गदर के 150 साल - अजय कुमार गुप्ता Gadar Ke 150 Saal - Hindi book by - Ajay Kumar Gupta
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गदर के 150 साल

अजय कुमार गुप्ता

प्रकाशक : पेंग्इन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :233
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6895
आईएसबीएन :0-14-310343-1

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गदर के 150 साल

Gadar Ke 150 Sal - A Hindi Book - By Ajay Kumar Gupta

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

1857 में क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ ये सारे प्रश्न आज डेढ़ सौ साल बाद भी विवाद से घिरे हैं।
जो भी हो, तब भारत की नींद टूट रही थी। टुकड़े-टुकड़ों में ही सही, वह सपने देखने लगा था। गुलामी के बंधनों को तोड़ देने की हसरतें गांव-गांव, शहर-शहर में सिर उठाने लगीं थीं। अपनी सरजमीं को अंग्रेज़ी साम्राज्य के चंगुल से आज़ाद कराने के लिए सारे भारतवासी आख़री हमला बोलने को तैयार थे। क्रांति हुई और अंग्रेजों के पांव उखड़ गए। एक बार तो लगा कि देश अब आज़ाद है, लेकिन...
अंग्रेजों ने जवाबी कार्रवाई की। फिर जो क़हर उन्होंने ढाया, उसे देखकर पत्थर दिल इंसान तक सिहर उठे।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से प्रकाशित गदर के 150 साल उस दौर पर एक गहरी दृष्टि डालती है।

भूमिका

इतिहास में सब कुछ सत्य नहीं होता। इतिहास में अधिकांशतः तथ्य होता है। पसंदीदा तथ्य को आधार मानकर अधिसंख्य इतिहासकार अपनी इच्छानुसार तर्क की मूरत गढ़ते हैं, और सच्चाई का आभास पाने के लिए अपनी-अपनी शैली में उस पर रंग-रोगन करते हैं। भारतीय इतिहास में 1857 के अध्याय के साथ ऐसा ही हुआ है। इसमें क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ—आदि प्रश्नों पर तो विवाद है ही, इसके नामकरण पर भी गहरा विवाद है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, विद्रोह, महाविद्रोह, गदर, सिपाही विद्रोह, क्रांति, महाक्रांति, सैन्य-क्रांति, महासंग्राम, विप्लव, महाविप्लव, क्रांतिकारी युद्ध, राष्ट्रीय युद्ध आदि अनेक नामों से इसे याद किया जाता है। इसकी सफलता को लेकर भी संदेह किया जाता है। बहरहाल हमें न तो इसके पक्ष-विपक्ष के किसी मसले में पड़ना चाहिए, नही इससे जुड़े किसी विवाद को उठाना चाहिए। अनेक टिप्पणीकारों (इतिहासकारों) की तरह इसमें सम्मिलित रचनाएं स्वयं इसकी ओर इशारा कर दे रही हैं। कार्ल मार्क्स, राकोवस्की, अर्नेस्ट जोन्स, जस्टिन मैकार्थी, विनायक दामोदर सावरकर, डिज़रायली, एंगेल्स, ट्रिवेलियन, चार्ल्स बॉल, वित्सन, मैत्सन, व्हाइट, होल्फ़ेज़, एस. राय, एस. एन. सेन, आर-सी मजूमदार, जॉन के, मेटकाफ़, रसेल, परमानंद, फारेस्ट, ग्रांट, सुंदरलाल, वसुदेव गोस्वामी, अयोध्या सिंह, जी.मुखर्जी सरीखे प्रायः सभी

 लेखकों-इतिहासकारों-टिप्पणीकारों में इस बारे में मतभिन्नता स्वष्टतः परिलक्षित होती है। परस्पर विरोधाभासों के बावजूद इन तमाम टिप्पणीकारों की टिप्पणी में दो-तीन जगहों पर महत्त्वपूर्ण समानता-सहमति भी दिखती है। मसलन, तब भारत की नींद टूट रही थी ! टुकड़ों-टुकड़ों में ही सही, वह सपने देख रहा था, जाग रहा था ! हिंदू-मुस्लिम पहली बार कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ संघर्ष कर रहे थे ! भारत की इन घटनाओं से शेष विश्व का समुदाय एवं पत्रकारिता जगत भी धीरे-धीरे परिचित हो रहा था !

1857 के पूरे प्रकरण में ये तीनों तथ्य अति महत्त्वपूर्ण हैं, जो इसके छोटे-बड़े उद्देश्यों की सफलता के समर्थन के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप में मुक्ति के लिए मची छटपटाहट की ओर संकेत करना चाहते हैं। 1857 में या उसके बारे में शोषक बनाम शोषित की राय अथवा शासक बनाम शासित के विचार तथा कार्ल मार्क्स या राकोवस्की जैसे तीसरे पक्ष के मत को फिलवक्त दरकिनार कर मैं प्रस्तुत संकलन के बहाने आप सभी को यह स्मरण कराना चाहता हूं कि तब वह भारतीय जागरण की बेला थी, और आज यह उस जागरण के 150 वर्ष को मनाने का अवसर है, यह भारत के धर्मनिरपेक्ष सांस्कृतिक स्वरूप के अंकुरण के 150 वर्ष पूरे होने का अवसर है, यह भारत की अखंडता तथा एकता के 150 वर्ष मनाने का समय है, यह विभिन्न संस्कृतियों के भारतीय संस्कृति में रचते-बसते हुए विविधता में एकता के प्रस्फुटन के 150 वर्ष पूरे होने का प्रेरक पल है। और, न सिर्फ भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश बल्कि पूरे उपमहाद्वीप को इसे विशेष रूप से स्मरण करना चाहिए। वर्मा (म्यांमार), थाईलैंड, नेपाल जैसे देशों को भी इससे जुड़ी दुर्लभ यादें ताज़ा करने का यह उचित समय है। यही नहीं, ब्रिटेन-जिसके स्वयं का तब का बुद्धिजीवी तबका, तत्कालीन भारतीय अंगड़ाई को स्वतंत्रता पाने की बेचैनी के रूप में देख रहा था, और आज जबकि उन बुद्धिजीवियों की संख्या बहुत बढ़ चुकी है, उनके लिए भी यह अवसर विश्व में भारत के महत्त्व को समझने, तथा स्वयं को परखने का है। दुनिया भर की लोकतांत्रिक शक्तियों के लिए 1857 के उस भारतीय कालचक्र को विशेष रूप से स्मरण करने का यह महत्त्वपूर्ण अवसर है, जिसने उस दौर में अन्य देशों के अंदर भी स्वतंत्रता की चाहत जगाई थी, तथा उस इच्छा शक्ति को संबल प्रदान किया था।

इतिहास समय-सापेक्ष होता है। इसलिए उसे कुरेदने की जगह आज के संदर्भ में समझने-जानने की आवश्यकता पड़ती है। उसे उस कालखंड की राजनैतिक-भौगोलिक-पारिस्थितिक कसौटी पर कसकर समग्रता में समझना-समझाना चाहिए। 1857 के अध्याय को समझने के लिए तो यह और भी ज़रूरी है। नई पीढ़ी को अनेक जलियावाला कांड जैसी कुर्बानियां देने वाले अपने अतीत-पूर्वज तथा बाद के वर्षों में लाखों की संख्या में भारतीयों को तिलक-गांधी-भगत सिंह-सुभाषचंद्र बोस बनाने के लिए प्रेरित करने वाले उस ऐतिहासिक समय को आज स्मरण कर एकता तथा राष्ट्रीयता और कर्तव्य तथा स्वतंत्रता का मंत्र नए सिरे से उच्चारित करना चाहिए।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज हम वैसे समय में 1857 के 150 वर्ष पर उन कथित ‘पिछड़े’ लोगों की जागृति को याद कर रहे हैं, जब भारत, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे ‘अति लोकतांत्रिक’ राष्ट्र आतंकवाद के नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं। 21 वीं सदी की यह विडंबना विकराल रूप धारण कर चुकी है। भटके हुए कुछ मनुष्य बम बनाने के साथ-साथ स्वयं बम (मानव बम) बन रहे हैं। ऐसी स्थिति में धरती की सुख-शांति बचाने के लिए पूरी दुनिया को मिलकर पहल करने की आवश्यकता है, और इसके लिए भारतीय उपमहाद्वीप सहित अन्य महाद्वीपों-महादेशों के युवाओं को आगे आकर भटके हुए लोगों को ‘जीवन से प्रेम’ करना तथा ‘आतंक की जगह शांति की भाषा’ का उपयोग करना सिखाना चाहिए। युवाओं को चाहिए कि भारत 1857 के 150 वर्ष तथा भारत की आज़ादी के 60 वर्ष एवं ‘वंदे मातरम्’ के 100 वर्ष के अवसर को सांस्कृतिक अभियानों के रूप में मनाएं। इसके लिए वे सरकारी-गैरसरकारी स्तरों पर आयोजन-उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। अपने अभियान में वे विश्व-शांति की मजबूती के लिए अनेक कार्यक्रमों–प्रयासों को जोड़ सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वैश्वीकरण के वर्तमान युग में दरअसल यह विश्व जागरण की बेला है।

भारत के साथ-साथ पूरे विश्व के हित का भी ध्यान रखना आज उतना ही जरूरी है।
भारत एक उदार राष्ट्र है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आज भी 1857 के नायकों–खलनायकों के स्मृति-चिन्ह देखे जा सकते हैं। दिल्ली में आज भी एक ओर हडसन लाइन है, तो दूसरी ओर मेटकाफ़ भवन है। खलनायकों के ये नाम तथा अन्य इसी तरह के नाम देश के अन्य शहरों में भी मिल जाते हैं। पता नहीं इन नामों को हम आज भी क्यों ढो रहे हैं ? ये नाम तो बदलने चाहिए, लेकिन साथ ही अधिक आवश्यकता है उस मानसिकता-सोच को स्थायी रूप से बदलने की, जो साम्राज्यवादी शक्तियों की यादें आज भी यदा-कदा ताज़ा करती रहती हैं और जो पूरी दुनिया के अमन-चैन को डसने की कोशिश करती हैं।

यह संकलन 1857 के महासंग्राम में शहीद हुए असंख्य भारतीय क्रांतिकारियों की याद को समर्पित है। इसे तैयार करने में विभिन्न पुस्तकों, समाचार पत्रों-पत्रिकाओं के प्रकाशकों एवं अनेक रचनाकारों के साथ-साथ भारत के सर्वोच्च न्यायलय, राष्ट्रीय अभिलेखागार, राष्ट्रीय संग्रहालय, साहित्य अकादेमी, नेहरू लाइब्रेरी, खुदाबख्स लाइब्रेरी, बैरकपुर प्रशासन आदि ने बहुमूल्य सहयोग दिया है। इन सबके प्रति हम आभार प्रकट करते हैं।

                                -हरेन्द्र प्रताप
                                 सह संपादक


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