दीर्घतपा - फणीश्वरनाथ रेणु Deerghtapa - Hindi book by - Phanishwarnath Renu
लोगों की राय

सामाजिक >> दीर्घतपा

दीर्घतपा

फणीश्वरनाथ रेणु

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6667
आईएसबीएन :9788126714780

Like this Hindi book 5 पाठकों को प्रिय

132 पाठक हैं

एक मर्मस्पर्शी उपन्यास जिसके माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है...

Deerghtapa - Hindi Book by Phanishwar Nath Renu

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अफरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।

बेला गुप्त भी सहज जीवन जीना चाहती थी, लेकिन उनके साथ क्या हुआ ? कई हादसों से गुजरने के बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रही । लेकिन आज...?

आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा-उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीजों पर से उसका मोहभंग हो गया हो ! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।
दीर्घतपा फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है।

‘‘अजीत भाई...अतीत भाईजी-ई-ई...!’’

अबुल हसन लेन की अँधेरी दरगल्ली में रात के दस बजे एक नारी-कंठ की पुकार सुनकर हठात् रूक जाना पड़ा। पुकारने वाली रिक्शा से उतरी और सामने आकर चुपचाप मुस्कुराती खड़ी रही-‘‘पहचानिए तो ?’’ फिर मेरे चेहरे पर उड़ने वाली हवाइयों को भाँपकर हँस पड़ी ‘‘आप तो इस तरह डर गए मानो किसी ‘डाकिन-पिशाचिन’ ने घेर लिया हो !’’
‘‘अरे, रामरति...तुम ?’’

‘‘फिर से देख लीजिए, गौर कर। यह देखिए, मेरे पाँव सीधे ही हैं।’’ रामरति ने हँसते-हँसते, बारी-बारी से अपने दोनों पैरों पर ‘पेन टॉर्च’ की रोशनी डालकर दिखलाया।
समझने में देर नहीं लगी कि रामरति किस फिल्म की डायलॉग बोल रही है। अतः मैंने उसके पाँव देखकर गम्भीरतापूर्वक कहा-
‘‘इस्स !’’
वह खिलखिलाकर हँस पडी।
‘‘कब लौटी ? मतलब, कब रिहा हुई...?’’ मैंने ही पूछा। मेरा सवाल पूरा नहीं हो पाया, रामरति बीच में ही मेरी बात को काटती हुई बोली-‘‘आज अपनी बात बताइए कि इस छोड़ी हुई नगरी में आप कब लौटे ? हमें तो पाँच साल की ही सजा हुई थी। आप दस वर्षों के बाद दिखलाई पड़े हैं।’’
‘‘तुम्हारी बेला दीदी ?’’

मैंने लक्ष्य किया, रामरति मेरे प्रश्न से तनिक अप्रतिभ हुई। किन्तु तुरन्त ही सहज हो गई-‘‘मेरी बेला दीदी ! अर्थात आपके उपन्यास को असफल बनाने वाली आपकी ही प्रधान नायिका ?’’
रामरति के इस संवाद ने मुझे हैरत में डाल दिया। मैंने पूछा-‘‘तुम उपन्यास की बात कैसे समझने लगीं ?’’
‘‘जेल में, चक्की पीसने के बदले मुझे पढ़ने का ‘कमान’ मिला था। और, पाँच साल में बेला दीदी इस मिट्टी के गागर में जितना-सा सागर भर सकी...।’’ रामरति अपनी काया की ओर ‘सधुक्कड़ी’ मुद्रा में संकेत करती बोली।
मैंने अब हथियार डाल दिया।

...दस वर्षों के अन्तराल में क्या नहीं हो सकता है ? इसमें अचरज की क्या बात ? रामरति ने पढ़ना-लिखना सीखकर कहानियों और उपन्यासों पर बहस करने की हैसियत हासिल कर ली है...अचरज की बात नहीं।
अँधेरी दरगल्ली में रामरति की मुस्कुराहट रह-रहकर बिजली की तरह कौंध जाती।

‘‘आप किदवईपुरी जाइएगा न ? आइए, बुद्घमूर्ति के पास उतर जाइएगा।’’ रामरति ने कहा।
मुझे लगा, रामरति ने मुझे चिढ़ाने के लिए, शायद मुझे तौलने के लिए अथवा सिर्फ चुहल के लिए यह प्रस्ताव किया था। यद्यपि लोहियानगर में मुझे एक मित्र से मिलना था, मैंने रामरति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
‘‘तो मेरी प्रधान नायिका कहाँ है ?’’ मैंने रिक्शा पर बैठते ही पूछा।
‘‘इससे पहले कभी कहीं पूछताछ नहीं की ?’’

सचमुच पहली बार पूछताछ कर रहा था। मैंने हकलाते हुए अपनी सफाई देने की चेष्टा की-‘‘असल में, मैं इस शहर को छोड़कर एक अर्सें तक बाहर रहा-इलाहाबाद, बम्बई, कलकत्ता और फिर गाँव...’’
‘‘लेकिन पिछले तीन साल से तो आप लगातार इसी शहर में हैं और हम लोग चार वर्ष तीन महीने के बाद यानी जेल से रिहा होने के बाद से बराबर यहीं हैं।’’
मैंने बात को टालने की कोशिश की-‘‘तुम तो एकदम बदल गई हो रामरति !’’
वह फिर हँसी-‘‘बदल गई हूँ ? बदलकर एकदम आपकी हीराबाई जैसी हो गई हूँ क्या ? हा-हा-हा...!’’
मैं अपनी हँसी को जब्त नहीं रख सका।

वह बोली-‘‘कहाँ बदली हूँ ! जैसी-की-तैसी हूँ। काली-कलूटी। आपने लिखा था न...’’
‘‘नहीं, मुझे याद है कि मैंने तुमको कभी काली-कलूटी नहीं लिखा। साँवली-सलोनी...।’’
‘‘एक ही बात है। आपने लिखा था-रामरति हमेशा खरी बात बोलती है, किसी को भली लगे या बुरी। लेकिन उसे शराबी का बहुत डर है...’’

‘‘घबराओ मत, मैंने छोड़ रखी है।’’
‘‘मुझे पता है, वरना रात के वक्त क्या, कभी दिन में भी आपके पास रिक्शा में बैठने की हिम्मत नहीं करती।’’
‘‘लेकिन तुमने कैसे जाना...?’’
‘‘देखिए अजीत भाई ! कहने को आपको भाईजी कहती हूँ, लेकिन हमें कहना चाहिए-सिरजनहारजी, पिताजी। अपने स्रष्टा को हम कैसे भूल सकते हैं ?’’
‘‘किन्तु बेला गुप्त ने मुझे छला है..।’’
‘‘सुनिए अजीत भाई ! मैं जानती हूँ, ‘खगड़ा-मंजिल’ से लेकर किशनगंज, फिर पेशावर के प्रसिद्ध होटल का चक्कर लगा आए थे। आपके ही शब्दों में, आपने उसी ‘दीपकली’ के प्रकाश में बैठकर बड़ी-बड़ी आशाएँ पाल रखी थीं। लेकिन खिली दीपकली बेला गुप्त अचानक बुझ गई, आप निराश हो गए और आपका उपन्यास असफल हो गया। यही है न आपका अभियोग ? किन्तु बेला गुप्त बुझ नहीं गई है। अगर वह दीपकली थी तो आज उसकी निष्कम्प लौ आँधी-तूफान में निर्भय चित्त...’’
मैंने टोका-‘‘तुम लिखती भी हो ? मतलब, कविता-कहानी...?’’

रामरति बोली-‘‘आप जो चाहें बना दें। मगर आपने अब तक जो कुछ भी बनाया है, मैं उसकी बात कर रही हूँ। बेला दीदी ने आपके उपन्यास को अप्रत्याशित ढंग से असफल नहीं बनाया। आप कहानी पूरी होने तक सब्र नहीं कर सके-यह मेरी राय है, आपकी प्रधान नायिका बेला गुप्त की नहीं।’’
‘‘उसकी राय क्या है ?’’
‘‘वह आप स्वयं जाकर क्यों नहीं जान लेते ? मैं इससे ज्यादा नहीं बताऊँगी कि बेला दीदी इसी शहर की बेली रोड़ के ‘नूक’ नाम के बँगले में रहती है।’’

बुद्धमूर्ति के पास अचानक रिक्शाचालक ने रिक्शा रोक दिया। मैंने पूछा-‘‘तुम अचानक रिक्शाचालक ने रिक्शा रोक दिया। मैंने पूछा-‘‘तुम अब उसके साथ नहीं रहतीं ?’’
‘‘अजीत भाईजी, मुझे जिसके साथ रहना चाहिए, रह रही हूँ।’’
‘‘अर्थात् तुम्हारे पतिदेव ने भी शराब छोड़ दी...?’’ मैंने रिक्शा से नीचे उतरते हुए पूछा।
रामरति इस तरह ठठाकर हँस पड़ी कि मैं डर गया। रात के ग्यारह बजे, बुद्धमूर्ति के पास किसी औरत का इस तरह ठठाकर हँसना !
‘‘मेरी माँ-मुनिया-मरी नहीं है, लेकिन आपने उसके बारे में कुछ नहीं पूछा।’’
‘‘अरे. मैं तो भूल ही गया। कैसी है तुम्हारी माँ ?’’
‘‘मैंने कहा न, मरी नहीं है। आप पहले अपनी प्रधान नायिका की सुधि तो लीजिए, फिर सुखमय घोष से लेकर तारा, कुन्ती...।’’

मैं डरा, रामरति फिर अस्वाभाविक ढंग से हँस न पड़े। मेरे हाथ स्वयं जुड गए, जिसका एक अर्थ विदा-सम्भाषण और दूसरा मतलब क्षमा-निवेदन भी था। रिक्शाचालक ने पैडिल पर पाँव रखा। रामरति ने रोक दिया-‘‘एक मिनट रूको !’’
वह मेरे करीब आ गई और मुझसे सटकर बोली-‘’बेला दी ने आपको चरण छूकर नमस्कार किया था। मुझे आपकी चरणधूलि की कतई जरूरत नहीं थी, लेकिन आपने हम पर अभियोग लगाकर जिस अवस्था में छोड़ दिया है, उसके निस्तार के लिए आपके पैर पकड़कर प्रार्थना भी कर सकती हूँ-दुहाई ! हमें इस कैदखाने से निकालिए आप। कलंक-मुक्त कीजिए। हमें। दुनिया हमें हमेशा गालियाँ देती रहेगी कि मिल-जुलकर आपके उपन्यास को असफल किया है।’’
रामरति सचमुच मेरे पैर पकड़कर इस तरह बैठ गई, जैसे मेले में आई हुई कोई ‘बहुरिया’ अपने बाप से मिलते ही पैर पकड़कर बैठ जाती है और रोने लगती है। मुझे लगा, रामरति भी सुर में गा-गाकर उसी तरह रो पड़ेगी। मैंने कहा-‘‘ठीक है।...वचन देता हूँ।...कसम खाता हूँ। तीसरी नहीं, चौथी ! अब उठो...।’’

‘‘नहीं, मैं तिरिया-चलित्तर’ का खेल नहीं कर रही। जो कुछ भी कह रही हूँ, बहुत दर्द से कह रही हूँ।’’
रामरति चली गई तो बहुत देर तक मैं बुद्धमूर्ति के पास खड़ा होकर सोचता रहा, ‘डाकिन-पिशाचिन’ नहीं, यह मेरी ही रची हुई रामरति थी।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book