बहनजी - अजय बोस Behanji - Hindi book by - Ajay Bose
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जीवनी/आत्मकथा >> बहनजी

बहनजी

अजय बोस

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :279
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6556
आईएसबीएन :978-81-8143-899

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यह पुस्तक मूल रूप से मायावती की राजनीतिक जीवनी है। तथ्यों पर आधारित, दक्षता से लिखी, निष्पक्ष एवं रोचक

Bahanji - A Hindi Book - by Ajay Bos

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मायावती की जीवन-कथा में कई आयाम हैं। यह एक साधारण-सी दलित स्त्री की निजी ज़िन्दगी की अद्भुत दास्तान है। एक ऐसी स्त्री जिसे भारत के चोटी के सशक्त राजनेताओं के बीच अपनी जगह बनाने की महत्वाकांक्षा ने लगातार प्रेरित किया। सत्ता की दौड़ में राजनीति के मैदान के खिलाड़ी-राजनेता परम्परा से जो खेल खेलते चले आ रहे थे, मायावती ने उसे वस्तुत: नया रूप दिया। राजनीति और विचारधारा की दृष्टि से उनके मन में बराबर जो दुविधा बनी रहती थी, अगर कुल-मिला कर उसके इतने शानदार नतीजे न निकले होते तो उनकी स्थिति हास्यापद हो जाती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मायावती का उदय उस व्यापक सामाजिक उथल-पुथल को प्रतिबिम्बित करता है जिसने भारतीय समाज में सदियों से चली आती रुढ़िवादी जाति-व्यवस्था का सफ़ाया कर दिया। यही कारण है कि अपने समय के नरेन्द्र मोदी, जयललिता और ममता बैनर्जी जैसे तपे हुए राजनेताओं की तुलना में मायावती का अध्ययन ज़्यादा प्रासंगिक मालूम होता है।

उत्तर प्रदेश में जब तीसरी बार मायावती शासन ध्वस्त हुआ, उसके कुछ ही समय बाद मैंने अपनी इस पुस्तक के लिए सामग्री जुटानी शुरू की थी। राजनीति, नौकरशाही और मीडिया में मेरे मित्रों को लगा कि ऐसा करके मैं अपना समय बर्बाद करूँगा। कुछ लोगों को यकीन था कि ताज कॉरिडार विवाद में हारी हुई मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जो व्यू-रचना की गयी है, वह उनके राजनीति जीवन का अन्त कर देगी। कुछ और लोगों का कहना था कि 2003 में कांशीराम को जिस आघात ने कमज़ोर कर दिया था, उसके बाद बसपा तेज़ी से नीचे लुढ़क रही थी और कुछ ऐसे लोग भी थे जो इस बात से विस्मित थे कि मैंने ‘ऐसी असभ्य, भ्रष्ट और पूरी तरह बेईमान’ नेता की जीवनी लिख कर उसे सम्मान देने के लिए चुना है। कुछ ही समय पहले तक ऐसी बातें करने वाले लोगों ता एक बड़ा वर्ग इस दलित तेजस्वी नेता के बारे में इस राय से सहमत था।

मुझे इस बात पर ताज्जुब हो रहा है कि 2003 में जब से उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में बसपा की भारी जीत ने उन्हें भारत के सबसे बड़े राज्य की निर्विवाद मलिका बना दिया है, यही लोग मायावती की तारीफ़ों के पुल बाँध कर उन्हें आसमान पर उठाये हैं। अचानक वे देश की सबसे सम्भावनापूर्ण राजनेता हो गयी हैं। कुछ लोग यहाँ तक भविष्यवाणी कर रहे हैं कि वे अगली प्रधानमन्त्री होंगी। जहाँ तक मेरी किताब का सवाल है अब इतना अच्छा विषय, और उसके प्रकाशन के लिए ऐसा बेहतरीन मौका चुनने के लिए मुझ पर तारीफ़ों की बौछार हो रही है।
पहले मायावती का मज़ाक उड़ाने और अब ऐसी बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ करने से सिर्फ़ एक ऐसे नेता के बारे में अधूरी समझदारी का पता चलता है जो भारत में राजनीतिक विरोधाभास को उसके चरम रूप में प्रकट करती है। देश की सबसे सफल राजनेता के रूप में जो बाबा साहब अम्बेडकर तक के ऊपर छा गयी है। उस मायावती ने एक ऐसे समुदाय को अभूतपूर्व राजनीतिक चेहरा और हैसियत दी है जो कई शताब्दियों से सामाजिक पूर्वाग्रह के नीचे पिसता रहा है। इसके साथ ही मायावती के काम करने के तानाशाही तरीके ने, पूरे राजनीतिक परिदृश्य के यहाँ-से-वहाँ तक संबंधों में कटुता पैदा करने और पैसे के निर्भीक प्रदर्शन ने उन्हें आज भारत की सबसे विवादास्पद राजनेता भी बनवा दिया है। वे खुद और उनकी निराली राजनीति साधारण आदमी के लिए ही नहीं, राजनीति के बड़े-बड़े पण्डितों के लिए एक पहेली है।
प्रसिद्धि पाने के बाद मायावती को तरह-तरह के विवादों और अफ़वाहों ने जिस तरह घेर लिया है, वह किसी भी पत्रकार को आकर्षित करने के लिए काफ़ी है। शुरू में बाबा कांशीराम ने राजनीतिक दृष्टि से नौसिखिया, गदराये बदन की एक युवा लड़की को सार्वजनिक क्षेत्र में अपने वारिस के रूप में परिचित कराया तो मीडिया में, विशेषकर ऊँची जातिवाले हिन्दी प्रेस के गलियारे में, उनके आपसी संबंधों के बारे में अश्लील, कभी-कभी खुले-आम बेहूदी कहानियाँ प्रचारित होने लगीं। काफ़ी लम्बे समय तक कोई पत्रकार मायावती को गम्भीर राजनैतिक नेता नहीं मनाता था, जबकि दलितों के मसीहों के रूप में कांशीराम की भूमिका को स्वीकार किया जा चुका था। बाद में जब उन्होंने लखनऊ के सिंहासन को बार-बार छीनने में अद्भुत दृढ़ता का परिचय दिया, तब भी मीड़िया ने अपना ध्यान उनके हीरों और भवनों पर केन्द्रित रखा और उन्हें एक ऐसी चंचल-चित्त, ओछी नवागन्तुका के रूप में देखा जो दरवाज़ा तोड़ कर राजनीति की दुनिया में घुस आयी हो। मायावती ने जब अपने बल-बूते पर विधानसभा में असम्भव-से दिखाई पड़ने वाले बहुमत को हासिल करके यहाँ-से-वहाँ तक पत्रकारों को चौंका दिया, तभी पत्रकारों ने उन्हें नीचा दिखाना छोड़ा। अब स्थिति यह है कि अपने पिछले व्यवहार की क्षतिपूर्ति के रूप में प्रिंट मीडिया और टेलीविजन में तरह-तरह के टिप्पणीकार इस महिला की वास्तविक ज़िन्दगी से कहीं बड़ी तस्वीरें पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
शायद अपनी ज़िन्दगी की विस्मयकारी दास्तान और राजनीति के बारे में पत्रकारों के कई ऐसे सतही रवैये ने शुरू से ही मायावती को बहुत चौकन्ना बना दिया। मायावती की जीवनी लिखने के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें महज़ नेता ही नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के समझना ज़रूरी है। मायावती के राजीनीतिक जीवन और दलितों पर उनके प्रभाव के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, मगर एक व्यक्ति के रूप में मायावती के बारे में जानकारी लगभग नहीं के बराबर है। मायावती ने मनमौजी स्वाभाव और पसन्द के बारे में कुछ फुटकर किस्सों के अलावा उनकी बीती हुई और वर्तमान निजी ज़िन्दगी पर अब भी रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है। देश में किसी दूसरे राजनेता के विपरीत मायावती ने पत्रकारों से बच कर रहने को अपनी आदत बना लिया है। गिने-चुने साक्षात्कारों और कभी-कभी होने वाले पत्रकार-सम्मेलनों में मायावती अपने निजी व्यक्तित्व के बारे में कुछ कहने से सख़्ती से इनकार करती रही हैं।
उदाहरण के लिए उनके बचपन, पारिवारिक संबंधों, मित्रों और प्रेमियों के बारे में जानकारी नहीं के बराबर है। हम सिर्फ़ उतना ही जानते हैं जितने की जानकारी हमें उन कुछ बहुत साफ़-सुथरी बना कर पेश की गयी झलकियों में मिलती है जिन्हें मायावती ने अपनी आत्मकथा में जगह दी है। ऐसा लगता है कि उनके जीवन का एकमात्र गहरा निजी संबंध अपने निर्माता काशीराम के साथ था जिसे लगातार उनके राजनीतिक जीवन को समझने के लिए प्रस्तुत किया गया है। अक्सर तूफ़ानी और प्रचण्ड हो जाने वाले इस संबंध का, जिससे वे स्पष्ट रूप से अभिभूत थीं, निश्चित रूप क्या था, यह आज भी रहस्य ही बना हुआ है। गरचे ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्हें उनको करीब से देखने का मौका मिला है। उनका कहना है कि दोनों के बीच इस निजी रिश्ते के अनेक आयाम थे।
यह पुस्तक मूल रूप से उनकी राजनीतिक जीवनी है। यह मायावती के दिलो-दिमाग़ के अन्तरंग के उद्घाटन का कोई दावा नहीं करती। उनके साथ इन वर्षों में मेरी मुलाकातें एक पत्रकार की हैसियत से होती रही हैं, विश्वासपात्र के रूप में नहीं, पर इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उनके निकटतम सहयोगी भी वास्तविक मायावती को जानने का दावा नहीं कर सकते। वे उनके गिने-चुने भारतीय नेताओं में से है जो अपने सहायकों से घनिष्ठता बढ़ाने के बजाय काम से संबंधित औपचारिक संबंध रखना पसन्द करती हैं। उदाहरण के लिए उनके एक निकटतम सहयोगी ने अभी तक उनसे अपनी पत्नी का परिचय नहीं कराया है और उसे लगता है कि ऐसा करने की उससे अपेक्षा भी नहीं है।
मायावती की निजी ज़िन्दगी के बारे में बहुत जानकारी न हो, पर उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उन तक पहुँचना मुश्किल नहीं होता। पर जिन राजनेताओं और अफ़सरों ने उनके निकट रह कर उनके साथ काम किया है, मायावती के बारे में लोगों की अलग-अलग राय से उलझन पैदा होती है। ज़ाहिर है, इन पर नेता के साथ उनके निजी संबंधों का रंग चढ़ा है। जो लोग उनके विरुद्ध हो गये हैं, वे उनकी चर्चा एक ओछी, असुरक्षित और दुश्मनी निकालने वाली ऐसी महिला के रूप में करते हैं, जिसके पास जनता का नेता होने के लिए न दूरदर्शिता है, न संगठन का कौशल। वे मायावती को कांशीराम की सृष्टि के रूप में देखते हैं, जो उनके काम को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह आयोग्य है, पर इन लोगों के अनुसार उसने उत्तर प्रदेश की दलितों के बीच किसी दूसरे नेता का अभाव है। अगर कोई उनके इन पहले के सहयोगियों की बात पर विश्वास करे जो अब उनके विरोधी हो गये हैं तो अब जो सफलता उन्हें मिली है, वह सिर्फ भाग्य का खेल है और समय अब दूर नहीं है जब वे राजनीतिक गुमनामी में खो जायेंगी।
जो लोग उनके साथ हैं, उन्हें मायावती के नेतृत्व पर अटूट विश्वास है; पर जो लोग उनके प्रति वफ़ादार हैं, उनके अलावा भी काफ़ी लोग ऐसे हैं, जो मायावती के खिलाफ़ निन्दा के इस कोरस में शामिल होने को राज़ी नहीं हैं। इनमें वे सरकारी अफ़सर भी शामिल हैं जो आपसी निष्ठा और कार्यकुशलता के लिए प्रसिद्ध हैं। वे मानते हैं कि चार बार राज्य में मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी निभाने वाली यह तेजस्वी दलित महिला भले ही परम्परा-मुक्त ढंग से आचरण करती रही हो, पर वह अपने अनेक पूर्ववर्तियों से ज़्यादा भ्रष्ट और आयोग्य नहीं है। वास्तव में उनका कहना है कि राज्य की नौकरशाही के साथ काम करने की मुँहफट और स्पष्ट तरीका, राजनीतिक दृष्टि से ज़्यादा अनुभवी मुख्यमंत्रियों के भ्रष्ट और कपटी तौर-तरीकों की तुलना में बेहतर है।
फिर भी मायावती के निन्दकों-समर्थकों के साथ ही वे सभी लोग, जो तटस्थ माने जाते हैं, उनके व्यक्तित्व की कुछ सामान्य विशेषताओं के बारे में एकमत हैं। ये लोग सर्वसम्मति से उन्हें ऐसा अनगढ़ और तत्काल प्रतिक्रिया करने वाला राजनेता मानते हैं जो बहुत पहले अपनी ये योजनाएँ बना कर काम करने के बजाय चलते-फिरते अपनी रणनीति बनाता है। लखनऊ के एक मँजे हुए पत्रकार के शब्दों में : ‘‘वे एक ऐसी सीधी रेखा के बारे में सोचती हैं जो उसकी नज़र में ‘अ’ से ‘ब’ तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता साबित हो।’’ एक बात पर सबकी सहमति है कि इस दलित नेता का रवैया बिलकुल एकाग्र रहता है। इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे राजनीतिक परम्पराओं या विचारधारात्मक सिद्धान्तों की बिलकुल परवाह नहीं करतीं।
मायावती की जगह ठीक-ठीक राजनीतिक मुख्यधारा में नहीं है, यह बात इससे उजागर होती है कि वे साम्प्रदायिकता बनाम धर्म-निरपेक्षता की बहस को बड़ी दृढ़ता से पूरी तरह ख़ारिज करती हैं, जबकि यह बहस लगभग पीछे दो दशकों से भारतीय राजनीति पर छायी रही है। उन्होंने एक के बाद एक, तीन बार गठबन्धन सरकार बनाने के लिए भाजपा से इस हद तक मेल-जोल बढ़ाया कि वे गुजरात के दंगों के कुछ ही दिन बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी अभियान में शामिल होने पहुँच गयीं। दूसरी तरफ़ जब भाजपा से मायावती का स्वार्थ नहीं सधा तो वे उसकी सबसे तीखी आलोचक हो गयीं। ताज्जुब नहीं कि दक्षिणपन्थी हिन्दू, कम्यूनिस्ट और कांग्रेसी सभी इस बात से परेशान हैं। कि वे मायावती को ठेठ राजनेताओं के रुढ़िबद्ध ढाँचें में रख कर उनके व्यवहार का अन्दाज़ा नहीं लगा सकते। वे अपनी हरकतों से उन्हें लगातार चौंका कर असमंजस में डालती रही हैं। दक्षिण और वाम, दोनों पक्षों की विचारधारा के समर्थन से वे जिस तरह इनकार करती रही हैं, उसे बहुत-से लोग स्थूल अवसरवादिता कहेंगे। लेकिन मायावती का यह आत्म-केन्द्रित, लेकिन एकदम पारदर्शी रवैया उन पार्टियों की तुलना में कहीं अधिक ईमानदार है जिनमें राजनीतिक एजेंडा इतना ही स्वार्थनिष्ठ होता है, पर लागू पूरे आडम्बर के साथ किया जाता है।

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