स्वामी विवेकानन्द - नरेन्द्र कोहली Swami Vivekanand - Hindi book by - Narendra Kohli
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स्वामी विवेकानन्द

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :351
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6437
आईएसबीएन :9788123743417

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स्वामी जी ने भारतमाता को अपमानित और कलंकित करने वालों के देश में पहुंचकर उनकी जनता की पंचायत में उनकी भूल दर्शाई। अपनी मां के गौरव को स्थापित किया। यह कृति इसी सारी प्रक्रिया का विश्लेषण करती है। इसे हम उपन्यास की शैली में लिखी जीवनी कह सकते हैं.....

Swami Vivekanand

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मद्रास की एक सभा में स्वामी विवेकानन्द के परिचय में कहा गया कि वे अपना घर-परिवार, धन-सम्पत्ति, मित्र-बंधु, राग-द्वेष तथा समस्त सांसारिक कामनाएं त्याग चुके हैं। इस सर्वस्वत्यागी जीवन में यदि अब भी वे किसी से प्रेम करते हैं, तो वह भारतमाता है; और यदि उन्हें अब भी कोई दुख है, तो भारतमाता तथा उसकी संतान के अभावों और अपमान का दुख है।

स्वामीजी ने भारतमाता को अपमानित और कलंकित करने वालों के देश में पहुँचकर उनकी जनता की पंचायत में उनकी भूल दर्शाई। अपनी मां के गौरव को स्थापित किया। यह कृति इसी सारी प्रक्रिया का विश्लेषण करती है। इसे हम उपन्यास की शैली में लिखी गई जीवनी कह सकते हैं।

लेखक, नरेन्द्र कोहली, का जन्म 6 जनवरी, 1940 ई. को स्यालकोट (पंजाब) में हुआ। वे एक उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार तथा व्यंग्यकार हैं। अनेक पुरस्कार व सम्मान प्राप्त लेखक की प्रमुख रचनाएं पुनरारंभ, आतंक, साथ सहा गया दुख, महासमर, अभ्युदय, तोड़ो कारा तोड़ो, शंबूक की हत्या, एक और लाल तिकोन, पांच अब्सर्ड उपन्यास, आधुनिक लड़की की पीड़ा, जहां है धर्म वहीं है जय, आदि हैं।

एक

गंगा का जल था कि अंधकार में एक विराट अंधकार का सागर बह रहा था। तट पर एक ओर कुछ बजरे बंधे खड़े थे। उनमें से छनकर मंद सा प्रकाश बाहर आ रहा था। नरेन्द्र ने अपनी दृष्टि फेर ली। दूर धारा के मध्य एक बजरा था, जो न चल रहा था और न ही खड़ा था। वह मुग्ध दृष्टि से उसे देखता रहा और फिर जैसे उसकी आंखों में एक विराट तृष्णा झलकी।
आतुरता में उसने छलांग लगाई। जल ने फटकर उसके लिए स्थान बना दिया नरेन्द्र ने अपने कूदने के स्थान से पांच छह मीटर आगे, जल में से सिर बाहर निकाला। वह वेग से धारा के बीच वाले बजरे की ओर तैरता चला गया। अंततः वह बजरे के निकट पहुँचा। बजरे से लगा-लगा कुछ देर तैर कर जैसे उसके विषय में कुछ जानकारी प्राप्त करता रहा। फिर बजरे की पट्टी पकड़, उचककर ऊपर आ गया।
दो एक छोटे कक्षों के निर्विघ्न पार कर, नरेन्द्र केंद्र में बने मुख्य कक्ष में आ गया। मध्य भाग में मूल्यवान कालीन बाघंबर बिछाए, पद्मासन लगाए महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ध्यान कर रहे थे। नरेन्द्र उनके सम्मुख खड़ा हो गया।
‘‘महाशय !’’
महर्षि का ध्यान टूटा, ‘आँखें खुलीं। वे विचलित थे और कुछ क्षुब्ध भी। उनके सामने जैसे कोई छाया खड़ी थी। उन्होंने अपने निकट रखी लालटेन उठाई। नरेन्द्र के चेहरे पर पूरा प्रकाश पड़ा : सिर से पैर तक भीगा हुआ। कपड़े शरीर से चिपक गए थे। उसके बालों और वस्त्रों से पानी टपक रहा था और उससे फर्श पर बिछा कालीन गीला हो रहा था।
‘‘नरेन्द्रनाथ दत्त ! तुम इस समय यहां ?’’
‘‘आप मुझे जानते हैं महर्षि ?’’
‘‘ब्रह्म समाज के उत्सवों में तुम्हें गाते हुए सुना है।’’ वे बोले, ‘‘किंतु आधी रात को गंगा की मध्य धारा में खड़े बजरे में ?....तुम....’’
‘‘मुझे आपसे एक प्रश्न पूछना है महर्षि !’ रुक नहीं सका।’’
‘‘तैरकर आए हो ?’’
इस समय नौका कहां मिलती।’’
देवेन्द्रनाथ प्रच्छन्न खीज के साथ बोला, ‘‘इतना विकट है तुम्हारा प्रश्न ?’’
‘‘मेरे जीवन-मरण का प्रश्न है।’’
‘‘पूछो।’’
नरेन्द्र उनके निकट चला गया। अपनी दृष्टि से जैसे चीरते हुए बोला, ‘‘संसार का लक्ष्य है—इंद्रियभोग। धन संपत्ति, सोना चांदी, प्रासाद, हाथी घोड़े, दास दासियां, वस्त्राभूषण, भोजन व्यंजन, कामिनी कांचन....पर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है?’’
देवेन्द्रनाथ उसकी ओर देखते रहे, कुछ बोले नहीं।
‘‘क्या मानव जीवन का लक्ष्य है—इनमें लिप्त न होना, इन सबका त्याग ? विसर्जन ?’’
‘‘हां पुत्र ! ये सब बंधन हैं। वे जीवात्मा को बांधते हैं। भोग से मुक्ति ही जीवन का लक्ष्य है।’’
‘‘अर्थात् संन्यासी का जीवन। हिमालय की गुफा। वल्कल वस्त्र। सिर पर जटाएं। तपस्या। ईश्वर से प्रेम, ईश्वर की भक्ति। ईश्वर के दर्शन। ईश्वर का साक्षात्कार।....’’
‘‘हां ! ईश्वर के दर्शन। ईश्वर का साक्षात्कार।’’
‘‘आपने ईश्वर को देखा है ?’’ नरेन्द्र ने जैसे झपटकर पूछा।
देवेन्द्रनाथ उसकी ओर देखते रह गए, कोई उत्तर दे नहीं पाए।
नरेन्द्र का स्वर कुछ और प्रबल हो गया, ‘‘आपने ईश्वर का साक्षात्कार किया है ?’’
महर्षि ने उसकी ओर देखा और जैसे सायास अपने हृदय का सारा माधुर्य वाणी में उंडेला, ‘‘पुत्र ! तुम्हारे नेत्र, एक योगी के नेत्र हैं।’’
नरेन्द्र ने भी उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में निराशा और कठोरता थी।
‘‘तुम ध्यान किया करो पुत्र ! मैं तुम्हारे लिए एक महान योगी का भविष्य देख रहा हूं।’’
नरेन्द्र की आँखों की कठोरता का भाव भी सघन हो गया। उसमें निराशा उतर आई। उसने एक शब्द भी नहीं कहा और वापस जाने के लिए मुड़ गया। ‘‘सुनो पुत्र ! इस अंधेरे में गंगा में मत कूदना,’’ देवेन्द्रनाथ ने पीछे से कहा। किंतु नरेन्द्र रुका नहीं, वह चलता चला गया।
‘‘रुक जाओ। मत कूदो’’ देवेन्द्रनाथ ने पुनः कहा।
‘‘कूदकर ही खोजना होगा। खोजकर कौन कूदता है’’, नरेन्द्र ने जाते जाते कहा।

दो

रविवार के दिन प्रातः ही हेडो तालाब के किनारे, एक गोरा पादरी सड़क पर भाषण की मुद्रा में खड़ा था। वह मदारी के समान भीड़ इकट्ठी हो जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। छितरे-छितरे से लोग इधर-उधर आते जाते दिखाई पड़ रहे थे। कुछ उसके निकट आ गए थे। कुछ उत्सुकता से उसकी ओर देख रहे थे।
सहसा पादरी बोला, ‘‘हमारा ईश्वर इस सारे संसार को बनाता है। सूरज, चांद और सितारे बनाता है। इस सारी कायनात को बनाता है; और हिंदुओं के ईश्वर को बनाता है, इनका कुम्हार।’’
नरेन्द्र के पग थम गए। उसने दृष्टि उठाकर पादरी की ओर देखा।...किंतु व्यर्थ के झमेले से बचने के लिए, उसने स्वयं को बलात आगे धकेला।...पादरी के शब्द अब भी उसके कानों में पड़ रहे थे।
‘‘वह....गंदा कुम्हार अपने पैरों से रौंदकर इस गंदी मिट्टी से एक घटिया सी मूर्ति बना देता है और हिंदू उसकी पूजा करने लगते हैं। उसके सम्मुख माथा टेकने लगते हैं। वह उनका ईश्वर हो जाता है।’’
नरेन्द्र सब कुछ अनसुना कर चुपचाप आगे बढ़ जाना चाहता था; किंतु उसके पैरों में जैसे रोक ही लग गई।
‘‘हिंदू धर्म है या राक्षसों का अघोर तंत्र। पति अपनी पत्नी को प्रतिदिन पीटता है। किसी दिन अधिक क्रोध आ जाए तो उसे जीवित जला देता है। वह नहीं जलाता तो उसकी मृत्यु के बाद, उसके संबंधी उसकी पत्नी को सती बनाने के नाम पर जीवित जला देते हैं।....यह कोई धर्म है ?’’
अब नरेन्द्र स्वयं को रोक नहीं पाया। उसने पादरी को तीखी दृष्टि से देखा, पादरी को घेरकर खड़े, उसकी बातें सुन रहे लोगों पर भी घृणा की एक दृष्टि डाली और फिर भीड़ को धकियाता सा उस पादरी के सामने जा खड़ा हुआ, ‘‘क्या प्रत्येक हिंदू अपनी पत्नी को जीवित जला देता है ?’’
पादरी ने उपेक्षा से उसकी ओर देखा और उद्दंडता से कहा, ‘‘हां ! जला देता है।’’
‘‘तो फिर इतनी सारी सुहागिनें जीवित कैसे हैं ?’’ नरेन्द्र ने उसे डांटा, ‘‘सारी विधवाओं को जीवित जला दिया जाता है तो तीर्थस्थलों और मंदिरों में इतनी सारी विधवाओं की भीड़ कहां से आ जाती है ?’’
‘‘मंदिर जाता ही कौन है।’’ पादरी बोला, ‘‘हम तो यही जानते हैं कि हिंदू लोग अपनी पत्नियों को जला देते हैं।’’
‘‘कुछ मूर्खों के दुष्कर्मों के कारण तुम सारे हिंदू समाज को कलंकित कर रहे हो। जो जलाता है, उस अपराधी को दंडित न करवाकर तुम हमारे धर्म को कलंकित करने लगे हो।’’
पादरी को क्रोध आ गया, ‘‘ ऐ ऐ ज्यादा मत बोल।’’
‘‘समाज की कुप्रथाओं को धर्म पर आरोपित करना न्याय नहीं है।’’ नरेन्द्र उग्र हो उठा, ‘‘अंग्रेजों को शराब पीते देखकर हमने तो कभी ईसा को मदिरापान का समर्थक नहीं कहा....न ईसाई समाज को पियक्कड़ माना।’’
‘‘ऐ होश में आओ। तुम हमारे पैगंबर का अपमान नहीं कर सकते।’’
‘‘अपने पैगंबर का अपमान तो तुम कर रहे हो—झूठ बोलकर, अन्य धर्मों की झूठी निंदा कर।’’
‘‘यह झूठ है ?’’ पादरी चिल्लाया, ‘‘क्या तुम्हारे यहां सती प्रथा नहीं है ?’’
‘‘ऐसी कोई प्रथा होती तो प्रत्येक घर में पत्नियां, पति के शव के साथ चितारोहण कर रही होतीं।’’ नरेन्द्र बोला, ‘‘सती वह नहीं होती, जो पति के शव के साथ चितारोहण करती है.....’’
पादरी आपे से बाहर हो गया, ‘‘वही होती है। वही होती है। तुम लोग अंधविश्वासी हो। औरतों को जला देते हो। तुम्हारी माताएं अपने जीवित बच्चों को नदी में फेंक देती हैं। तुम लोग मनुष्य नहीं हो पशु हो। मिट्टी के बुतों की पूजा करते हो।.....’’
चारों ओर से लोग जमा होने लगे। कुछ धक्का मुक्का भी होने लगा। कुछ लोग बीच-बचाव में चीख चिल्ला रहे थे।
‘‘हम मूर्तिपूजा करते हैं, तो तुम क्या करते हो?’’ नरेन्द्र ने कहा, ‘‘तुम्हारे गिरजों पर क्या सलीब पर टंगी ईसा की मूर्ति नहीं होती ? माता मरियम की मूर्ति के सम्मुख सिर नहीं झुकाते तुम लोग ?’’
‘‘ऐ जुबान संभालकर। अंग्रेजों के राज्य में तुम एक पादरी का अपमान कर रहे हो।’’ पादरी ने अपना घूंसा हवा में लहराया, ‘‘जब जेल में सड़ोगे तब जानोगे कि किस से बातें कर रहे हो।’’

भीड़ में से आगे बढ़कर एक बलिष्ठ पुरुष ने पादरी का उठा हुआ हाथ थाम लिया, ‘‘सावधान ! इस बच्चे पर हाथ मत उठाना।’’
हक्का बक्का सा पादरी उस पुरुष की ओर देख ही रहा था कि एक अन्य व्यक्ति भी आगे बढ़ आया, ‘‘तर्क नहीं कर सका तो घूंसेबाजी पर उतर आया।’’
पादरी का भी एक पक्षधर सामने आ गया, ‘‘तुम चुप रहो। अधिक बकवास करोगे तो तुम्हारे ये सारे दांत तोड़ दूँगा, जो मुंह से बाहर निकल आए हैं।’
वे लोग एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हो रहे थे कि एक सिपाही आ गया, ‘‘ऐ कौन झगड़ा कर रहा है। दंगा करोगे तो मार-मार कर हड्डियां तोड़ दूंगा। अंग्रेजों का राज है। इसे नवाही राज मत समझना।’’
‘‘हम दंगा नहीं कर रहे।’’ नरेन्द्र ने कहा, ‘‘पर इन्हें भी तो संभालिए जो धार्मिक प्रवचन के नाम पर हमारे धर्म का निरंतर अपमान करते रहते हैं।’’
‘‘अच्छा समझा दूंगा इन्हें भी। तुम तो चलो। जिसे देखो, वही बड़ा विद्वान हो गया है।’’

तीन

संध्या समय विश्वनाथ घर लौटे, तो उनका शरीर थका हुआ और मन बोझिल था।
‘‘आज बहुत थक गए हो।’’ भुवनेश्वरी ने कहा, ‘‘उठो मुंह हाथ धोकर कुछ खा पी लो।
विश्वनाथ मंद स्वर में बोले, ‘‘काकी ने वकील के माध्यम से नोटिस भिजवाया है।
‘‘क्या ?’’
‘‘हम बिना किसी अधिकार के उनके पति के घर में रह रहे हैं।’’
‘‘उनके पति के घर में ?’’
‘‘वे कहती हैं कि यह भवन उनके पति का है; और हम बलपूर्वक इस पर अधिकार जमाए बैठे हैं। वे असहाय विधवा हैं, इसलिए लड़ नहीं सकतीं।...यदि हमने भवन खाली नहीं किया तो वे अदालत से प्रार्थना करेंगी कि भवन खाली कराकर, पूरी तरह से उन्हें सौंपा जाए।’
‘‘तो फिर क्या सोचा है तुमने ? काकी के विरुद्ध मुकदमा लड़ोगे ?’’
‘‘तो क्या यह मिथ्या आरोप चुपचाप स्वीकार कर लूं?’’ विश्वानाथ बोले।
‘‘नहीं ! असत्य से समझौता तो कभी नहीं!...’’ भुवनेश्वरी सहमत हो गईं, ‘‘किंतु इस घर में मेरा जीवन विषाक्त हो जाएगा। ऐसा तो काकी का स्वभाव नहीं है कि कचहरी में मुकदमा लड़ें और घर में हम से स्नेह बनाए रखें।’’
‘‘यह तो शायद काली काका के जीवन में भी संभव नहीं होता। पर....इस आरोप के रहते मैं इस भवन में नहीं रहूंगा।...अब तो अदालत से वैध अधिकार प्राप्त कर ही यहां बसूंगा।’’ विश्वानाथ कुछ आवेश में बोले, ‘‘अपने पिता का एकमात्र उत्तराधिकारी होने के कारण, यह भवन मेरा है।....सारा का सारा मेरा है।’’
‘‘इस भवन को छोड़ दोगे ?’’
‘‘न्यायालय से न्याय मिलने तक।’’
‘‘तो हम रहेंगे कहां ?’’
‘‘कहीं कोई स्थान किराए पर ले लेंगे।’’
‘‘किराए पर ?’’
‘‘हां। क्यों ?’’

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