आपका जीवन आपके हाथों में - कृष्ण चोपड़ा Aapka Jeevan Aapke Hatho Me - Hindi book by - Krishna Chopra
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आपका जीवन आपके हाथों में

कृष्ण चोपड़ा

प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :306
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6628
आईएसबीएन :81-7621-038-2

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इस पुस्तक का यह प्रज्ञान वैसे सभी लोगों का जीवन बदल सकेगा, जो इसे पढ़ेंगे और यहां वर्णित अंतर्ज्ञान को रचनांतरित करेंगे...

Aapka Jivan Aapke Hathon Mein - A Hindi Book - by - Krishna Chopra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह पुस्तक प्रज्ञान से परिपूर्ण है, जिसे मेरे पिता ने मुझे और मेरे भाई को बढ़ती आयु के साथ-साथ प्रदान की, और जो मेरे पिता ने जीवन के अपने अनुभवों से खुद भी सीखा।
इस पुस्तक का यह प्रज्ञान वैसे सभी लोगों का जीवन बदल सकेगा, जो इसे पढ़ेंगे और यहां वर्णित अंतर्ज्ञान को रचनांतरित करेंगे। वे अपनी सफलता, समृद्धि की पूरी जिम्मेदारी उठाने की योग्यता विकसित कर सकेंगे और अपने जीवन को अपने हाथों में रखने का अर्थ भी समझ सकेंगे।

हमारा जीवन हमारे अपने हाथों में है और आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन की वैसी ही देखभाल करें जैसी उसे चाहिए। जीवन को बदल सकने वाली इस पुस्तक में डॉ. कृष्ण चोपड़ा ने एक डॉक्टर के रूप में अपने अनुभवों और प्राचीन भारतीय प्रज्ञान को, मस्तिष्क और शरीर को प्रत्यावर्तित करने के साथ ही आत्मशक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की व्यावहारिक सलाहों के रूप में प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक ‘आपका जीवन आपके हाथों में’ निम्न विषयों पर आपका मार्गदर्शन कर सकेगी।

1. दबाव और तनाव की विश्वव्यापी महामारी और उससे जूझने के बारे में
2. एक बेहतर जीवन-शैली के सहारे हृदय रोग, कैंसर जैसे अन्य रोगों से अपनी हिफाजत करने के बारे में
3. लंबे जीवन के लिए उचित खान-पान के फायदे
4. सकारात्मक सोच, ध्यान-साधना और प्रार्थना की असीम शक्ति
5. एक आध्यात्मिक आयाम को अपने दैनिक जीवन में कैसे शामिल करें।

डॉ. चोपड़ा ने अपने परिवार में प्रज्ञता के बारे में बताया है, जिसने उनके पुत्र और विश्व-प्रसिद्ध स्वास्थ्य लेखक डॉ. दीपक चोपड़ा को प्रभावित किया। उपाख्यान की गुंजित संपदा के साथ भारत की समृद्धि और आधुनिक विज्ञान के आधार पर उन्होंने अपनी परिचर्चाओं में इसकी व्याख्या की है। हम में से जो लोग अपने जीवन को संभालकर रखना चाहते हों और परिपूर्ण उत्तम स्वास्थ्य के लिए अपनी क्षमताओं को जानना-समझना चाहते हों-वैसे लोगों के लिए डॉ. कृष्ण चोपड़ा इस पुस्तक के जरिए राह दिखाने का कार्य कर रहे हैं।

भूमिका

डॉ.दीपक चोपड़ा

अपने पिताजी डॉ. कृष्ण चोपड़ा के विषय में सबसे पुरानी यादों में से एक याद है—मुम्बई बंदरगाह पर सूर्यास्त के समय पानी के जहाज पर उन्हें इंग्लैंड जाते हुए देखने का दृश्य। मेरा छोटा भाई संजीव उस समय तीन वर्ष का था और मैं छः का। हम दोनों अपने-अपने खिलौने पकड़े हुए थे। जलपोत जाते-जाते क्षितिज में छिप गया था। पिताजी उस समय हृदय रोग का इलाज करने की विशेष पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड गये थे। अपनी परीक्षा पास कर लेने पर पिताजी आठ महीने के बाद लौट आयेंगे और हमारे लिए ढेर सारे खिलौने लाएंगे। इस सबसे हम बहुत उत्साहित थे और हमारी समझ में यह नहीं आ रहा था कि हमारी माताजी क्यों रो रही हैं। आगे की पढ़ाई करने के लिए पिताजी को वजीफा मिला था लेकिन उस वजीफे से तो न उनके जाने-आने का ही खर्च निकल सकेगा। माताजी, संजीव और मैं भारत में ही रह गये थे और हम प्रभु से प्रार्थना करते रहते थे कि पिताजी अपनी शिक्षा में उत्तीर्ण हों जिससे हमारा सारा परिवार फिर मिलकर हंसी-खुशी से रहने लगे।

कई महीनों के बाद हमें इंग्लैंड से एक तार मिला जिसमें बताया गया था कि हमारे पिताजी ने परीक्षा पास कर ली है और वह एडिनबरा के रॉयल कालेज ऑफ फिजीशियन्स के एक सदस्य बना लिए गये हैं। जिस शाम वह तार मिला, वह दिन हमारे लिए उत्सव का दिन था। हमारे दादाजी ने अपनी पुरानी फौजी राइफल निकाली थी और हवा में कई फायर किये थे। हम लोगों ने केक काटा था—और उसके बाद हमारे दादाजी ने हमें ‘आलीबाबा चालीस चोर’ पिक्चर दिखाई थी जो मुम्बई में तभी पहली बार दिखायी जानी शुरू हुई थी।

सिनेमा देखकर हम देर रात घर लौटे और उत्तेजना से भरे हम सब रात को सो गये। रात के दो बजे के करीब हम लोग रोने-चिल्लाने की आवाजें सुनकर जागे। दादा जी सोते-सोते ही स्वर्ग सिधार गये थे। अगले दिन उनका दाह-संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां एक घट में भरकर ले आयी गयी थीं। पिताजी साउथम्टन (इंग्लैंड) से तीन सप्ताह बाद घर लौटे थे। उन दिनों इंग्लैण्ड से भारत तक आने में समुद्री जहाज से तीन सप्ताह लगा करते थे।)

शनिवार को सबेरे पिताजी घर आये थे। मुझे याद है कि जब वह घर में घुसे थे तोपहले दादीजी के पास गए थे। वह उन्हें पकड़कर खूब जोर से रो रहे थे। कई मिनटों के बाद वह आंसू भरी आंखों से हमारे पास आये और कहा कि ‘मेरे साथ उस कमरे में चलो। मैं तुम लोगों के लिए बहुत ही अच्छे खिलौने लाया हूँ।’ दरअसल वे सभी खिलौने बहुत ही अद्भुत थे। उनमें एक बिजली का इंजन था जिसे पटरी पर चलाने के लिए वह पटरियां भी लाये थे जो एक सुरंग से गुजरती थीं। वह एक जोकर भी लाये थे जो तरह-तरह के रूप बदलता था, क्रिकेट का एक बल्ला भी लाये थे और ऐसी ही और भी अनेक चीजें थीं।

उस खिलौनों में हमारी दिलचस्पी नहीं रह गई थी। हम जानना चाहते थे कि कुछ दिनों पहले ही जो दादाजी हमें सिनेमा दिखाकर लाये थे, वे कहां चले गये। जब हम अपनी दादीजी से पूछते कि दादाजी कहां गये तो दादाजी उस अस्थि घट की ओर उंगली उठा देतीं। उस अस्थि घट को शीघ्र ही गंगा में प्रवाहित कर दिया जाना था।
इन घटनाओं के कारण मेरे भीतर जीवन क्या है, मृत्यु क्या है; इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रबल इच्छा ने जन्म लिया और इसी ने मन-चित्त-काया के बीच क्या सम्बन्ध है; इसकी अन्तर्दृष्टि पाने की नींव भी डाल दी। यह खोज-यात्रा मेरे लिए जीवन-यात्रा बन गयी। बाद में मुझे पता चला कि मेरे दादाजी हृदय के गंभीर रोगी थे और डॉक्टरों की भविष्य वाणियों को झुठलाते हुए जीवित रहे। वह प्रतीक्षा कर रहे थे कि मेरे पिताजी डॉक्टरी की उच्च परीक्षा उत्तीर्ण कर लें, इंग्लैंड से उनकी सफलता का तार पा लें, उसकी खुशी में हवाई फायर कर लें, केक काटें और पोते-पोतियों को ‘आलीबाबा और चालीस चोर’ नामक फिल्म दिखा दें। अपनी अगली कार्मिक यात्रा के पूर्व वे यह सब कर लेना चाहते थे।

मेरे पिताजी हम सबको प्रश्न करने के लिए प्रेरित करते लेकिन किसी भी प्रश्न का उत्तर न देते। वह हमें कहानियां सुना दिया करते और उन्हीं कहानियों में से उत्तर खोज निकाल देते। मेरी नज़र में मेरे पिताजी दुनिया के सबसे बड़े कहानी सुनानेवाले हैं और बचपन से ही मैंने उनके मुख से नाटकीय, प्रेममयी और लोगों एवं रोगियों से हुए संपर्कों से सम्बन्धित अनगिनत कहानियां सुनी हैं। बर्मा में जब वह अंग्रेजी फौज में थे और जापानियों द्वारा युद्धबंदी बना लिये गए थे, उस समय की युद्ध-कथाएं, लार्ड माउंडबैटन की कहानियां और ब्रिटेन की महारानी के साथ किये रात्रिभोज की कहानियां भी सुनाई हैं। आश्चर्यजनक रूप से बच जाने, भीषण रोगग्रस्त लोगों के चंगे होने की कहानियां, सुख-दुख की कहानियां, अज्ञान और आत्म-प्रबुद्धता की कहानियां भी उन्होंने सुनाई हैं। उनकी इन कहानियों ने रहस्य, रोमांच, अद्भुतता और विराग सभी का मिला-जुला एक अद्भुत संसार हमारे सामने रच दिया।

इस पुस्तक में ज्ञान की बहुत सी बातें भी वर्णित हैं जो मैंने और मेरे भाई ने आयु में बढ़ते हुए सुनी हैं और मेरे पिताजी ने जीवन के अनुभवों से सीखी हैं। मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक मेरे पिताजी के जीवन के सार्वभौम चिंतन पर अधिक प्रकाश डालती है। जो पाठक इसे पढ़ेंगे, उनका जीवन इस ज्ञान से परिवर्तित हो सकेगा। इसका ज्ञान जब उनके अन्तःमन में प्रवेश कर जाएगा, तो वे अपने को सुख-चैन से जीने का उत्तरदायित्व समझने लगेंगे और यह भी समझ पाएंगे कि किस रूप में उनका जीवन उनके अपने ही हाथों में है। कई रूपों में तो यह पुस्तक उनके जीवन का सार-रूप है। जब भी मैं इस पुस्तक को उलटता-पुलटता हूं तो कोई वाक्यांश अथवा वाक्य उन स्मृतियों की झड़ी लगा देता है जिससे मुझे और अपने पिता के बीच विद्यमान कार्मिक बंधनों का स्मरण हो आता है। आज मैं जानता हूं कि जिस व्यक्ति को मैं ‘मैं’कहता हूं वह स्मृतियों, इच्छाओं, स्वप्नों और आकांक्षाओं का पुलिन्दा है जिन्हें कोमलता से इस व्यक्ति ने पाला-पोसा है जिनका नाम कृष्ण चोपड़ा है। मैं उनके प्रति किसी अन्य भावना की अपेक्षा गहरे आभार- भाव और प्रेम-भाव से जुड़ा हूं। मेरी माता और पिता ने सहज-सरल रूप से मुझे एवं संजीव को जो प्रेम दिया है और बचपन से अब तक पाला-पोसा है, उन्हीं के कारण हम वह बन सके, जो आज हैं।

आत्म-रहस्यों के अनुभवों से प्राप्त हजारों वर्षों का तत्त्वज्ञान हमारे वैज्ञानिक ज्ञान के साथ हाथों में हाथ डाले चल रहा है। इस पृथ्वी पर जीवन का वर्तमान युग अद्भुत समय है। जीवन और स्वास्थ्य के विषय में एक नयी सकारात्मक दृष्टि उभरकर सामने आ रही है, जो आधुनिक युग की वैज्ञानिक खोजों का नूतन ज्ञान और प्राचीन युग के सर्वोत्तम ज्ञान का मिला-जुला रूप है। यह नया ज्ञान दीर्घ स्वास्थ्य, पूर्ण और सृजनात्मक जीवन की कुंजी है, जिसका लाभ जो भी चाहे, इसका उपयोग करके उठा सकता है।

चंद लोग ही जानते हैं कि सच्चा स्वास्थ्य क्या है ? हममें से अधिकतर लोग तो लगातार अपने शरीर के साथ अन्याय करते रहे हैं और धीरे-धीरे खुद को ही मार रहे हैं। इसका बुनियादी कारण यही है कि हमारा जीवन प्रकृति के सहज-सामान्य नियमों के अनुरूप नहीं चलता। आजकल की अधिकांश बीमारियां जिनमें कैंसर और हृदय रोग भी शामिल हैं, हमारी दोषपूर्ण जीवन-शैलियों के कारण होती हैं और इन बीमारियों से पूरी तरह बचा भी जा सकता है।

दुनिया भर में प्रति मिनट छः व्यक्ति बीड़ी-सिगरेट आदि के धूम्रपान से मरते हैं। दूसरे बहुत से लोग अधिक शराब आदि मादक द्रव्य लेने, अधिक भोजन करने या गलत ढंग का भोजन करने से मरते हैं। हममें से ज्यादातर लोग व्यायाम बिल्कुल नहीं करते हालांकि सभी चिकित्सक इस बात पर जोर देते हैं कि अच्छे स्वास्थ्य और जीवन ऊर्जा को बनाये रखने के लिए व्यायाम करना जरूरी है। हममें से ज्यादातर लोग अपने दिमाग और शरीर पर ईर्ष्या, लालच और क्रोध सरीखे नकारात्मक विचारों का हमला करते रहते हैं।
धनी-मनी या उच्च मध्यम वर्ग के लोग अधिक मात्रा में अपौष्टिक खान-पान के कारण पीड़ाग्रस्त रहते हैं। ये लोग बहुत अधिक खाते हैं। अब नाना प्रकार के अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है कि जो लोग कम खाते हैं, उनकी उम्र लम्बी होती है। आज लोग अस्वास्थ्यकर—गरिष्ठ और चर्बी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनके कारण हृदय रोगियों और कैंसर पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है।
भोजन का प्रत्येक ग्रास, जूस का गिलास, सिगरेट का हर कश, हर विचार और हर भावना हमारे शरीर की 50 अरब कोशिकाओं से गुजर कर हमारी काया का एक अंग बन जाती है। हम क्या खाते हैं, यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमें क्या खाये जा रहा है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह प्रमाणित हो चुका है कि हमारे विचारों और मानसिक दृष्टिकोणों का हमारे भौतिक शरीर की अवस्था पर ही नहीं बल्कि हमारे सुख-चैन, प्रसन्नता, कार्य-कुशलता, सृजनशीलता और उत्पादकता तक पर प्रभाव पड़ता है।
प्रेम और भय; हर्ष और विषाद, करुणा और घृणा, क्रोध या ईर्ष्या के हमारे विचार एकाध दिन के, गुजर जाने वाले अमूर्त भाव मात्र नहीं होते बल्कि कायिक विद्युतीय चिकित्सकीय घटनाएं होती हैं जो यह निश्चित करती हैं कि हम स्वस्थ रहेंगे या रोगी, प्रसन्नता पूर्ण रहेंगे या दुखी।
हम सबके सामने यह ज्ञान भली प्रकार रहता है। इस प्रकार अब चुनाव हमें करना होगा कि हम अच्छी आदतों का विकास करके सक्रिय रूप से अच्छा स्वास्थ्य बनाना चाहते हैं अथवा गलत, अस्वास्थ्यकर जीवन-शैली अपनाकर अपने शरीर की रोग-मुक्ति क्षमता घटाना चाहते हैं और अपने शरीर को दुर्बल बनाना चाहते हैं।

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