कुछ रफू कुछ थिगडे - अशोक वाजपेयी Kuch Rafu Kuch Thigde - Hindi book by - Ashok Bajpai
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कुछ रफू कुछ थिगडे

अशोक वाजपेयी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :79
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 6897
आईएसबीएन :81-267-0846-8

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कुछ रफू कुछ थिगडे यह श्री अशोक वाजपेयी जी का ग्यारहवाँ कविता संग्रह है।

Kuch Rafu Kuch Thigde - A Hindi Book - by Ashok Bajpai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है जो यह भरोसा दिलाती है कि कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता और सब कुछ गँवा देने के बाद भी कुछ बचा रहता है।
अपने ग्यारहवें कविता-संग्रह के साथ उपस्थित अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन ताज़ा कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित हैं। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गयी ये कविताएँ, कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद, अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव मानने वाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाये हुए हैं उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती हैं।

हलके से


वह पत्ती हवा में हलके से काँपी
हवा उस पत्ती के पास से गुज़रते हुए हलके से काँपी
एक बच्चा उधर बैठे ठण्ड से हलका सा काँपा
एक बूढ़े के लगभग मरणासन्न चेहरे पर
जीवन फिर से काँपा और शान्त हो गया।

बुढ़िया


बुढ़िया की झोली में
कुछ फल थे सूखे हुए,
कुछ दबी हुई आकांक्षाएँ,
कुछ अनकहे रह गए शब्द।
बुढ़िया के घर में अन्न न था,
न कोई बिछौना,
न कोई, किसी के होने की आवाज़।
अपनी झोली बग़ल में रखे हुए
बुढ़िया पसरी रहती है
ओसारे में
जैसे जीवन बिछा हो मृत्यु के फर्श पर।

जब-तब


जब सारे अपमान झर गए
जब मुरझा गईं सारी इच्छाएँ,
जब गली में आगे जाने की जगह न रही—
तब वह उदारचरित देवता आया
बीत गए जीवन की गाथा से
कुछ चरित्र, कुछ घटनाएँ वापस लाकर
उनकी धूल-मैल साफ़ कर
उन्हें उपहारों की तरह उजला बनाते हुए।

शुरुआत


वे सब चले गए
सब कुछ को रौंदकर, ध्वस्त कर
आश्वस्त कि उन्होंने कुछ भी अक्षत नहीं छोड़ा।
तब सूखी पत्तियों के ढेर में गुम हुए कीड़े की तरह
एक शब्द आया
और उसने अपने मुँह में थोड़ी सी मिट्टी
और तिनका उठाकर रचने की शुरुआत की।

वह आया


देवताओं ने मार्ग बुहारा,
पंक्तिबद्ध खड़े हो गए दोनों ओर देवदूत,
आकाश हुआ नील-उज्जवल,
पृथ्वी पुण्यप्रसू,
जब वह आया
जिसे बाद में कहा गया मनुष्य।
फिर आया जीवन फिर आई मृत्यु।


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