ला मांचा का बाँका - रोबर्ट मेन्नास्से La Mancha ka Banka - Hindi book by - Robert Mennasse
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ला मांचा का बाँका

रोबर्ट मेन्नास्से

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6873
आईएसबीएन :978-81-8143-996

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रोबर्ट मेन्नास्से का एक अत्यन्त मनोरंजक तथा विचक्षण उपन्यास

La Mancha Ka Banka - A Hindi Book - by Robert Mennasse

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


ब्रह्मचर्य अफ़सोस है कि इस क्षण वास्तव में यही मेरे दिमाग़ में था, और मैंने इसे बोला भी। ब्रह्मचर्य दो तरह के अनुभवों से छुटकारा दिलाता है, जो नर-मादा के साथ अनिवार्यतः होते हैं, और वे हैं : उकताहट और पीड़ा, अर्थात् एक सीधी-सादी या, जो उससे भी बुरा होगा, ग़ैर सीधी-सादी औरत की बाँहों में परलोक की कामना करते हुए हाँफना। मैंने कहा था : ‘‘बुरे नाटकीय प्रदर्शन के रूप में उच्च कोटि की प्रेमिका-भक्ति या सच्चरित्र प्रेम।’’
‘‘तू और तेरे घटिया चुटकुले, बस यही सुनाता रहिये।’’ क्रिस्टा ने कहा था, जब मैं तुलसीबंधु और बबूने के काढ़े में बैठ कर नहाने की तैयारी कर रहा था। वह बिना नहाये चली गयी थी। वह जल्दी में थी, उसे अपना व्याख्यान देना था। वह यूनिवर्सिटी में प्राचीन भाषाओं की रीडर थी।
मैं स्नान-टब में बैठा जम रहा था और जल रहा था। आगे से मैं कभी भी खुद को उसके हाथों में नहीं सौपूँगा, एक औरत के हाथों में। दूसरी तरफ़, मैं नहीं जानता था कि जो कुछ मेरे लिए करना ज़रूरी है, उसके अलावा और क्या करना चाहिए मुझे।

(पुस्तक का एक अंश)


रोबर्ट मेन्नास्से ने सफलतापूर्वक परिष्कृत व्यंग्य के साथ गहरे अवलोकन का मिश्रण किया है। उत्तर -68 की पीढ़ी के मानस में उनकी सुख-दुख मिश्रित अन्तर्दृष्टि प्रशंसनीय और सटीक है।

-न्यूज़ हिटमाइस्टर डे

रोबर्ट मेन्नास्से का ‘‘डॉन ख़ुआन दे ला मांचा’’ पाठकों को एक अत्यन्त मनोरंजक तथा विलक्षण उपन्यास लगेगा, जिसकी उद्वत विषय-वस्तु पाठकों की अपेक्षाओं से कहीं अधिक निकलेग। आलप्स का यह डॉन ख़ुआन एक ऐसा पात्र है, जो वर्तमान पीढ़ी की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका अनुमान प्रथम दृष्टि में प्रारम्भिक पृष्ठ पढ़ने पर ही लग जाता है।

-शटुट्टगार्टर त्साइटुंग

यह चेतना को झकझोर कर रख देने वाली पुस्तक है। यदि किसी ने पहले से मेन्नास्से की रचनाएँ पढ़ रखी हैं तो वह इसे बिलकुल न पढ़े, इसे पढ़ कर वह मेनास्से के दूसरे उपन्यासों को भूल जायेगा। मुख्यपृष्ठ तथा शीर्षक पर प्रथम दृष्टि डालते ही उपन्यास के पात्रों के परस्पर जटिल सम्बन्धों का परिचय मिल जाता है।

-बूखहांडल

प्राक्कथन


मूल भाषा जर्मन में प्रकाशित ‘डॉन जुआन दे ला मांचा’ के अन्तिम आवरण पर एक सूक्ति सज्जित है : ‘प्रेम का इतिहास स्वतन्त्रता-संग्रामों का इतिहास है।’ यह कहानी प्रेम को सुरक्षित सँजो कर रखने की कहानी है, परन्तु इस उपन्यास के डटन जुआन नाथन के हाथों से प्रेम हर बार फिसल जाता है। वास्त में वह हर बार मानसिक तौर पर उसे हाथों से निकलने देने को तैयार होता है। नाथन का यह नारीवादी दृष्टिकोण है कि सेक्स में और प्रेम में अधिक आनन्द पुरुष के बजाय स्त्री को मिलता है, और यह भेद भी उसे स्त्री बताती है। नाथन के पिता स्त्रियों में अपना सौभाग्य खोजते रहे थे, जबकि नाथन की माँ की पुरुषों से हर बार दुर्भाग्य से भेंट हुई।

इस उपन्यास में रोबर्ट मेनास्से ने अपने पाठकों को अपने तनावग्रस्त मुख्य पात्र की आत्मा के गहर की नरक-यात्रा पर भेजा है, जबकि पुस्तक-समीक्षकों का मानना है कि मेनास्से ने यह उपनयास एक पूर्णतया तनावमुक्त मनःस्थिति में लिखा है। उनके अनुसार यह एक असाधारण कलाकृति है, जिसमें उन्होंने बीसवीं शताब्दी के दूसरे अर्ध का अपने विलक्षण अन्दाज़ में जायज़ा लिया है, जिसके आधार पर ‘दी त्साइट’ के समीक्षक ने इसे दशक का सबसे रोचक उपन्यास माना है। ‘ज़्यूडदोएछे त्साइटुंग’ के समीक्षक ने हेल्मुट ब्योटिगर ने जहाँ नाथन की प्यार की तलाश को ‘सेक्सुअल समाजीकरण’ कहा है, वहीं ‘दी टागेसत्साइटुंग’ के क्रिस्टोफ़ श्रयोडर ने उपन्यास को ‘सेक्सुअल समाजीकरण पर प्रहसन’ का दर्ज़ा दिया है।
उपन्यास में बोले गये पहले वाक्य के सन्दर्भ में ‘दी त्साइट’ के समीक्षक योखेन युंग का मत है कि इससे लेखक की आपत्तिकर अभिरुचि का परिचय मिलता है, परन्तु साथ ही युंग का यह भी मत है कि पाठक को यह पहला वाक्य पढ़ कर विचलित नहीं होना है, क्योंकि उपन्यास इस वाक्य से कहीं अधिक बेहतर है।

‘डॉन जुआन’ का कथानक आस्ट्रिलाई साहित्य में ‘अनर्गल’ की छाप को सुस्पष्ट प्रकट करता है। मेनास्से की अद्भुत शैली, जो उनकी हर नयी रचना में नये परिष्कृत रूप लेकर आती है, हिन्दी पाठकों के समझ लेखन के नये आयाम खोलेगी। ‘कायाकल्प’ (मूल जर्मन में : दी शूबउमकेयर के बाद ‘डॉन जुआन’ मेनास्से का हिन्दी में प्रकाशित दूसरा उपन्यास है। अगस्त 2007 में मूल जर्मन में प्रकाशित इस उपन्यास का इतनी जल्दी हिन्दी में उपलब्ध होना स्वयं में एक उपलब्धि है।

-अमृता मेहता

1


ब्रह्मचर्य की अक़्लमंदी की ख़ूबसूरती मुझे पहली बार तब समझ में आयी थी, जब क्रस्टा किसी-शोटन ने हाथों में पीस डाला था, बाद में मेरा हस्तमैथुन किया था और आख़िर में इच्छा प्रकट की थी कि मैं उसकी उसके अपने शब्दों में—गाण्ड में चोदूं। इसके लिए, अर्थात् किसी और गुदा-मैथुन के संयोजन के लिए, पूर्वकालिक ग्रीक भाषा में एक विशेष क्रिया होती है, उसने कहा था। वास्तव में किसी से गुदा-मैथुन के लिए नहीं, बल्कि अश्वमूल से, जिसे, उसने बताया था, ‘रेक्टे अश्वमूल’ कहते हैं, मूलतः इस तकनीक के लिए। उसने पूर्वकालिक ग्रीक क्रिया को चिल्ला कर बोला, मैं भी चिल्ला कर बोला और जो मैं चिल्ला कर बोला, अगर वह एक शब्द था तो वह पूर्वकालिक ग्रीक से भी पुरातन था। मेरी आँखों में पानी आ गया था। मुझे यक़ीन नहीं कि किसी जलते हुए घर में मुझे इससे ज़्यादा आतंक महसूस होता।

ब्रह्मचर्य अफ़सोस है कि इस क्षण वास्तव में यही मेरे दिमाग़ में था, और मैंने इसे बोला भी। ब्रह्मचर्य दो तरह के अनुभवों से छुटकारा दिलाता है, जो नर-मादा के साथ अनिवार्यतः होते हैं, और वे हैं : उकताहट और पीड़ा, अर्थात् एक सीधी-सादी या, जो उससे भी बुरा होगा, ग़ैर सीधी-सादी औरत की बाँहों में परलोक की कामना करते हुए हाँफना। मैंने कहा था : ‘‘बुरे नाटकीय प्रदर्शन के रूप में उच्च कोटि की प्रेमिका-भक्ति या सच्चरित्र प्रेम।’’

‘‘तू और तेरे घटिया चुटकुले, बस यही सुनाता रहिये।’’ क्रिस्टा ने कहा था, जब मैं तुलसीबंधु और बबूने के काढ़े में बैठ कर नहाने की तैयारी कर रहा था। वह बिना नहाये चली गयी थी। वह जल्दी में थी, उसे अपना व्याख्यान देना था। वह यूनिवर्सिटी में प्राचीन भाषाओं की रीडर थी।
मैं स्नान-टब में बैठा जम रहा था और जल रहा था। आगे से मैं कभी भी खुद को उसके हाथों में नहीं सौपूँगा, एक औरत के हाथों में। दूसरी तरफ़, मैं नहीं जानता था कि जो कुछ मेरे लिए करना ज़रूरी है, उसके अलावा और क्या करना चाहिए मुझे।

2


यह सोचना ग़लत होगा कि सिर्फ इसलिए कि किसी की सेक्स में दिलचस्पी नहीं रही, वह सेक्स छोड़ देता है। बिल्कुल उलट—मेरे जीवन में सेक्स का अतिशय कभी भी इतना नहीं था जितना अब, जब सेक्स से मुझे ऊब होती है।

इसके दो कारण हैं—पहला यह कि अब मुझे घबराहट नहीं होती। क्योंकि घबराऊँगा मैं एक ऐसी स्थिति से, जो मेरे लिए उबाऊ है ? घबराहट उकताहट से बहुत ज़्यादा बुरा असल डालती है मर्दानगी पर। बिस्तर में घबराहट मानवोचित है, परन्तु प्रलोभनों पर बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया प्रकट करना पशुसदृश है। दूसरी तरफ कटुस्वभाव भी मानवोचित है। इसीलिए पशु अन्त में बिस्तर से मनुष्य बन कर निकलता है। दूसरी यह कि सम्भोग की अनिच्छा भी कोई कारण नहीं है सेक्स में दिलचस्पी न होने का। सच्चाई बल्कि इसके विपरीत है। शायद कोई भी प्रेरणा इतनी बलवान नहीं है, जितना वह, जिसमें एक ऐसा आदमी जोश से भर उठता है, जो एक ऐसे समाज में अपनी सम्भोग की इच्छा खो बैठा है, जो किसी च़ीज में कामुकता खोजे बिना एक लिटर खनिज जल भी नहीं ख़रीद सकता है। इन्सान सम्भोग की इच्छा खो सकता है, मगर उसे भूल नहीं सकता। सम्भोग की इच्छा एकमात्र ऐसी चीज है, जिसे इन्सान भूल नहीं सकता। हम अल्त्सहाइमर के मरीज़ों के बारे में जानते हैं कि वे अपने जीवन-चरित के कोहरे में डूबे सहज रूप से खड़ा कर लेते हैं। सम्भोगेच्छा को अनुभव करने की सहजवृत्ति, उसे शान्त करने की वृत्ति से अधिक प्रबल हो गयी है। इच्छातृप्ति शायद उसे अनुभव करने में है। मैं उसे अन्ततः एक बार इतनी प्रबलता से अनुभव करना चाहता हूं कि दूसरों के लिए इसका जो मतलब है उसे कम से कम युक्तियुक्त रूप से समझ सकूँ।

यहाँ विषयान्तर आवश्यक है —विषयान्तर सदा आवश्यक होते हैं, अतः पहले विषयान्तरों पर विषयान्तर : इश्क के मरीज़ जानते हैं कि पूरे दिन में होने वाले कुल कामों के अधिकतम हिस्से का इश्क़ से कोई रिश्ता नहीं होता, उसके कहीं नज़दीक भी नहीं बैठता। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, बल्कि ज़िन्दगी अन्तहीन व्यतिक्रमों का एक अनुक्रम होती है, जो इश्क़ से परे ले जाते हैं, लेकिन जितने बारे में यह सोचा जाता है कि आख़िर में वे बेजोड़ साध्य चक्करदार मार्ग हैं, जो इश्क़ के पास पहुँचाते हैं। इसीलिए इश्क़ के मरीज़ व्यतिक्रमों के विशेषज्ञ होते हैं, उनके लिए व्यतिक्रम जीवन का आचार-व्यवार है। व्यक्तिगत सफलतावादी विषय पर रहते हैं, आशिक़ विषयान्तर पर रहते हैं।
तो फिर पहला विषयान्तर—जब मैं छोटा होता था तो खुशिया बूढ़ी होती थीं। विज्ञापनों में सिर्फ़ बूढ़े होते थे। ख़ुशी की हर मुमकिन शक़्ल अच्छी उम्र के खिचड़ बालों  या सफ़ेद बालों वाले आदमियों के रूप में पेश की जाती थी, साफ़-सुथरे कपड़े, ख़ुशबूदार क़ॉफ़ी, जिन्दादिली पियक्कड़पन—‘‘आसबाख़ ऊअरआल्ट1 के बराबर हैं।’’

टीवी में ब्राण्डी पीता दद्दू कहता था, जो इतना ख़ुश होता था, कि उसकी मिसाल दी जा सकती थी। तब, बच्चे के रूप में, ख़ुशी मुझे कितनी दूरी पर नज़र आती होगी ! खुशी के अमीरात में दाखिला पाने के लिए मेरे लिए बीच में अभी बहुत साल पड़े थे। जब मैं खुशी का हिस्सेदार बनने की सम्भावना के नज़दीक पहुँचा तो विज्ञापनों में खुशी की नुमाइंदगी करने वाले सभी खुश लोगों की उम्र तीस साल कम हो गयी थी। साफ़-सुथरे कपड़े पहन ख़ुश़ी का इज़हार करने वाले अकस्मात बीस साल के जवान लड़के थे, जिन्होंने अपनी शर्ट्स फ़िनेस-स्टूडियोज़ में भिगो डाली थीं। शराब भी अब लड़कों, छात्रों और नाई की दुकान पर काम सीख रहे प्रशिक्षुओं के पीने की चीज़ बन गयी थी, जो बैकार्डी रम का एक घूँट पीते ही फौरन ज़िन्दादिल बन कर खजूर के पेड़ों से भरे किसी समुद्रतट पर नाचने लगते थे। आज मुझे ख़ुशी कितनी पीछे छूट गयी और हाथ से निकल गयी लग रही होगी। आज मेरी उम्र के मनुष्य को लॉस्ट जेनरेशन कहना अतिशयोक्ति होगा परन्तु इन कमर्शियल्स, इस यथार्थ लॉस्ट को प्रमाणित किया जा सकता है।

हमारे जीवन के दौर में ख़ुशी का वायदा करने वाली और कोई ऐसी मशीन नहीं थी, जो विज्ञापन से ज़्यादा असरदार हो। उपभोगवाद को त्यागने का वचन इसके मुक़ाबले में कुछ नहीं कि हम उसमें उपस्थिति नहीं थे, बल्कि वज़ीफ़ों की किफ़ायती दुनिया पर आचारिक चन्दोबा हमारा सम्बल था।

3


शरीर से मैं ख़ुद को उसे ज़्यादा बूढ़ा महसूस करता हूँ, जितना मैं हूँ। मगर अन्तःकरण से मैं उससे अधिक अपरिपक्व हूँ, जितना मुझे अपनी उम्र में होना चाहिए। यह वाक्य बकवास है, हन्ना कहती है। अक्सर मैं उस उम्र का रहा हूँगा, जितना मैं आज हूँ, अर्थात् अपनी शारीरिक तथा आन्तरिक स्थिति बराबर होने की सम्भावनाएँ रही होंगी। वाक्य में सत्य केवल यही है कि कोई भी अपनी उम्र को अपने शरीर के साइज़ के बराबर बने सूट की तरह महसूस नहीं करता। कभी नहीं।

4


क्रिस्टा शाजीशुदा है। अगर वह अकेली होती और सच्चा प्यार खोज रही होती तो मुझ जैसे आदमी से कभी न पटती। परन्तु उसका बिस्तर लगा हुआ है-और
1.    एक ब्राण्डी का नाम : दद्दू का अभिप्राय होता था कि इन चीज़ों को इस्तेमाल करने वाला तजरुबेकार है, जीवन का आनन्द भोगना जानता है।



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