भारतीय विज्ञान कथाएँ -2 - शुकदेव प्रसाद Bhartiya Vigyan Kathayein 2 - Hindi book by - Shukdev Prasad
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भारतीय विज्ञान कथाएँ -2

शुकदेव प्रसाद

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :360
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6804
आईएसबीएन :81-7016-645-4

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विगत सौ वर्षों के विज्ञान गल्प साहित्य पर दृष्टिपात करने पर कुछेक खास प्रवृत्तियां दृष्टिगोचर होती हैं। अधिकांश कथाएं अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की सैर पर आधृत हैं....

Bhartiya Vigyan Kathayein 2 - a hindi book by Shukdev Prasad

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सत्तरादि के आरंभ में हिन्दी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया ? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं ?

हिंदी और बंगला की तुलना मे मराठी का विज्ञान गल्प कहीं अधिक समद्ध हैं, लेकिन मराठी कथाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ। वास्तव में विगत शती के उन्मेष काल में वर्न, वेल्स की साहसिक, रोमांचक यात्राओं ने पाठकों में अपनी खासी पैठ बनाई, लेकिन इन काल्पनिक यात्राओं से शीघ्र ही पाठकों का मोह भंग होता चला गया, चाहे काल यंत्र का सैर हो या कि अदृश्य मानव की कहानी अथवा चंद्रमा की सैर। दुर्भाग्यवश ऐसी कथाओं को आलोचकों ने बाल-साहित्य मान लिया। और उनकी दुर्भावनापूर्ण उपेक्षा की गई। यही कारण है कि बीसवीं शती के आरंभ काल में ही हिन्दी, बंगला और मराठी में जिस विधा का शुभारंभ हुआ था, वह अब भी स्थापित नहीं हो सकी है।

विगत सौ वर्षों के विज्ञान गल्प साहित्य परदृष्टिपात करने पर कुछेक खास प्रवृत्तियां दृष्टिगोचार होती हैं। अधिकांश कथाएं अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की सैर पर आधृत है। ‘चंद्रलोक की यात्रा’ (1900) से आरंभ अंतरिक्ष यात्राएं आज भी विज्ञान कथाओं की विषय-वस्तु हैं। कुछ चुनिंदा विषय हैं और उन्हीं के इर्द-गिर्द कहानियों के ताने-बाने बुने जा रहे हैं। विषयों का दुहराव इतना है कि कथाओं की विश्वसनीयता संदिग्ध हो चली हैं।

कल्पनाएं चिर नवीन और उर्वर होनी चाहिए। उर्वर कल्पनाओं की भावभूमि में विज्ञान गल्पों के बीजों का वपन ही सार्थक हैं अन्यथा विज्ञान गल्प अपनी अस्मिता की खोज ही करते रहेंगे। वास्तव में हुआ यह कि विज्ञान गल्पों पर समीक्षात्मक टिप्पणियां ही नहीं की गई और न ही गहनता से पढ़ने का प्रयास किया गया कि इन कथाओं में है क्या ? समीक्षात्मक लेखन न होने के कारण यह दुर्दशा हुई है।

विगत सौ वर्षों की भारतीय विज्ञान कथाओं की विकास-यात्रा को दो खंडो में समग्रता से समेटने की चेष्टा की गई है। विज्ञान गल्पों की भावी दिशा क्या हो, इस पर गहनता से विमर्श आरंभ हो जाना चाहिए।

विज्ञान कथाओं के यक्ष प्रश्न

साठादि के अंत तक विज्ञान कथाओं के लिए पर्याप्त वातावरण बन चुका था और पूर्वपीठिका निर्मित हो जाने के बाद इस दिशा में काफी लोग सक्रिय हुए अनियमित रूप से भी कुछेक ने कथाएं लिखीं।
सत्तरादि के आरंभ में और पूरे दशक में हिन्दी हीं नहीं हिन्दीतर भाषाओं में भी कहानियां लिखी जाने लगीं। बंगला मे प्रख्यात् सिने निर्देशक सत्यजित राय और प्रेमेंद्र मित्र के प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं। अरसे तक इन्होंने नियमित गल्प लेखन किया। फिर इन्होंने अपनी लेखनी को विराम दे दिया। क्यों विज्ञान कथाओं से इनका मोह भंग हो गया ? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं ?

सत्यजित राय ने प्रोफेसर शंकू नामक एक पात्र की कल्पना की और कई कहानियां लिखी। उनकी कहानियों के दो संग्रह उपलब्ध हैं-‘प्रोफेसर शंकू ’(1973) और ‘प्रोफेसर शंकू के कारनामे’ (1975)। ‘प्रोफेसर शंकू’ में 9 कथाएं संग्रहीत हैं-‘अंतरिक्ष यात्री की डायरी’, ‘प्रोफेसर शंकू और कंकाल’, ‘प्रोफेसर शंकू और मेकाओ’, ‘प्रोफेसर शंकू और मिस्त्र का आतंक’, ‘प्रोफेसर शंकू और आश्चर्यजनक पुतले,’ ‘प्रोफेसर शंकू और गोलक का रहस्य’, ‘प्रोफेसर शेकू और ची-चिंग’, ‘प्रोफेसर शंकू और मुन्ना’ और ‘प्रोफेसर शंकू और भूत’।

‘प्रोफेसर शंकू के कारनामें’ में इसी प्रकार की 6 कहानियां संकलिच है- ‘प्रोफेसर शंकू और रोबू’, ‘प्रोफेसर शंकू और कोचाबंबा की गुफा’, ‘प्रोफेसर शंकू और लाल मछली का रहस्य’, ‘प्रोफेसर शंकू और गुरिल्ला’, ‘प्रोफेसर शंकू और बगदाद की संदूकची’।

प्रोफेसर शंकू कौन हैं ? आमुख में कहा गया है- ‘कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद किसी भीषण प्रयोग मे अपने प्राण गंवा दिए हैं। इधर यह भी सुनने में आया है कि वे किसी अपरिचित अंचल में छुपकर अपने काम में लगे हुए हैं, समय आने पर प्रकट हो जायेंगे। प्रोफेसर शंकू की डायरी में कुछ-कुछ विचित्र जानकारी का विवरण मिलता है। ये कहानियां सच्ची हैं या झूठी, संभव है या असंभव- इसका निर्णय पाठक स्वयं करें।’

और इस प्रकार एक रहस्यमय पात्र के सहारे कथा-सूत्र पिरोया गया है। रहस्य के आवरण में लिपटी राय की दुस्साहसिक यात्राओं की ये कथाएं जासूसी प्रभाव से भी मुक्त नहीं है।
बंगला के प्रतिष्ठ साहित्यकार प्रेमेन्द्र मित्र ने भी घना दा (घनश्याम-दा) नामक एक पात्र की परिकल्पना की है और चार खंडों में घना दा के पराक्रमों और कारनामों की कहानियां  संकलित हैं। ‘घनश्याम-दा (1975) में उनकी-‘मच्छर’, ‘कीड़ा’, ‘पत्थर का टुकड़ा’, ‘कांच’, ‘मछली’, ‘टोपी’, ‘छड़ी’ और ‘लट्टू’ कहानियां संकलित हैं तो ‘धनश्याम-दा के और किस्से’ (1976) में ‘ढेला’. ‘सुई’ और ‘शीशी’ नाम्नी तीन कहानियां संकलित हैं।

प्रेमन्द्र मित्र के गल्प संसार में घनश्याम-दा ती आश्चर्यचकित करने वाली दुस्साहसिक यात्राओं के वृत्तांत हैं। दुर्धर्षपूर्ण, साहसी, अन्वेषक और ज्ञान-विज्ञान के खोजी घनश्याम-दा का विचरण-क्षेत्र, उनकी सक्रियता बंगाल या भारत में ही नहीं सीमित रहती बल्कि ये कहानियां दुनिया के जाने-अनजाने दूरस्थ देशों-प्रदेशों की भी यात्राएं कराती हैं। इन आश्चर्य मिश्रित साहसिक कथाओं में भ्रमण वृत्तांत तो खूब है लेकिन विज्ञान का पुट कम है। विज्ञान को नेपथ्य में डालकर दुस्साहसिक घटनाओं की प्रमुखता ही विज्ञान कथाओं के पुष्पन-पल्लवन में बाधक सिद्ध हुई।

आलोचकों का कहना है कि ‘यह विधा अनुवाद और व्यंग्य की दलदल में फंस कर रह गयीं।’ आगे भी लिखी जाने वाली कथाओं में साहसिक घटनाएं ही प्रमुख होती चली गई और यही कारण है कि कृत्रिम और भ्रामक कथाओं के सृजन से विज्ञान गल्पों की बंगधारा अवरूद्घ होती चली। बंगला विज्ञान कथाओं को अक्षुण्ण रखने की दिशा में कुछेक कथाकार अभी भी सक्रिय हैं और निरंतर कहानियां लिखी जा रही हैं लेकिन वह त्वरा नहीं जो वांछनीय थी। बंगला के विज्ञान गल्पकार अदरीश वर्धन गल्प लेखन में प्रवृत्त होने के साथ-साथ एक पत्रिका ‘‘फैंटास्टिक’ का भी संपादन कर रहे हैं। बंग विज्ञान कथाओं की परंपरा को पुनजींवित करने की दिशा में यह एक प्रशंसनीय प्रयास है।

इधर भी बंगला में फंतासी लिखने में कई लोग सक्रिय हैं। बंग-विज्ञान कथाकारों में समीर कुमार गांगुली और समीर धर सक्रिय हैं। अरसा पहले समरजित कर का ‘पाथेर मानुष’ (पत्थर का मनुष्य) छप चुका है। समीर कुमार गांगुली का बालोपयोगी वैज्ञानिक उपन्यास ‘जेड जुइंग की डायरी’ (1981) भी प्रकाशित है।

हिंदी और बंगला की तुलना में मराठी का विज्ञान गल्प साहित्य कहीं अधिक समृद्ध है लेकिन मराठी विज्ञान कथाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ। वास्तव में विगत शती के उन्मेष काल में वर्न, वेल्स की साहसिक, रोमांचक यात्राओं ने पाठकों में अपनी खासी पैठ बनायी लेकिन इन काल्पनिक यात्राओं से पाठकों का मोह भंग होचा चला गया चाहे काल-यंत्र की सैर हो या कि अदृश्य मानव की कहानी अथवा चंद्रमा की सैर। दुर्भाग्यवश ऐसी कथाओं को आलोचकों ने बाल साहित्य मान लिया और उनकी दुर्भावनापूर्ण उपेक्षा की गई। साठादि तक भारतीय विज्ञान कथा लेखक वर्न और वेल्स के प्रकाव से मुक्त नहीं हो सके और इसीलिए साठादि तक सृजित किए जा रहे साहित्य की उपेक्षा की गई।

आज भी ऐसी काल्पनिक यात्राओं के वृत्तांत विज्ञान कथाओं की विषय-वस्तु हैं। यही कारण है कि बीसवीं शती के आरंभ काल में ही हिंदी, बंगला और मराठी में जिस विधा का शुभारंभ हुआ था, वह अब भी स्थापित नहीं हो सकी है। मराठी विज्ञान कथाओं के पुनरूद्धार का कार्य अनंत अंतरकर ने ‘नवल’ नाम्नी पत्रिका से किया है और मराठी विज्ञान गल्प को भटकाव से बचाया है।

इस दिशा में मराठी विज्ञान परिषद के कार्यों की भी सराहना की जानी चाहिए। परिषद द्वारा प्रति वर्ष विज्ञान स्पर्धाओं का आयोजन एक श्लाघनीय प्रयास रहा है और आज मराठी में जितने भी विज्ञान कथाकार है, सब इसी स्पर्धा की देन हैं। फ्रेड हॉयल के शिष्य, खगोल विज्ञानी जयंत नार्लीकर ने भी अपनी गल्प यात्रा इसी प्रतियोगिता से आरंभ की थी। दिसंबर 1974 में नौवे मराठी विज्ञान सम्मेलन के अवसर पर आयोजित ‘विज्ञान-रंजन कथा स्पर्धा’ में जो कहानियां प्रस्तुत की गई उनमें नारायण विनायक जगताप’ नामक लेखक की भी ‘कृष्ण विवर’शीर्षक से एक कहानी थी। जब इस गल्प को पारितोषिक प्राप्त हुआ तो डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर ने रहस्योदघाटन किया कि उक्त कहानी मैंने लिखी है। और इस प्रकार नार्लीकर ने 1974 से गल्प लेखन भी आरंभ कर दिया। लेकिन छद्म नाम से क्यों ? क्या उन्हें भय था कि एक कथाकार के रूप में एक विज्ञानी सफल होगा या नहीं ?

फिर नार्लीकर गल्प लेखन में गहनता से प्रवृत्त हुए। उनके मराठी गल्प हिंदी में अनुदित हुए हैं। ‘धूमकेतू’ (1986) उनकी विज्ञान कथाओं का संग्रह हैं। इसमें उनकी 9 कथाएं संग्रहीत हैं- ‘धूमकेतु’, ‘अंतरिक्ष का भस्मासुर’, ‘पुत्रवती भव’, ‘फालसागंज में पुष्पक विमान’, ‘कृष्ण विवर’, ‘पार नजर के’, ‘अक्स’, ‘इतिहास बदल गया’ और ‘पुनरागम’। नार्लीकर की गल्प साहित्य की ‘यक्षोपहार’, ‘अंतरिक्ष में विस्फोट’ (1993) और ‘वाइरस’ (2002) आदि प्रमुख कृतियां हैं।

मराठी में कई अन्य सशक्त गल्पकार हुए हैं। अरूण साधू मराठी के प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक हैं। इनके दो उपन्यासों- ‘मुंबई दिनांक’ और ‘सिंहासन’ पर आधृत मराठी फिल्म ‘सिहासन’ चर्चित रही है। विज्ञान-फंतासियों की रचना में भी इनकी समान गति है। ‘विप्लवा’ और ‘स्फोट’ इनके चर्चित वैज्ञानिक उपन्यास हैं।

इनके अतिरिक्त लक्ष्मण लोंढ़े निरंजन घाटे, ग कृ. जोशी, सुबोध जावडेकर, बाल फोंडके आदि मराठी विज्ञान गल्पों की रचना में सन्नद्ध हैं। दत्त प्रसाद दाभोलकर कृत ‘विज्ञानेश्वरी’ और लक्ष्मण लोंढे तथा चिंतामणि देशमुख की ‘संभवामि युगे युगे’ मराठी गल्प की चर्चित रचनाएं हैं।

साठादि तक तो मराठी और बंगला विज्ञान गल्प को नई दिशा मिल गई और उसमें एक लय भी आ गई है। मोहन संजीवन् जैसे कुछेक लेखको को छोड़कर तमिल में विज्ञान कथा का क्षेत्र सूना पड़ा है। मलयालय में विज्ञान फंतासी का नितांत अभाव है जबकि वैज्ञानिक जागरूकता की दिशा में केरल शास्त्र साहित्य परिषद् ने अथक प्रयास किए हैं। और हिन्दी ? हिंदी में भी सत्तरादि से तेजी से कथाएं लिखी जा रही हैं लेकिन अधिकांश लेखक विज्ञान गल्प का स्वरूप ही नहीं निर्धारित कर सके हैं विज्ञान गल्पों के संक्रमण का कारण है।

फिर भी जो प्रयास इधर उत्तरशती में हुए हैं, उनकी चर्चा अपरिहार्य है। उनका विश्लेषण हम आगे करेंगे।
ग्रंथ के प्रथम खंड में कुछेक ऐसी कहानियां दी गई जिसके रचनाकाल का उल्लेख नहीं है। सत्तरादि में लिखी गई ये कहानियां लेखकों ने मुझे ‘विज्ञान भारती’ में प्रकाशनार्थ भेजी थी। जब तक मेरी सामर्थ्य थी, मैंने प्रकाशन जारी रखा। बाद में किसने अपनी कहानी कहां छपवा लीं या उनका प्रकाशन नहीं हो पाया, इसका लेखा-जोखा रखना सहज नहीं है। बहुत से लेखक तो अह दिवंगत भी हो चुके हैं। उन कथाओं में कुछेक कथाएं विज्ञान गल्पों के मापदंडों पर खरी भी नहीं उतरतीं लेकिन युह की प्रवृत्तियों की प्रतीति तो उनमें हैं जिससे गल्प लेखन के इतिहास की पड़ताल की जा सके। अस्तु !

विज्ञान के विविध पक्षों पर बहुविध लेखन करने वाले शुकदेव प्रसाद गल्प लेखन से सत्तरादि से ही संपृक्त हैं। अपनी पहली विज्ञान कथा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (1977) से वे इस दिशा में प्रवृत्त हुए। आगे उनकी और भी कहानियां-‘रोबों मेरा दोस्त’ (1979), ‘अतंरिक्ष के मित्र’ (1984), ‘हिमीभूत’ (1990), ‘आगंतुक’ (1991) प्रकाशित हुई। उनकी ताजातरीन कहानी ‘अपने-अपने आकाश’ (2003) हैं। ये सारी कहानियां उनके संग्रह ‘हिमीभूत और अन्य वैज्ञानिक कहानियां (2003) में संकलित हैं।

अपने ही बारे में क्या लिखना ? हमारी संस्कृति और परंपराएं इसका निषेध करती हैं। फिलहाल इतना ही कि मेरी कहानियां विज्ञान की भावी विभीषिकाओं की सचेतक कहानियां हैं। विज्ञान गल्प लेखन में यह पक्ष अभी नदारद है और है भी तो अल्पांश में। संकलित कथा ‘अंतरिक्ष के मित्र’ में कचरा घर बनते अंतरिक्ष (स्पेस गार्बेज) के खतरों से आगाह किया गया है। तो ‘हिमीभूत’ विकिरणशीलता क्षति की भयावहता को इंगित करती है और ‘वसुधैव कुटुबंकम्’ जैव प्रौद्योगिक के आसन्न संकटों का पूर्व कथन करती है। मेरी कथाएं न तो किसी विचित्र लोक की सैर कराती हैं और न ही पृथ्वी से उन्नत सभ्यताओं से साक्षात्कार करती प्रतीत होती है। ऐसे कथानकों का लोपन गल्प लेखन के लिए श्रेयस्कर ही होगा।

राजेश्वर गंगवार ने विज्ञान लेखन के अतिरिक्त कई विज्ञान गल्प भी लिखे हैं। ‘शीशियों में बंद दिमाग’ (1975), ‘केसर ग्रह’ (1977) ‘साढ़े सैंतीस वर्ष’ (1979) और ‘सप्तबाहु’ (1979) उनकी प्राकशित कहानियां हैं। जब वह ‘पराग’ में थे तो उन्हें ‘विज्ञान कथा विशेषांक ’की आयोजना की थी। हिंदी विज्ञान कथाओं को गति देने में उनका यह सराहनीय प्रयास था। उस समय (1975) ‘पराग’ के संपादक कन्हैया लाल नंदन थे। आगे चलकर अस्सी आदि के अंत में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने इस काम को और आगे बढ़ाया। उन्होंने ‘पराग’ के कई विशेषांक निकाले जिनमें विज्ञान कथाओं की प्रधानता थी और बाल कथाओं को उन्होंने परी कथाओं और पौराणिक कहानियों से मुक्त कराकर वैज्ञानिक संस्पर्श दिए।

देवेन्द्र मेवाड़ी एक सिद्धहस्त विज्ञान लेखक हैं। तेरह वर्षों तक उन्होंने ‘किसान भारती’ नामक कृषि मासिक का कुशल संपादन किया है। ‘पशुओ की प्यारी दुनिया’, ‘हार्मोन और हम’, ‘सूरज के आंगन में’ और ‘फसले कहें कहानी’ उनकी लोकोपयोगी वैज्ञानिक कृतियां है। लोकप्रिय विज्ञान लेखन के साथ-साथ गल्प लेखन में भी उनकी गति है। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपे लघु वैज्ञानिक उपन्यास ‘सभ्यता की खोज’ (1979) से उन्होंने विज्ञान गल्प लेखन में प्रवेश किया ! तब से आज तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर वैज्ञानिक कहानियां लिख रहे हैं और इस दिशा में सचेष्ट हैं।

देवेन्द्र मेवाड़ी के दो विज्ञान-कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘भविष्य’ (1994) और ‘कोख’ (1998) पहले संग्रह में उनकी 6 विज्ञान सथाएं-‘सभ्यता की खोज’, ‘एक और युद्ध’, ‘डॉ. गजानन के आविष्कार’. ‘गुडबाई मिस्टर खन्ना’, ‘खेम ऐंथानी की डायरी’ तथा ‘भविष्य’ संकलित हैं। ‘सभ्यता की खोज’ में बुद्धिमान मशीनों पर अतिनिर्भरता के आसन्न संकट संकेतित हैं तो ‘भविष्य’ में हिमीकरण के बाद शरीर को पुनः वर्षों बाद जीवित करने से उत्पन्न स्थितियों का विश्लेषण हैं। ‘कोख’ संग्रह में 7 कथाएं-‘कोख’, ‘अलौकिक प्रेम’, दिल्ली मेरी दिल्ली’, ‘पिता’, ‘चूहे’, ‘अतीत में एक दिन’ और ‘अंतिम प्रवचन’ संकलित हैं।

‘कोख’, परखनली शिशु तकनीक की कथा है तो ‘अंतिम प्रवचन’ एक मानव क्लोन की कहानी है। ‘अलौकिक प्रेम’ मानव और पृथ्वेतर जीव के अटूट प्रेम संबंधों की गाथा है। ‘दिल्ली मेरी दिल्ली’ प्रदूषण के व्यापक दुष्प्रभावों की संकेत कथा है तो ‘पिता’ डी. एन. ए. अंगुलि छाप तकनीक आधृत मानवीय संबंधों को दर्शाती है। ‘चूहें’ में बढ़ती जनसंख्या की भयावहता प्रदर्शित है तो ‘अतीत में एक दिन’ भविष्य पर वर्तमान के प्रभाव का रेखांकन है।

प्रेमानंद चंदोला एक वरिष्ठ विज्ञान लेखक हैं। नाटक, कहानी. कविता और ललित लेखन की दिशा में सतत प्रयत्नशील चंदोला जी की कई मानक कृतियां प्रकाशित हैं। यथा-‘पर्यावरण और जीव’, ‘प्रदूषण : पृथ्वी का ग्रहण’, ‘कीट : कितने रंगीले : कितने निराले’, ‘बिन पानी सब सून’। बाल पाठकों के लिए भी उन्होंने लिखा है। हिंदी में विज्ञान-नाटकों की शुरूआत चंदोला जी ने की। लेकिन इनमें गल्प नहीं है। ये विशुद्घ वैज्ञानिक तथ्यों की नाटय प्रस्तुतियां हैं। ‘‘बैक्टीरिया अदालत में’ (1979) शीर्षक संग्रह में उनके तीन नाटक संग्रहीत हैं- ‘बैक्टीरिया अदालत में’, ‘गंदगीमल पर मुकदमा’ और ‘नाइट्रोजन की पेशी’। लोक विज्ञान की यह ललित शैली है जिस पर काम होना चाहिए।

‘वनस्पति मानव’ (1984), ‘घर का जासूस’ (1985) और ‘सचाई का पेंडुलम’ (1984) उनकी विज्ञान कथाएं हैं। ‘चीखती चपटप और खामोश आहट’ नामक उनके बाल-कथा संग्रह में भी सफेद और काला’, ‘शरीर का महत्वपूर्ण अंग’ ‘तितली’ शीर्षक से विज्ञान कथाएं दी गई हैं।


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