कोजागार - बुद्धदेव गुहा Kojagar - Hindi book by - Budhadev Guha
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कोजागार

बुद्धदेव गुहा

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :351
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6915
आईएसबीएन :978-81-8031-138

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कोजागार

Kojagar - A Hindi Book - by Buddhadev Guha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कोजागर

उस समय गोधूलि के प्रकाश में जंगल भरे पहाड़ों की असदृश दिगन्त रेखा पर सारा आकाश एक निष्प्रभ लालिमा से भर उठा था। जाती हुई बस के पीछे-पीछे कुछ देर लाल धूल का गुब्बार बस को भगाकर सड़क के किनारों के पेड़-पौधों व पत्थरों पर स्थित हो गया था।
बस से उतर कर जरा दूर चलते ही मनिया से साक्षात् हो गया। लकड़ी का गट्ठर कंधे पर उठाये वह साल के जंगल की पगडंडी से बाहर निकल कर बड़ी सड़क पर पहुँचा था। मनिया माने, मनि उराँव।
बोला-कहाँ गये थे बाबू ?
डाल्टनगंज।

सुबह तुम्हारे लिये एक मुर्गी लाया था। पर तितली कहने लगी कि बाबू मुरगा रखने को कहकर नहीं गये हैं, इसलिये मैं तो रक्खूँगी नहीं।
अच्छा ही हुआ। औरंगाबाद से मेरे जो मेहमान आने वाले थे, वह नहीं आयेंगे। वह तू कल चिपादोहर के हाट में बेच आना जाकर। अच्छे दाम मिल जायेंगे। मुझे तो सस्ते में ही देता।
तुम्हारी बात अलग है। प्यार से मनि बोला।
फिर बोला, जरा जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाओं। अँधेरा हो आया।
तदुपरान्त पालामऊ के उस जंगल भरे पहाड़ी इलाके में जल्दी आ गई सर्दी को एक भद्दी अभाव्य गाली देकर वह अपने रास्ते चल दिया।

मैंने भी अपने डेरे का रास्ता पकड़ा।
सूरज के डूबते ही यहाँ सर्दी बड़ी बेदर्दी से दोनो कान मरोड़ने लगती है। दोनों नथुनों से होकर मस्तिष्क के हर कोने में भर जाती है वह। क्वाँर अभी खत्म भी नहीं हुआ और यह हाल है।
सड़क के दोनों ओर लिटपिटिया का जंगल था-छितरा; ठुंठ। कही-कहीं अनार के से गोल-गोल छोटे-छोटे फूल लगे हुए थे। पीछे जंगल गहराता चला गया था। जाने कितनी तरह के पेड़ –पौधे थे। वनज सन्ध्या के बदन की गंध चारों ओर से आ रही थी- एक रहस्यमय क्वाँरी गंध। दू....र....पहाड़ के नीचे, जहाँ जंगल बहुत ही घना था, वहाँ से टिटिहरी का एक जोड़ा टिटिर,-टि, टिटिर,-टि-टिटि –टिटि करता हुआ लौट रहा था। रह-रहकर उनकी आवाज भालुमार बस्ती के खेत-खलिहान व जंगल के पेड़ों के ऊपर से होती हुई सुनाई पड़ रही थी। पश्चिम के आकाश में साँझ का तारा जाज्वल्य-मान था।
सेम और लौकी की बेल से आच्छादित बाँस के बेड़े का दरवाजा खोलकर मैं भीतर घुसा। पूँछ हिलाते हुए लालू दो बार भौका। सही साँझ वह अपने फूस के गद्दे में दुबक गया था। मेरे डेरे के निकट ही अपनी झोपड़ी की बगल मे सड़क मरम्मत करने वाले कुलियों ने आग जला रक्खी थी। मेरा स्वागत करके लालू अपना गद्दा छोड़कर उठा और उस आग के पास जाकर बैठ गया। वह भी लंबी बर्फीली रात के लिये स्वयं को तैयार कर रहा था।

दरवाजा खुलते ही अभिभावक के स्वर में तितली बोली, इतनी देर में आये ?
बस अभी तो आयी है ! आवाज नहीं सूनी ? जानती नहीं कि आज ट्रक का दिन नहीं हैं ?
जाते वक्त तो बड़ी शान से दोपहर को आने को कह गये थे। तुम्हारी वजह से मेरा भी खाना नहीं हुआ आज।
दोपहर को लौट आऊँगा, कहने की बात याद आते ही शर्मिंदा हो गया। बोला, बड़ी गल्ती हो गई, माफ कर दे।
यह सुनकर तितली पहले तो जैसे शर्म से गड़ गई, फिर उत्तेजित होकर  बोली, छिः. छिः, यह क्या ! अब तुमसे बात ही नहीं करूँगी। ऐसी बात क्यों कहीं तुमने !
गल्ती तो हुई ही है। नहीं हुई ?

गल्ती ? तुमसे ? आश्चर्यमिश्रित स्वर में तितली बोली।
मानों मैं कभी कोई गल्ती कर ही नहीं सकता।
हाथ का सामान रखकर, हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदलने चला गया मैं। उसी कमरे के बगल की रसोई में तितली के आटा गूँदने की आवाज आ रहा थी। मैने आवाज जरा ऊँची करके पूछा, आज क्या बना रही हैं री ?
लौकी की तरकारी और चने की दाल।
बड़ी जोर की भूख लगी है। जल्दी से रोटियाँ सेक ले। जरा ज्यादा बना लेना। दोपहर को तूने खाया नहीं ? इसका भी कोई मतलब हुआ ! सचमुच नहीं खाया ?

सच नहीं तो क्या झूठ ? नरसी से बोली वह।
उसके हाथ की चूड़ी के पीतल की थाली से टकराने में मधुर आवाज उठ रही थी।
कुछ देर चुप रहकर धीमे स्वर में बोली वह, मैं तो भात ही खाऊँगी। दोपहर का भात क्या फिकेगा ?
हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदलने में दस मिनिट भी नहीं लगे थे, मुझे, कि उसने आसन लगाकर थाली परस दी। गरम-गरम हाथ की बनी रोटी, लौकी की सब्जी और चने की दाल। कच्चा प्याज और हरी मिर्च। मनोयोग से खा रहा था मैं कि तभी जैसे कोई बहुत गोपनीय बात कहनी हो, ऐसे धीरे से फुसफुसाकर बोली वह, गाड़ू के रेंजर साहब ने तुम्हारे लिये नीबू, आँवले और मिर्च का अचार भेजा है। दूँ थोड़ा ?
चिढ़ाने के लिये जरा जोर से कहा मैंने, दे दे। अब तक क्यों नहीं दिया ? नीबू का आचार तो तू ही चोरी से खा-खाकर दो दिन में साफ कर देगी, मेरे लिये तो बचेगा ही नहीं।
गाल फुलाकर बोली वह, हाँ...हाँ....। मैं तो चोर-डाकू हूँ ना। तुम्हारा सर्वनाश नहीं करूँगी तो किसका करूँगी ! तो फिर सब कुछ जानते-बूझते मुझे रक्खा ही क्यों ?

यहाँ के तो सारे ही लोग चोर हैं। अच्छा आदमी नहीं मिला इसलिये रक्खा है। मजबूरी में।
लालटेन के प्रकाश मे आलोकित अपने व्यथित मुख पर बाँये हाथ से एक झटके में आँचल खींचकर गंभीर स्वर में वह बोली, देख लेना तुम, मैं कल से सचमुच तुम्हारी नौकरी छोड़ दूँगी। हम लोग चोर हैं तो चोर सही। इससे तो भूखे रहना अच्छा है।
ला, थो़ड़ी सी दाल दे। तुझे मैं छोड़ूँगा तब तो ! नौकरी क्या तेरी मर्जी से लगी थी, जो अपनी मर्जी से जायेगी ?
पीतल की कड़छी से गरम दाल मेरी कटोरी में डालते हुए वह बनावटी गुस्से से बोली, पहले जनम में बहुत पाप करने से तुम्हारे जैसा मालिक मिलता है।
तभी बाहर टेट्ररा की आवाज सुनाई दी।
खाँस कर बोला वह, मैं आ गया तितली।

तितली बोली, बापू, थोड़ी देर कुलियों की झोंपड़ी में आग ताप लो। अभी बाबू का खाना नहीं हुआ।
मैंने टेटरा को अंदर आकर बैठने को कहा। कमरे में मिट्टी के तसले में लकड़ी के कोयले जल ही रहे थे। शाम से ही जलाकर न रखने से कमरा गरम होने में बहुत देर लगती थी। टेटका बगल के कमरे में बैठकर मुझसे बातें करने लगा। बहुत सी बातें-डाल्टनगंज में आटे का क्या भाव था ! कड़ुआ तेल और मिट्टी का तेल बाजार में कितना आ रहा था ! सूखे महुए के दाम क्या उस साल और बढ़ गये थे ?
जमीन पर आसन बिछाकर साल की चौकी पर थाली रक्खे खाना खा रहा था मैं। लड़की के एक टुकड़े पर लालटेन रखकर तितली मेरे सामने बैठी थी।
उस पैकेट में क्या लाये हो मेरे लिये ?
तू ही बता।
खुशी से उसका मुँह खिल उठा।
मुझे मालूम है। बताऊँ ? आतिशबाजी !
खोलकर देख।
वह उठकर धीरे-धीरे मेरे कमरे में गई और पैकेट उठा लाई। खोलते ही मुँह चमक उठा उसका। बोली, हाय राम, इतने ! इतने क्यों लाये ?
सब मिलकर छुड़ाना। मजा करना।....तेरे लिये एक साड़ी भी लाया हूँ। दीवाली के दिन पहनना। ले जा। आतिशबाजी भी ले जा।

ना, ना अभी कुछ नहीं लूँगी। दीवाली के दिन सुबह देना, जब तुम्हें प्रणाम करूँगी। दीवाली के कितने दिन हैं अभी ?
छह। देखती नहीं, रात को अँधेरा कैसा रहता है ? रात के अंत में चाँद निकलता है और वह भी जरा सा।
और कुछ न कहकर वह पैकेट वापस कमरे में रखने चली गई।
मैं खा चुका तो तितली ने थाली में अपना खाना रक्का और बाँयें हाथ से थाली पकड़कर बाँयें कंधे पर रख ली। फिर दाहिने हाथ में मिट्टी के तेल की कुप्पी उठाकर एक झटके से सीधी खड़ी हो गई और प्रतीक्षारत टेटरा से बोली, चलो बाबू।
इन सब इलाकों में साँझ के बाद घर से लोग आमतौर पर नहीं निकलते। अगर कभी निकलना पड़ता भी है तो खाली हाथ और बिना बत्ती के नहीं निलकते। टेटरा के कंधे पर कुल्हारी थी और तितली के हाथ में कुप्पी।
खुले दरवाजे में खड़े-खड़े मैंने देखा कि रास्ता दिखाती लड़की के पीछे-पीछे बड़े-बड़े डग भरता टेटरा मोड़ के महुर के पेड़ो के झुंड के पास में बस्ती की पगडंडी पर मुड़ गया।

मैं जानता हूँ कि तितली जितना भी खाना ले जाती है, यानी मैं उसके लायक जितना उसे देता हूँ, माँ-बाप के साथ मिलकर खाती है। शायद उसका अपना पेट भी नहीं भरता। वह लोग सारे साल सुबह-शाम जो खाते हैं, वह न जाने के बराबर है। पर मेरी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उसके परिवार के सारे आदमियों को खिला सकूँ। इतनी सामर्थ्य होती तो मेरी जितना खुश कोई नहीं होता। रोज दोनों वक्त खाना खाने के बाद उन लोगों की याद आ जाती है और बड़ी देर तक मन खराब रहता है। दोनों वक्त अच्छा-बुरा जैसा भी हो भरपेट खाने को मिल जाता है मुझे, यह सोचकर मन में एक अपराध भावना भी जाग उठती है।

दरवाजा बन्द कर दिया। शीतार्त तारों भरी रात बाहर अँधेरे में निश्चल खड़ी रही। खपरैल का कच्चा मकान था। कमरे में बान की चारपाई पर बैठकर मैंने पान मुँह में रक्खा। चारपाई के नीचे तसले में जलते मिट्टी के कोयलों की आग की उष्णता मेरे शरीर को धीरे-धीरे गरम कर रही थी। सर्दियों की रात में साँझ होते ही यहाँ धरों के अन्दर व बाहर का जीवन स्तब्ध हो जाता है। सब जल्दी-खा-पीकर दरवाजा बंद करके सो जाते हैं। केवल खेतों में रखवाली करने वाले लड़कों के कनस्तर पीटकर सुअर व हिरण भगाने की आवाज इधर-उधर गूँज उठती है। कुलथी और अरहर के खेतों में सांभर झूंड बनाकर आते हैं। जिस दिन हाथी आते हैं, उस दिन फटाके, मृदंग, ढोल व कनस्तरों की मिली-जुली आवाज से आधी रात को नींद खुल जाती है। सभी-अपनी-अपनी झोपड़ी में उत्कर्ण, उत्कंठित पड़े रहते है। फिर रखवालों की चीख-पुकार धीरे-धीरे कम होकर एक हो जाती है तो सब चैन की साँस लेकर करवट बदल कर सो जाते हैं।
सोने में पैसे खर्च नहीं होते। एकमात्र सोने में ही ! इसीलिये; वह लोग खूब सोते हैं।



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