भारत के साहित्यों की कहानी - भगवतशरण उपाध्याय Bharat Ke Shahityon Ki Kahani - Hindi book by - Bhagwat Sharan Upadhyay
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भारत के साहित्यों की कहानी

भगवतशरण उपाध्याय

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 654
आईएसबीएन :9788170284987

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भारत के साहित्यों की विस्तृत व्याख्या..

Bharat Ke Sahityon Ki Kahani a hindi book by Bhagwat Sharan Upadhyay - भारत के साहित्यों की कहानी - भगवतशरण उपाध्याय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय साहित्य

भारत में अनेक लोग हैं जो अनेक भाषाएँ बोलते हैं। प्रधान भाषाएँ तो दस-बारह ही हैं, पर बोलियाँ सैकड़ों हैं, यहाँ हम केवल तेरह भाषाओं के साहित्य की कहानी कहेंगे। इनमें से नौ उत्तर-पूर्व की भाषाएँ हिन्दी, बंगाली, गुजराती, मराठी, कश्मीरी, पंजाबी, उड़िया, असमी और उर्दू हैं और दक्षिण की चार तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम हैं। दक्षिण की भाषाएँ मूल रूप से द्रविड़ से निकली हैं पर उनमें संस्कृत के शब्द बहुत मिले हुए हैं। उत्तर की भाषाएँ संस्कृत और पुरानी जन बोलियाँ यानी प्राकृतों से निकली हैं और एक-दूसरे के बहुत समीप हैं। इन तेरहों भाषाओं में सैकड़ों वर्षों से साहित्य लिखा जाता रहा है। एक से एक विद्वान, एक से एक गायक उनमें पैदा हुए और उन्होंने बोली को साहित्य के योग्य बनाया। आज हम उनके साहित्य को बार-बार मथकर सुख और आनन्द का लाभ करते हैं; आज सैकड़ों साल बाद भी उनके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं।

 

1

हिन्दी

 

 

हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा है। उसका विस्तार बड़ा है। करीब चालीस करोड़ आदमी उसे इस देश में बोलते हैं। पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा बुंदेलखंड का एक बड़ा भाग और बिहार के रहने वाले हिन्दी या उससे मिलती जन-बोलियां बोलते हैं।
यह भूखण्ड इतना बड़ा है कि इसमें एक भाषा की निभ सकना कठिन था इसलिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बोली बदलती गई और इस प्रकार अनेक बोलियाँ बोली जाने लगीं। इनमें से प्रधान बोलियों में साहित्य भी काफी तैयार हुए हैं जिनको हिन्दी ने अपनी छत्रछाया में लिया है और जो हिन्दी के ही अंग-प्रत्यंग बन गए।

इस प्रकार जिन बोलियों में अच्छा साहित्य प्रस्तुत हुआ, उनमें प्रधान हैं—राजस्थानी, ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी और मैथिली। जिसे आज हम खड़ी बोली कहते हैं, वह पहले की दिल्ली के आसपास की जन बोली ही है। पर जैसे किसी ज़माने में ब्रजभाषा का बंगाल तक इतना बोलबाला था कि रवि बाबू सहित अनेक बंगाली कवियों ने उसमें कविता की, उसी प्रकार आज दिल्लीवर्ती उस खड़ी बोली का भी बोलबाला है और उसी की सभी हिन्दी-बोलियाँ और उनके साहित्य उसी के अन्तर्गत माने जाते हैं।

इन बोलियों का आरम्भ प्राचीन जन-बोलियों या प्राकृतों से हुआ। प्राकृत का मतलब है वह बोली, जो सहज रूप से अनायास बोली जाती है। उन्हीं को प्राकृतों ने समय आने पर साहित्यिक रूप धारण किया। उन्हीं का एक रूप अपभ्रंश कहलाया। जब साहित्य का रूप धारण की हुई प्राकृतों में जन-बोली के शब्द मिलाकर लिखते थे, तब उसे अपभ्रंश कहते थे। यही अपभ्रंश कालक्रम प्राकृतों की ही भाँति साहित्य की भाषा बन गई। हिन्दी का उदय बस वहीं से हुआ।
अपभ्रंश में लिखी अनेक कवियों की रचनाओं में ऐसी पँक्तियाँ हैं जो हिन्दी में दोहे कहलाईं। इस रूप में हिन्दी का आरम्भ शायद दसवीं सदी से पर्याप्त पहले हो गया था। हिन्दी के इतिहास को हम साधारण तौर पर तीन भागों में बाँट सकते हैं—प्राचीन काल, मध्य काल और वर्तमान काल। प्राचीन काल आठवीं सदी से तेरहवीं सदी तक है, मध्य काल उसके बाद उन्नीसवीं सदी तक, वर्तमान काल उसके बाद से आज तक।

 

1.प्राचीन काल

 

प्रचीन काल प्रायः ईसा की आठवीं सदी से भी पहले से आरम्भ होता है, जब वज्रयानी सिद्धों ने अपना ज्ञान पदों और दोहों में लिखना शुरू किया। कन्हपा, सरहपा आदि उसी परम्परा के सिद्ध हैं। दसवीं-ग्यारहवीं सदी में नाथों का सम्प्रदाय खड़ा हुआ, जिसमें सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए गुरु गोरखनाथ। सिद्धों की भाषा अधिकतर जटिल हैं और हास्य-प्रधान है।
प्रचीन काल का युग ‘वीर-गाथा’ काल भी कहलाता है।

यह युग ग्यारहवीं-बारहवीं सदी का है। इसी काल में प्रसिद्ध ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखा गया। उससे भी पहले पृथ्वीराज के दादा बीसलदेव का चरित्र उसी वीर-गाथा-शैली में नरपति नाल्ह ने गाया था। बीसलदेव अजमेर का चौहान राजा था। पृथ्वीराज दिल्ली और अजमेर का राजा था और उसका दरबारी कवि चन्दवरदायी और उसके बेटे जल्हण ने ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखा। परन्तु जो रासो आज हमें मिलता है, वह उतना पुराना नहीं है और आज से केवल चार सौ वर्ष प्राचीन जान पड़ता है। उस काल का सबसे प्रबल राज दरबार कन्नौज के गहड़वाल राजा जयचंद का था। उसके दरबार में मधुहर और भट्ट केदार भाषा के कवि थे परन्तु उनका लिखा हुआ आज कुछ भी प्राप्त नहीं है। चन्देल राजाओं के महोबा के दरबार में जगनिक नाम के कवि के होने की बात कही जाती है। उसके बाद शायद ‘आल्हाखण्ड’ के नाम से जन-बोली में उस काल की वीर गाथा गाई। पर जो आज ‘आल्हाखण्ड’ मिलता है वह तब का नहीं माना जा सकता। इस वीरगाथा साहित्य को, जो अधिकतर, वीरों के यश को अमर करने के लिए लिखा गया था, ‘चारण काव्य’ भी कहते हैं क्योंकि उसको दरबार में या लड़ाई के मैदान में या लोगों की बैठक में चारण या भाँड़ लोग ही गाया करते थे।

 

2 मध्य काल

 

मध्य काल का आरम्भ भक्ति-सम्प्रदाय के प्रचार के साथ हुआ। दक्षिण में रामानुज, निम्बार्क आदि ने जिस भक्ति-परम्परा को साधा, वह उत्तर में भी रामानन्द और चैतन्य महाप्रभु के प्रचार से फैली। बंगाल में जयदेव ने राधाकृष्ण का रास संस्कृत काव्य ‘गीत-गोविन्द’ में गाया। मैथिल-कोकिल विद्यापति ने अपनी बोली में उन्हीं का रास मुखरित किया।
मध्य काल की खड़ी बोली का आरम्भ मलिक खुसरो ने किया। उसकी पहेलियाँ बड़ी साफ-सुथरी हैं और उनमें उसने फारसी और हिन्दी-मिश्रित भाषा का सुन्दर प्रयोग किया है। उसने भारतीय संगीत का भी बड़ा विकास किया। कहते हैं कि सितार और तबला उसी के बनाए हुए हैं।

मीरा ने भी अपने पदों में भक्ति की अद्भुत धारा बहाई। राजा की लड़की थी मीरा, पर कुल की मर्यादा से अधिक उसने श्रीकृष्ण-प्रेम को महत्त्व दिया। उसके पद ब्रजभाषा में, राजस्थानी और दुराती तीनों भाषाओं में अपनाए गए। सूरदास भी उसी भक्त-परम्परा में हुए। उनके पद मिठास और कविता की सुगढ़ता में अपना सानी नहीं रखते। ब्रजभाषा में उनके पदों से बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है। कृष्ण के बालपन का जो रूप सूर ने खींचा है वह अन्यत्र नहीं मिलता। सूरदास के निर्माण में उनके गुरु बल्लभ का बहुत योगदान है। रामानन्दी परम्परा के सबसे महान कवि गोस्वामी तुलसीदास हुए। समाज को शास्त्र की मर्यादा से गिराने वाले औघड़ों और कपालिकों के जवाब में उन्होंने अपना महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ लिखा, जिसकी गिनती संसार के सर्वोत्तम काव्य में की जाती है। समाज में एक-दूसरे के प्रति कर्त्तव्य, पारिवारिक सम्बन्ध आदि उसमें भी कुछ उतर आया; और जन-जन की बोली में जन-जन को छूकर उस काव्य ने सुरसरि की धारा की भाँति सबको पवित्र कर दिया।

भक्तों की एक सन्त-परम्परा भी थी जो पहले से चली आती प्रचीन सिद्ध गुरुओं से भी कुछ अंश में जुड़ी थी। उस पर सूफी धर्म का प्रभाव पड़ा, जिसमें प्रेम और एकता का उपदेश किया। कबीर उसी परम्परा के सन्त कवि थे। जिन्होंने हिन्दू-मुसलमान, मन्दिर-मस्जिद आदि की बुराइयों को बड़े साहस के साथ ललकारा। जायसी ने भी ‘पद्मावत’ उसी परम्परा में लिखा, जिसमें सूफी और उपनिषद् के विचारों को पद्मिनी के रूपक में रखा गया। दादू, मलूकदास आदि भी सन्त कवि ही थे। इनके प्रचार से समाज के भेद-भाव में कमी आई।

मध्य काल का पिछला युग रीति-काल श्रृंगार-काल कहलाता है। अब अधिकतर कवि जयपुर, ओड़छा आदि के दरबारों में रहने लगे। इस काल नायिकाओं के नखशिख-सौन्दर्य का वर्णन, नायिका-भेद और अलंकार कवियों के आकर्षण बने और उन्होंने कहीं व्यख्या के रूप में उस सम्बन्ध में कविता रची। ओड़छा के कवि केशवदास ने इसी रीति-परम्परा में अपनी ‘कविप्रिया’ लिखी। जयपुर के कवि बिहारी ने तभी कुछ ही काल बाद अपनी ‘सतसई’ लिखी। देव, सेनापति, घनानन्द और पद्माकर भी इसी परम्परा के कवि थे और इसी परम्परा के मतिराम और भूषण भी थे। पर भूषण ने वीर-रस में हिन्दू राष्ट्रीयता का स्वर भरा।


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