चन्द्रकान्ता सन्तति 3 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati 3 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति 3

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6767
आईएसबीएन :81-284-0039-8

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हिन्दी का सर्वाधिक चर्चित तिलस्मी उपन्यास - तीसरा भाग

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Chandrakanta Santati-3


नौवाँ भाग

पहिला बयान

अब वह मौका आ गया है कि हम अपने पाठकों को तिलिस्म के अन्दर ले चलें और वहाँ की सैर करावें, क्योंकि कुँअर इन्द्रजीत सिंह और आनन्दसिंह मायारानी के तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा विराजे हैं, जिसे एक तरह पर तिलिस्म का दरवाजा कहना चाहिए। ऊपर के भाग में यह लिखा जा चुका है कि भैरोसिंह को रोहतासगढ़ की तरफ और राजा गोपालसिंह और देविसिंह को काशी की तरफ रवाना करने के बाद इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेजसिंह, तारासिंह, शेरसिंह और लाडिली को साथ लिए हुए कमलिनी तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जा पहुँची और उसने राजा गोपालसिंह के कहे अनुसार देवमन्दिर में, जिसका हाल आगे चलकर खुलेगा, डेरा डाला। हमने कमलिनी और कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह को दरोगावाले मकान के पास के एक टीले पर ही पहुँचाकर छोड़ दिया था, और यह नहीं लिखा कि वे लोग तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में किस राह से पहुँचे या वह रास्ता किस प्रकार का था। खैर, हमारे पाठक महाशय ऐयारों के साथ कई दफे उस तिलिस्मी बाग में जाँयगे, इसलिए वहाँ के रास्ते का हाल उनसे छिपा न रह जायगा।

तिलिस्मी बाग का चौथा दर्जा अद्भुत और भयानक रस का खजाना था। वहाँ का पूरा हाल तो तब मालूम होगा, जब तिलिस्म बखूबी टूट जायगा, मगर जाहिरी हाल, जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और उनके साथियों ने वहाँ पहुँचने के साथ ही देखा, हम इस जगह लिख देते हैं।

उस हिस्से में फूल-फल और पत्ते की किस्म में से ऐसा कुछ विशेष न था जिससे हम उसे बाग कहते। हाँ, चारों तरफ तरह-तरह की इमारतें जरूर बहुतायत से बनी हुई थीं, जिनका हाल हम उस देवमन्दिर को मध्य मानकर लिखते हैं, जिसमें इस समय हमारे दोनों कुमार और दोनों नेक दिल खैरख्वाह और मुहब्त का नमूना दिखानेवाली नायिकाएँ तथा उनके साथी लोग विराज रहे हैं। जैसाकि नाम से समझा जाता है, वह देवमन्दिर वास्तव में कोई मन्दिर या शिवालय नहीं था, वह केवल एक मकान सुर्ख पत्थर का बना हुआ था, जिसमें दस हाथ की कुर्सी के ऊपर चालीस खम्भों का केवल एक अपूर्व कमरा था, जिसके बीचोबीच में दस हाथ के घेरे का एक गोल खम्भा था और उस पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। बस इसके अतिरिक्त देवमन्दिर में और कोई बात न थी।

उस देवमन्दिरवाले कमरे में जाने के लिए जाहिर में कोई भी रास्ता न था, इसके सिवाय एक बात यह और थी कि कमरा चारों तरफ से परदेनुमा ऊँची दीवारों से ऐसा घिरा हुआ था कि उसके अन्दर रहनेवाले आदमियों को बाहर से कोई देख नहीं सकता था। उस देवमन्दिर के चारों तरफ थोड़ी-सी जमीन में बाग की पक्की क्यारियाँ बनी हुई थीं और उनमें तरह-तरह के पेड़ लगे हुए थे, मगर ये पेड़ सच्चे न थे, बल्कि एक प्रकार की धातु से बने हुए थे और असली मालूम होने के लिए उन पर तरह-तरह के रंग चढ़े हुए थे, यदि इस ख्याल से उसे हम बाग कहें तो हो भी सकता है, और ताज्जुब नहीं कि इन्हीं पेड़ों की वजह से वह हिस्सा बाग के नाम से पुकारा भी जाता हो। उस नकली बाग में दो-दो आदमियों के बैठने लायक कई कुर्सियाँ भी जगह-जगह बनी हुई थीं उन क्यारियों के चारों तरफ छोटी-छोटी कई कोठरियाँ और मकान भी थे, जिनका अलग-अलग हाल लिखना इस समय आवश्यक नहीं, मगर उन चार मकानों का हाल लिखे बिना काम न चलेगा, जोकि देवमन्दिर या यों कहिए कि इस नकली बाग के चारों तरफ, एक-दूसरे के मुकाबले में बने हुए थे, और जिन चारों ही मकानों के बगल में एक कोठरी, और कोठरी से थोड़ी दूर के फासले पर एक-एक कूँआ भी बना हुआ था।

पूरब तरफवाले मकान के चारों तरफ पीतल की ऊँची दीवार थी, इसलिए उस मकान का केवल ऊपरवाला हिस्सा दिखायी देता था, और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ, छत के ऊपर एक लोहे का पतला महराबदार खम्भा निकला हुआ जरूर दिखायी दे रहा था, जिसका दूसरा सिरा उसके पासवाले कूँए के अन्दर गया हुआ था। उस मकान के चारों तरफ जो पीतल की दीवार थी, उसी में एक बन्द दरवाजा भी दिखायी देता था, जिसके दोनों तरफ पीतल के दो-दो आदमी हाथ में नंगी तलवारें लिये खड़े थे।

पश्चिम तरफवाले मकान के दरवाजे पर हड्डियों का एक बड़ा ढेर था, और उसके बीचोबीच में लोहे की एक जंजीर गड़ी थी, जिसका दूसरा सिरा उसके पासवाले कूँए के अन्दर गया हुआ था।
उत्तर तरफवाला मकान गोलाकार स्याह पत्थर का बना हुआ था, और उसके चारों तरफ चर्खियाँ और तरह-तरह के कल-पुर्जे लगे हुए थे। इसी मकान के पासवाले कूँए के अन्दर मायारानी अपने पति का काम तमाम करने के लिए गयी थी।
दक्खिन की तरफवाले मकान के ऊपर चारों कोनों पर चार बुर्जियाँ थीं, और उनके ऊपर लोहे का जाल पड़ा हुआ था। उन चारों बुर्जियों पर (जाल के अन्दर) चार मोर न मालूम किस चीज के बने हुए थे, जो हर वक्त नाचा करते थे।
आज उसी देवमन्दिर के कमरे में दोनों कुमार, कमलिनी, लाडिली और ऐयार लोग बैठे आपुस में कुछ बातें कर रहे हैं। रिक्तगन्थ अर्थात् किसी के खून से लिखी हुई किताब, कुँअर इन्द्रजीतसिंह के हाथों में है, और वह बड़े प्रेम से उसकी जिल्द देख रहे हैं, मगर अभी तक उस किताब को पढ़ने की नौबत नहीं आयी है। कमलिनी मुहब्बत की निगाह से इन्द्रजीतसिंह को देख रही है, और उसी तरह लाडिली भी छिपी निगाहें आनन्दसिंह पर डाल रही है।

कमलिनी: (इन्द्रजीतसिंह से) अब आपको चाहिए कि जहाँ तक जल्द हो सके, यह रिक्तगन्थ पढ़ जाँय।
इन्द्रजीत: हाँ, मैं भी यही चाहता हूँ, परन्तु पहिले उन कामो से छुट्टी पा लेना चाहिए, जिनके लिए तेजसिंह चाचा और ऐयारों को हम लोग यहाँ तक साथ लाये हैं।
कमलिनी: मैं इन लोगों को केवल रास्ता दिखाने के लिए यहाँ तक लायी थी, सो काम तो हो ही चुका, अब इन लोगों को यहाँ से जाना और कोई नया काम करना चाहिए, और आपको भी रिक्तगन्थ पढ़ने के बाद तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगा देना चाहिए।
इन्द्रजीत: राजा गोपालसिंह ने कहा था कि किशोरी और कामिनी को छुड़ाकर जब हम आ जाँय, तब तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाना। इसके अतिरिक्त तेजसिंह चाचा से मुझे राजा गोपालसिंह के छुड़ाने का हाल सुनना भी बाकी है।
तेज: उस बारे में कुछ हाल तो मैं आपसे कह भी चुका हूँ ?

आनन्द: जी हाँ, वहाँ तक कह चुके हैं जब (कमलिनी की तरफ देखकर) ये चण्डूल की सूरत बनकर आपके पास आयी थीं, मगर यह न मालूम हुआ कि इन्होंने हरनामसिंह, बिहारीसिंह और मायारानी के कान में क्या कहा, जिसे सुन सभों की अवस्था बदल गयी थी। जहाँ तक मैं समझता हूँ शायद इन्होंने राजा गोपालसिंह के ही बारे में कोई इशारा किया होगा।
कमलिनी: जी हाँ, यही बात है। राजा गोपालसिंह के कैद करने में हरनामसिंह और बिहारीसिंह ने भी मायारानी का साथ दिया था और धनपत इस काम का जड़ है !
इन्द्रजीत: (हँसकर) धनपति इस काम ‘का’ जड़ है !

कमलिनी: जी हाँ, मैं बोलने में भूलती नहीं, धनपति वास्तव में औरत नहीं बल्कि मर्द है। उसकी खूबसूरती ने मायारानी को फँसा लिया और उसी की मुहब्बत में पड़कर उसने यह अनर्थ किया था। ईश्वर ने धनपति का चेहरा ऐसा बनाया है कि वह मुद्दत तक औरत बनकर रह सकता है, एक तो वह नाटा है, दूसरे अठारह वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी दाढ़ी-मोंछ की निशानी नहीं आयी। लेकिन जनानी सूरत होने पर भी उसमें ताकत बहुत है।
इन्द्रजीत: (ताज्जुब से) यह तो एक नयी बात तुमने सुनायी। अच्छा तब ?
लाडिली: क्या धनपति मर्द है ?

कमलिनी: हाँ, और यह हाल मायारानी, बिहारीसिंह और हरनामसिंह के सिवाय और किसी को मालूम नहीं है। कुछ दिन बाद मुझे मालूम हो गया था, मगर आज के पहिले यह हाल मैंने भी किसी से नहीं कहा था। इसी तरह राजा गोपालसिंह का हाल भी उन चारों के सिवाय और कोई नहीं जानता था, और मुझे भी इत्तिफाक ही से इस बात का पता लग गया। उन लोगों को यही विश्वास था कि राजा गोपालसिंह का हाल सिवाय हम चारों के और कोई भी नहीं जानता, और जब कोई पाँचवाँ आदमी उस भेद को जानेगा तो बेशक हम चारों की जान जायगी, और यही सबब उस समय उन लोगों की बदहवासी का था, जब मैंने चण्डूल बनकर, उन तीनों के कानों में पते की बात कही थी, मगर उस समय इसके साथ-साथ ही मैंने यह भी कह दिया था कि राजा गोपालसिंह का हाल हजारों आदमी जान गये हैं और राजा बीरेन्द्रसिंह के लश्कर में भी यह बात मशहूर हो गयी है।
आनन्द: ठीक है, मगर बिहारीसिंह ने मायारानी से यह हाल क्यों नहीं कहा ?
कमलिनी: इसका एक खास सबब है

इन्द्रजीत: वह क्या ?
कमलिनी: बिहारी और हरनाम ने मायारानी के दो प्रेमी-पात्रों का खून किया है,जिसका हाल मायारानी को भी मालूम नहीं है, उसका भी इशारा मैंने उन दोनों के कानों में किया था।
इन्द्रजीत: (हँसकर) तुम्हारी बहिन बड़ी ही शैतान है ! मगर देखा चाहिए, तुम कैसी निकलती हो, खून का साथ देती हो या नहीं !
कमलिनी: (हाथ जोड़कर) बस, माफ कीजिए, ऐसा कहना हम दोनों बहिनों(लाडिली की तरफ इशारा करके) के लिए उचित नहीं ! इसका एक सबब भी है।
इन्द्रजीत: वह क्या ?
कमलिनी: मेरे पिता की दो शादियाँ हुई थीं। मैं और लाडिली एक माँ के पेट से हुई और कमबख्त मायारानी दूसरी माँ के पेट से, इस लिए हम दोनों का खून उसके संग नहीं मिल सकता।
इन्द्रजीत: (हँसकर) शुक्र है। खैर, यह कहो कि चण्डूल बनने के बाद तुमने क्या किया ?
कमलिनी: चण्डूल बनने के बाद मैंने नानक को बाग के बाहर कर दिया और तेजसिंह को राजा गोपालसिंह के पास ले पास ले जाकर, दोनों की मुलाकात करायी, इसके बाद वहाँ रहने का स्थान, राजा गोपालसिंह के छुड़ाने की तरकीब और उन्हें साथ लेकर बाग के बाहर हो जाने का रास्ता बताकर, मैं तेजसिंह से बिदा हुई, और आप लोगों को कैद से छुड़ाने का उद्योग करने लगी। इसके बाद जोकुछ हुआ आप जान ही चुके हैं। हाँ, राजा गोपालसिंह को छुड़ाने के समय तेजसिंह ने क्या-क्या किया, सो आप इन्हीं से पूछिए।

अब पाठक समझ ही गये होंगे कि राजा गोपालसिंह को कैद से छुड़ानेवाले तेजसिंह थे, और जब राजा गोपालसिंह को मारने के लिए मायारानी कैदखाने में गयी थीं, तो तेजसिंह ही ने आवाज देकर उसे परेशान कर दिया था। दोनों कुमारों के पूछने पर तेजसिंह ने अपना पूरा-पूरा हाल बयान किया, जिसे सुनकर कुमार बहुत प्रसन्न हुए।

दूसरा बयान


ऐयारों को जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह के साथ थे, बाग के चौथे दर्जे के देवमन्दिर में आने-जाने का रास्ता बताकर कमलिनी ने तेजसिंह को रोहतासगढ़ जाने के लिए कहा और बाकी ऐयारों को अलग-अलग काम सुपुर्द करके दूसरी तरफ बिदा किया।
इस बाग के चौथे दर्जे की इमारत का हाल हम ऊपर लिख आये हैं और यह भी लिख आये हैं कि वहाँ असली फूल-पत्तों का नाम-निशान भी न था।
यहाँ की ऐसी अवस्था देखकर कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने कमलिनी से पूछा, ‘‘राजा गोपालसिंह ने कहा था कि ‘चौथे दर्जे में मेवे बहुतायत से हैं, खाने-पीने की तकलीफ न होगी’ मगर यहाँ तो कुछ भी दिखायी नहीं देता ! हम लोगों को यहाँ कई दिनों तक रहना होगा, कैसे काम चलेगा ?’’ इसके जवाब में कमलिनी ने कहा, ‘‘आपका कहना ठीक है और राजा गोपालसिंह ने भी गलत नहीं कहा। यहाँ मेवों के पेड़ नहीं हैं, मगर (हाथ का इशारा करके) उस तरफ थोड़ी-सी जमीन मजबूत चहारदीवारी से घिरी हुई है, जिसे आप मेवों का बाग कह सकते हैं। उसको कोई सींचता या दुरुस्त नहीं करता है बाहर से एक नहर दीवार तोड़कर उसके अन्दर पहुँचायी गयी है, और उसी की तरावट से वह बाग सूखने नहीं पाता। कई पेड़ पुराने होकर मर जाते हैं, और कई नये पैदा होते हैं, और इस तिलिस्मी बाग का राजा दस-पन्द्रह वर्ष पीछे उसकी सफाई करा दिया करता है। मैं वहाँ जाने का रास्ता आपको बता दूँगी !’’

ऐयारों को बिदा करने के बाद ही कमलिनी भी लाडिली को लेकर दोनों कुमारों से यह कह बिदा हुई-‘‘कई जरूरी काम पूरा करने के लिए मैं जाती हूँ, परसों यहाँ आऊँगी।’’
तीन दिन तक कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह देवमन्दिर में रहे। जब आवश्यकता होती, मेवोंवाले बाग में चले जाते, और पेट भर-कर फिर उस देवमन्दिर में चले आते।इस बीच में दोनों भाइयों ने मिलकर ‘रिक्तगन्थ’ (खून से लिखी किताब) भी पढ़ डाली, मगर रिक्तगन्थ में जो भी बातें लिखी थीं, वे सब-की सब बखूबी समझ में न आयीं क्योंकि उसमें बहुत से शब्द इशारे के तौर पर लिखे थे, जिनका भेद जाने बिना असल बात का पता लगाना बहुत ही कठिन था, तथापि तिलिस्म के कई भेदों और रास्तों का पता उन दोनों को मालूम हो गया, और बाकी के विषय में निश्चय किया कि कमलिनी से मुलाकात होने पर उन शब्दों का अर्थ पूछेंगे, जिनके जाने बिना कोई काम नहीं चलता।
यद्यपि कुँअर इन्द्रजीतसिंह किशोरी के लिए और आनन्दसिंह कामिनी के लिए बेचैन हो रहे थे, मगर कामलिनी और लाडिली की भोली सूरत के साथ-साथ उनके अहसानों ने भी दोनों कुमारों के दिलों को पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था, फिर भी किशोरी और कमिनी की मुहब्बत के खयाल से दोनों कुमार अपने दिलों को कोशिश के साथ दबाये जाते थे।

दोनों कुमारों को देवमन्दिर में टिके हुए आज तीसरा दिन है। ओढ़ने और बिछावन का कोई सामान न होने पर भी, उन दोनों को किसी तरह की तकलीफ नहीं मालूम होती। रात आधी से ज्यादे जा चुकी है। तिलिस्मी बाग के दूसरे दर्जे से होती और वहाँ के खुशबूदार फूलों से बसी हुई मन्द चलनेवाली हवा ने नर्म थपकियाँ लगाकर, दोनों नौजवान, सुन्दर और सुकुमार कुमारों को सुला दिया है। ताज्जुब नहीं कि दिन-रात ध्यान बने रहने के कारण दोनों कुमार इस समय स्वप्न में भी अपनी-अपनी माशूकाओं से लाड़-प्यार की बातें कर रहे हों, और उन्हें इस बात का गुमान भी न हो कि पलक उठते ही रंग बदल जायेगा, और नर्म कलाइयों का आनन्द लेनेवाला हाथ सर तक पहुँचने का उद्योग करेगा।
यकायक घड़घड़ाहट की आवाज ने दोनों को जगा दिया। वे चौंककर उठ बैठे और ताज्जुब-भरी निगाहों से चारों तरफ देखने और सोचने लगे कि यह आवाज कहाँ से आ रही है। ज्यादे ध्यान देने पर भी यह निश्चय न हो सका कि आवाज किस चीज की है। हाँ, इतनी बात मालूम हो गयी कि देवमन्दिर के पूरब तरफवाले मकान के अन्दर से यह आवाज आ रही है। दोनों कुमारों को देवमन्दिर से नीचे उतर कर उस मकान के पास जाना उचित न मातूम हुआ, इसलिए वे देवमन्दिर की छत पर चढ़ गये और बड़े गौर से उस तरफ देखने लगे।

आधे घण्टे तक वह आवाज एक रंग से बराबर आती रही और इसके बाद धीरे-धीरे कम होकर बन्द हो गयी। उस समय दरवाजा खोलकर अन्दर से आता हुआ एक आदमी उन्हें दिखायी पड़ा। वह आदमी धीरे-धीरे देवमन्दिर के पास आया और थोड़ी देर तक खड़ा रहकर उस कूएँ की तरफ लौटा, जो पूरब की तरफवाले मकान के साथ और उससे थोड़ी ही दूर पर था। कूएँ के पास पहुँचकर थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़ा रहा और फिर आगे बढ़ा, यहाँ तक की घूमता-फिरता छोटे-छोटे मकानों की आड़ में जाकर, वह न जाने कहाँ नजरों से गायब हो गया और इसके थोड़ी ही देर बाद उस तरफ से एक कमसिन औरत के रोने की आवाज आयी।
इन्द्रजीत: जिस तौर से यह आदमी इस चौथे दर्जे में आया है, वह बेशक ताज्जुब की बात है।
आनन्द: तिस पर इस रोने की आवाज ने और भी ताज्जुब में डाल दिया है। मुझे आज्ञा हो तो जाकर देखूँ कि क्या मामला है ?
इन्द्रः जाने में कोई हर्ज तो नहीं है मगर... खैर, तुम इसी जगह ठहरो, मैं जाता हूँ।
आनन्द: यदि ऐसा ही है तो चलिए हम दोनों आदमी चलें।

इन्द्रजीत: नहीं एक आदमी का यहाँ रहना बहुत जरूरी है। खैर, तुम ही जाओ कोई हर्ज नहीं, मगर तलवार लेते जाओ।
दोनों भाई छत के नीचे उतर आये। आनन्दसिंह ने खूँटी से लटकती हुई अपनी तलवार ले ली और कमरे के बीचोबीचवाले गोल खम्भे के पास पहुँचे। हम ऊपर लिख आये हैं कि उस खम्भे में तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। आनन्दसिंह ने एक मूरत पर हाथ रखकर जोर से दबाया, साथ ही एक छोटी-सी खिड़की अन्दर जाने के लिए दिखायी दी। छोटे कुमार उसी खिड़की की राह उस गोल कम्भे के अन्दर घुस गये और थोड़ी ही देर बाद उस नकली बाग में दिखायी देने लगे। खम्भे के अन्दर रास्ता कैसा था और वह नकली बाग के पास क्योंकर पहुँचे, इसका हाल आगे चलकर दूसरी दफे किसी और के आने या जाने के समय बयान करेंगे, यहाँ मुख्तसर ही में लिखकर मतलब पूरा करते हैं।
आनन्दसिंह उस तरफ गये जिधर वह आदमी गया था, या जिधर से किसी औऱत के रोने की आवाज आयी थी। घूमते-फिरते एक छोटे मकान के आगे पहुँचे, जिसका दरवाजा खुला हुआ था। वहाँ औरत तो कोई दिखायी न दी, मगर उस आदमी को दरवाजे पर खड़े हुए जरूर पाया।

आनन्दसिंह को देखते ही वह आदमी झट मकान के अन्दर घुस गया और कुमार भी तेजी के साथ उसका पीछा किये बेखौफ मकान के अन्दर चले गये। वह मकान दो मंजिल का था, उसके अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियाँ थीं और हरएक कोठरी में दो-दो दरवाजे थे, जिससे आदमी एक कोठरी के अन्दर जाकर कुल कोठरियों की सैर कर सकता था।
यद्यपि कुमार तेजी के साथ उसका पीछा किये हुए चले गये, मगर वह आदमी एक कोठरी के अन्दर जाने के बाद कई कोठरियों में घूम-फिरकर कहीं गायब हो गया। रात का समय था और मकान के अन्दर तथा कोठरियों में बिल्कुल अन्धकार छाया हुआ था, ऐसी अवस्था में कोठरियों के अन्दर घूम-घूमकर उस आदमी का पता लगाना बहुत ही मुश्किल था, दूसरे इसका भी शक था कि वह कहीं हमारा दुश्मन न हो, लाचार होकर कुमार वहाँ से लौटे, मगर मकान के बाहर न निकल सके, क्योंकि वह दरवाजा बन्द हो गया था, जिस राह से कुमार मकान के अन्दर घुसे थे। कुमार ने दरवाजा उतारने का भी उद्योग किया, मगर उसकी मजबूती के आगे कुछ बस न चला। आखिर दुखी होकर फिर मकान के अन्दर घुसे और एक कोठरी के दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये। थोड़ी देर के बाद ऊपर की छत पर से फिर किसी औरत के रोने की आवाज आयी, गौर करने से कुमार को मालूम हुआ कि यह बेशक उसी औरत की आवाज है, जिसे सुनकर यहाँ तक आये थे। उस आवाज की सीध पर कुमार ने ऊपर की दूसरी मंजिल पर जाने का इरादा किया, मगर सीढ़ियों का पता न था।

इस समय कुमार का दिल कैसा बेचैन था, यह वही जानते होंगे। हमारे पाठकों में भी जो दिलेर और बहादुर होंगे, वह उनके दिल की हालत कुछ समझ सकेंगे। बेचारे आनन्दसिंह हर तरह से उद्योग करके रह गये, पर कुछ भी बन न पड़ा। न तो वे उस आदमी का पता लगा सकते थे, जिसके पीछे-पीछे मकान के अन्दर घुसे थे, न उस औऱत का हाल मालूम कर सकते थे, जिसके रोने की आवाज से दिल बेताब हो रहा था, और न उस मकान ही से बाहर होकर, अपने भाई इन्द्रजीतसिंह को इन सब बातों की खबर कर सकते थे, बल्कि यों कहना चाहिए कि सिवाय चुपचाप खड़े रहने या बैठ जाने के और कुछ भी नहीं कर सकते थे।

जो कुछ रात थी, खड़े-खड़े बीत गयी। सुबह की सुफेदी ने जिधर से रास्ता पाया मकान के अन्दर घुसकर उजाला कर दिया, जिससे कुँअर आनन्दसिंह को वहाँ की हरएक चीज साफ-साफ दिखायी देने लगी। यकायक पीछे की तरफ से दरवाजा खुलने की आवाज कुमार के कान में पड़ी। कुमार ने घूमकर देखा तो एक कोठरी का दरवाजा जो इसके पहिले बन्द था, खुला हुआ पाया। वे बेधड़क उसके अन्दर घुस गये और वहाँ ऊपर की तरफ गयी हुई छोटी-छोटी खूबसूरत सीढ़ियाँ देखीं। धड़धड़ाते हुए दूसरी मंजिल पर चढ़ गये और हर तरफ गौर करके देखने लगे। इस मंजिल में बारह कोठरियाँ एक ही रंग-ढंग की देखने में आयीं। हर एक कोठरी में दो दरवाजे थे, एक दरवाजा कोठरी के अन्दर घुसने के लिए और दूसरा अन्दर की तरफ से दूसरी कोठरी में जाने के लिए था। इस तरह पर किसी एक कोठरी के अन्दर घुसकर, कुल कोठरियों में आदमी घूम आ सकता था। धीरे-धीरे अच्छी तरह उजाला हो गया और वहाँ की हरएक चीज बखूबी देखने का मौका कुमार को मिला। छोटे कुमार एक कोठरी के अन्दर घुसे और देखा कि वहाँ सिवाय एक चबूतरे के और कुछ भी नहीं है। यह चबूतरा स्याह पत्थर का बना हुआ था, औऱ उसके ऊपर एक कमान और पाँच तीर रक्खे हुए थे। कुमार ने तीर और कमान पर हाथ रक्खा, मालूम हुआ कि सब पत्थर का बना हुआ है, औऱ किसी काम में आने योग्य नहीं है। दूसरे दरवाजे से दूसरी कोठरी में घुसे तो वहाँ एक लाश पड़ी देखी, जिसका कटा हुआ सिर पास ही पड़ा हुआ था और वह लाश भी पत्थर ही की थी। उसे अच्छी तरह देख-भालकर तीसरी कोठरी में पहुँचे।

इसके अन्दर चारों तरफ दीवार में कई खूँटियाँ थीं, और हरएक खूँटी से एक-एक नंगी तलवार लटक रही थी। ये तलवारे नकली न थीं, बल्कि असली लोहे की थीं, मगर हरएक पर जंग चढ़ा हुआ था। जब चौथी कोठरी में पहुँचे तो वहाँ चाँदी के सिंहासन पर बैठी हुई एक मूरत दिखायी पड़ी। यह मूरत किसी प्रकार की धातु की बहुत ही खूबसूरत और ठीक-ठीक बनी हुई थी, जिसे देखने के साथ ही कुमार ने पहिचान लिया कि यह मायारानी की छोटी बहिन लाडिली की मूरत है। कुमार मुहब्बत-भरी निगाहें, उस मूरत पर डालने लगे। निराली जगह अपनी माशूक को देखने का उन्हें अच्छा मौका मिला, यद्यपि वह माशूक असली नहीं, बल्कि केवल उसकी एक छवि मात्र थी, तथापि इस सबब से कि यहाँ पर कोई ऐसा आदमी न था, जिसका लिहाज या खयाल होता, उन्हें एक निराले ढंग की खुशी हुई और वे देर तक उसके हरएक अंग की खूबसूरती देखते रहे। इसी बीच बगलवाली कोठरी में से यकायक एक खटके की आवाज आयी। कुमार चौंक पड़े और यह सोचते हुए उस कोठरी की तरफ बढ़े कि शायद वह आदमी उसमें मिले, जिसके पीछे-पीछे इस मकान के अन्दर आये हैं, मगर इस कोठरी में भी किसी की सूरत दिखायी न दी।

इस कोठरी में, जिसमें कुमार पहुँचे चाँदी का केवल एक सन्दूक था, जिसके बीच में हाथ डालने के लायक एक छेद भी बना हुआ था और छेद के ऊपर सुनहले हर्फों में लिखा हुआ थाः-

‘‘इस छेद में हाथ डाल के देखो क्या अनूठी चीज है।’’

कुँअर आनन्दसिंह ने बिना सोचे-विचारे उस छेद में हाथ डाल दिया, मगर फिर हाथ निकाल न सके। सन्दूक के अन्दर हाथ जाते ही मानों लोहे की हथकड़ी पड़ गयी, जो किसी तरह हाथ बाहर निकालने की इजाजत नहीं देती थी। कुमार ने झुककर सन्दूक के नीचे की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि सन्दूक जमीन से अलग नहीं है, और इसलिए उसे किसी तरह खिसका भी नहीं सकते थे।

तीसरा बयान


कुँअर आनन्दसिंह के जाने के बाद इन्द्रजीतसिंह देर तक उनके आने की राह देखते रहे। जैसे-जैसे देर होती थी, जी बेचैन हो जाता था। यहाँ तक कि तमाम रात बीत गयी, सवेरा हो गया, और पूरब तरफ से सूर्य भगवान दर्शन देकर धीरे-धीरे आसमान पर चढ़ने लगे। जब पहर-भर से ज्यादे दिन चढ़ गया, तब इन्द्रजीतसिंह बहुत ही बेताब हुए और उन्हें निश्चय हो गया कि आनन्दसिंह जरूर किसी आफत में फँस गये !

कुँअर इन्द्रजीतसिंह सोच ही रहे थे कि स्वयं चलके आनन्दसिंह का पता लगाना चाहिए कि इतने ही में लाडिली को साथ लिये हुए कमलिनी वहाँ आ पहुँची। इन्हें देख कुमार की बेचैनी कुछ कम हुई और आशा की सूरत दिखायी देने लगी। कमलिनी ने जब कुमार को उस जगह अकेले और उदास देखा तो उसे ताज्जुब हुआ, मगर वह बुद्धिमान औऱत तुरन्त ही समझ गयी कि इनके छोटे भाई आनन्दसिंह इनके साथ नहीं दिखायी देते, जरूर वे किसी मुसीबत में पड़ गये हैं, और ऐसा होना कोई ताज्जुब की बात नहीं है, क्योंकि यह तिलिस्म का मौका है और यहाँ का रहने वाला थोड़ी भूल में तकलीफ उठा सकता है।

कमलिनी ने कुँअर इन्द्रजीतसिंह से उदासी का कारण और कुँअर आनन्दसिंह के न दिखने का सबब पूछा, जिसके जवाब में इन्द्रजीतसिंह ने जो कुछ हुआ था, बयान करके कहा कि, ‘आनन्द को गये हुए नौ घण्टे के लगभग हो गये’।
इस समय कोई लाडिली की सूरत गौर से देखता तो बेशक समझ जाता कि आनन्दसिंह का हाल सुनकर उसको हद्द से ज्यादे रंज हुआ है। ताज्जुब नहीं कि कमलिनी औऱ इन्द्रजीतसिंह भी उसके दिल की हालत जान गये हों, क्योंकि वह अपनी आँखों को डबडबाने और आँसू के निकलने को बड़े परिश्रमपूर्वक रोक रही थी। यद्यपि उसे निश्चय था कि दोनों कुमार इस तिलिस्म को अवश्य तोड़ेंगे, तथापि उसका दिल दुःख गया था। कौन ऐसा है, जो अपने प्यारे पर आयी हुई मुसीबत का हाल सुनकर बेचैन न हो ?

कमलिनी: (सब बातें सुनकर) किसी का आना ताज्जुब नहीं है, हाँ किसी औऱत का आना बेशक ताज्जुब है, क्योंकि (इन्द्रजीतसिंह की तरफ इशारा करके) आप कहते हैं कि एक औरत के रोने की आवाज आयी थी।
लाडिली: ठीक है, जहाँ तक मैं समझती हूँ कि सिवाय तुम्हारे, मायारानी के और मेरे, किसी चौथी औरत को यहाँ आने का रास्ता मालूम नहीं है, हाँ, मर्दों में कई जरूर ऐसे हैं, जो यहाँ आ सकते हैं।

कमलिनी: मगर इस देवमन्दिर के अन्दर हम लोगों के अतिरिक्त राजा गोपालसिंह के सिवाय और कोई भी नहीं आ सकता। खैर, इन बातों को जाने दो, अब यहाँ से चलकर कुँअर साहब का पता लगाना बहुत जरूरी है। यद्यपि यहाँ किसी दुश्मन का आना बहुत कठिन है, तथापि खुटका लगा ही रहता है। जब दोनों कुमारों को मायारानी के कैदखाने से छुड़ाकर हम लोग सुरंग-ही-सुरंग तिलिस्मी बाग से बाहर हो रहे थे तो उस हरामजादे के आ पहुँचने की कौन उम्मीद थी, जिसने कुमार को जख्मी किया था ! इसी तरह कौन ठिकाना यहाँ भी कोई दुष्ट आ पहुँचा हो।

आखिर कुँअर आनन्दसिंह को खोजने के लिए तीनों वहाँ से रवाना हुए और देवमन्दिर के नीचे उतर उसी तरफ चले जिधर आनन्दसिंह गये थे। जब एक मकान के दरवाजे पर पहुँचे तो कमलिनी रुकी और बड़े गौर से उस दरवाजे को जो बन्द था, देखने लगी, इसके बाद फिर आगे बढ़ी, दूसरे मकान के दरवाजे पर पहुँचकर उसे भी गौर से देखा और सिर हिलाती हुई फिर आगे बढ़ी। इसी तरह कुँअर इन्द्रजीतसिंह और लाडिली को साथ लिये हुए कमलिनी सात-आठ मकानों के दरवाजे पर गयी। हर-एक मकान का दरवाजा बन्द था और हरएक दरवाजे को कमलिनी ने गौर से देखा, लेकिन कुछ काम न चला, मगर जब उस मकान के दरवाजे पर पहुँची, जिसमें कुँअर आनन्दसिंह गये थे रुककर मामूली तौर पर उसके दरवाजो को भी बड़े गौर से देखने लगी और थोड़ी ही देर में बोल उठी, ‘‘बेशक, कुँअर आनन्दसिंह इसी मकान के अन्दर हैं। (उँगली से दरवाजे के ऊपरवाले चौखटे की तरफ इशारा करकेः देखिए, वह स्याह पत्थर की तीन खूटियाँ नीचे की तरफ झुक गयी हैं।’’
कुमार: इन खूटियों से क्या मतलब है ?
कमलिनी: इस मकान के अन्दर जितने आदमी जाँयगे, उतनी खूँटियाँ नीचे की तरफ झुक जाँयगी।



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