एक जमीन अपनी - चित्रा मुदगल Ek Zameen Apni - Hindi book by - Chitra Mudgal
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एक जमीन अपनी

चित्रा मुदगल

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :206
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6874
आईएसबीएन :81-7178-778

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विज्ञापन की उस दुनिया की कहानी जहां समाज की इच्छाओं को पैना करने के औजार तैयार किए जाते हैं...

Ek Zameen Apni - A Hindi Book - by Chitra Mudgal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विज्ञापन की चकाचौंध दुनिया में जितना हिस्सा पूँजी का है, शायद उससे कम हिस्सेदारी स्त्री की नहीं है। इस नए सत्ता-प्रतिष्ठान में स्त्री अपनी देह और प्रकृति के माध्यम से बाजार के संदेश को ही उपभोक्ता तक नहीं पहुँचाती, बल्कि इस उद्योग में पर्दे के पीछे एक बड़ी ‘वर्क फोर्स’ भी स्त्रियों से ही बनती है। ‘एक ज़मीन अपनी’ विज्ञापन की उस दुनिया की कहानी भी है जहाँ समाज की इच्छाओं को पैना करने के औज़ार तैयार किए जाते हैं और स्त्री के उस संघर्ष की भी जो वह इस दुनिया में अपनी रचनात्मक क्षमता की पहचान अर्जित करने और सिर्फ देह-भर न रहने के लिए करती है। आठवें दशक की बहुचर्चित कथाकार चित्रा मुद्गल ने इस उपन्यास में उसके इस संघर्ष को निष्पक्षता के साथ उकेरते हुए इस बात का भी पूरा ध्यान रखा है कि वे सवाल भी अछूते न रह जाएँ, जो विज्ञापन-जगत की अपेक्षाकृत नई संघर्ष-भूमि में नारी-स्वातंत्र्य को लेकर उठते हैं, उठ सकते हैं।

 

एक

वह ठिठक गई। क्यारियों की चौड़ी मेड़ से एकदम धनुषाकार हो.....
जब भी ‘रंगोली’ आती है, उसके प्रवेश-द्वार के दोनों ओर चुने हुए गोटों और चट्टानों की सांधों में दुबकी-सी झाँकती कैक्टस की दुर्लभ प्रजातियाँ उसे मोहपश में ही नहीं जकड़ लेतीं, बेईमान हो उठने को भी उकसाती हैं कि वह उनमें से किसी भी पौधे को पुतले से जड़ खड़े दरबान की आँख बचाकर फुर्ती से उखाड़ ले और अपने पर्स में छिपा ले.....
‘‘उधर उस कोने में चलते हैं।’’ उसने मेहता को इंगित कर तेजी से उस ओर बढ़ चलने का संकेत किया। इससे पहले कि अन्य कोई उस मेज़ को धाँपता, वह मेज़ पर पहुँच जाना चाहती थी। मनपसंद रेस्तराँ में अगर मन मुताबिक बैठने की जगह न मिले तो वहाँ आना उसे व्यर्थ-सा महसूस होने लगता है। अन्य खाली मेजों के बावजूद वह पलट पड़ती, ‘कहीं और चलकर बैठते हैं....’ उन्हें पलटते देख मुख्य वेटर हड़बड़ाया हुआ-सा पास आकर पूछने लगता, ‘कोई गलती हो गई सर.....?’, मैडम की तबीयत जरा गड़बड़ लग रही है।’ वह खिसियाया-सा ऐसा ही कोई बहाना उछाल देता। अंकू की यह आदत उसे सख्त नागवार गुजरती और सनक की हद तक बचकानी, ‘तुम जगह खाती हो या खाना ?’.......
‘तीनों।’
‘तीसरा ?’
‘साथ !’ वह बगैर उसकी खीझ की परवाह किए अपनी बात चाबुक-सी हवा में लहरा देती, ‘मेहता ! जगह, साथ, खाना-तीनों समान महत्त्व रखते हैं मेरे लिए.....’

यानी बहस फिजूल है। आपके अच्छा लगने, न लगने की बात भी। आना है तो ऐसे ही आना होगा और इन्हीं शर्तों पर मित्रता भी, वरना न साथ आने की जरूरत है, न खाने की। इतने शुष्क असंबंधित कटाक्ष से वह गहरे कटकर रह जाता है लेकिन अकसर उसने अपने से उबरकर अंकिता के विषय में सोचने की कोशिश की है और पाया है कि स्निग्धता के कवच के भीतर कहीं कुछ इतना अधिक छिजा है उसमें कि वह छोटी-छोटी चाहनाओं को लेकर दुराग्रह की हद तक हठीली हो उठती है.....
‘‘हाय अंकिता........’’

यहाँ....कौन ? उसी को तो पुकारा गया है ? विस्मित दृष्टि इधर-उधर दौड़ाई तो ठीक अपने दाहिनी ओर ‘आब्जर्वेशन एडवरटाइजिंग’ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मि० मैथ्यू को खड़ा पा वह अप्रत्याशित खुशी से छलक आई। लेकिन दूसरे ही क्षण पता नहीं क्या हुआ कि उत्साह अचानक हाथ से छूटे गिलास-सा चूर-चूर हो गया। बड़े बेमन से प्रत्युत्तर में उसने हाथ ऊपर उठा दिया। ‘‘हायऽ...!’’ तनिक आगे बढ़ गए मेहता ने उसकी ‘हाय’ पर पलटकर देखा तो सुखद अचरज से भरकर फुर्ती से उनकी ओर लौट आया।

लगभग मिनट-भर तक गर्मजोशी से हाथ मिलाते रहने के उपरांत मि० मैथ्यू को सहसा अपने साथ आई निकट खड़ी सुप्रसिद्ध मॉडल अलका गिरिराज का खयाल आया। क्षमा-याचना करते हुए उसने बड़ी मृदुता से उससे परिचय की औपचारिकता निभाई, ‘‘अलका, अंकिता फ्रॉम फिल्मरस.....मेहता फ्रॉम फिल्मरस टू.....’’, ‘‘हाय’’ ! उसकी सुपरिचित मुसकान के प्रत्युत्तर में अलका ने बेहद ठंडे अपरिचित स्मित के साथ उसकी ओर देखा जैसे कि वह अंकिता से पहली बार मिल रही हो और बावजूद इसके उसे मिलने में कतई दिलचस्पी न हो। अलका के इस अप्रत्याशित व्यवहार से आहत नहीं हुई। जानती है कि दोष अलका का नहीं है, सुप्रसिद्ध का है जिसकी फुनगी पर चढ़कर अकसर लोगों की स्मरण-शक्ति कमजोर हो जाती है और दृष्टि क्षीण। यही अलका है, जब भी उसकी एजेंसी आती थी इठलाती हुई ‘दन्न’ से उसकी मेज पर आसीन हो जाती, ‘अपने राम तो आज लंच तुम्हारे साथ ही करेंगे अंकू ! लाई क्या हो टिफिन में ?........ऊँऽऽ यह क्या घास-पात भर लाती हो ?.....किसी दिन भरवाँ करेले बनाकर लाओ न....और दिन बता दो.....अपन सीधे आकर धरना दे देंगे तुम्हारी मेज़ पर......’
‘‘कब लौटीं ?’’

‘‘कौन, मैं ?.....गई कहाँ थीं ?’’ मि० मैथ्यू के प्रश्न से वह एकबारगी चौंकी ।
‘‘क्यों ....तुम घर नहीं गई थीं ?’’
‘‘गई थी पर......उस गए हुए को तो महीनों होने आए ?’’
‘‘महीनों ?.....’’

‘‘जी महीनों और हुजूर....फॉर योर काइंड इंफारमेशन....घर से लौटते ही हमने आपको दस-बारह से कम फोन नहीं किए होंगे....न आप मिले, न प्रत्युत्तर में फ़ोन ही किया.....उलटा सेक्रेटरी से टलवाकर बेइज्जती और करवाई कि मैडम प्लीज.....आप बार-बार फोन करने की जहमत न उठाएँ....सर चाहेंगे तो आपको खुद ही फोन कर लेंगे.....संदेश पहुँचा दिया है आपका.....यह तो संयोग से आज आप टकरा गए वरना.....हमने तो मान लिया था कि अब हमारी भेंट नहीं होगी क्योंकि आप मिलना ही नहीं चाहते और दफ्तर पहुँचकर मैंने जबरन मिलना नहीं चाहा।’’ वह कोशिश करके भी अपने को रुक्ष होने से बचा नहीं पाई। हालाँकि अपना व्यवहार स्वयं उसे अविवेकपूर्ण लगा। न यह स्थान आपसी मनमुटावों के निपटारे के लिए उपयुक्त है, न अचानक हिस्से में आई यह मुलाकात !
‘‘कैसी बातें कर रही हो !’’

मैथ्यू का स्वर अविश्वास से फुसफुसा आया।
अगले ही क्षण वह सतर्क-भाव से गलतफ़हमी बुहारता-सा बोला, ‘देखो अंकिता ! टकरा गए वाली लीपा-पोती यह नहीं है। मैंने तुम्हें देखते ही पुकारा.....अगर तुमसे मिलना न चाहता तो कतराकर निकल गया होता.....तुम्हें क्या पता चलता कि....खैर, छोड़ो.....सच तो यह है कि मुझे तुम्हारे फोन की कोई सूचना नहीं मिली.....रहा उस सेक्रेटरी का रवैया, उसकी तो एजेंसी से छुट्टी हो गई-वह एक अलग पचड़ा है-कम घपले नहीं किए उसने.....हाँ, तुम्हारी दोस्त नीता ने ही मुझे यह सूचना दी थी कि फिलहाल तुम बम्बई नहीं लौट रहीं.....किसी व्यक्तिगत समस्या के चलते.......फिर नीता ने ही प्रस्ताव रखा था-अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो अंकिता का काम मैं आगे भी देखती रह सकती हूँ। वह तुम्हारी दोस्त थी, मुझे उसे रखने में भला क्या आपत्ति हो सकती थी ? काम वह बखूबी जानती ही है.....’’
अविश्वास और विस्मय से वह अस्थिर हो आई। वह तो अब तक इसी प्रभाव में थी कि मैथ्यू का फोन पर उपलब्ध न होने का मतलब है उसके लिए एजेंसी में-‘प्रवेश निषिद्ध’। यह मैथ्यू क्या कह रहा है ! नीता ने यह झूठ क्यों गढ़ा ? जबकि वह निर्धारित प्रोग्राम के अनुसार ही बंबई लौट आई थी और आते ही सबसे पहले नीता से ही मिली थी....:?
‘‘मैथ्यू, दो से ऊपर हो रहा है......’’ अलका ने अपनी कलाई मोड़ी।
‘‘ओह ! लेट अस मूव...’’

अलका के याद दिलाते ही मैथ्यू कुछ इस कदर हड़बड़ाया जैसे उसे जरूरी काम का स्मरण करवाया गया हो। काटने का यह शिष्ट लहजा उसे गहरे तक खुरच गया। अधिकार-प्रदर्शन के ये तेवर भी।
‘‘सी यू अंकिता...’’ उसके हाथों को गहरी आत्मीयता से छूकर मैथ्यू ने विदाई चाही।
‘‘बायऽऽ।’’
‘‘बायऽऽ।’’
उसने स्पष्ट महसूस किया कि अलका ने बड़ी अनिच्छा से उसकी ओर हाथ उठाकर विदा की औपचारिकता निबाही है। अलबत्ता मेहता पर उसने मुस्कुराहट परोसने की उदारता अवश्य बरती। उसने यह भी लक्ष्य किया था कि उसकी और मैथ्यू की बातचीत के दौरान वह निरंतर मेहता से ही बतियाती रही थी.....

जाहिर था कि उसकी ओर से रत्ती-भर भी भाव न दिया जाना आज की नंबर वन मॉडल को नख से शिख तक अखर गया है। अखरता रहे। शायद उसने जान-बूझकर ही किया ताकि व्यक्ति स्वयं अवमानना की उस धुएँ-भरी कोठरी के भीतर हो सके जहाँ औरों को ढकेलकर वह उनकी औकात बताने की फिराक में उनका दम घुटता देखकर प्रताड़ना-आनंद उठाता है। अलका की कहाँ ले बैठी ? माना कि साल-भर पहले तक अलका के साथ अच्छा उठना-बैठना था पर मानसिक रूप से वह उससे इस कदर जुड़ी भी नहीं रही कि उसके आज के ये नक्शे उसे अस्त-व्यस्त कर जाएँ, लगे कि अचानक उससे उसका कुछ छिन गया है या छीन लिया गया है और वह एकाएक दरिद्र हो उठी है। मगर नीता !.......नीता से उसे ऐसे दोगले व्यवहार की उम्मीद सपने में भी नहीं थी। एक भरोसा होता है जो अचानक बीज से फूटकर अँकुआता हुआ टहनियों में फलने-फूलने लगता है। आखिर मैथ्यू झूठ क्यों बोलेगा ? मैथ्यू के नि:संकोच व्यवहार से राई-रत्ती आभास नहीं हुआ कि वह उससे झूठ बोलने की कोशिश कर रहा है या अपनी कुटिलता पर परदा डालने की खातिर नीता को लपेट रहा है ! कहीं कोई चालाकी होती तो क्या वह उसी पुरानी बेतल्लुफी से उसका सामना कर पाता ? बहुत बड़े पद पर है मैथ्यू। न उससे रौब खाने का सवाल उठता है, न संकोच-लिहाज का। सीधे-छुट्टी कर सकता था उसकी, ‘आई एम सॉरी अंकिता। मेरे यहाँ अब तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है।’ काश ! ऐसा कुछ घट जाता। वह कुछ दिनों रो-बिसूरकर तनावमुक्त हो जाती। यंत्रणा की चक्की में तो न पिसती रहती निरंतर !.......

तलुवों के नीचे से उठा सर्द सुन्नाहट का बवंडर पिंडलियों से रेंगता हुआ अचानक बिच्छू के विष-सा पूरी देह में चुनचुनाने लगा। उसका पोर-पोर अपना न होने के अहसास से टूट रहा है.....कोई नियंत्रण नहीं......अब गिरी अब.......घबराकर उसने मेहता की बाँह पकड़ ली। अप्रत्याशित। एक दूरी उनके दरमियान सदैव खुदी रही है। मेहता ने अबूझ दृष्टि से उसकी ओर देखा। छुआ। छुअन के ठंडेपन से अधीर हो आया, ‘अंकू ! क्या हुआऽऽ ’’ प्रत्युत्तर में उसने आँखों से संकेत-भर किया कि आगे चल पाना उसके लिए संभव नहीं; यहीं पास वाली किसी मेज पर बैठ जाना ठीक होगा।

उसे सहारे से कुर्सी पर बैठाकर मेहता ने पास आते बैरे को वहीं से इशारा कर तत्काल पानी ले आने का संकेत किया। फिर उसकी नम, ठंडी हथेलियों को सहलाते हुए बेसब्री से पूछा, ‘‘यह अचानक.....क्या हो गया तुम्हें.....?’’
उसने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ उत्तर दिए नहीं जा सकते। किसी प्रकार पर्स में से रूमाल टटोलकर वह माथे, गले पर छलछला आए श्वेद बिंदुओं को पोंछने लगी। कुछ मेजें उसे कौतूहल से घूर रही हैं, वह स्वयं बड़ा अटपटा महसूस कर रही है......
‘‘तुम....एक बार अपनी जाँच क्यों नहीं करवा लेतीं.....कभी मायग्रेन, कभी.....’’
उसने ‘करवाना है’ वाले अंदाज में खामोशी से सिर हिला दिया, फिर बैरे द्वारा लाकर रखे गए जग से गिलास में पानी उँडेलकर गटागट पीने लगी।
‘‘घर ले चलूँ.....?’’

‘‘बैठते हैं.....’’ उसने अपने को भरसक सहेज मेहता को चिंतित न होने देने की गरज से कहा। कितने उत्साह से वह उसे ‘रंगोली’ लाया है। उसकी एक कॉपी जो ‘सरस चाय’ पर लिखी गई थी, पिछले साल के विज्ञापनों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय साबित हुई और महीने-भर पहले ही उस विज्ञापन को ‘एडवरटाइजिंग क्लब’ नाम संस्था ने वर्ष के सर्वाधिक सार्थक विज्ञापन के रूप में पुरस्कृत कर मेहता को उसके काम के लिए सम्मानित किया है। दफ्तर के उत्साहित साथियों ने सम्मान के उपलक्ष्य में मेहता से एक जोरदार पार्टी की माँग की। और इस बात पर अड़ गए थे कि वे दालमोठ और समोसे पर नहीं टलने वाले। तंदूरी चिकन के साथ चिल्ड बीयर से नीचे बात नहीं जमेगी। मेहता ने थोड़ी आना-कानी करने की कोशिश की कि किसी प्रकार मामला चाय और पनीर-पकौड़ों पर निपट जाए, मगर बहुमत के सामने उसे हथियार डालने ही पड़े। मेहता ने कहा था, ‘इस ट्रीट में तुम शरीक जरूर हो मगर मेरे लेखे यह शरीक होना मायने नहीं रखता। तुम्हें मैं अलग से डिनर या लंच पर ले जाऊँगा, वहीं जहाँ तुम खाना पसंद करोगी और वही जो तुम खाना चाहोगी।’ ऐसे सुंदर अवसर पर अगर वह नीता की टुच्चीगिरी बात छेड़ बैठे अच्छे-खासे मूड़ पर घड़ों पानी पड़ जाएगा। अचानक बिगड़ी अपनी तबीयत को लेकर ही वह मेहता के सामने अत्यन्त अटपटा ही नहीं महसूस कर रही, लज्जित भी अनुभव कर रही है......वह पूछेगा जरूर कि.....
‘‘कुछ ठीक लग रहा है ?’’
‘‘हाँ....’’

‘‘क्या लोगी ?’’
‘‘कुछ भी।’’ बोलना जरूरी लगा।
‘‘आज कुछ भी खा लेने यहाँ नहीं आए हैं हम !’’
वह सँभली। ठीक ही तो कह रहा है मेहता। लेकिन क्या करे ? भीतर की अन्यमनस्कता उसकी चेतना पर भारी-भरकम सिल्लियों-सी लटकी हुई घड़ी की पेंडुलम सदृश टिक्-टिक् करती हथौड़े के प्रहार-सी अनुभव हो रही है। जो कुछ सामने है वह बहुत सुंदर और अच्छा होकर भी उसके मन को अपने से बाँधने में असमर्थ है.....नहीं, इस क्षण वह अपने सामने के सत्य से ही संबंधित रहना चाहती है। मेज पर कुहनियाँ टिकाकर वह सीधी हो बैठ गई। वातानुकूल की ठंडक भी अब अच्छी लग रही है, हॉल में मध्यम सुर में गूँज रहा अमजद अली खान का सरोद वादन भी। ठंडक और लय की भी अपनी आँच होती है।

ठंडेपन की चींटियाँ शनै:-शनै: लोप हो रही हैं।.....काफी स्वस्थ महसूस कर रही है। मेनू बता देने के बाद और भी। मेहता के चेहरे पर उगी रोशनी कितनी अच्छी लगती है !
बैरा ‘चिकन स्वीट कार्न सूप’ रखा गया है। वह सूप के प्याले में ग्रीन चिली सॉस के साथ जिंजर शेरी मिलाने लगी.....
रोशनी आँख-मिचौनी खेल रही है.....मेहता न जाने किस सोच में डुबकी लगा रहा है। चुप्पी तोड़नी ही पड़ेगी। उसने स्वर को सायास बुलबुला बनाकर उसे छेड़ा, ‘‘यह क्या मजाक है......तबीयत हमारी नक्शे दिखा रही है और तोरई आप हो रहे हैं.....?’’

सूप-भरी चम्मच मेहता के उदास खिंचे होठों के पास पहुँचकर ठिठक-सी गई, ‘उल्लास होने जैसी बात नहीं है.....?’’
‘‘मसलन...’’

‘‘यही कि.....तुम मुझे इस काबिल नहीं समझतीं कि मैं तुमसे कुछ शेयर कर सकता हूँ, बाँट सकता हूँ......परेशानियों के अपने भीतर ताला लगाके बंद रखने का शौक है तुम्हें....कोई नहीं जान सकता, मैं भी नहीं ?.....हालाँकि जानने में विशेष दिलचस्पी नहीं है मुझे, जितनी सामने हो, काफी है मगर अंकू ! तुम्हारे ये ताले तुम्हारे लिए ही जख्म की शक्ल अख्तियार करते जा रहे हैं और तुम अपनी ही टीसों में घुल रही हो....टूट रही हो.....बड़ा अपच दर्शन है तुम्हारा....’’



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