भारत के नगरों की कहानी - भगवतशरण उपाध्याय Bharat ke Nagaro Ki Kahani - Hindi book by - Bhagwat Sharan Upadhyay
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भारत के नगरों की कहानी

भगवतशरण उपाध्याय

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :72
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 657
आईएसबीएन :9788170285939

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भारत के प्रमुख नगरों का वर्णन...

Bharat ke Nagaro Ki Kahani a hindi book by Bhagwat Sharan Upadhyay -भारत के नगरों की कहानी - भगवतशरण उपाध्याय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत एक महान् देश है, जिसके संबंध में परिचय देने वाली यह पुस्तकमाला भारत के सभी पक्षों का पूरा विवरण देती है। प्रत्येक पृष्ठ पर दो रंग में कलापूर्ण चित्र, सुगम भाषा और प्रामाणिक तथ्य। इस पुस्तकमाला के लेखक हैं, प्रसिद्ध साहित्यकार, इतिहास और कला के मर्मज्ञ डॉ. भगवतशरण उपाध्याय।

 

काशी

पतितपावनी गंगा के तट पर बसी काशी बड़ी पुरानी नगरी है। इतने प्राचीन नगर संसार में बहुत नहीं हैं। आज से हजारों बरस पहले नाटे कद के साँवले लोगों ने इस नगर की नींव डाली थी। तभी यहाँ कपड़े और चाँदी का व्यापार शुरू हुआ।
वे नाटे कद के साँवले लोग शान्ति और प्रेम के पुजारी थे। किसी से लड़ते-झगड़ते नहीं थे, अपने खेत जोतते थे, माल बेचते खरीदते थे। छोटी-छोटी नावों में माल भर-भर कर गंगा की राह दूर तक वे चले जाते, बैलगाड़ियों में माल लादकर देश-देश की यात्रा करते थे।
एक दिन दूर पश्चिम से आकर ऊँचे कद के गोरे लोगों ने उनकी नगरी छीन ली। वे ऊँचे लोग घोड़ों पर चढ़कर आए थे। उनके पास तीर कमान थे, भाले- बरछे थे। फरसे और ढाल थे। बचाव के लिए टोप और कवच थे। बड़े लड़ाके थे वे, लड़ाई ही उनका पेशा था। उनके घर-द्वार न थे, धन-दौलत न थी। घोड़े की पीठ ही उनका घर-द्वार था, लड़ने के हथियार ही उनकी धन-दौलत थे। वे भला हारते कैसे !
उनके पास भला हारने को था ही क्या ! और काशी उन्होंने अनायास जीत ली। परकोटों को तोड़कर वे नगर के भीतर घुस गए। नगर के मालिक बन गए। वे अपने को ‘आर्य’ कहते थे, श्रेष्ठ महान।
आर्यों की अपनी जातियाँ थीं, अपने कुल घराने थे। एक-एक जाति का एक-एक राजा था। उनका एक राजघराना तब काशी में भी आ जमा। आर्य तब इस देश को चारों ओर से जीतते जा रहे थे। उन्होंने पश्चिम में अनेक राज्य कायम किए। काशी के पास ही अयोध्या में भी तभी उनका राजकुल बसा। उसे राजा इक्ष्वाकु का कुल कहते थे, सूर्यवंश, जिनके पुरखे सूर्य की सन्तान माने जाते थे। काशी में चन्द्रवंश की प्रतिष्ठा हुई। सैकड़ों बरस उस नगर पर भरत राजकुल के चन्द्रवंशी राजा राज करते रहे।

काशी में आर्यों के आने के बाद नई चहल-पहल शुरू हुई। बाबा विश्वनाथ (शिव) की पूजा तो होती ही रही, साथ ही यज्ञ हवन भी होने लगे, भाँति-भाँति के जानवर भी बलि दिए जाने लगे। नए प्रकार की पूजा शुरू करने वाले इस नगर के नए राजा थे, बृहद्रथ- कुल के।
काशी तब आर्यों के पूर्वी नगरों में से थी, पूर्व में उनके राज की सीमा। उससे परे पूर्व का देश अपवित्र माना जाता था। आर्य लोग मन्त्र और झाड़-फूँक में से अपनी रोग व्याधि उसी पूर्व के देश की ओर भगाते थे।

आर्य लोगों के राजा कन्या के विवाह के लिए स्वयंवर किया करते थे। अनेक राजा बन ठनकर आते और राज्य कन्या जिसे चाहती उसे चुन लेती और उसी से उसका ब्याह हो जाता। यही स्वयंवर था, क्योंकि इसमें लड़की स्वयं अपना वर चुनती थी। कभी-कभी स्वयंवरों में वीरता परखने का भी प्रबन्ध होता था, रथ-दौड़ या घुड़-दौड़ होती और जो अपना रथ या घोड़ा सबसे आगे निकाल ले जाता, वही लड़की को ब्याहता। बड़े धनुष की डोरी चढ़ानी होती, ऊपर नाचती मछली को नीचे तेल में देखकर बाण से बींधना होता। इसी प्रकार के एक स्वयंवर में पाण्डवों कौरवों के पितामह भीष्म ने काशी नगरी की तीन लड़कियों का अपहरण किया था।

महाभारत की लड़ाई के पहले मगध में राजा जरासन्ध ने बड़ा राज्य कामय किया। बड़े राज्य को साम्राज्य कहते थे। भारत का वह पहला साम्राज्य था। काशी भी उसी साम्राज्य में समा गई। महाभारत के नरसंहार में फिर जरासन्ध और उसका पुत्र सहदेव दोनों जूझ गए। कुछ काल बाद जब गंगा की बाढ़ ने पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर को डुबा दिया, तब पाण्डव इलाहाबाद जिले में यमुना के तीर कौशाम्बी में नई राजधानी बनाकर बस गए। उनका राज्य ‘वत्स’ कहलाया और काशी पर मगध की जगह अब वत्स का अधिकार हुआ।

फिर ब्रह्मदत्त नाम के राजकुल का काशी पर अधिकार हुआ। उस कुल के राजा बड़े पंडित हुए। असल में उस काल में ज्ञान और पंडिताई ब्राह्मणों से क्षत्रियों के हाथ में आ गई थी। ब्राह्मण पंडित ज्यादातर पुरोहिताई करते थे और ज्ञान का उपार्जन क्षत्रिय राजा लोग करने लगे थे। उस काल में ऐसा विचारवान पंडित पंजाब में कैकेय राजकुल में राजा अश्वपति था। तभी गंगा-यमुना के दोआबे में राज करने वाले पांचालों में राजा प्रवहण जैबलि ने भी अपने ज्ञान का जादू चलाया। तभी जनकपुर, मिथिला में विदेहों का राजाजनक हुआ, जिसके दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी महर्षि और गार्गी जैसी पंडिता नारियां शास्त्रार्थ करती थीं; तभी काशी नगरी का राजा अजातशत्रु हुआ जो आत्मा और परमात्मा के ज्ञान में अनुपम था। ब्रह्म और जीवन के सम्बन्ध पर, जन्म और मृत्यु पर, लोक-परलोक पर तब देश में विचार हो रहे थे। इन विचारों को ‘उपनिषद्’ कहते हैं। इसी से यह काल भी उपनिषद्-काल कहलाता है।

तब काशी का भी उपनिषद्-काल था।
युग अब बदल गया था, जैसे ब्राह्मण की जगह क्षत्रिय महान माने गए, वैसे ही कर्मकाण्ड, पुरोहिताई और पशुबलि की जगह अमर आत्मा और जन्म-मरण पर विचार होने लगे। अहिंसा का बोलबाला हुआ। बड़े-बड़े राजकुमार अपना भोग-विलास, राज-पाट छोड़ सत्य की खोज में संन्यासी हो गए। वैशाली मिथिला के लिच्छवियों में इसी प्रकार के साधु वर्धमान महावीर हुए, कपिलवस्तु के शाक्यों में गौतम बुद्ध। उन्हीं दिनों काशी का राजा अश्वसेन हुआ। पार्श्वनाथ उन्हीं का बेटा था, बड़ा विचारवान और ज्ञानी। उसने राजपाट छोड़ जनता के कल्याण के लिए चोरी, झूठ हिंसा और धन के विरुद्ध प्रचार किया। उसी के विचारों का प्रचार कर महावीर ने जैन धर्म की बुनियाद डाली।

उन दिनों भारत में चार राज्य प्रबल हो रहे थे जो एक-दूसरे को जीतने के लिए, आपस में बराबर लड़ते रहते थे। ये थे मगध (दक्षिण बिहार), कोसल, अवध, वत्स और उज्जयिनी। कभी काशी वत्सों के हाथ में जाती, कभी मगध के और कभी कोसल के। महावीर- बुद्ध से कुछ काल पहले, पार्श्वनाथ से कुछ ही बाद कोसल-श्रावस्ती के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज में मिला लिया।
उसी कुल के राजा महाकोशल ने तब अपनी बेटी कोसल देवी का मगध के राजा बिम्बसार से ब्याह कर ‘चूड़ास्नान’ (दहेज- जेबखर्च) के रूप में काशी की सालाना आमदनी एक लाख हर साल अपनी बेटी-दामाद को देना शुरू कर दिया और इस तरह काशी मगध के हिस्से में जा पड़ी। कहाँ तो काशी पवित्र और मगध अपवित्र कहलाते थे, अब पवित्र काशी पर अपवित्र मगध का चंगुल आ पड़ा।

पर काशी के भाग्य का निपटारा अभी नहीं हुआ था। राजाओं की छीना-झपटी में आज वह एक के हाथ में थी, कल दूसरे के। राज के लोभ से मगध के राजा बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने पिता को भूखों मारकर गद्दी छीन ली। तब विधवा बहन कोसलदेवी के दुःख से दुःखी उसके भाई कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी की आमदनी अजातशत्रु को देना बन्द कर दिया। फिर तो मगध और कोसल में समर छिड़ गया।

कभी काशी कोसल के, कभी मगध के हाथ लगी। अन्त में अजातशत्रु जीता और काशी उसके बढ़ते हुए साम्राज्य में समा गई। कुछ काल बाद मगध की राजधानी राजगृह से उठकर गंगा और सोन के तीर पाटलिपुत्र (पटना) में जा बसी, पर काशी का भाग्य न फिरा।

गौतम तप के बाद गया में ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध बन गए और काशी के पास हिरनों के जंगल सारनाथ में आए। वहाँ तप के समय उनके साथी पाँच साधु थे, जो बुद्ध के तप छोड़ देने से नाराज होकर सारनाथ चले आए थे; उन्हीं को सबसे पहले अपने ज्ञान का उपदेश करने के विचार से बुद्ध ने पहले उपदेश किए। काशी में ही पहली बार उन्होंने अपने धर्म के चक्के या चक्र को घुमाया। उसी चक्के का रूप हमारे झंडे पर बना है।

उसी सारनाथ में अशोक ने अपने स्तूप और खम्भे खड़े किए। खम्भे के सिंह भी हमारे झंडे का गौरव हैं। तब से देश-विदेश से बौद्ध धर्म के पंडित बराबर सारनाथ काशी आते रहे हैं।

मगध के राजकुल बदले। शिशुनागों के बाद नन्द आए, नन्दों के बाद मौर्य, मौर्यों के बाद शुंग और शुंगों के बाद कण्व। यानी क्षत्रियों के बाद उनका नाश करने वाले शूद्र, फिर क्षत्रिय, तब ब्राह्मण, पर काशी की काया मगध से बंधी रही।
नन्दों के शूद्र-शासन में काशी की गति बिगड़ चली, पर ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने उसे सहारा दिया। फिर मौर्यों के अधिकार में आकर तो उसे वह देखना पड़ा जो उसने कभी न देखा था। अशोक ने अपने अहिंसा के उत्साह में पशु-वध बन्द कर दिया। था तो वह ठीक ही, पर उसके ब्राह्मणों की पुरोहिताई बन्द हो गई, यज्ञ-हवन बन्द हो गए और ब्राह्मणों और पुराने विचारों की हिन्दू जनता में बड़ा असन्तोष फैला।


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