कृष्ण चूड़ा का वृक्ष - आशापूर्णा देवी Krishna Chuda ka Vriksh - Hindi book by - Ashapurna Devi
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कृष्ण चूड़ा का वृक्ष

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : गंगा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6807
आईएसबीएन :81-8113-033-2

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित आशापूर्णा देवी का नया उपन्यास....

Krishna Chuda Ka Vriksh _ A hindi book by Ashapurna Devi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका आशापूर्णा देवी का एक नया उपन्यास।
आशापूर्णा देवी का लेखन उनका निजी संसार नहीं है वे हमारे आस-पास फैल संसार का विस्तारमात्र है। इनके उपन्यास मूलतः नारी केन्द्रित होते हैं। सृजन की श्रेष्ठ सहभागी होते हुए भी नारी का पुरूष के समान मूल्यांकन नहीं? पुरुष की बड़ी सी कमजोरी पर समाज में कोई हलचल नहीं, लेकिन नारी की थोड़ी सी चूक उसके जीवन को रसातल में डाल देती है। यह है एक असहाय विडम्बना। बंकिम, रवीन्द्र, शरत् के पश्चात् आशापूर्णा देवी हिन्दी भाषी आँचल में सुपरिचित नाम है- जिसकी हर कृति एक नयी अपेक्षा के साथ पढ़ी जाती है।

कृष्ण चूड़ा का वृक्ष

सीधा-सादा गृहस्थ घर का बेटा सुमन जो वैसे तो हर क्षेत्र में कम से कम आडम्बर से जीवन निर्वाह करने की चेष्टा करता है। पर उसकी एक ही विलासिता या शौकीन तबियत का निदंशन प्रगट होता है उसके दाढ़ी बनाने के उपकरणों में। उनमें गरम पानी, ठंडा पानी, तौलिया, आफटर शेव क्रीम, सब रहता है। इन सबके बावजूद उसे फिटकरी की दहन ज्वाला का सामना करना पड़ता है। क्यों ? वह दाढ़ी बनाने का काम पुराने फैशन से करना- यानि खुले उस्तरे से करना- पसंद करता है। उसी से उसे सचमुच का आराम मिलता है।
आज भी इन सब सामानों सहित, दोनों गालों को साबुन के झाग में फुलाकर उस्तरा चलाने वाला था- अचानक एक तेज स्वर सुनकर काफी सारा कट गया। वह लहूलुहान हो गया।
यह चीख किसकी थी। बड़ी जानी पहचानी लगी। पर अजीब बात थी कि यह चीख उसे अनजानी भी लगी। कौन किसे क्या कह रहा था ? गाल को तौलिए से दबाकर असली स्वर की पहचान में था कि वह स्वर उछल कर सामने आ गया।

भैया, कुपति, घोर निनाद फूटा। ऐसे तो मेरा अब सब कुछ मान कर चलना मुश्किल हो गया है। मुझे यही लगता है कि अपना रास्ता चुनना पड़ेगा। सुमन का सफेद, धवल चेहरा अब रक्त वर्ण परिवर्तित हो चुका था। पर उस पर सुमन की निगाह ही नहीं पड़ी।
वह बोलता चला जा रहा था- यह मैं तुम्हें कहे देता हूँ।
सुमन ने एक बार हाथ पर रखे तौलिए को देखा और दूसरी बार भाई की ओर देखा। कौन-सा ज्यादा लाल था- भाई का गोल लाल चेहरा या उसका तौलिया ? सुजय का गोल, गोरा चेहरा किसी भी मानसिक तनाव के समय उत्तेजना से लाल रंग में बदल जाता है।
एक बार कभी जब सुजय छोटा था तब इस घर के काम वाले लड़के ने सुजय को तू कह पुकारा था। तब वह इसी प्रकार भाई से नालिश करने आया था- भैया मैं उसे नहीं रखूँगा- उसे अभी भगा दो।
किसे ?
उस पंचू पाजी को- वह मुझे....
भाई की शक्ल देख सुमन ने तड़ाक से उठ कर कहा- उसने तुझे ऐसे गाल पर थप्पड़ मार कर तेरा चेहरा लाल कर डाला ?
सुजय गुस्से में आग बबूला होता बोला- वह मेरे गाल पर थप्पड़ मार सकता है ? उसकी हिम्मत भी है ? उसने मुझसे तू कहकर बात किया है, छोटे भैया आजा सड़क में कैसा तमाशा हो रहा है चल कर देखें।
उस दिन तो असमंजस सा सुमन हँसने लगा- पर मन में, ऊपर से तो उसे कहना पड़ गया, उसकी इतनी हिम्मत है मैं उसे ठीक कर दूँगा। कहाँ है वह ?

पर आज का असमंजस सुमन हँस ना सका, बल्कि नयनों में दया स्वर में अधिकतर करूणा ढालकर बोला, तू क्या कह रहा है जय तेरी बातें तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रही है।
आज सुजय लम्बे समय की तैयारी के बाद अपने हथियारों सहित रणक्षेत्र में आन उपस्थित हुआ था।
तभी तो कंधों को उचका कर बोला, वह तो कर नहीं पाओगे यह तो मुझे मालूम ही था, हमेशा ही भोले बने रह गये। पर हर वक्त एक ही अदा अपना जलवा नहीं दिखा सकती।
सुमन के गाल में बड़ी तकलीफ हो रही थी, सिर्फ गाल में हांलाकि जो सामने देखने से तो उस्तरे से किया गया मांस पर वार था। सुमन ने उस दर्द की परवाह छोड़ दी और अस्थिर स्वर में पूछने लगे, परन्तु अचानक हुआ क्या ? कुछ बता तो सही।

अब तो अचानक नहीं हमेशा ही हो रहा है, पर सहने की एक सीमा भी होती है। घर का एक सदस्य जिसका दूसरे के साथ समान अधिकार है। वह विचारी हमेशा अनाधिकारी की भूमिका में पड़ कर मार खा रही है। भाभी अपने आचार व्यवहार की शुचिता का बहाना करके उसे रसोई या भंडारे में हाथ लगाने नहीं देती, इसका क्या मतलब ? अगर बेवक्त चाय पीने की ख्वाहिश हो तो चोर की तरह जाकर एक कोने से गरम पानी करके ले जाना, चाय, चीनी, दूध माँग कर ले जाना ? क्यों ? किसलिए ? एला क्या इस परिवार की कोई भी नहीं है ? एला का क्या किसी चीज पर अधिकार नहीं ?
सुमन रोने को हुए, तू क्या कहता है जय तेरी भाभी इस कदर बुरा बर्ताव करती है बहू के साथ। एकबार बुला तो उसे।
रहने दो भैया-एक तमाशा मत बनाओ जैसे कि तुम कुछ भी जानते नहीं ?
सुमन थोड़ा उदासी से कहने लगे, हाँ पता है। अच्छी तरह से जानता हूँ। धीरे-धीरे छूआछूत और गोबर-गंगाजल का प्रबल प्रताप शुरू हो गया है। सुन कर तू विश्वास करेगा- मुझे भी आजकल दफ्तर के पोशाक में आने नहीं देती। पहले बाथरूम में जाकर हाथ-पैर धोकर पोशाक बदल कर तौलिया लपेट कर तब घुसने का अधिकार।
वाह। बढ़िया। तुम सब मान लेते हो ? उपाय भी तो नहीं। शान्ति कायम तो रखना पड़ेगा। पता है शान्ति सबसे बड़ी है।

तुम्हीं समझो। सभी तो तुम्हारी तरफ बर्फ के गोले नहीं हैं। बाकी तो हाड़ मांस के इंसान हैं। उनके लिए यह सब सहन करना मुश्किल है।
ठीक ही तो है। उन्होंने बड़ा होकर क्या तीर मारा है ? इतना सब नहीं चलेगा। बुला उसे मैं उसे फटकारता हूँ।
आह दादा। क्या ड्रामाबाजी कर रहे हो ? हम लोग दूसरा बन्दोबस्त कर लेंगे।
सुमन का स्वर अब निराशा मे ड़ूबा था, ‘‘क्यों क्या एक फ्लैट लेकर...।’’
जय। सुमन चीख उठे, क्या कह रहा है तू ? अपना घर छोड़ दूसरे फ्लैट मे चला जायेगा ?
दादा अपना और कहाँ रहा ? यह तो जैसे पराये घर में चोरों से भी ज्यादा नीचा बनकर रहना। जब तक फ्लैट नहीं मिल जाता तब तक अपने सोने वाले कमरे में ही स्टोव पर....।’’
सुमन गुस्से से लाल-क्या बाल-बच्चों को लेकर तू क्यो ? किसलिए ? महारानी की खुशी के लिए- उनके गोबर-गंगाजल के छूआछूत के विचार के लिए। उससे तो वही क्यों ना अपने ठाकुर के दरवाजे पर एक चूल्हा लेकर। हविष्यान्न पका कर अपनी शुद्धता कायम रखें- जैसे बूआ करतीं थीं।
आह दादा ! क्या उल्टा सीधा बके जा रहे हो ? ठीक ही तो कह रहा हूँ। हफ्ते में तो तीन-चार दिन व्रत उपवास के कारण शाकाहारी-फिक इस परिवार को मुट्ठी में भर कर बाकी लोगों को हैरान क्यो ? ना ना वह सब नहीं चलेगा।

कल से ही वही भिन्न रसोई’ कर लें। हम सब-तू मैं, बहू, नीपू, टुकाई एक में हम सब इच्छानुसार मांस, अंडा, मुर्गी, खायेंगे मजे करेंगे। और नीपू, कहाँ है सुनो।
दादा ! फालतु कुछ अजीब बातें कह कर असल बात को घुमाओ मत। नीपू, टुकाई स्कूल नहीं गये ? मैं जो कह रहा हूँ वही होगा।
तु इस घर को छोड़ कर चला जायेगा। सिर्फ एक व्यक्ति की खमख्याली पन, शुद्धता कायम रखने की खातिर। कहाँ है जय वह उसे एकबार बुला ना।
बुलाने की जरूरत नहीं आसामी हाजिर है। एक शान्त स्वर सुनाई पड़ा। कहाँ किस सजा की बात हो रही है। फांसी की सजा मिले उसे भी मैं सिर झुकाकर अपने पति परम गुरू से लेने के लिए तैयार हूँ। उसका स्वर हास्यास्पद था। यानि अपने पति की घोषणा उसने छत के पूजा वाले कमरे से सुनीं थीं।
सुषमा छरहरा शरीर, चेहरा जैसे खुदाई करके गढ़ा गया, पहनावा बाल किनारी वाला मटका-साड़ी उसी प्रकार की समीज।

सुमन जल्दी से बोले, हँसी में उड़ाने वाली बात नहीं है। सुना है तुम इस संसार की हर चीज पर अपना कब्जा जमाये हो। बहू को रसोई में हाथ लगाने नहीं देतीं, देने से वह चीज फेंक देती हो।
सुषमा भी आत्मविश्वास से बोली, अगर दस बजे बासी कपड़े में सोती रहे। चाय डबलरोटी अंडा खाकर हाथ तक ना धोकर भंडारे की चाभी अगर छूने आये तो मैं क्या करूँ ? तुम्हारी बुआ ने ही तो मृत्यु के समय मेरा हाथ पकड़ कर एक जबरदस्त कसम दिलवा कर मेरा परलोक बिगाड़ तक चलीं गई हैं।
उसका मतलब ?
माने पता नहीं ? कह नहीं गई कि ‘तुम्हारे हाथों में अपने गोपाल को सौंप कर जा रही हूँ बहूँ। देखना उनका भोग आदि बन्द ना हो।’ याद नहीं।
बताया तभी याद आया। पर उनका गोपाल तो ठाकुर वाले कमरे में केला, बताशा, मक्खन, मिश्री, खीर, पनीर, सन्देश, रसगुल्ले में डूबे रहते थे। उनके साथ हमारे रसोई का क्या सम्बन्ध था ?
है सम्बन्ध। उसे मैं तुम्हें नहीं समझा सकती।

अगर भंडार शुद्ध नहीं रहेगा तो इतना सरजाम आयेगा कहाँ से ? सिर्फ रोज लड्डू ही नहीं, पीठा खीर, चन्दनपुली- पर जाने दो वह सब ? मैंने क्या तुम्हारे संसार में नया कुछ घुमाया है ? बूआ के जमाने से ही तो जैसा चला आया है उसी को जीजान से चलाने की कोशिश में हूँ। फिर भी क्या मैं गोपाल की सेवा उस प्रकार से कर पाती हूँ। वे दिन-दिन दुबले होते जा रहे हैं।
पीतल का खिलौना। दुबले। इतनी नखरेबाजी बरदाश्त करना सम्भव नहीं। सुजय अपने मुँह को विकृत करके कुछ व्यंगात्मक तीर छोड़ने जा रहा था कि सुषमा अपने पति की शक्ल को देख कर सिहर उठी। क्या कांड करा है ? खून बहा जा रहा है। इतना बड़ा तौलिया लाल हो गया है। जय क्या होगा ? फालतू बातें छोड़ देखों ना भाई क्या लगाना होगा तुम्हारे कमरे में दवाई हैं ?
सुजय को थोड़ा तो संकोच दिखाना पड़ा। मेरे कमरे में देखूँ ? कितनी अजीब बात हैं इतनी असावधानी से खुले उस्तरे से- और यह भी एक आश्चर्यतम घटना है। शेविंग व्यवस्था की इतनी उन्नति हुई है- पर अभी भी क्या खुले उस्तरे से उसे भी रोज धार करके-।’’
इतनी तैयारी से आया था। उस समय के लिए तो मामला ठंडा पड़ गया। क्योंकि सुमन के गाल में पट्टी करनी पड़ी, तीन दिनों तक दफ्तर से गोल।

एला कमरे में बैठी कुढ़ती रही। क्यों ना करती इसी को कहते हैं काम होते-होतें बिगड़ जाना।
पाँच साल का लड़का और तीन साल की लड़की जब सो गये तो, रात भर उसने पति को पट्टी पढ़ाई कि कल अगर सारा फैसला ना कर आये तो मैं गड़पार चली जाऊँगी।
एला की जिन्दगी इतनी बुरी तरह से कट रही थी- सुजय को इसका पता ना था। क्योंकि नित्य प्रति दिन के लय में कुछ अधिक लयहीनता का पता उसे ना लग पाता। जब एला का मन अभिमान, क्रोध, मानसिक यंत्रणा शीर्ष पर रहता-जिससे हर समय मुँह भारी, सिर दर्द, शाम होते ही माथा दर्द से फट जाना, यह सब जैसे चामरमनी चावल के भीतर कंकड़ जैसा प्रतीत होता, उसकी शान्ति भंग होती।

पर रविवार को जब एला को ले गाड़पार जाता तो उसका हास्योन्मुख, उज्ज्वल झलमलाता रूप देख, लगता अब सब ठीक हो गया। चलो।
पर हफ्ते में सिर्फ एक दिन बचना क्या बचना कहलाता है ?
एला दृढ़ थी। वह ऐसा आश्रित की भाँति नहीं पड़ी रहेगी। नहीं रहेगी। मान कर सामंजस्य बिठाने की चेष्टा क्यों करे ? उसका अपना स्वयं का जीवन नहीं है ?



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