बाल विज्ञान कथाएँ - शुकदेव प्रसाद Bal Vigyan Kathayein - Hindi book by - Shukdev Prasad
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बाल विज्ञान कथाएँ

शुकदेव प्रसाद

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :384
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6639
आईएसबीएन :9788189859404

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वैज्ञानिक तथ्यों की अतिशय अतिरंजना करने वाली कथाएं...

Bal Vigyan Kathayein - An Hindi Book by Shukdev Prasad

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे, तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच.जी. वेल्स उभरा, जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया। वस्तुतः आधारभूमि के लिए जो विचार-सरणियाँ निर्मित कीं, वे ही आगे चलकर विज्ञान कथाओं की निमित्त बनीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएँ लिखी जाने लगीं।

वर्न और वेल्स ने जिन भावभूमियों पर अपने गल्प संसार का ताना-बाना बुना, उन्हीं थीमों पर ही भावी रचनाकारों ने गल्प लिखे। यह परंपरा विगत में तो थी ही, आज भी बनी हुई है, जबकि इस अवधि में नाना ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का रहस्योद्घाटन हो चुका है, जिन्हें विज्ञान-गल्पों का आधार बनाना हास्यास्पद तो है ही, विज्ञानसम्मत भी नहीं है। लेकिन विज्ञान कथाकार इस व्यामोह से विरत नहीं हो सके हैं।

वैज्ञानिक तथ्यों की अतिशय अतिरंजना करने वाली कथाएं या कि अविज्ञान को स्थापित करती प्रतीत होने वाली कथाएं बच्चों के ज्ञान को संवर्धित तो नहीं, करतीं, अपितु उन्हें दिग्भ्रमित अवश्य करती हैं।

चंदा मामा विषयक लोरियां और परीकथाओं, आदमी की बोली-बानी में बतियाने जानवरों आदि की कथाएं सुनकर और आगे चलकर उन्हें पढ़कर बच्चा बड़ा होता है। सारी दुनिया की भाषाओं में लोककथाओं की भरमार है तो क्या उन कथाओँ के वैचित्र्य का संसार विज्ञान है ? पुराकथाओं या कि लोककथाओँ में नैतिक जीवन-मूल्यों की तलाश तो की जा सकती है, पर विज्ञान की नहीं।

आज से प्रायः 20 वर्ष पूर्व विज्ञान कथाओं की शतकीय यात्रा के संधान क्रम में जब बाल विज्ञान कथाओं पर मैंने कार्य आरंभ किया तो इन्हीं विसंगतियों पर प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. आत्माराम से विमर्श किया। उन्होंने मुझे लिखाः परीकथाओं के मोहजाल से निकालकर अपने आसपास को जानने-समझने की भूख बच्चों में जगाना बहुत बड़ा काम है। तभी आज के बच्चे बड़े होकर इस वैज्ञानिक युग की जटिलताओँ से जूझ सकेंगे।’

निस्संदेह विज्ञान-गल्प-लेखन एक ऐसी सरस और रोचक विधा है, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ ज्ञान के नए-नए गवाक्ष खोलने में सक्षम है बशर्तें वैज्ञानिक तथ्यों का अतिरेक न हो। विज्ञान गल्पकारों का दायित्व रंजन-मनोरंजन के साथ अंधकार की कारा का निवारण भी है

बाल मन की उड़ानें और विज्ञान कथाओं के सच

यह अपने आप में युक्ति-युक्ति है कि मेरी डब्ल्यू, शेली (1797-1851) कृत फ्रैंकेंस्टाइन (1818) आधुनिक काल का प्रथम विज्ञान गल्प है। कथानायक फ्रैंकेंस्टाइन अपने संजीवनी मंत्र के सहारे निष्प्राण देह में प्राण का संचार करने में सफलीभूत हो जाता है लेकिन इस उपक्रम के बाद जो जीवधारी प्रकट होता है उसे देखकर फ्रैंकेंस्टाइन के होश फाख्ता हो जाते हैं। वास्तव में उसकी सर्जना की परिणति एक नर पिशाच के रूप में होती है।

यद्यपि शेली विज्ञान में दीक्षित तो नहीं थी, फिर भी हमें उसकी कल्पनाशीलता, भावप्रवणता की सराहना करनी ही होगी। उसने अपने गल्प में निष्पाप्ति दी कि नैसर्गिक नियमों के विरुद्ध कोई बी मानवीय प्रयास विफल ही होगा। उसके गल्फ में आधुनिक विश्वामित्रों के विफल प्रयासों की स्पष्ट इंगिति है। मानव क्लोन बनाने के दुष्प्रयासों में तल्लीन आधुनिक मनुपुत्रों के लिए शेली ने आज से प्रायः दो शतियों पूर्व ही स्पष्ट संदेश दे दिया था। आज हम शेली की चर्चा किए बिना विज्ञान कथाओं पर विमर्श आरंभ ही नहीं कर सकते। शेली ने सामाजिक सरोकारों के दृष्टिगत एक कथा लिखी जिससे समाज में विद्रूपता न पनपे, विज्ञान के दुरूपयोगों से उपजी विसंगति की भी उसने इंगिति की थी, विज्ञानियों के लिए उसने अपनी कृति के माध्यम से एक लक्ष्मण रेखा भी खींची जिसका अतिरेक अहमन्यता है। शेली अपनी स्थापनाओं में पूर्णतः सफल रही है।

शेली के बाद सुदीर्घ अवधि तक विज्ञान गल्प के क्षेत्र में शून्य ही शून्य व्याप्त है। ‘फाइव वीक्स इन ए बैलूए’ (1863) के साथ फ्रेंच लेखक जूल्स वर्न का पर्दापण होता है जिन्हें इस विधा के कुशल शिल्पी होने और विज्ञान कथाओं के संस्थापक का श्रेय है। यद्यपि इस क्षेत्र में अचानक नाटकीय ढंग से उनका प्रवेश हुआ था। उन्होंने वैज्ञानिक तथ्य़ों में थोड़ी अतिरंजना करके कैशोर्य वय के पाठकों के लिए दर्जनों उपन्यास लिखे जिन्हें आबाल वृद्ध सभी पाठकों ने सराहा। उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनीं।

विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच. जी. वेल्स उभरा जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया। वस्तुतः आधुनिक काल में वर्न और वेल्स ने विज्ञान कथाओं की निमित्त बनीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जाने लगीं।

‘कालयंत्र’ की सैर और ‘अदृश्य मानवः’ परंपराएं और विसंगतियां

वर्न और वेल्स ने जिन भावभूमियों पर अपने गल्प संसार का ताना-बाना बुना, उन्हीं थीमों पर ही भावी रचनाकारों ने गल्प लिखे। यह परंपरा विगत में तो थी ही, आज भी बनी हुई है जबकि इस अवधि में नाना ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का रहस्योद्घाटन हो चुका है जिन्हें विज्ञान गल्पों का आधार बनाना हास्यास्पद तो है ही, विज्ञान सम्मत भी नहीं है। लेकिन विज्ञान कथाकार इस व्यामोह से विरत नहीं हो सके हैं।

वेल्स ने अपने प्रथम विज्ञान गल्प ‘टाइम मशीन’ (1895) में एक ऐसे यंत्र की परिकल्पना की जिस पर सवार होकर भूत और भविष्य में झांका जा सकता है। यह परिकल्पना नवीन और रोमांचक थी, अतः उसे पाठकों ने हाथों हाथ लिया और रातों रात वेल्स तक भी लिखे गए और आज तक भी लिखे जा रहे हैं। भूत और भविष्य के लोंकों का सैर कराने वाली ऐसी मशीन आज तक तो नहीं बन सकी है औऱ भविष्य में बन पायेगी, इसकी भी संभावना नहीं है क्योंकि यह परिकल्पना वैज्ञानिक नियमों के किसी भी खांचे में फिट नहीं होती। लेकिन अभी तक गल्पकार ‘काल यात्रा’ रत हैं।

वस्तुतः इस मनोरंजक कथा का मर्म लेखक आज तक समझ नहीं सके या कि इसे स्वीकारना नहीं चाहते, कहना कठिन है। वेल्स ने अपनी प्रज्ञा से आने वाली दुनिया में मानव मूल्यों में जो परिवर्तन होंगे, उसकी एक झलक प्रस्तुत की थी। यही इस कथा का मर्म और प्रतिपाद्य है।
‘दि टाइम मशीन’ का कालयात्री कालयंत्र पर सवार होकर आठ लाख दो हजार सात सौ एक वर्ष ईस्वी में जब पहुंचता है तो उसे प्रत्याशा के विपरीत भयानक परिदृश्य से रूबरू होना पड़ता है जहां मानव समुदाय दो वर्गों में विभक्त हो चुका है-शोषक और शोषित।–हजारों या शायद लाखों वर्ष पहले मनुष्य में स्पष्ट रूप से दो वर्ग हुए होंगे। सम्पन्न और सर्वहारा। सुविधाभोगी और श्रमिक। सुविधाभोगियों ने श्रमिकों को अपनी सेवा में बांधने की व्यवस्थाएं बनायी होंगी औऱ कालांतर में पूरी मानव जाति दो उपजातियों में बंट गयी होगी। एक सुंदर, कोमल, शांत, निश्चिंत जो पृथ्वी के ऊपर रहते हैं और दूसरी मेहनतकश, अभावग्रस्त और अशांत, जो जमीन के अंधेरों के आदी हो चुके हैं।’

मानव-मानव के बीच खिंचती जा रही भयंकर और विषम खाई का भविष्य दर्शन कराने की चेष्टा वेल्स ने ‘कालयंत्र’ में की थी। वस्तुतः यह कहानी है शोषक और शोषितों की, शासकों और पीड़ियों-प्रताड़ियों की और उस गहरे दमन चक्र की जिसके नीचे दमित मानवता की चीख पुकार और करूणाई को सुनने वाला कोई नहीं है। अनादिकाल से इस व्यवस्था का नैरंतर्य है जिसे तकनीकी संस्कृति ने और संबल प्रदान किया है।
हमारे कालयात्री को आशा थी कि जिस भावी दुनिया में वह पदार्पण कर रहा है, वह काफी समुन्नत होगी- मैं तो सोचकर भविष्य की ओर निकला था कि लाखों वर्ष बाद हमारे वंशज ज्ञान-विज्ञान में हमसे बहुत आगे होंगे। ‘मैं उनके सामने काफी पिछड़ा और फूहड़ दिखाई दूंगा, मगर यहां तो हाल ही दूसरा था।’ वास्तव में कालयात्री संघर्षहीन सुविधाभोगी युग में पहुंच गया था, जहां-‘सुविधाएं आयीं तो संघर्ष करने की प्रवृत्ति भी कम होने लगी। ऐसा भी समय आया और यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि संघर्ष रहित मानव समाज में धीरे-धीरे बौद्धिक क्षमता भी क्षीण हो जायेगी। जीवन यापन के लिए बुद्धि का इस्तेमाल ही न किया जाय तो बुद्धि का कमजोर होना स्वाभाविक है। मैं इसी संघर्षहीन सुविधाभोगी युग में पहुंच गया था।’
वस्तुतः ‘कालयंत्र’ तकनीकी संस्कृति की विद्रूपताओं का दर्पण है जिसमें भविष्य की परछाई देखी थी वेल्स ने, जो आज सच साबित हो चुका है लेकिन दुर्भाग्य यह कि गल्पकारों ने वेल्स के मर्म को समझा नहीं। कथानक के रूप में उसने एक मशीन की परिकल्पना की थी लेकिन उसके सहारे विज्ञान की विद्रूपताओं की इंगिति दर्शायी थी अपनी कथा में। यह सच है कि तकनीकी संस्कृति मनुष्य की संवेदना हर लेती है, उसे कुंद जहन बनाती है और उसे सामाजिक सरोकारों से विलग करती है। आज के ‘वैश्विक गांव’ में भी हर कोई अकेला है। पहचान का भी संकट आसन्न है। वेल्स ने यही सब कुछ अभिव्यक्त करना चाहा था, जिसमें वह सफल रहा, समय की धारा ने सिद्ध कर दिया है।
‘सुन्दरी मनोरमा की करूण कथा’ (1925) करूण तो है लेकिन ‘ऐन्द्रजालिक ऐनक’ का ही कमाल था कि उसे डाकुओं के चंगुल से छुड़ा लिया गया।

‘पार्वती देवी ने ऐनक अपनी आंख पर चढा ली। दीवार के पास तक धीरे-धीरे जाकर दीवार के उस पार घर के भीतर देखने लगीं। कोई दस बारह आदमी शराब पीते ताश खेलते दिखाई पड़े। दूसरे कमरे में एक सुंदरी चारपाई पर पढ़ती दिखलाई पड़ी। यही मनोरमा देवी थीं। एक और कमरे में एक युवक बंद दिखलाई पड़ा। कमरे का दरवाजा बाहर से बंद था। युवक भीतर से भाग निकलने की तरकीब ढूंढ रहा था। पार्वती ने परबते को पहचान लिया। राम नारायण की आंखों पर ऐनक लगाकर उसे भी सब हाल दिखलाया।
इन ऐन्द्रजालिक ऐनकों से कोई भी गुप्त स्थान सुरक्षित न था। दीवारों के उस पार, फर्श के नीचे, जमीन में गड़े हुए खजाने जेड़ रे की सहायता से दिखलाई पड़ रहे थे। मूल्यवान चीजों को देख लेना बिल्कुल कठिन न था, पर उनको निकालना अधिक कठिन था। लूट की सब सामग्री मोटर कार में भर दी गई। साथ ही साथ सब डाकू एक के ऊपर एक लादकर ठूंस दिए गए। कोई आधी रात को सब लोग डाक्टर हक्सर के घर पहुंच गए।
डाकुओं को लम्बी सजाए मिलीं पर डाक्टर हक्सर ने सुंदरी मनोरमा को अभियोग से अलग रखा। वह तो बेचारी डाकुओं के हाथ में कठपुतली थी। अपनी प्रयोगशाला में उसे इन्होंने नौकर रख लिया।’
इस मनोरंजक कथा में तिलस्म तो है लेकिन विज्ञान नहीं। विज्ञान कथाओं में विज्ञान के मान्य सिद्धांतों के विचलन की वर्जना है। ऐसा ही कुछ-कुछ हाल जे. बी. एस. हाल्डेन के ‘जादुई कॉलर बटन’ (1937) का भी है जिसमें बटन के जादूई चमत्कारों के साथ-साथ जूतों के जादुई तस्मों की भी चर्चा हैः
‘निश्चित ही मैं जूतों के जादुई तस्मों को नहीं चाहता था, क्योंकि मैं एक मिस्टर मेकफरलेन नाम के आदमी को जानता हूं जिसने एक जोड़ी ऐसे तस्में खरीदे थे। वे बहुत ही उपयोगी थे पर एक दिन वह उन्हें ढीले करने का मंत्र भूल गया तो उसे तीन माह तक जूते पहन ही सोना पड़ा, जब तक कि उसे वह जादूगर नहीं मिल गया जिसे सही मंत्र मालूम था। उसके बाद उसने वह मंत्र किताब में लिख लिया और फिर उसे इस तरह की कोई तकलीफ नहीं हुई।’ आश्चर्य की बात यह है कि अभिमंत्रित तस्मों की कथा सुप्रसिद्ध आनुवांशिकीविद् जे. बी. एस. हाल्डेन ने लिखी है।

चाहे ऐन्द्रजालिक ऐनक हो या कि ’जादुई कॉलर बटन, ऐसी कथाएं अलादीन का चिराग हैं जिसमें तिलस्म ही तिलस्म है। वस्तुतः इस तरह की कथाएं वेल्स के ‘इनविजिबल मैन’ (1897) से प्रेरित होकर नए रंग-रूपों में ढाली गई हैं। वेल्स का अदृश्य मानव एक रयायन पीकर अदृश्य होने की क्षमता अर्जित कर लेता है। हालांकि उसकी परिणति अत्यंत दुःखद है लेकिन गल्पकारों ने अरसे तक इसी भाव भूमि पर अनेक गल्प लिखे और आज भी ‘इनविजिबल मैन’ का सफर जारी है। आज तक न तो ऐसी कोई ऐनक बन सकी जिसे पहन कर अदृश्य ‘दृश्य’ हो जाय और न ही ऐसा कोई रसायन ईजाद हुआ जिसे पीकर दृश्य ‘अदश्य’ हो जाय लेकिन दृश्य-अदृश्य का पूरा परिदृश्य आज तक विज्ञान गल्पों में परिव्याप्त है। यही आश्चर्यजनक है। विज्ञान असम्मत चीजें विज्ञान गल्पों की परिधि से बाहर की चीजें हैं और विज्ञान गल्पों का सीमोल्लंघन भी जिसका निषेध किया जाना चाहिए।

पृथ्वेतर लोकों में जीवन

वर्न और वेल्स से शतियों पूर्व भी चंद्र यात्राओं पर विज्ञान गल्पों की सर्जना की गई है लेकिन विगत शती में फ्रांसीसी लेखक जूल्स वर्न (1828-1905) ने ‘अंतरिक्ष’ को अपना प्रतिपाद्य चुना और ब्रितानी लेखक एच. जी. वेल्स (1866-1946) ने इसे और समृद्ध किया। लेकिन दोनों की भविष्यत की परिकल्पनाओं में एक अंतर है। यह पर्याप्त अंतर है। वर्न ने ‘फ्राम अर्थ-टू मून’ (1865) में चांद की ओर उड़ने का विवरण प्रस्तुत किया है जबकि अगले उपन्यास ‘एराउंड दि मून’ (1870) में चंद्र अवलोकन की झांकी प्रस्तुत की। 30 वर्ष बाद वेल्स ने ’चंद्रमा पर प्रथम मानव’ (फर्स्ट मैन आन दि मून, 1901) का अवतरण भी करा दिया। लेकिन दोनों के दृष्टिकोणों में कितनी भिन्नता है। वर्न की प्रज्ञा ने तो चंद्रमा को मृत पिंड घोषित किया और वेल्स ने उसे जीता-जागता सजीव लोक परिकल्पित किया जब कि वेल्स की कृति वर्न की कृति के 30 वर्ष बाद की प्रस्तुति है।

दुनिया भर की लोक कथाओं का चंदा मामा और उसमें तकली कातती बुढ़िया लोक लुभावन कथाएं हैं और संसार की सारी भाषाओं में ऐसी लोक कथाएं शतियों से जन मानस में व्याप्त हैं लेकिन वर्न/ वेल्स से प्रायः तीन शतियों पूर्व गैलीलियो ने इस व्यामोह को भंग कर दिया था जब उसने स्वर्निर्मित दूरदर्शी से 1609 में बृहस्पति के चार चांद (उपग्रह) देखे और चंद्रमा की उबड़-खाबड़ सतह को देखा और चंद्रमा को मात्र कंकड-पत्थरों का ढेर घोषित करके हुए उसे मृत पिंड का दर्जा दिया लेकिन गल्पकारों ने चंद्र ही नहीं शुक्र, मंगल और अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की यात्रा और उनमें उन्नत सभ्यताओं की खोज संबंधी गल्प लिखे और आज भी यह प्रक्रिया जारी है।
जब वर्न और वेल्स चांद्र अभियानों और चंद्र लोक पर गल्पों की रचना कर रहे थे, तब जन-मानस ने इसे सराहा ही लेकिन चंद्र अवतरण (1969) के बाद तो ऐसी कथाएं अतीत गाथाएं बन जानी चाहिए। 21 जुलाई, 1969 को जब अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने मानव का छोटा कदम और मानवता की विशाल छलांग’ के उद्घोष के साथ चंद्र तल का स्पर्श किया तो गैलीलियो जीवंत हो गया।



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