भग्न वीणा - रामधारी सिंह दिनकर Bhagna Veena - Hindi book by - Ramdhari Singh Dinkar
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भग्न वीणा

रामधारी सिंह दिनकर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6838
आईएसबीएन :978-81-8031-334

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प्रस्तुत पुस्तक में विचार प्रधान कविताओं का संग्रह किया गया है और इसमें जीवन के उत्तरार्द्ध की दार्शनिक मानसिकता के दर्शन होते हैं।

Bhagna Veena - A Hindi Book - by Ramdhari Singh Dinkar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वे अहिन्दीभाषी जनता में भी बहुत लोकप्रिय थे क्योंकि उनका हिन्दी प्रेम दूसरों की अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धा और प्रेम का विरोधी नहीं, बल्कि प्रेरक था।

हजारप्रसाद द्विवेदी

दिनकर जी ने श्रमसाध्य जीवन जिया। उनकी साहित्य साधना अपूर्व थी। कुछ समय पहले मुझे एक सज्जन ने कलकत्ता से पत्र लिखा कि दिनकर को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना कितना उपयुक्त है ? मैंने उन्हें उत्तर में लिखा था कि–यदि चार ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें मिलते, तो उनका सम्मान होता-गद्य, पद्य भाषणों और हिन्दी प्रचार के लिए।

हरिवंश राय ‘बच्चन’

उनकी राष्ट्रीयता चेतना और व्यापकता सांस्कृतिक दृष्टि, उनकी वाणी का ओज और काव्यभाषा के तत्त्वों पर बल, उनका सात्त्विक मूल्यों का आग्रह उन्हें पारम्परिक रीति से जोड़े रखता है।

                                                                                      अज्ञेय

हमारे क्रान्ति-युग का सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व कविता में इस समय दिनकर कर रहा है। क्रान्तिवादी को जिन-जिन हृदय-मंथनों से गुजरना होता है, दिनकर की कविता उनकी सच्ची तस्वीर रखती है।

                                                                       रामवृक्ष बेनीपुरी

दिनकर जी सचमुच ही अपने समय के सूर्य की तरह तपे। मैंने स्वयं उस सूर्य का मध्याह्न भी देखा है और अस्ताचल भी। वे सौन्दर्य के उपासक और प्रेम के पुजारी भी थे। उन्होंने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक विशाल ग्रन्थ लिखा है, जिसे पं. जवाहर लाल नेहरू ने उसकी भूमिका लिखकर गौरवन्वित किया था। दिनकर बीसवीं शताब्दी के मध्य की एक तेजस्वी विभूति थे।

                                      नामवर सिंह

भग्न वीणा युगदृष्टा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की सुभाषितों से भरी ऐसी विचारप्रधान कविताओं का संकलन जिसमें महाकवि के जीवन के उत्तरार्द्ध की दार्शनिक मानसिकता के दर्शन होते हैं।
इस संग्रह में संग्रहित की गईं कविताएँ परम सत्ता के प्रति निश्चल भावना से समर्पित हैं। मनुष्य–मन की विराटता का यहाँ परिचय होता है।
नई साज-सज्जा और सरल सुबोध भाषा-शैली में प्रकाशित यह कृति सभी प्रबुद्ध पाठकों के लिए पठनीय है।

निवेदन

कई मित्रों ने पूछा है और मैं भी अपने-आपसे पूछता हूँ ऐसी कविताएँ मैं क्यों लिखने लगा हूँ। जवाब मुश्किल से बनेगा। कविता मेरे बस में नहीं है, मैं ही उसके अधीन हूँ। पहले उस तरह की कविता आती थी, तब वैसी लिखता था, अब इस तरह की आ रही है, इसलिए ऐसी लिखता हूँ।

‘परशुराम की प्रतीक्षा’ सन् 1963 ई. में निकली थी। ‘कोयला और कवित्य’ का प्रकाशन सन् 1964 ई. हुआ। उसी साल लारेन्स का आश्रय लेकर मैंने कुछ नए ढंग की कविताएँ लिखी, जो ‘आत्मा की आँखें’ नाम से निकलीं। उसके बाद मैं लगभग मौन हो गया। महसूस होता था कि कवित्व मुझे छोड़कर चला गया, मेरे भीतर अब कोई कविता नहीं है, जो बाहर आयेगी।

तब कई वर्षों के बाद वे छोटी-छोटी कविताएँ आने लगीं, जिनका संकलन वर्तमान संग्रह में हुआ है। लगता है, ‘आत्मा की आँखें’ लिखते समय मैंने जिस शैली का प्रयोग किया था, वही शैली इन कविताओं का आधार बन गयी है। केवल कवि कविता नहीं रचता, कविता भी बदले में कवि की रचना करती है।
कुछ मित्र ‘हारे को हरि नाम’, इस नाम से भी चौंके हैं। किंतु पराजित मनुष्य और किसका नाम ले ? जिन्हें मेरे पराजित रूप से निराशा हुई है, उन मित्रों से मैं क्षमा माँगता हूँ।

मैंने अपने आपको
क्षमा कर दिया है।
बन्धु, तुम भी मुझे क्षमा करो।
मुमकिन है, वह ताजगी हो,
जिसे तुम थकान मानते हो।
ईश्वर की इच्छा को
न मैं जानता हूँ,
न तुम जानते हो।

                                      -दिनकर

राम, तुम्हारा नाम


राम, तुम्हारा नाम कंठ में रहे,
हृदय, जो कुछ भेजो, वह सहे,
दुख से त्राण नहीं माँगूँ।

माँगू केवल शक्ति दुख सहने की,
दुर्दिन को भी मान तुम्हारी दया
अकातर ध्यानमग्न रहने की।

देख तुम्हारे मृत्यु दूत को डरूँ नहीं,
न्योछावर होने में दुविधा करूँ नहीं।
तुम चाहो, दूँ वही,
कृपण हौ प्राण नहीं माँगूँ।

संपाती


तुम्हें मैं दोष नहीं देता हूँ।
सारा कसूर अपने सिर पर लेता हूँ।

यह मेरा ही कसूर था
कि सूर्य के घोड़ों से होड़ लेने को
मैं आकाश में उड़ा।

जटायु मुझ से ज्यादा होशियार निकला
वह आधे रास्तें में ही लौट आया।

लेकिन मैं अपने अहंकार में
उड़ता ही गया
और जैसे ही सूर्य के पास पहुँचा,
मेरे पंख जल गये।

मैंने पानी माँगा।
पर दूर आकाश में
पानी कौन देता है  ?

सूर्य के मारे हुए को
अपनी शरण में
कौन लेता है ?

अब तो सब छोड़कर
तुम्हारे चरणों पर पड़ा हूँ।
 मन्दिर के बाहर पड़े पौधर के समान
तुम्हारे आँगन में धरा हूँ।

तुम्हें मैं कोई दोष नहीं देता स्वामी !
‘‘आमि आपन दोषे दुख पाइ
वासना-अनुगामी।’’


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