रात-दिन - विष्णु नागर Raat-Din - Hindi book by - Vishnu Nagar
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रात-दिन

विष्णु नागर

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :178
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6666
आईएसबीएन :9788126715404

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इस कहानी-संग्रह में कुछ कहानियों को छोड़कर लगभग सारी कहानियों-लघुकथाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है....

Rat-Din - An Hindi Book by Vishnu Nagar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वे पिछले चार दशक से दिल्ली में रहते थे और जब भी जाते थे, वाशिंगटन, न्यूयार्क मास्को, पेरिस, लन्दन, ही जाते थे। कभी-कभी कृपापूर्वक काठमांडू या ढाका भी चले जाते थे ताकि दक्षिण एशिया की पूर्ण उपेक्षा भी न हो। वे एक बार जाम्बिया भी जा चुके थे, लेकिन उन्हें भारत के गाँवों के बारे में बात करने का बहुत शौक था। गाँव शब्द सुनते ही स्वर्गिक आनन्द में डूबकर वे आँखें मींच लेते थे और पाँच मिनट बाद आँखें खोलकर कहते, ‘आपने क्या शब्द कहा था-गाँव ! अहा, कितना सुन्दर शब्द कहा, कितना प्यारा, एकदम से राजदुलारा। एक बार फिर से कहिए तो ! अहा, वाह-वाह ! दिल खुश कर दिया आपने !’ लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे गाँव कभी नहीं गए थे।

कविता और व्यंग्य की दुनिया में जितने वह सक्रिय हैं, उतने ही कहानी की दुनिया में भी। उनका यह ताजा कहानी-संग्रह इस मायने में दूसरों से बहुत भिन्न है कि इसकी चंदेक कहानियों को छोड़कर लगभग सारी कहानियों-लघुकथाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है। वह चाहे ‘प्रेम-कहानियाँ’ हो या ‘पापा मैं गरीब बनूँगा’ हो या ‘भगत सिंह बिल्डर्स, हो या ‘साले तू किसकी इजाजत से मरा’ है। वह चाहे प्रेम-प्रसंग हो, शैतान से अच्छा आदमी दीखने की कोशिश हो या जीवन-भर भ्रष्टाचार और काहिली के बाद सत्य और न्याय के पथ पर चलने की कोशिश करने वाले ढोंगी और कायर बूढ़े हों, करियर और पैसे के पीछे भागते लोग हों या साम्प्रदायिक शक्तियाँ हों या गाँव और देश से बनावटी प्रेम करने वाले लोग हों या महात्मा गांधी के नाम पर तरह-तरह के धंधे करने वाले लोग हों-सभी उनकी कहानियों का विषय बनते हैं। यहाँ तक कि सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के प्रति शोकाकुल मित्र के प्रेम को भी उन्होंने व्यंग्यात्मक अन्दाज में व्यक्त किया है। यह व्यंग्य, व्यंग्य-विनोदवाला नहीं है-यह चुभता है, गड़ता है, परेशान करता है, उत्तेजित करता है, विकल करता है।

हमेशा की तरह दिलचस्प और पठनीय विष्णु नागर के इस संग्रह में ‘भटकने वाला आदमी,’ ‘बेटा और माँ’, बचपन के पहाड़’, ’दयालु पागल’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो एक तरह से कहानी होकर भी कविता है और कविता होकर भी कहानी हैं। वे कहानी में कविता और व्यंग्य की ताकत के साथ आते हैं और कविता में कहानी और व्यंग्य की शक्ति के साथ और उनका व्यंग्य, कविता भी होता है कहानी भी, निबन्ध भी, राजनीतिक टिप्पणी थी।
बहरहाल यह कहानी-संग्रह आपके हाथों में है और यह परखने का मौका देगा कि जो कहा गया, वह कितना सच है। विश्वास है कि यह सब कुछ आपको सच लगेगा।

 

मेरी कल्पना की औरत

वह मेरी कल्पना की औरत थी, इसलिए स्वाभाविक था कि वे गोरी-चिट्टी थी, सुन्दर थी। कल्पना की औरत काली, साँवली, मोटी, नाटी हो भी कैसे सकती है ! वह गोरी ही होगी, सुन्दर ही होगी, छरहरी ही होगी, उसकी नाक सुतवाँ ही होगी, उसकी कमर पतली ही होगी, उसके बाल काले, कोमल और लम्बे ही होंगे, उसके स्तन और जंघाएँ पुष्ट ही होंगी वगैरह-वगैरह। आप मान ही लीजिए कि वह नखशिख सुन्दर थी। वह बोलती थी तो उसके मुँह से फूल झरते थे।

मेरी कल्पना की औरत थी, इसलिए न केवल मैं उसे चाहता था, बल्कि वह भी मुझे बहुत चाहती थी। वैसे सोचने पर ऐसा लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरी कल्पना की इतनी सुन्दर औरत को मेरे अलावा कोई और न चाहता होगा लेकिन जहाँ तक उसका सवाल था, वह मुझे और सिर्फ मुझे चाहती थी क्योंकि वह मेरी अपनी कल्पना की औरत थी। वह मेरी कल्पना की औरत थी, इसलिए वह मेरी कल्पना में मुझसे कभी भी, किसी भी बात पर लड़ती-झगड़ती नहीं थी और याद नहीं आता कि मैं भी कभी उससे कल्पना में कभी लड़ा-झगड़ा होऊँ। हालाँकि वह सुन्दर थी इसलिए स्वाभाविक रूप से उसे अधिकार था कि वह कभी-कभी मुझसे लड़े-झगड़े भी लेकिन वह ऐसी नहीं थी, हालाँकि वह लड़ती भी तो भी मैं उसे उतना ही चाहता लेकिन वह तो इतनी अच्छी थी कि वह कभी छींकती और खाँसती भी नहीं थी और दैनिक कर्म आदि भी करती थी या नहीं, यह मैं विश्वासपूर्वक नहीं कह सकता क्योंकि मेरी कल्पना में तो उसने ऐसा कभी किया नहीं। हालाँकि मैंने उसे कल्पना में नहाते हुए कई-कई बार देखा है और सिर्फ मैंने ही देखा है और मैंने पाया है कि उसे मेरा इस तरह देखना अच्छा लगता है और वह चाहती है कि मैं उसे देखता रहूँ और वह लगातार शरमाती रहे। उसका शरीर ही क्या वह पूरी तरह हमेशा ताजगी से महकती रहती है-चाहे दिन हो या रात और वह कभी थकती नहीं बल्कि सच कहूँ तो मुझे इसका सपने में भी ख्याल नहीं आया कि औरत भले ही कल्पना की हो मगर दिनभर के बाद जब मैं थक जाता हूँ तो वह भी जरूर थकती होगी। वह मेरी कल्पना की औरत थी, इसलिए वह एक आदर्श पत्नी थी और साथ ही एक आदर्श प्रेमिका भी। वह मुझसे पहले जाग जाती थी और मेरे लिए चाय का प्याला लेकर मेरे बिस्तर के पास आकर खड़ी हो जाती थी और कहती थी-‘चायवाला आया, चाय ले लो, मुफ्त रूपए कप’ और मैं उसकी इस आवाज पर मुस्कुराता हुआ उठता था लेकिन उसके साथ एक अच्छी बात यह भी थी कि वह तब तक जागती थी, जब तक कि मैं उसे जगाए रखता था औऱ वह तब सोती थी जब मैं उसे थपकियाँ देकर सुलाता था। ऐसा नहीं कि आप जागे हुए हैं और वह आराम से सोयी हुई है क्योंकि अगली सुबह उसे आपसे पहले जागना है। ऐसी सुन्दर और फिर आज्ञाकारी औरत आजकल कहाँ मिलती है लेकिन वह थी और मिल गई थी हालाँकि कल्पना में ही मिली थी।

उसके साथ दिन और रात बिताना इतना सुखद था कि उस सुख की बस कल्पना ही की जा सकती है बल्कि मेरा तो ख्याल है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उस सुख को तो सिर्फ हासिल करने वाला जानता है और वह सुख गूँगे का गुड़ है, उसका बखान नहीं किया जा सकता।

मेरी कल्पना की औरत अच्छे दिनों की मधुबाला भी थी और नरगिस भी, माला सिन्हा भी थी और वहीदा रहमान भी, रेखा भी थी और माधुरी दीक्षित भी। आप चाहें तो मामले को ऐश्वर्या राय या काजोल तक भी ले आ सकते हैं या चाहें तो इन दिनों जो भी मशहूर हीरोइनें आपको खूबसूरत लगती हों, उनका नाम इसमें जोड़ सकते हैं हालाँकि आप ऐसा करेंगे तो वह फिर आपकी कल्पना की औरत होगी, मेरी कल्पना की नहीं।

आप मेरी हँसी उड़ाएँ, मुझे बेवकूफ कहें मगर सौन्दर्य की मेरी कल्पना हीरोइनों तक ही जाती है और वहीं जाकर ठहर जाती है, खत्म हो जाती है। ऐसा नहीं कि मुझे अपनी गली-मुहल्ले-शहर की लड़कियाँ और औरतें खूबसूरत नहीं लगतीं, लगती हैं लेकिन वे मेरी ही कल्पना में नहीं बसतीं। कल्पना में सिर्फ फिल्म की भूतपूर्व और वर्तमान हीरोइनें रहती हैं लेकिन इस मामले में सौभाग्य से मैं सम्पूर्ण स्वदेशी हूँ क्योंकि अंग्रेजी की फिल्में मुझे समझ में नहीं आती, इसलिए मैं उन्हें देखता नहीं और उनकी हीरोइनों को पसन्द नहीं करता। इसलिए मुझे कल्पना में सिर्फ स्वदेशी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण रूप से हिन्दी जानने-समझने वाली ही औऱत दीखती है। मेरी कल्पना की औरत मेरी भाषा में मुझसे बात भी न कर सके तो क्या खाक वह मेरी कल्पना की औरत होगी। कोई औरत कितनी ही खूबसूरत हो, अगर वह हिन्दी नहीं बोल सकती, अगर वह कल्पना में भी हिन्दी बोल सकती तो मेरे लिए वह खूबसूरत होकर भी खूबसूरत नहीं है क्योंकि मैं अपनी कल्पना की औऱत से, जो कि मेरी है, दिनभर मेरे साथ रहती है, अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में लगातार बात करना बर्दाश्त नहीं कर सकता। वैसे भी ज्यादा देर तक मैं अंग्रेजी बोलने की कोशिश करता हूँ तो मेरे जबड़े दुखने लगते हैं।

जैसा कि अक्सर शायद सभी के साथ होता है मेरे साथ भी हुआ। मेरी कल्पना की औरत तो मेरी कल्पना में ही रह गई और मेरी शादी उस औरत से हो गई जो कि यथार्थ में थी। चूँकि वह यथार्थ में थी, इसलिए वह कितनी ही खूबसूरत क्यों न हो, वह इतनी खूबसूरत तो बिल्कुल नहीं थी, जितनी कि मेरी कल्पना की औऱत थी। वह गोरी नहीं थी मगर गनीमत थी कि उसका रंग गेंहुँआ था और काली तो उसे हरगिज नहीं कह सकते। वह उतनी लम्बी नहीं थी, जितनी कि मेरी कल्पना की औऱत थी। उसके बाल भी उतने घने और लम्बे नहीं थे, जितने कि मेरी कल्पना की औऱत के थे हालाँकि इसके भी बाल कुछ घने थे मगर उतने लम्बे नहीं थे, होते तो शायद बात कुछ बन भी सकती थी। मेरी कल्पना की औरत की आवाज बहुत मधुर थी हालाँकि साफ कहूँ, तो मेरी कल्पना की औरत की आवाज लता मंगेशकर जैसी हो, इसकी न मैंने कल्पना की थी, न मैं इसकी जरूरत महसूस करता था। औऱत चाहे वह कल्पना की हो मगर आप उसे इतना सर्वगुण सम्पन्न भी नहीं बना सकते। वास्तव में आपकी कल्पना उसकी हर तरह की सुन्दरता पर जाती भी नहीं, खासकर उस सुन्दरता की तरफ जिसका ताल्लुक शरीर से न हो। अलबत्ता यथार्थ की औऱत की आवाज काफी मधुर थी। वह संयोग से कल्पना की औरत से भी ज्यादा अच्छी हिन्दी जानती थी और हमेशा हिन्दी ही बोलती थी, जिसका एक कारण यह था कि उसे भी मेरी तरह ठीक से अंग्रेजी नहीं आती थी। वह बोलचाल की अंग्रेजी समझ लेती थी मगर जहाँ तक बोलने का सम्बन्ध था, उसमें उसे खासी मुश्किल होती थी। मजूबरी हो तो वह दो-चार लाइन बोलकर काम चला लेती थी। मैंने उससे कह दिया था कि (चूँकि तुम मेरी कल्पना की औरत नहीं हो इसलिए) तुम काम करके सोओ कभी भी, मगर तुम्हें हर हालत में मुझसे पहले जागना होगा क्योंकि मेरी हमेशा से यह कल्पना रही है कि मेरी पत्नी को मुझे बिस्तर पर लाकर चाय पिलानी पड़ेगी। मेरे कहने के तरीके से वह शायद समझ गई कि यह यथार्थ का पुरूष है, इसलिए यह यथार्थ भारतीय की तरह ही व्यवहार करेगा। फिलहाल इसे ऐसा करने दो। इसलिए श


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