चन्द्रकान्ता सन्तति 1 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति 1

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :233
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6765
आईएसबीएन :81-288-1562-8

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हिन्दी का सर्वाधिक चर्चित तिलस्मी उपन्यास - प्रथम भाग

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Chandrakanta Santati-1



चन्द्रकान्ता सन्तति-1

जन्म 18 जून 1861 (आषाढ़ कृष्ण 7 संवत् 1918)। जन्मस्थान मुजफ्फरपुर (बिहार)।
बाबू देवकीनन्दन खत्री के पिता लाला ईश्वरदास के पुरखे मुल्तान और लाहौर में बसते-उजड़ते हुए काशी आकर बस गए थे। इनकी माता मुजफ्फरपुर के रईस बाबू जीवनलाल महता की बेटी थीं। पिता अधिकतर ससुराल में ही रहते थे। इसी से इनके बाल्यकाल और किशोरावस्था के अधिसंख्य़ दिन मुजफ्फरपुर में ही बीते।

हिन्दी और संस्कृत में प्रारम्भिक शिक्षा भी ननिहाल में हुई। फारसी से स्वाभाविक लगाव था, पर पिता की अनिच्छावश शुरु में उसे नहीं पढ़ सके। इसके बाद अठारह वर्ष की अवस्था में, जब गया स्थित टिकारी राज्य से सम्बद्ध अपने पिता के व्यवसाय में स्वतंत्र रूप से हाथ बँटाने लगे तो फारसी और अंग्रेजी का भी अध्ययन किया। 24 वर्ष की आयु में व्यवसाय सम्बन्धी उलट-फेर के कारण वापस काशी आ गए और काशी नरेश के कृपापात्र हुए। परिणामतः मुसाहिब बनना तो स्वीकार न किया, लेकिन राजा साहब की बदौलत चकिया और नौगढ़ के जंगलो का ठेका पा गए। इससे उन्हें आर्थिक लाभ भी हुआ और वे अनुभव भी मिले जो उनके लेखकीय जीवन में काम आए। वस्तुतः इसी काम ने उनके जीवन की दिशा बदली।

स्वभाव से मस्तमौला, यारबाश किस्म के आदमी और शक्ति के उपासक। सैर-सपाटे, पतंगबाजी और शतरंज के बेहद शौकीन। बीहड़ जंगलों, पहाड़ियों और प्राचीन खँडहरों से गहरा, आत्मीय लगाव रखने-वाले। विचित्रता और रोमांचप्रेमी। अद्भुत स्मरण-शक्ति और उर्वर, कल्पनाशील मस्तिष्क के धनी।
चन्द्रकान्ता पहला ही उपन्यास, जो सन् 1888 में प्रकाशित हुआ। सितम्बर 1898 में लहरी प्रेस की स्थापना की। ‘सुदर्शन’ नामक मासिक पत्र भी निकाला। चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति (छः भाग) के अतिरिक्त देवकीनन्दन खत्री की अन्य रचनाएँ हैं नरेन्द्र-मोहिनी, कुसुम कुमारी, वीरेन्द्र वीर या कटोरा-भर खून, काजल की कोठरी, गुप्त गोदना तथा भूतनाथ (प्रथम छः भाग)।


पहिला भाग

पहिला बयान


नौगढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के लड़के बीरेन्द्रसिंह की शादी विजयगढ़ के महाराज जयसिंह की लड़की चन्द्रकान्ता के साथ हो गयी। बारात-वाले दिन तेजसिंह की आखिरी दिल्लगी के सबब चुनार के महाराज शिवदत्त को मशालची बनना पड़ा। बहुतों की यह राय हुई कि महाराज शिवदत्त का दिल अभी तक साफ नहीं हुआ इसलिए अब इनको कैद ही में रखना मुनासिब है, मगर महाराज सुरे्न्द्रसिंह ने इस बात को नापसन्द करके कहा कि ‘महाराज शिवदत्त को हम छोड़ चुके हैं, इस वक्त जो तेजसिंह से उनकी लड़ाई हो गयी, यह हमारे साथ वैर रखने का सबूत नहीं हो सकता। आखिर महाराज शिवदत्त क्षत्रिय हैं, जब तेजसिंह उनकी सूरत बन बेइज्जती करने पर उतारू हो गए तो यह देखकर भी वह कैसे बर्दाश्त कर सकते थे ? मैं यह भी नहीं कह सकता कि महाराज शिवदत्तका दिल हम लोगों की तरफ से बिल्कुल साफ हो गया क्योंकि अगर उनका दिल साफ ही हो जाता तो इस बात को छिपकर देखने के लिए आने की जरूरत क्या थी ? तो भी यह समझकर कि तेजसिंह के साथ इनकी यह लड़ाई हमारी दुश्मनी के सबब नहीं कही जा सकती, हम फिर इनको छोड़ देते हैं। अगर अब भी ये हमारे साथ दुश्मनी करेंगे तो क्या हर्ज है, ये भी मर्द हैं और हम भी मर्द हैं, देखा जाएगा’।

महाराज शिवदत्त फिर छूटकर कहाँ चले गए। वीरेन्द्रसिंह की शादी होने के बाद महाराज सुरेन्द्रसिंह और जयसिंह की राय से चपला की शादी तेजसिंह के साथ और चम्पा की शादी देवीसिंह के साथ की गयी। चम्पा दूर के नाते में चपला की बहिन होती थी।

बाकी सब ऐयारों की शादी भी हुई थी। उन लोगों की घर-गृहस्थी चुनार ही में थी, अदल-बदल करने की जरूरत न पड़ी क्योंकि शादी होने के थोड़े ही दिन बाद बड़े धूमधाम के साथ कुँवर बीरेन्द्रसिंह चुनार की गद्दी पर बैठाए गए और कुँअर छोड़ राजा कहलाने लगे। तेजसिंह उनके राजदीवान मुकर्रर हुए और इसलिए सब ऐयारों को भी चुनार ही में रहना पड़ा।
सुरेन्द्रसिंह अपने लड़के को आँखों के सामने से हटाना नहीं चाहते थे, लाचार नौगढ़ की गद्दी फतहसिंह के सुपुर्द कर वे भी चुनार ही रहने लगे, मगर राज्य का काम बिल्कुल बीरेन्द्रसिंह के जिम्मे था, हाँ कभी-कभी राय दे देते थे। तेजसिंह के साथ जीतसिंह भी बड़ी आजादी के साथ चुनार में रहने लगे। महाराज सुरेन्द्रसिंह और जीतसिंह में बहुत मुहब्बत थी और यह मुहब्बत दिन-दिन बढ़ती गयी। असल में जीतसिंह इसी लाय़क थे कि उनकी जितनी कदर की जाती थोड़ी थी। शादी के दो बरस बाद चन्द्रकान्ता को लड़का पैदा हुआ। उसी साल चपला और चम्पा को भी लड़का पैदा हुआ। इसके तीन बरस बाद चन्द्रकान्ता ने दूसरे लड़के का मुख देखा। चन्द्रकान्ता के बड़े लड़के का नाम इन्द्रजीतसिंह, छोटे का नाम आनन्दसिंह, चपला के लड़के का नाम भैरोसिंह और चम्पा के लड़के का नाम तारासिंह रखा गया।

जब ये चारो लड़के कुछ बड़े और बातचीत करने लायक हुए तब इनके लिखने-पढ़ने और तालीम का इन्तजाम किया गया और राजा सुरेन्द्रसिंह ने इन चारों लड़को को जीतसिंह की शागिर्दी और हिफाजत में छोड़ दिया। भैरोसिंह और तारासिंह ऐयारी के फन में बड़े तेज और चालाक निकले। इनकी ऐयारी का इम्तिहान बराबर लिया जाता था। जीतसिंह का हुक्म था कि भैरोंसिंह और तारासिंह कुल ऐयारों को बल्कि अपने बाप तक को धोखा देने की कोशिश करें और इसी तरह पन्नालाल वगैरह ऐयार भी उन दोनों लड़को को भुलावा दिया करें। धीरे-धीरे ये दोनों लड़के इतने तेज और चालाक हो गए कि पन्नालाल वगैरह की ऐयारी इनके सामने दब गई।
भैरोंसिंह और तारासिंह, इन दोनों में चालाक ज्यादे कौन था इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, आगे मौका पड़ने पर आप ही मालूम हो जाएगा, हाँ इतना कह देना जरूरी है कि भैरोसिंह को इंद्रजीतसिंह के साथ और तारासिंह को आनन्दसिंह के साथ ज्यादे मुहब्बत थी।
चारों लड़के होशियार हुए अर्थात इन्द्रजीतसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह की उम्र अठ्ठारह वर्ष की और आनन्दसिंह की उम्र पन्द्रह वर्ष की हुई। इतने दिनों तक चुनार राज्य में बराबर शान्ति रही बल्कि पिछली तकलीफें और महाराज शिवदत्त की शैतानी एक स्वप्न की तरह सभों के दिल में रह गयी।

इन्द्रजीतसिंह को शिकार का बहुत शौक था, जहां तक बन पड़ता वे रोज शिकार खेला करते। एक-दिन किसी बनरखे ने हाजिर होकर बयान किया कि इन दिनों फलाने जंगल की शोभा खूब बढ़ी-चढ़ी है और शिकार के जानवर भी इतने आये हुए हैं कि अगर वहां महीना-भर टिककर शिकार खेला जाए तो भी न घटे और कोई दिन खाली न जाए। यह सुन दोनों भाई बहुत खुश हुए। आपने बाप राजा बीरेन्द्रसिंह से शिकार खेलने की इजाजत माँगी और कहा कि ‘हम लोगों का इरादा आठ दिन तक जंगल में रहकर शिकार खेलने का है’। इसके जवाब में राजा बीरेन्द्रसिंह ने कहा कि ‘इतने दिनों तक जंगल में रहकर शिकार खेलने का हुक्म मैं नहीं दे सकता-अपने दादा से पूछो अगर वे हुक्म दें तो कोई हर्ज नहीं।
यह सुनकर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने आपने दादा महाराज सुरेन्द्रसिंह के पास जाकर अपना मतलब अर्ज किया। उन्होंने खुशी से मंजूर किया और हुक्म दिया कि शिकारगाह में इन दोनों के लिए खेमा खड़ा किया जाए और जब तक ये शिकारगाह में रहें पाँच सौ फौज बराबर इनके साथ रहे।
शिकार खेलने का हुक्म पा इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह बहुत खुश हुए और अपने दोनों ऐयार भैरोसिंह और तारासिंह को साथ ले मय पाँच सौ फौज के चुनार से रवाना हुए।

चुनार से पाँच कोस दक्षिण एक घने और भयानक जंगल में पहुंचकर उन्होंने डेरा डाला। दिन थोडा़ बाकी रह गया इसलिए यह राय ठहरी कि आराम करें, कल सवेरे शिकार का बन्दोबस्त किया जाए मगर बनरखों*
*जंगलों की हिफाजत के लिए जो नौकर रहते हैं उनको बनरखे कहते हैं। शिकार खेलाने का काम बनरखों का ही है। ये लोग जंगल में घूम-घूमकर और शिकारी जानवरों के पैर का निशान देख और उसी अन्दाज पर जाकर पता लगाते हैं कि शेर इत्यादि कोई शिकारी जानवर इस जंगल में है या नही, अगर है तो कहाँ है। बनरखों का काम है कि अपनी आँखों से देख आवें तब खबर करें कि फलानी जगह पर शेर, चीता या भालू है।
को शेर का पता लगाने के लिए आज ही कह दिया जायगा भैंसा*बाँधने की कोई जरूरत नहीं, शेर का शिकार पैदल ही किया जायगा।

दूसरे दिन सवेरे बनरखों ने हाजिर होकर उनसे अर्ज किया कि इस जंगल में शेर तो है मगर रात हो जाने के सबब में हम लोग उन्हें अपनी आँखों से न देख सके, अगर आज के दिन शिकार न खेला जाय तो हम लोग देखकर उनका पता दे सकेंगे।
आज के दिन भी शिकार खेलना बन्द किया गया। पहर-भर दिन बाकी रहे इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह घोड़ों पर सवार हो अपने दोनों ऐयारों को साथ ले घूमने और दिल बहलाने के लिए डेरे से बाहर निकले और टहलते हुए दूर तक चले गये।
ये लोग धीरे-धीरे टहलते और बातें करते जा रहे थे कि बाईं तरफ से शेर के गरजने की आवाज आयी जिसे सुनते ही चारों अटक गए और घूम कर उस तरफ देखने लगे जिधर से आवाज आयी थी।
लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक साधू शेर पर सवार जाता दिखाई पड़ा जिसकी लम्बी-लम्बी और घनी जटाएँ पीछे की तरफ लटक रही थीं- एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में शंख लिए हुए था। इसकी सवारी का शेर बहुत
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• खास शेर के शिकार में भैंसा बाँधा जाता है। भैंसा बाँधने के दो कारण हैं।

एक तो शिकार को अटकाने के लिए अर्थात जब बनरखा आकर खबर दे कि फलाने जंगल में शेर है, उस वक्त या कई दिनों तक अगर शिकार खेलने वाले को किसी कारण शिकार खेलने की फुरसत न हुई और शेर को अटकाना चाहा तो भैंसा बाँधने का हुक्म दिया जाता है। बनरखे भैंसा ले जाते हैं और जिस जगह शेर का पता लगता है उसके पास ही किसी भयानक और सायेदार जंगल या नाले में मजबूत खूँटा गाड़कर भैंसे को बाँध देते हैं। जब शेर भैंसे की बू पाता है तो वहीं आता है और भैंसे को खाकर उसी जंगल में कई दिनों तक मस्त और बेफिक्र पड़ा रहता है। इस तरकीब से दो-चार भैंसा देकर महीनों शेर को अटका लिया जाता है। शेर को जब तक खाने के लिए मिलता है, वह दूसरे जंगल में नहीं जाता। शेर का पेट अगर एक दफे खूब भर जाय तो उसे सात-आठ दिनों तक खाने की परवाह नहीं रहती। खुले भैंसे को शेर जल्दी नहीं मार सकता।
दूसरे जब मचान बाँधकर शेर का शिकार किया चाहते हैं या एक जंगल से दूसरे जंगल में अपने सुबीते के लिए, उसे ले जाया चाहते हैं, तब इसी तरह भैंसे बाँधकर हटाते जाते हैं। इसको शिकारी लोग ‘मरी’ भी कहते हैं। बड़ा था और उसके गर्दन के बाल, जमीन तक लटक रहे थे।

इसके आठ-दस हाथ पीछे एक शेर और जा रहा था जिसकी पीठ पर आदमी के बदले बोझ लदा हुआ नजर आया। शायद यह असबाब उन्हीं शेर-सवार महात्मा का हो।
शाम हो जाने के सबब साधू की सूरत साफ मालूम न पड़ी तो भी उसे देख इन चारों को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और कई तरह की बातें सोचने लगे।
इन्द्र: इस तरह शेर पर सवार होकर घूमना मुश्किल है।
आनन्द: कोई अच्छे महात्मा मालूम होते हैं।
भैरो: पीछेवाले शेर को देखिए जिस पर असबाब लदा हुआ है, किस तरह भेड़ की तरह सिर नीचा किये जा रहा है।
तारा: जी चाहता है उनके पास चलकर दर्शन करें।
आनन्द: अच्छी बात है, चलिए पास से देखें कैसा शेर है।
तारा: बिना पास गए महात्मा और पाखण्डी में भेद न मालूम होगा।

भैरो: शाम तो हो गई है, खैर चलिए आगे से बढ़कर रोकें।
आनन्द: आगे से चलकर रोकने से बुरा न मानें !
भैरो: हम ऐयारों का पेशा ही ऐसा है कि पहिले तो उनका साधु होना ही विश्वास नहीं करते !
इन्द्र: आप लोगों की क्या बात है, जिनकी मूँछ हमेशे ही मुड़ी रहती हैं, खैर चलिए तो सही।
भैरो: चलिए !

चारो आदमी आगे घूमकर बाबाजी के सामने गये जो शेर पर सवार जा रहे थे। इन लोगों को अपने पास आते देख बाबाजी रुक गए। पहिले तो इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देखकर अड़े मगर फिर ललकारने से आगे बढ़े। थोड़ी दूर जाकर दोनों भाई घोड़ों के ऊपर से उतर पड़े, भैरोसिंह और तारासिंह ने दोनों घोड़ों को पेड़ से बाँध दिया, इसके बाद पैदल ही चारों आदमी महात्मा के पास पहुँचे।
बाबाजीः (दूर ही से) आओ राजकुमार इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह-कहो कुशल तो है ?
इन्द्र: (प्रणाम करके) आपकी कृपा से सब मंगल है।
बाबा: (भैरोसिंह और तारासिंह की तरफ देखकर) कहो भैरो और तारा अच्छे हो ?
दोनो: (हाथ जोड़कर) आपकी दया से !

बाबा: राजकुमार, मैं खुद तुम लोगों के पास जाने को था क्योंकि तुमने शेर का शिकार करने के लिए इस जंगल में डेरा डाला है। मैं गिरनार जा रहा हूं, घूमता-फिरता इस जंगल में भी आ पहुँचा। यह जंगल अच्छा मालूम होता है इसलिए दो-तीन दिन तक यहाँ रहने का विचार है, कोई अच्छी जगह देखकर धूनी लगाऊँगा। मेरे साथ सवारी और असबाब लादने के कई शेर हैं, इसलिए कहता हूँ कि धोखे में मेरे किसी शेर को मत मारना, नहीं तो मुश्किल होगी, सैकड़ों शेर बहुंचकर तुम्हारे लश्कर में हलचल मचा डालेंगे और बहुतों की जान जायगी। तुम प्रतापी राजा सुरेन्द्रसिंह के लड़के हो इसलिए तुम्हें पहिले ही से समझा देना मुनासिब है जिसमें किसी तरह का दुख न हो।
इन्द्र: महाराज मैं कैसे जानूँगा कि यह आपका शेर है ? ऐसा ही है तो शिकार न खेलूँगा।
बाबा: नहीं तुम शिकार खेलो, मगर मेरे शेरों को मत मारो !

इन्द्र: मगर यह कैसे मालूम होगा कि फलाना शेर आपका है ?
बाबा: देखो मैं अपने शेरों को बुलाता हूं पहिचान लो।
बाबाजी ने शंख बजाया। भारी शंख की आवाज चारो तरफ जंगल में गूँज गयी और हर तरफ से गुर्राहट की आवाज आने लगी। थोड़ी ही देर में इधर-उधर से दौड़ते हुए पाँच शेर और आ पहुँचे। ये चारों दिलावर और बहादुर थे, अगर कोई दूसरा होता तो डर से उसकी जान निकल जाती। इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के घोड़े शेरों को देखकर उछलने-कूदने लगे मगर रेशम की मजबूत बागडोर से बँधे हुए थे इससे भाग न सके। इन शेरों ने आकर बड़ी उधम मचायी-इन्द्रजीतसिंह वगैरह को देख गरजने-कूदने और उछलने लगे, मगर बाबाजी के डाँटते ही सब ठण्डे हो, सिर नीचा कर भेंड़-बकरी की तरह खड़े हो गए।

बाबा: देखो इन शेरों को पहिचान लो, अभी दो-चार और हैं, मालूम होता है, उन्होंने शंख की आवाज नहीं सुनी। खैर अभी तो मैं इसी जँगल में हूं, उन बाकी शेरों को भी दिखला दूँगा-कल भर शिकार और बन्द रक्खो।
भैरो: फिर आपसे मुलाकात कहाँ होगी ? आपकी धूनी किस जगह लगेगी ?
बाबा: मुझे तो यही जगह आनन्द की मालूम होती है, कल इसी जगह आना मुलाकात होगी।
बाबाजी शेर से नीचे उतर पड़े और जितने शेर उस जगह आये थे वे सब बाबाजी के चारो तरफ घूमने तथा मुहब्बत से उनके बदन को चाटने तथा सूँघने लगे। ये चारो आदमी थोड़ी देर वहां और अटकने के बाद बाबाजी से विदा हो खेमे में गये।

जब सन्नाटा हुआ तो भैरोसिंह ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, ‘‘मेरे दिमाग में इस समय बहुत -सी बाते घूम रही हैं। मैं चाहता हूँ कि हम लोग चारो आदमी एक जगह बैठ कुमेटी कर कुछ राय पक्की करें।’’
इन्द्रजीतसिंह ने कहा, ‘‘अच्छा आनन्द और तारा को भी इसी जगह बुला लो।’’
भैरोसिंह गए और आनन्दसिंह और तारासिंह को उसी जगह बुला लाये। उस वक्त सिवाय इन चारों के उस खेमे में और कोई न रहा। भैरोसिंह ने अपने दिल का हाल कहा जिसे सभों ने बड़े गौर से सुना, इसके बाद पहर-भर तक कुमेटी करके निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।
यह कुमेटी कैसी रही भई, भैरोसिंह का क्या इरादा हुआ और उन्होंने क्या निश्चय किया तथा रात-भर ये लोग क्या करते रहे, इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, समय पर सब भेद खुल जायगा।

सवेरा होते ही चारों आदमी खेमें से बाहर हुए और अपनी फौज के सरदार कंचनसिंह को बुला, कुछ समझा बाबाजी की तरफ रवाना हुए। जब लश्कर से दूर निकल गये, आनन्दसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह तो तेजी के साथ चुनार की तरफ रवाना हुए और इन्द्रजीतसिंह अकेले बाबाजी से मिलने गए।
बाबाजी शेरों के बीच धूनी रमाए बैठे थे। दो शेर उनके चारो तरफ घूम-घूमकर पहरा दे रहे थे। इन्द्रजीतसिंह ने पहुँचकर प्रणाम किया और बाबाजी ने आशिर्वाद देकर बैठने के लिए कहा।
इन्द्रजीतसिंह ने बनिस्बत कल के आज दो शेर और ज्यादे देखे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद बातचीत होने लगी।
बाबा: कहो इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारे भाई और ऐयार कहां रह गए, वे नहीं आये ?
इन्द्र: हमारे छोटे भाई आनन्दसिंह को बुखार आ गया, इस सबब से वह नहीं आ सका। उसी के हिफाजत में दोनों ऐयारों को छोड़, मैं अकेला आपके दर्शन को आया हूं।
बाबा: अच्छा क्या हर्ज है, आज शाम तक वह अच्छे हो जायेंगे, कहो आजकल तुम्हारे राज्य में कुशल तो है ?
इन्द्र: आपकी कृपा से सब आनन्द है।

बाबा: बेचारे बीरेन्द्रसिंह ने भी बड़ा कष्ट पाया ? खैर जो हो दुनिया में उनका नाम रह जायगा। इस हजार वर्ष के अन्दर कोई ऐसा राजा नहीं हुआ-जिसने तिलिस्म तोड़ा हो। एक और तिलिस्म है, असल में वही भारी और तारीफ के लायक है।
इन्द्र: पिताजी तो कहते हैं कि वह तिलिस्म तेरे हाथ से टूटेगा।
बाबा: हां ऐसा ही होगा, वह जरूर तुम्हारे हाथ से फतह होगा इसमें कोई सन्देह नहीं।
इन्द्र: देखें कब तक ऐसा होता है, उसकी ताली का तो कहीं पता नहीं लगता।
बाबा: ईश्वर चाहेगा तो एक ही दो दिन में तुम उस तिलिस्म को तोड़ने में हाथ लगा दोगे, उस तिलिस्म की ताली मैं हूं, कई पुश्तो से हम लोग उस तिलिस्म के दरोगा होते चले आये हैं। मेरे पर-दादा, दादा और बाप उसी तिलिस्म के दरोगा थे, जब मेरे पिता का देहान्त होने लगा, तब उन्होंने उसकी ताली मेरे सुपुर्द कर मुझे उसका दरोगा मुकर्रर कर दिया। अब वक्त आ गया है कि मैं उसकी ताली तुम्हारे हवाले करूँ क्योंकि वह तिलिस्म तुम्हारे नाम पर बांधा गया है और सिवाय तुम्हारे कोई दूसरा उसका मालिक नहीं बन सकता।
इन्द्र: तो अब देर क्या है ?

बाबा: कुछ नहीं, कल से तुम उसके तोड़ने में हाथ लगा दो, मगर एक बात तुम्हारे फायदे की हम कहते हैं।
इन्द्र: वह क्या ?
बाबा: तुम उसके तोड़ने में अपने भाई आनन्द को भी शरीक कर लो, ऐसा करने से दौलत भी दूनी मिलेगी और नाम भी दोनों भाइयों का दुनिया में हमेशा के लिए बना रहेगा।
इन्द्र: उसकी तो तबियत ही ठीक नहीं !
बाबा: क्या हर्ज है ! तुम अभी जाकर जिस तरह बने उसे मेरे पास ले आओ, मैं बात की बात में उसको चंगा कर दूँगा। आज ही, तुम लोग मेरे साथ चलो, जिसमें कल तिलिस्म टूटने में हाथ लग जाय, नहीं तो साल भर फिर मौका न मिलेगा।
इन्द्र: बाबाजी असल तो यह है कि मैं अपने भाई की बढ़ती नहीं चाहता, मुझे यह मंजूर नहीं कि मेरे साथ उसका भी नाम हो।

बाबा: नहीं नहीं, तुम्हें ऐसा न सोचना चाहिए, दुनिया में भाई से बढ़-के कोई रत्न नहीं है।
इन्द्र: जी हाँ दुनिया में भाई से बढ़कर रत्न नहीं तो भाई से बढ़-के कोई दुश्मन भी नहीं, यह बात मेरे दिल में ऐसी बैठ गयी है कि उसके हटाने के लिए ब्रह्मा भी आकर समझावें-बुझावें तो भी कुछ नतीजा न निकलेगा।
बाबा: बिना उसको साथ लिये तुम तिलिस्म नहीं तोड़ सकते।
इन्द्र: (हाथ जोड़कर) बस तो जाने दीजिए, माफ कीजिए, मुझे तिलिस्म तोड़ने की जरूरत नहीं।
बाबा: क्या तुम्हें इतनी जिद है ?
इन्द्र: मैं कह जो चुका कि ब्रह्मा भी मेरी राय पलट नहीं सकते।
बाबा: खैर तब तुम्हीं चलो, मगर इसी वक्त चलना होगा।
इन्द्र: हाँ हाँ, मैं तैयार हूं, अभी चलिए।

बाबाजी उसी समय उठ खड़े हुए। अपनी गठड़ी-मुठड़ी बाँध एक शेर पर लाद दिया तथा दूसरे पर आप सवार हो गये। इसके बाद एक शेर की तरफ देखकर कहा, ‘‘बच्चा गंगाराम यहां तो आओ !’’ वह शेर तुरन्त इनके पास आया। बाबाजी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, ‘‘तुम इस पर सवार हो लो।’ इन्द्रजीतसिंह कूदकर सवार हो गये और बाबाजी के साथ-साथ दक्षिण का रास्ता लिया। बाबाजी के साथी शेर भी कोई आगे, कोई पीछे, कोई बायें कोई दाहिने हो बाबाजी के साथ जाने लगे।
सब शेर तो पीछे रह गए मगर दो शेर जिन पर बाबाजी और इन्द्रजीतसिंह सवार थे आगे निकल गये। दोपहर तक ये दोनों चले गये। जब दिन ढलने लगा बाबाजी ने इन्द्रजीतसिंह से कहा, ‘‘यहाँ ठहरकर कुछ खा पी-लेना चाहिए।’’ इसके जवाब में कुमार बोले, ‘‘खाने पीने की जरूरत नहीं। आप महात्मा ही ठहरे, मुझे कोई भूख नहीं लगी है, फिर अटकने की क्या जरूरत है ? जिस काम में पड़े, उसमें सुस्ती करना ठीक नहीं !’’

बाबाजी ने कहा ‘‘शाबास, तुम बड़े बहादुर हो, अगर तुम्हारा दिल इतना मजबूत न होता तो तिलिस्म तुम्हारे ही हाथों से टूटेगा, ऐसा बड़े लोग न कह जाते। खैर, चलो।’’
कुछ दिन बाकी रहा जब ये लोग एक पहाड़ी के नीचे पहुँचे। बाबाजी ने शंख बजाया, थोड़ी ही देर में चारों तरफ सैकड़ों पहाड़ी लुटेरे हाथ में बरछे लिए आते हुये दिखाई पड़े और ऐसे ही बीस-पच्चीस आदमियों को साथ लिए पूरब तरफ से आता हुआ राजा शिवदत्तनजर पड़ा, जिसे देखते ही इन्द्रजीतसिंह ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘इनको मैं पहिचान गया, यही महाराज शिवदत्तहैं। इनकी तस्वीर मेरे कमरे में लटकी हुई है।
दादाजी ने इनकी तस्वीर मुझे दिखाकर कहा था कि हमारे सबसे भारी दुश्मन यही महाराज शिवदत्तहैं। ओफ ओह, हकीकत में बाबाजी ऐयार हो निकले, जो सोचा था वही हुआ ! खैर क्या हर्ज है, इन्द्रजीतसिंह को गिरफ्तार कर लेना जरा टेढ़ी खीर है !!’’
शिवदत्तः ( पास पहुँचकर) मेरा आधा कलेजा तो ठण्डा हुआ, मगर अफसोस तुम दोनों भाई हाथ न आये।
इन्द्रजीत: जी इस भरोसे में न रहियेगा कि इन्द्रजीतसिंह को फँसा लिया। उनकी तरफ बुरी निगाह से देखना भी काम रखता है।
ग्रन्थकर्ताः भला इसमें भी कोई शक है !!

दूसरा बयान


इस जगह पर थोड़ा-सा हाल महाराज शिवदत्तका भी बयान करना मुनासिब मालूम होता है। महाराज शिवदत्तको हर तरह से कुँअर बीरेन्द्रसिंह के मुकाबले में हार माननी पड़ी। लाचार उसने शहर छोड़ दिया और अपने कई पुराने खैरख्वाहों को साथ ले चुनार के दक्खिन की तरफ रवाना हुआ।
चुनार से थोड़ा दूर दक्खिन लम्बा-चौड़ा घना जंगल है। यह बिन्ध्य के पहाड़ी जंगल का सिलसिला राबर्ट सगंज सरगुजा तूर सिंगरौली होता हुआ सैकड़ो कोस तक चला गया है। जिसमें बड़े-बड़े पहाड़, घाटियाँ, दर्रे और खोह पड़ते हैं। बीच में दो-दो चार-चार कोस के फासले पर गाँव भी आबाद हैं। कहीं-कहीं पहाड़ों पर पुराने जमाने के टूटे-फूटे अलीशान किले अभी तक दिखायी पड़ते हैं। चुनार से आठ-दस कोस दक्षिण अहरौरा के पास पहाड़ पर पुराने जमाने के बर्बाद एक किले का निशान आज भी देखने से चित्त का भाव बदल जाता है।


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