने कभी शराब को सूँघी भी न हो, सिगरेट को हाथ न लगाया हो, बदपरहेजी की दहलीज़ से भी न गुजरा हो.....उसे ऐसी बीमारी। जो सुबह उठकर 6 किलोमीटर की सैर करता हो। जिसका घोड़े जैसा सपाट जिस्म देखकर लोग कहते हों, ‘‘रिटायरमेंट के बाद आप पर जवानी आ रही है...’’और वह शख्स मुस्कराकर जवाब देता हो, ‘‘जवानी तो अब आनी ही चाहिए.....मेरे तीन-तीन बेटे जवान हो गए है.....उन्हें देखता हूँ तो अपने खिचड़ी बालों का स्याह रंग छाते-उभरते देखता हूँ....और सच बताऊँ....अब तो मुझमें फिर एक अखाड़ेबाज की जवानी तारी होने लगी है। बस, बच्चों के उलाहने से डरता हूँ कि वे क्या कहेंगे....’’ऐसे व्यक्ति को लीवर कैंसर.....

......कुछ समझ में नहीं आता कि आखिर यह हुआ कैसे ? यूँ भी कुछ होने के लिए किसी कारण का होना ज़रूरी नहीं है। किसी को कुछ भी हो सकता है, और कभी भी हो सकता है। परन्तु, वह क्या करे.....उसकी समझ में कुछ नहीं आता। वह इससे पहले कभी इतना बेचैन नहीं हुआ। उसने मरते हुए लोगों को देखा है, उनके बारे में सुना है, पर वे सब उसके कोई नहीं थे। दूसरों का मरना देखना और बात है, और किसी अपने को मरते हुए जीना....उससे हददर्जे दीगर बात है। वह भी तब कि जब वह खुद को असहाय पा रहा है......

पिछले दो दिनों से छुट्टियाँ हैं। अभी दो दिन और शहर बन्द रहेगा। आज अट्ठाईस तारीख है। ईद की छुट्टियाँ हैं। इस मुल्क में इन छुट्टियों की खासी अहमियत है। तनख्याह एक तारीख को होगी। तब तक क्या करे वह.....किसी भी हाल में रुक नहीं सकता। रुकना, माने दीन-दुनिया से अपने आपको खो बैठना होगा। बाप तो खो ही देगा, जो बचेंगे उनसे भी हर हाल में नाता टूट जाएगा। कौन मानेगा कि चार दिन की ईद की छुट्टियाँ रही होंगी.....या फिर पैसा पास नहीं रहा होगा.....और,......तो और,....उसका पासपोर्ट भी उसके स्पांसर के पास थे। उसकी आँखें सूखी हुई थीं। उन आँखों में या तो बर्फ की सिल्लियाँ तैर रही थीं...या फिर चटख-चटख कर जलती हुई चिता की लकड़ियाँ....या फिर और कुछ था। उनका खुलासा क्या कभी हो पाएगा ? उसे अभी पासपोर्ट लेना है......

वह टैक्सी में बैठा है। टैक्सी स्कूल की ओर भागी जा रही थी। बाहर हवा तेज है। रेत के बवंडर उठकर सड़क पर आ रहे हैं। रात-दिन सिंचने वाले पौधों और पेड़ों का चेहरा भी झुलसा हुआ है। या कि यह उसके अपने दिल का ही वह अक्स है जो चारों तरफ दिख रहा है।

वह अपने स्पांसर से जब अपना पासपोर्ट लेकर लौटा तो उसके कमरे पर उसे पहचानने वालों का एक जमघट लग चुका था। हर कोई पत्नी के द्वारा टेलीफोन से यह जान चुका था कि आश्वासन भी कि ज़रूरत पड़े तो कानपुर से टेलीफोन करना....पैसे पहुँच जाएँगे।

शाम की, यानी कि रात की फ्लाइट से उसका जाना तय हो गया.....वही एक पहली फ्लाइट थी जो तार मिलने या फिर टेलीफोन मिलने के बाद की थी। एअरपोर्ट पर टिकट लिया था। जेब में एक लाख रुपयों का ड्राफ्ट था और दिल में एक भयानक खोखलेपन का अहसास ! उस अहसास में एक बात शामिल थी कि या तो उसके बाप को कुछ भी नहीं हुआ, या फिर उसका बाप उसे जिन्दा नहीं मिलेगा। दिल के भारीपन के आगे जेब हल्की हो गई थी। वह टूट रहा था। उजड़ रहा था। सच कहा जाए तो तहस-नहस हो रहा था। फिर भी जिन्दा था......बाप के साथ मरा तो नहीं जा सकता न.....! वह भी उस बाप के साथ जिससे ठीक से बात किए हुए बीस बरस से ऊपर बीतने को आए। यह एक अलग कहानी है। मगर इसका भी कुछ-न-कुछ इस कहानी से संबंध ज़रूर है। हाँ; बाप ने उससे बोलना छोड़ दिया था क्योंकि उसने अपने बाप की मर्जी के खिलाफ अपने पसन्द की एक विजातीय लड़की से विवाह किया था। बाप को यह अपनी हार लगी थी, और उसने घर में अपना फैसला सबको सुना दिया था कि अब इस जिन्दगी में उसका और उसके बड़े बेटे का परस्पर कोई संबंध शेष नहीं है। यदि घर का कोई अन्य सदस्य संबंध रखता है तो यह उसका व्यक्तिगत मामला है, परन्तु यह घर की मर्यादा के खिलाफ होगा। बाप का यह फैसला सुनने वालों में उसके भाई-बहनों के साथ उसकी माँ भी थी जिसकी अपने ही घर में अपनी कोई आवाज़ नहीं थी। लेकिन बाप का यह फैसला सुनने के बाद भी उसने घर को कभी नहीं छोड़ा। जब भी छुट्टी मिलती, वह अकेला ही घर आ पहुँचता। सबकी आँखों में यह सवाल ज़रूर होता कि वह अकेला क्यों आया है ! लेकिन न तो किसी ने खुलकर पूछा और न ही उसने कभी किसी को बताया कि वह बच्चों को किसके सहारे छोड़ आया है....न तो हिन्दुस्तान में रहते हुए और न ही अबूधाबी में रहते हुए। यहाँ रहते हुए भी उसे पाँच बरस तो होने को हो ही गए, मगर कभी उसके बाप ने अपने पोतों को भी बहाना बनाकर कोई कमजोरी नहीं दिखाई....ऐसे बाप की बीमारी का समाचार पाकर भी अगर वह बदहवास चल पड़ा था तो...तो, सच तो यह है कि वह अपने बाप का सबसे बड़ा प्रशंसक था। उस बाप का जो टूट तो सकता था। पर झुक नहीं सकता था।

इमिग्रेशन क्लीयरेंस के बाद ड्यूटी-फ्री में आकर लगा कि हर बार तो कुछ पीकर चला है। इस बार क्या करे। आज अगर इलियास का फोन न आया होता तो उसने दोपहर में लंच लेने से पहले अपनी छुट्टी के दिन का कोटा दो पेग तो ले ही लिया होता। ऐन उसी वक्त फोन आया था जब वह एक जाम बनाने की सोच रहा था। और, समाचार मिलने के बाद तो इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी कि काठ मारे हुए शरीर को होश में लाने के लिए या फिर पूरी तरह बेहाशी में डुबा देने के लिए शराब की भी कोई अहमियत बाकी रह गई है.....

बड़ी अज़ीबोंगरीब कशमकश थी। एक मन हो कि कम-अज-कम तीन पेग पी ले और सुबह दिल्ली जब आए तभी आँख खुले, और, दूसरा मन कि बाप.....डेथ-बेड़ पर पड़ा है.....और दारू है कि छूटती नहीं। जबकि बाप के डेथ-बेथ पर होने और दारू न छूटने का आपस में कोई रिश्ता नहीं है। फिर भी उसने डयूटी-फ्री में न तो दारू पी, और न हर बार की तरह अपने दोस्तों के लिए दारू खरीदी......और न ही कोई गिफ्ट.....

क्या खरीदना, और किसके लिए.....उस वक्त उसे कोई अपनी कैफियत में कमी भी नहीं दिख रहा था। वह तन्हा था। अकेला। वी.आई.पी. लगेज में चला गया है।

यहाँ तक कि कोई हैंड बैगेज भी नहीं। सिवाय अपने पासपोर्ट और टिकट के।
उसके मन ने कहा पत्नी को फोन कर ले। न जाने बच्चे क्या सोच रहे होंगे....?
....वह भले ही उसके माता-पिता से न मिली हो, परन्तु इस समय कुछ-न-कुछ तो सोच ही रही होगी। उसका पति जी रहा है, वह भी ऐसे समय पर जब शब्द काम नहीं आते। आते समय वह चुप ही थी। पर, जाते समय उससे कुछ तो कहना था। नम्बर डायल किया-‘‘मैं बोल रहा हूँ....फ्लाइट बीस मिनट बाद है। घबराना नहीं....मैं कानपुर पहुँचते ही काटैक्ट करूँगा...’’
‘‘बच्चे जगे हैं...संजय बात करना चाहता है आपसे....उसे फोन दूँ।’’
‘‘दे दो।’’
‘‘पापा, आपके पापा को क्या हुआ है ?.....कैंसर....लीवर कैंसर....’’ रिसीवर एक बार फिर उसके हाथ से छूट गया है। वह कुछ बोल पाने के हाल में नहीं है। अपने सात बरस के बेटे को वह क्या समझाए? जबकि वह खुद ही नहीं समझ पा रहा है कि उसके पापा को यानी कि उसके बाप को अचानक यह क्या हो गया है !
उसने हाथ से छूटे रिसीवर को पकड़कर कान से फिर लगाया। उस तरफ अब भी टेलीफोन पर संजय ही था।.....‘‘बेटे ममी को फोन दो.....’’
संजय ने फोन अपनी ममी को दे दिया है।
‘‘मैं जा रहा हूँ....ठीक से रहना...बच्चों का और अपना खयाल रखना....मैं हालत सुधरते ही लौट आऊँगा’’ दूसरी ओर एक ठहरी हुई चुप्पी है। उसने रिसीवर फोन के क्रेडिल पर टिका दिया। कभी-कभी बातों के लिए किसी विषय का न होना भी कितना तकलीफदेह होता है।


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