कामतानाथ संकलित कहानियां - कामतानाथ Kamtanath Sankalit Kahaniyan - Hindi book by - Kamtanath
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कामतानाथ संकलित कहानियां

कामतानाथ

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6427
आईएसबीएन :978-81-237-5247

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आम जनजीवन से उठाई गई ये कहानियां कथाकार के रचना-कौशल की वजह से ग्रहण के स्तर पर एक तरफ बतरस का मजा देती हैं तो दूसरी तरफ प्रभाव के स्तर पर उद्वेलित करती हैं...

Kamtanath Sankalit Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कामतानाथः संकलित कहानियां शीर्षक इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी कथा-धारा के श्रेष्ठ कथाकार कामतानाथ (1935) की अठारह चुनी हुई कहानियां संकलित हैं। कहानियों का चयन स्वयं कथाकार ने किया है। स्वातंत्र्योत्तर कालीन भारतीय जनमानस का जीवन-क्रम इन कहानियों में सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत है। कामतानाथ की कहानियों में कथा-रस’ का जादू पाठकों के सिर चढ़कर बोलता है। आम जनजीवन से उठाई गई ये कहानियाँ कथाकार के रचना-कौशल की वजह से ग्रहण के स्तर पर एक तरफ बतरस का मजा देती है, तो दूसरी तरफ प्रभावके स्तर पर उद्धेलित करती हैं। सामाजिक सरोकारों की मौलिक पहचान के साथ ये कहानियाँ प्रेमचंद की परंपरा को अपने ढंग से विस्तार देती हैं और उसका नवोन्मेष भी करती हैं।

भूमिका


इस संकलन में कामतानाथ की अठारह कहानियां है। अपनी लगभग डेढ़ सौ कहानियों में से लेखक ने इन्हें चुना है। संभवतः लेखक की कोशिश यह रही है कि उसके विस्तृत एवं वैविध्यपूर्ण रचना संसार का पूरा प्रतिनिधित्व इस संकलन से हो जाए।
उनकी पहली कहानी ‘मेहमान’ सन् 1961 में छपी। लेकिन पहली उल्लेखनीय कहानी ‘लाशें’ हैं। यह साठवें दशक के अंत में ‘नयी धारा’ के विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। संपादक थे कमलेश्वर। इस समय तक ‘नई कहानी’ और ‘सचेतन’ कहानी का दौर समाप्त हो चुका था और सेक्स, कुंठा, संत्रास, अकेलेपन एवं अजनबीपन को लेकर अजीब–ओ-गरीब कहानियां लिखी जा रही थीं। यह बीट जेनेरेशन’ और अस्तित्ववाद से प्रेरित कथित ‘साठोत्तरी पीढी़’ की कहानियों का संक्रमण कालीन दौर था। कामतानाथ इन प्रभावों से दूर रहे। मध्यवर्गीय पारिवारिक पृष्ठभूमि और ट्रेड यूनियन में सक्रिय भागीदारी के कारण उनके पास यथार्थ का व्यापक और गहरा अनुभव तथा जनोन्मुखी मानवीय दृष्टि थी। इसी थाती के सहारे उन्होंने कहानी का विषय नहीं बनाया। ‘लाशें’ वस्तुतः विकृत सेक्स की मानसिकता की कठोर आलोचना करने वाली कहानी है। 1968 में उनकी ‘छुट्टियाँ’ कहानी ‘सारिका’ में छपी। यह टूटते हुए मध्यवर्गीय परिवार की महागाथा है। इससे उन्हें अलग पहचान मिली। सन् 1970 के आस-पास जब समांतर आंदोलन प्रारंभ हुआ तो कामतानाथ उसके प्रमुख कहानीकार के रूप में स्थापित हुए। इसी दौरान उनकी ‘अंत्येष्टि’, ‘पूर्वार्ध’, ‘तीसरी सांस’ जैसी चर्चित कहानियां आईं। ‘समांतर’ आंदोलन का जन्म उस समय हुआ जब प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियां ठंडी पड़ चुकी थीं और उसने इस खाली जगह को भरा और आम आदमी को केंद्र में रखते हुए प्रगितशील मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही नहीं सम्बद्धता की भी बात की।
कामतानाथ के वैविध्यपूर्ण रचना-संसार को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में उन कहानियों को रख सकते हैं जिनके केंद्र में मानवीय संबंध और पारिवारिक रिश्ते हैं। दूसरी श्रेणी ऐसी कहानियों की बनाई जा सकती है जिनकी शुरूआत तो परिवार से होती है लेकिन जो परिवारिक दायरे तक सीमित नहीं रहतीं, बाहर निकल जाती हैं- व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन के दायरे के बीच आती जाती रहती हैं। तीसरी श्रेणी में उन कहानियों को लिया जा सकता है जो सार्वजिनक जीवन से संबंधित किसी समस्या को उठाती हैं। यह विभाजन एक काम चलाऊ विभाजन है और इस पर ज्यादा जोर देने का मेरा कोई इरादा नहीं है। आगे उनकी कहानियों को इसी क्रम में समझने की कोशिश की गई है।
परिवारिक रिश्ते को लेकर लिखी गई कहानियों में कई कहानियां ऐसी हैं जो पुरुष–प्रधान समाज में स्त्री के विरुद्ध हो रहे भेदभाव को अपना विषय बनाती है। इस तरह की कहानियों में ‘सारी रात’ ‘नर्सिंग होम’, ‘खलनायक’, ‘तीसरी सांस’, और ‘पहाड़’, उल्लेखनीय है।
‘सारी रात’ एक ऐसी रसभरी गुदगुदाने वाली कहानी है जो पुरुष –मानसिकता के प्रेम-संबंधी पूर्वाग्रह को उद्धाटित करती है। ‘नर्सिंग होम’ ‘पुरुष मानसिकता के एक भिन्न आयाम को सामने लाती है। यहाँ स्त्री का जीवन महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वह ‘बेटा’ पैदा कर पाती है या नहीं। ‘खलनायक’ लेखक की चर्चित कहानी है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो अपनी पसंद की लड़की से शादी तो करना चाहता है लेकिन नैतिक साहस की कमी के कारण किसी से खुलकर कुछ कह नहीं पाता। वह स्वयं को यातना तो दे सकता है लेकिन परिवार एवं विवाह की संस्था में कोई बड़ी तोड़-फोड़ का साहसिक कदम नहीं उठा पाता।
‘तीसरी सांस’ कहानी के केंद्र में रेलवे के एक कैबिन मैन की नीरस जिंदगी है जिसमें थोड़े समय के लिए प्रेम-रस का संचार होता है। वह जिस विधवा स्त्री को चाहता है उससे शादी का प्रस्ताव इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि उसका धर्म दूसरा है। यहां दोनों के बीच मजहब की दीवार आ जाती है।

‘पहाड़’ एक अलग ढंग की कहानी है। पति, पत्नी और वह के कथित त्रिकोण में यह एक नया आयाम जोड़ती है। यह आयाम है मेहनत-मशक्कत कर गुजर–बसर करने वाले ‘घोड़े वालों’ का जिनकी जिंदगी में सिर्फ पहाड़ हैं।
स्त्री के विरुद्ध हो रहे भेदभाव को उद्घाटित करने वाली कहानियों के अतिरिक्त मध्यवर्गीय परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्तों को लेकर लेखक ने कई कहानियां लिखी हैं, जिनमें ‘संक्रमण’ और ‘छुट्टियां’ विशेष रूप से चर्चित रही हैं।

‘छुट्टियां’ कहानी में मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार की टूटन का मार्मिक अंकन है। यह टिपिकल भारतीय परिवार है जिसके केंद्र में माँ है। वही इसे संभाले हुए है। इस परिवार का दायरा बहुत बड़ा है। इसमें परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त, दोस्त, मित्र और पड़ोसी भी शामिल हैं। कथा-नायक का इस परिवार के प्रति लगाव और अलगाव का द्वंद्व ही इस कहानी को मार्मिक बनाता है।
‘संक्रमण’ लेखक की एक और चर्चित कहानी है। पाठकों से सीधा संवाद और तादात्म्य स्थापित करने की क्षमता के कारण इस कहानी की नाट्य–प्रस्तुति के प्रति नसीर उद्दीनशाह और देवेंद्र राज अंकुर सहित अनेक प्रसिद्ध रंगकर्मी आकृष्ट हुए। देश एवं विदेश में इस कहानी का अनेक बार मंचन हो चुका है। यह पिता और पुत्र के द्वंद्व को सामने लाती है। प्रचलित शब्दावली में यह ‘जेनेरेशन गैप’ को अपना विषय बनाती है।
‘कैन माने सकना’ में भी परिवार है। लेकिन यहा कहानी के केंद्र में बच्चा है। बचपन, खेल, तोता, रटंत पढ़ाई, माँ और पिता के संदर्भ इस कहानी को बहुत ही सूक्ष्म स्तर मार्मिक बनाते हैं।
लेखक ने पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंधित कहानियों के साथ–साथ सार्वजनिक जीवन से जुड़ी हुई कहानियाँ भी लिखी हैं। इस तरह की कहानियों में ‘शिकस्त’ ‘बच्चा’ ‘भय’, ‘काम का पहिया’, और ‘जमा हासिल’ का उल्लेख किया जा सकता है।

‘शिकस्त’ पुलिस और अपराध के अंतर्सबंधों की पड़ताल करने वाली कहानी है। वस्तुतः यह एक ऐसे भ्रष्ट–तंत्र की कहानी है जो लोगों को गैरकानूनी काम करने के लिए मजबूर करता है, क्योंकि गैरकानूनी काम के साथ उसके स्वार्थ जुड़े हैं वह अपराधी को सुधरने का मौका ही नहीं देता।

आम आदमी में व्याप्त पुलिसिया आतंक को बच्चे के मार्फत मूर्त्त करने वाली कहानी है ‘बच्चा।’ बच्चे के लिए न तो भारतीय पुलिस का कोई मतलब है और न ही उसकी दिल दहला देने वाली भाषा का। बच्चा पुलिस से नहीं डरता जब कि ट्रेन में बैठे हुए उसके मां-बाप और दूसरे मुसाफिर डरते हैं। लेकिन पुलिस का सिपाही भी अंततः इंसान ही है। यह व्यवस्था उसे लोगों को प्रताड़ित करने की छूट अवश्य देती है लेकिन वह स्वयं भी इस व्यवस्था द्वारा प्रताड़ित है। वस्तुतः यह कहानी सार्वजनिक जीवन के ठेठ भारतीय रूप से हमें रूबरू कराती है।

‘भय’ कहानी का अंदाज अलग तरह का है। आधुनिक शहरी जीवन में अजनबीपन और बिजली (रोशनी) के अनेक निहितार्थ हैं। अजनबी डराता भी है और आकर्षित भी करता है। बिजली अंधेरे का डर दूर करती है लेकिन उजाले में क्या डर खत्म हो जाता है ? निम्नवर्गीय संदर्भ मे अंधेरे–उजाले, अजनबी-परिचित, यौवन –आभूषण घर – बाहर, भय – सुरक्षा के युग्मों में इस कहानी का ध्वन्यार्थ अनुरणित होता रहता है।

‘काम का पहिया’ और ‘जमा हासिल’ ट्रेन यूनियन के अनुभव पर आधारित कहानियां हैं। इनके केंद्र में जुझारू, ईमानदार और संगठन के लिए समर्पित कार्यकर्ता हैं। नकारात्मक चरित्रों वाली कहानियां तो बहुत लिखी गई हैं लेकिन सकारात्मक और जीवंत चरित्र वाली ऐसी कहानियां हिन्दी में कम देखने को मिलती। ‘काम का पहिया’ के कथा-नायक का तो अपना कोई परिवार ही नहीं है, संगठन ही उनका परिवार है ‘जमा हासिल’ के कथा-नायक का परिवार तो है लेकिन संगठन ही उसकी पहली प्राथमिकता है।
कामतानाथ की कहानियां जीवन से उठाई गई कहानियां हैं। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनमें किस्सागोई का अंदाज भी दिखाई पड़ता है। जैसे ‘टूटी टांगे’, ‘संन्यास’, ‘अमन का दूत’ और ‘देवी का आगमन’। निश्चय ही उनकी कहानी-कला का एक पक्ष किस्सागोई की परंपरा से जुड़ता है। मगर यह निखालिस किस्सागोई नहीं है, उसका भी कोई न कोई मकसद है, जैसे ‘अमन का दूत’ राष्ट्र के जीवन में फेले भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है, ‘संन्यास’ के विकल्प की व्यर्थता का बोध कराती है और ‘देवी का आगमन’ धार्मिक अंध-विश्वासों का फायदा उठाकर पैसा कमाने की वृत्ति पर चोट करती है।

उनकी कहानियों में ‘कथा-रस’ का जादू पाठकों के सिर चढ़कर बोलता है। आज हिन्दी कथा-जगत में विरले ही लेखक होंगे जिनके यहां समा बाँधने के लिए विलुप्तप्राय कला का ऐसा निखार दिखाई पड़ता हो। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि समा बाँधने के लिए पुराने ढंग की किस्सागोई का सहारा लेना जरूरी नहीं। लेखक की ज्यादातर कहानियों में ऐसी किस्सागोई है भी नहीं। चलती हुई भाषा की रवानगी में वे जिस तरह कहानी रचते हैं उससे बतरस का मजा आता है। अकारण नहीं है कि उनकी कहानियों में संवादों की अहम भूमिका है। कुछ कहानियां उन्होंने विकसित की हैं, जिनका वे जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं।

कामतानाथ ने अपनी मार्क्सवादी दृष्टि का उपयोग यथार्थ के अंतर्विरोधों को समझकर उन्हें कहानी के सांचे में ढालने के लिए किया है। मार्क्सवादी दृष्टि के आलोक में वे यथार्थ को खोलते हैं और कहानी विद्या में उसे पुनर्सृजित करते हैं। लेकिन उनके यहां फार्मूले के सहारे लिखी गई शायद ही कोई कहानी मिले। सहजता उनकी कहानियों का ऐसा गुण है जो उन्हें बेहद पठनीय बनाता है।

वे मूलतः प्रेमचंद की परंपरा के कथाकार हैं। प्रेमचंद की परंपरा का कथाकार कहने से आशय प्रेमचंद की यथावत पुनर्प्रस्तुति से नहीं है। उन्होंने प्रेमचंद की परपरा का अपने ढंग से विस्तार और नवोन्मेष किया है। उनकी कहानियां सामाजिक सरोकार की कहानियां हैं। सामाजिक सरोकार की चिंता उनकी कहानियों को कथ्य को ही नहीं, भाषा और शिल्प को भी काफी दूर तक निर्धारित एवं नियंत्रित करती है। उनके यहां चालू फैशन के हिसाब से कहानी लिखने और नए-नए प्रयोग करने की हड़बड़ी नहीं है। इसका यह मतलब नहीं कि प्रयोग है ही नहीं। प्रयोग हैं लेकिन प्रायः सभी प्रयोग यथार्थवादी शिल्प की सीमा के अंदर किए गए हैं। यथार्थवादी शिल्प की महत्ता और सार्थकता को वे स्वयं स्वीकार करते हैं।

छुट्टियां


रिक्शावाला सामान दरवाज़े पर रखकर चला गया। उसने होल्डाल वहीं बाहर चबूतरे पर पड़ा रहने दिया और बक्स ले कर जीना चढ़ने लगा। मां बाहर छत पर ही खरहरी चारपाई पर बैठी थीं। उन्होंने उसकी ओर देखा। पहचाना या नहीं वह जान नहीं सका। वह इतना जानता है कि मां को अब बहुत कम दिखाई देता है। उसने बक्स वहीं फर्श पर रख दिया और झुककर मां के पैर छू लिए।
‘‘आ गए ?’ मां ने कहा।
‘‘हां’’ उसने कहा। एक क्षण रुका, तब नीचे होल्डाल लेने चला आया। होल्डाल ला कर उसे भी उसने वहीं छत पर पटक दिया और चारपाई पर बैठ कर हांफने-सा लगा। होल्डाल खासा वजनी था। उसे ले कर सीढी़ चढ़ने से वह थक-सा गया था।
सतीश, उसका छोटा भाई, अंदर कमरे से निकल कर आया और झुककर उसके पैर हुए। उसने कुछ कहा नहीं बस, पैर समेट कर एक अन्यमनस्कता–सी व्यक्त की, जैसे उसे यह सब पसंद न हो। सतीश भी कुछ बोला नहीं। सीने पर हाथ बांध कर चुपचाप वहीं खड़ा हो गया।
उसने देखा, मां के चेहरे पर विचित्र–सी गम्भीरता थी। तीन महीने उसे घर छोड़े हुए थे। परंतु इन्हीं तीन महीनों में जाने क्या हो गया था कि अपना ही घर उसे पराया लगने लगा था। उसने चारों ओर दृष्टि दौड़ा कर देखा-पाइप के पास वाली दीवार पर काईजमी थी। आंगन के जंगले के किनारे वाला सरिया टूट कर मगर के मुँह की तरह ऊपर उठ आया था। छत की मंडेर की ईंटें अभी भी टूटी हुई थीं। कमरे की खिड़की का दरवाजा आधा टूटा था। पाइप के ऊपर वाली दुछत्ती में चैले भरे थे। हां, जीने के सामने बरोठे के एक कोने में लकड़ी के बुरादे का ढेर था, जो पहले नहीं था। कुछ विशेष तो नहीं बदला था, फिर उसे अपना ही घर पराया क्यों लगने लगा था, वह सोचने लगा। शायद अधिक दिनों एक चीज को न देखने से ऐसा ही होता हो।
‘‘नीचे किरायेदार हैं क्या ?’’ उसने मां से पूछा।


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