ढोल - एम वीरप्पा मोइली Dhol - Hindi book by - M Veerappa Moili
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ढोल

एम वीरप्पा मोइली

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :155
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6668
आईएसबीएन :9788126715848

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ढोल कन्नड़ साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है...

Dhol - An Hindi Book by M. Veerappa Moili

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘ढोल’ (तेम्बरे) कन्नड़ साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो कर्नाटक के तटीय इलाके में रहने वाले सीमान्त समुदाय ‘पम्बद’ के जीवन की जटिल सांस्कृतिक प्रक्रिया-‘भूताराधना’ या नायकत्व की आराधना की गहरी छानबीन करता है। यह जटिल संस्कृति पम्बद की वंशगत वृत्ति के रूप में प्रचलित है। इस आराधना में, एक कठिन क्रिया के अन्तर्गत व्यक्तित्व का विखंडन होता है तथा सम्बन्धित व्यक्ति रूप बदलता है।

उपन्यास में कथाकार ने इस अद्भुत और पारम्परिक वृत्ति को दो पम्बद भाइयों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है, एक इस परम्परा के खिलाफ विद्रोह करता है और आधुनिक शिक्षा प्राप्त करता है। दूसरा भूताराधना की इस पद्धित को सच्चे उत्साह के साथ पुनर्स्थापित करने में लग जाता है। उनकी एक बहन है, जो पहले भाई की तरह परम्परा के खिलाफ जाकर कानून की पढाई करती है तथा अपनी जिन्दगी को स्त्री के अधिकारों के लिए समर्पित कर देती है।

कथाकार ने परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व से भरी इस कथा को रोचकता के साथ वृत्तान्त शैली में प्रस्तुत किया है।
कथाकार की सामुदायिक जिन्दगी में गहरी दिलचस्पी है। उसने पम्बद की जिन्दगी की इस सांस्कृतिक गतिशीलता को करीब से देखा है। राजनीतिक अनुभव और उनके न्याय के ज्ञान ने उनके अनुभव क्षेत्र का विस्तार किया है। दलित और स्त्री चेतना के प्रति भी इस उपन्यास में गहरी प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। कहना न होगा कि ये सारी बातें मिलकर इस उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बनाती है तथा उसे एक वैश्विक धरातल पर नए सामाजिक यथार्थ के साथ उपस्थित करती हैं।
                         डॉ. बी.ए. विवेक राय



एक जनजाति के अन्तःसत्त्व में जो परिवर्तन होते हैं और उनके मूल्यों के बीच जो संघर्ष होते हैं, उनको केवल इतिहास ही नहीं, साहित्य और दर्शन भी अपने-अपने माध्यमों से पहचानते हैं। इस अन्तःसत्त्व को केन्द्र बनाकर एम. वीरप्पा मोइली द्वारा कन्नड़ में लिखे गए उपन्यास ‘तेम्बरे’ का हिन्दी अनुवाद है-‘ढोल’! यह उपन्यास ‘एज ऑफ टाइम’ नाम से अंग्रेजी में भी छप चुका है।
ढोल कन्नड़ साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जो कर्नाटक के तटीय इलाके में रहने वाले सीमान्त समुदाय ‘पम्बद’ की जीवन की जटिल सांस्कृतिक प्रक्रिया ‘भूताराधना’ की गहरी छानबीन करता है। यह जटिल संस्कृति ’पम्बद’ की वंशगत वृत्ति के रूप में प्रचलित है।

प्रस्तुत उपन्यास में कथाकार ने इस अद्भुत और पारम्परिक वृत्ति को दो पम्बद भाइयों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है, जहाँ एक भाई इस परम्परा के खिलाफ विद्रोह करता है तो दूसरा भाई ‘भूताराधना’ की पद्धित को पुनर्स्थापित करने में सच्चे मन से जुट जाता है।

यह उपन्यास न केवल अपनी संस्कृति को बचाए रखने वालों की सांस्कृतिक अस्मिता का आईना है, वरन् उन पर भी प्रहार करता है, जो आतंक के माध्यम से न्याय पाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं।
कथाकार ने परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व से भरी इस कथा को रोचकता के साथ वृत्तान्त शैली में प्रस्तुत किया है।
दलित और स्त्री चेतना के प्रति गहरी प्रतिबद्धता इस उपन्यास को जहाँ महत्त्वपूर्ण बनाती है, वहीं एक वैश्विक धरातल पर नए सामाजिक यथार्थ के साथ उपस्थित करती है।
यह उपन्यास केवल पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि अध्ययन, बोध और गहरे आत्मचिन्तन के लिए भी है।

 

भूमिका

 

कन्नड़ भाषा में लिखे मेरे अधिकांश उपन्यास लोक आख्यानों पर केन्द्रित हैं जिनका प्रसार कर्नाटक राज्य के दक्षिण कन्नड़ जिले में खूब हुआ है। ढोल (तेम्बरे) उनमें से एक है जो दलित समाज के व्यक्तित्व-विखंडन की प्रकिया को माध्यम बनाकर उनके अस्तित्व की खोज करता है। ‘भूताराधना’ की इस प्रक्रिया की यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि आराधना की प्रक्रिया में जो व्यक्ति रात में ईश्वर की भाँति आदर-सत्कार पाता है, सुबह होते ही वह समाज के लिए अस्पृश्य होकर जीवन की मुख्यधारा में अलग-थलग पड़ जाता है। ध्यान दीजिए, यह सारा प्रभाव उस आदमी पर पड़ता है जो सत्य न्याय एवं समुदाय के गर्व के लिए, मुख्यधारा के खिलाफ संघर्ष करता है, मानवता के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देता है। यह उपन्यास न केवल अपनी संस्कृति को बचाए रखने वालों की सांस्कृतिक अस्मिता का आईना है, वरन् उन पर भी प्रहार करता है, जो आतंक के माध्यम से न्याय पाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। यह भी सत्य है कि इन आतंकियों की मृत्यु के बाद, इसी प्रकार के विभिन्न आतंकी समुदाय बने, जिन्होंने उन्हें ईश्वर के रूप में आदर दिया।

यह उपन्यास केवल पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि अध्ययन, बोध और गहरे आत्मचिन्तन के लिए भी है।
अपने प्रकाशन काल से ही यह उपन्यास सम्पूर्ण कर्नाटक में चर्चित रहा तथा इसने विभिन्न प्रकार की बहसों और विमर्शों को जन्म दिया।
हमारी प्रकृति ऐसी बन गई है कि हम अपनी संस्कृति की एक खास तस्वीर अपने मन में बसाए हुए हैं। उससे बाहर निकलने की हम कोशिश नहीं करते, जबकि हमारी संस्कृति बहुध्रुवीय है तथा उससे सभ्यता की अनेक परतें प्रतिबिम्बित होती हैं।

भूताराधना—एक तरह से ग्रीक दार्शनिक अरस्तू की ‘कैथार्सिस’ प्रक्रिया की तरह है जो मन से ‘भय’ के भाव को बाहर निकालती है। भय से मुक्ति ही द्वेष से मुक्ति का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करती है, समाज में बराबरी का भाव लाती है।

मेरे इस उपन्यास की कथा का सार यही है कि हम समाज को जटिल बनाने वाली धारणाओं से परे, मुक्त और चेतनशील समाज बनाने की दिशा में पहल करें।
इस उपन्यास का अंग्रेजी संस्करण ‘एज ऑफ टाइम’ के नाम से रूपा एंड कम्पनी से सन् 2006 में आया था।  प्रो. सी. एन. रामचन्द्रन ने उसका अंग्रेजी अनुवाद किया था।
मुझे खुशी है कि बी. आर. नारायण ने इस उपन्यास का हिन्दी में अनुवाद किया है। उनकी पत्नी श्रीमती कमला नारायण स्वयं भी एक अच्छी लेखिका हैं। उनका हर तरह का सहयोग श्री नारायण को मिलता रहा है।
इस उपन्यास का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी, हिन्दी में करने जा रहे हैं। यह मेरे लिए खुशी की बात है। इससे हिन्दी और कन्नड़ साहित्य का रिश्ता और मजबूत होगा।

 

                          एम. वीरप्पा मोइली


सिंहावलोकन

 

तुळुनाड् लोक साहित्य की वीरभूमि है। अब तक अनावृत्त न हो पाने वाले अनेक विचार तुळु संस्कृति के गर्भ में ही छिपे हैं। तुळु जनों की बन्धुत्व व्यवस्था, शोषण को निर्मूल करने की प्रतिक्रिया, विरोध करने की शक्ति—यह विश्व जीवन की दिव्य देन है। भूताराधना में सन्दि-पाडदन, भूत-वर्तमान के चलनशील सम्बन्धों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सन्दिड्न्दन लौकिक सम्प्रदाय के नीरस जगत की गहराई से कुछ रसपूर्ण क्षणों को खोद निकालता है। क्षणभर को धुँधलके से ढके जगत को विद्युत की सी अलौकिक प्रतिभा से देदीप्यमान करके अर्थपूर्ण बना देता है। हमारा देश भी एक ‘तेम्बरे’ के समान है। हमारा शरीर भी तेम्बरे के समान ही है। इस शरीर में जो कोमल भी नहीं, और कठोर भी नहीं है, इसमें सब स्थलों से ध्वनि प्रसारित करने वाले तन्तु हैं। कहाँ छेड़ने पर मेरी इच्छा तृप्त होती है यह सोचकर मैंने जगह-जगह पर छेड़ा ! वह क्षण आने पर मैं ‘मैं’ न रहा, समुद्र में गल जानेवाला एक नमक का ढेला था। एक जनजाति के अन्तःसत्त्व में जो परिवर्तन होते हैं और उनके मूल्यों के बीच जो संघर्ष होते हैं उनको केवल इतिहास ही नहीं, अपितु साहित्य और दर्शन भी अपने-अपने माध्यमों से पहचानते हैं। इस अन्तःसत्त्व को केन्द्र बनाकर मैंने इस उपन्यास की रचना की है। संसार में स्वतन्त्र रूप से जीने की इच्छा रखनेवाले व्यक्ति और समुदाय विरले होते हैं। इस उपन्यास में आनेवाले दुर्लभ पात्रों को इस स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए अपार कीमत चुकानी पड़ती है। उसमें भी अपने स्थान-मान के लिए अपने विश्वस्त तत्त्व मूल्यों के लिए त्याग करने वाले व्यक्तियों को समाज के बीच खोज पाना दुष्कर कार्य है।

कभी-कभी हमारा जीवन अपने आप शाखाओं को काट डालनेवाले पेड़-पौधों की तरह का होता है, कांड के ऊपर तले के भागकर जाने पर भी क्या चैतन्य वाहिनी का सत्व जब तक माता जड़ से भरा रहता है तब तक पौधों के जीव को कोई भय नहीं रहता। इस संजीवनी सत्व से फिर से शाखाओं से कोंपले फूट निकलती हैं और पल्लवित होती हैं। वृक्ष हरा होकर, पुष्पित होकर सारा का सारा इठला उठता है। फूल अलग, कोंपलें अलग। सिर उठाकर जीने की अदम्य इच्छा से फिर से पेड़ खूब समृद्ध होकर बढ़ता है। यह जैविक तत्त्व मनुष्य के जीवन पर भी समान रूप से लागू होता है। शायद चोट के बाद हठ और विकसित होने की शक्ति बढ़ जाती है। तेम्बरे में आनेवाली जीवन वाहिनी मोंटा से पिजन-मैरे, लकन-तनियारू, ऐता-चेन्नु, तोमु, सोमु-श्याम तक नन्दिनी नदी के समान बहती है। जीवन में भले ही कितने आघात क्यों न लगें, फिर से सिर उठाकर जीने की शक्ति, झरने की भाँति बहती ही रहती है। मैंने जहाँ जन्म लिया, घूमा-फिरा, साँस लेकर बढ़ते-बढ़ते साठ वर्ष तक निसर्ग और परिसर के एक-एक बिन्दु की शक्ति का आस्वादन करके सन्तुष्ट हुआ वह संतृप्ति और गर्व मुझमें हैं। मेरे मन में तादात्म्य पाने वाली इस मिट्टी का सार इस उपन्यास में आत्मसात होकर आया है। उस माटी के सार के साथ मैं एकात्म होकर बढ़ा हूँ। यह प्रकृति सदा जीवन के हजारों प्रश्नों का सामना करने की शक्ति देती है। इसी कारण किसी के लिए भी जहाँ वह जन्मा और पला वह परिसर बड़ा विशिष्ट होता है और महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालता है। उसके स्थान की स्फूर्ति सृजनशीलता में बाधा नहीं पहुँचाता। अपने प्रवाह को अपने आप पहचानने वाली नदी के समान बहता चलता है।

जन-प्रियता को ही दृष्टि में रखकर स्पर्धाशील साहित्य के युग में प्रवाह के विरूद्ध तैर पाना सरल नहीं। परन्तु जो लेखक उसे जीतकर आगे बढ़ सकता है वही अपनी सृजनशीलता और स्वतन्त्रता की छाप को बचाए रखकर साहित्य के साथ ऊपर ही उठ सकता है। यह काम सरल नहीं है। उसके लिए अपनी प्रत्येक कृति में विद्रोह की छाप और ऊष्मा को बचाए रखकर ही चलना चाहिए। वह व्यवस्था के संग समझौता नहीं करता। उसके साहित्य में विद्रोह दीखने पर भी मैं तो उसे सृजनशीलता का एक मुख ही मानता हूँ।

बंडाया विद्रोह के नाम पर साहित्यकार और कवियों को वर्गीकृत करने की यह प्रवृत्ति साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में रोक दी जानी चाहिए। नहीं तो यह भी एक प्रकार के वर्णभेद के आतंक की छाया में फैलता है। विचार की प्रतिभा को असहिष्णुता की कढाई में उबालकर बाहर निकालें तो अनेक विचार झुलस सकते हैं। हमारी धरती ने विविध भाषाएँ और विश्वास रखनेवाले लोगों को समान आश्रय दिया है। इसका अत्यन्त प्रमुख गुण सहनशीलता है। सभी धर्मों का सार आत्मसात करने बढ़नेवाले विशाल मनोधर्मवाला बड़प्पन हमारा है।

सार यह है कि हमारी संस्कृति स्वतन्त्र विशाल दृष्टि और पारदर्शक मनोधर्मवाली परम्परा की है। हमारे राष्ट्र के सांस्कृतिक व्यक्तित्व का ‘मार्क ट्रिवन’ ने इस प्रकार वर्णन किया है-भारत मानव जाति का पालक है। मानव की संवेदनाओं का मैका है। इतिहास की जननी है। परम्परा और इतिहास की मातामही है। ज्ञान और दर्शन की परनानी है। मानव इतिहास की अत्यन्त अमूल्य और श्रेष्ठ और उपयोगी साधनाएँ भारत में एकत्रित हैं।’ इसी प्रकार अमेरिका में एक पूर्व राजदूत ह.शी, महोदय ने यूँ लिखा है-‘भारत का अन्य देशों पर राज्य करने का विधान विशिष्ट और शान्तिपूर्ण है। उसने चीन पर धार्मिक दृष्टि से और सांस्कृतिक दृष्टि से बीस सदी तक राज्य किया। सीमा के पार भारत का एक सैनिक भी नहीं गया फिर भी भारत का राज्य चलता ही रहा। हमारी संस्कृति और धर्म की स्थापना करके उसे समृद्ध करनेवाले भगवान बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गांधी जैसे लोग थे।–इस सहनशीलता के परिसर में इस देश में वे सब पलकर महान बने। नहीं तो असहिष्णुता की समाधि के मजबूत पत्थरों के तले उनके विचार दब जाते। उनका-वसुधैव कुटुम्बकम’ का मानवतावादी सिद्धान्त संसार को प्राप्त ही न होता। ‘तेम्बरे’ में प्रतिपादित तत्त्व को प्रतिपादित करने वाली हुतात्माओं के दिव्य चरित्र राष्ट्र की बृहद सांस्कृतिक वृत्तमाला में पिरोए जाने वाले मोती बन जाएँ तो इस उपन्यास का उद्देश्य सफल होगा।


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