हिन्द स्वराज्य - महात्मा गाँधी Hind Swarajya - Hindi book by - Mahatma Gandhi
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हिन्द स्वराज्य

महात्मा गाँधी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :95
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 6948
आईएसबीएन :978-81-288-1264

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हिन्द स्वराज्य

Hind Swarajya - A Hindi Book - by Mohandas Karamchand Gandhi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारत की धरती ने एक ऐसा महान मानव पैदा किया जिसने न केवल भारत की राजनीति का नक्शा बदल दिया अपितु विश्व को सत्य अहिंसा, शांति और प्रेम की उस अजेय शक्ति के दर्शन कराए जिसके लिए ईसा या गौतम बुद्ध का स्मरण किया जाता है। गाँधी जी का धर्म समूची मानव-जाती के लिए कल्याणकारी था। उन्होंने स्वयं को दरिद्र नारायण का प्रतिनिधि माना। गांधी जी का विश्वास था कि भारत का उत्थान गाँवों की उन्नति से ही होगा। उनके लिए सत्य से बढ़कर कोई धर्म और अहिंसा से बढ़कर कोई कर्त्तव्य नहीं था। गांधी जी संसार की अमर विभूति हैं।

निवेदन


गांधी जी के विचार आसान, हिन्दुस्तानी में जनता के सामने रखना ‘गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, दिल्ली’ के अनेक कामों मे से एक खास काम है। गांधी जी अकसर आसान भाषा में ही लिखते थे। उन्होंने जो गुजराती भाषा में लिखा है, वह बिलकुल सरल हैं।
फिर भी मुमकिन है कि गुजराती, हिन्दी और दूसरी भाषाओं में जो शब्द आसानी से समझे जाते हैं वे सिर्फ उर्दू जानने वालों के लिए नये हों। इसलिए अनुवाद में ऐसे शब्दों के साथ-साथ आसान उर्दू शब्द भी देना ठीक समझा है। उम्मीद है कि इस तरह उर्दू जबान हिन्दी के नजदीक आयेगी और उर्दू जानने वाली जनता हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं का साहित्य भी आसानी से समझ सकेगी।
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा ने नवजीवन के साथ तय किया है कि गांधी जी की जो किताबें वह तैयार करेगी, उनकी नागरी आवृत्ति छापने का भार नवजीवन का होगा।

काका कालेलकर

दो शब्द


लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए गांधी जी ने रास्ते में जो संवाद लिखा और ‘हिन्द स्वराज्य’ के नाम से छपाया, उसे आज पचास बरस हो गये।
दक्षिण अफ्रीका के भारतीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए सतत लड़ते हुए गांधी जी 1909 में लंदन गये थे। वहां कई क्रांतिकारी स्वराज्य प्रेमी भारतीय नवयुवक उन्हें मिले। उनसे गांधी जी की बातचीत हुई उसी का सार गांधी जी ने एक काल्पनिक संवाद में ग्रंथित किया है। इस संवाद में गांधी जी के उस समय के महत्व के सब विचार आ जाते हैं। किताब के बारे में गांधी जी ने स्वयं कहा है कि ‘‘मेरी यह छोटी-सी किताब इतनी निर्दोष है कि बच्चों के हाथ में भी यह दी जा सकती है। यह किताब द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है; हिंसा की जगह-आत्म-बलिदान को स्थापित करती है; और पशुबल के खिलाफ है; हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को स्थापित करती है; औऱ पशुबल के खिलाफ टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।’’ गांधी जी इस निर्णय पर पहुँचे थे कि पश्चिम के देशों में, यूरोप-अमेरिका में जो आधुनिक सम्यता जोर कर रही है, वह कल्याणकारी नहीं है, मनुष्य हित के लिए वह सत्यानाश कारी है। गांधी जी मानते थे कि भारत में और सारी दुनिया में प्राचीन काल से जो धर्म-परायण नीति-प्रधान सभ्यता चली आयी है वही सच्ची सभ्यता है।

गांधी जी का कहना था कि भारत से केवल अंग्रेजों को और उनके राज्य को हटाने से भारत को अपनी सच्ची सभ्यता का स्वराज्य नहीं मिलेगा। हम अंग्रेजों को हटा दें और उन्हीं की सभ्यता का और उन्हीं के आदर्श का स्वीकार करें तो हमारा उद्धार नहीं होगा। हमें अपनी आत्मा को बचाना चाहिये। भारत के लिखे-पढ़े आयें हैं, वे भारत की धर्म-परायण नैतिक सभ्यता को ही मानते हैं। उनकों अगर आत्मशक्ति का उपयोग करने का तरीका सिखाया जाय, सत्याहग्रह का रास्ता बनाया जाय, तो वे पश्चिमी राज्य-पद्धति का और उससे होने वाले अन्याय का मुकाबला कर सकेंगे तथा शस्त्रबल के बिना भारत को स्वतंत्र करके दुनिया को भी बचा सकेंगे।

पश्चिम का शिक्षण और पश्चिम का विज्ञान अंग्रेजी के अधिकार के जोर पर हमारे देश में आये। उनकी रेलें उनकी चिकित्सा और रुग्णालय, उनके न्यायालय और उनकी न्यायदान-पद्धति आदि सब बातें अच्छी संस्कृति के लिए आवश्यक नहीं है, बल्कि विघातक ही है-वगैरा बातें बिना किसी संकोच के गांधी जी ने इस किताब में दी हैं।
मूल किताब गुजराती में लिखी गयी थी। उसके हिन्दुस्तान आते ही बंबई सरकार ने आक्षेपार्ह बताकर उसे जब्त किया। तब गांधीजी ने सोचा कि ‘हिन्द स्वराज्य’ में मैंने जो कुछ भी लिखा है, वह जैसा का वैसा अपने अंग्रेजी जानने वाले मित्रों और टीकाकारों के सामने रखना चाहिये। उन्होंने स्वयं गुजराती ‘हिन्द स्वराज्य’ का अंग्रेजी अनुवाद किया और उसे छपाया। उसे भी बम्बई सरकार ने आक्षेपार्ह घोषित किया।

दक्षिण अफ्रीका का अपना सारा काम पूरा करके सन् 1945 में गांधी जी भारत आये। उसके बाद सत्याग्रह करने का जब पहला मौका गांधी जी को मिला, तब उन्होंने बंबई सरकार के हुक्म के खिलाफ ‘हिन्द स्वराज्य’ फिर से छपवाकर प्रकाशित किया। बम्बई सरकार ने इसका विरोध नहीं किया। तब से यह किताब बम्बई सरकार ने राज्य में, सारे भारत में और दुनिया के गंभीर विचारकों के बीच ध्यान से पढ़ी जाती हैँ।
स्व. गोखले जी ने इस किताब के विवेचन को कच्चा कहकर उसे नापसन्द किया था और आशा की थी कि भारत लौटने के बाद गांधी जी स्वयं इस किताब को रद कर देंगे। लेकिन वैसा नहीं हुआ। गांधी जी ने एकाध सुधार करके कहा कि आज मैं इस किताब को अगर फिर से लिखता, तो उसकी भाषा में जरूर कुछ सुधार करता। लेकिन मेरे मूलभूत विचार वही है, जो इस किताब मैंने व्यक्त किये हैं।

गांधी जी के प्रति आदर और उनके विचारों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले दुनिया के बड़े-बड़े विचारकों ने ‘हिन्द स्वराज’ के बारे में जो संमति प्रगट की है, उसका सार श्री महादेव देसाई ने नई आंवृत्ति की अपनी सुन्दर प्रस्तावना में दिया ही है !
अहिंसा का सामर्थ्य, यंत्रवादका गाधी जी का विरोध औऱ पश्चिमी सभ्यता तीनों के बारे मे और सत्याग्रह की अतिंम भूमिका के बारे में भी पश्चिम के लोगों ने अपना मतभेद स्वप्ष्ट रूप से व्यक्त किया है।
गाधीं जी के सारे जीवन-कार्य के मूल में जो श्रद्धा काम करती रही, वह सारी ‘हिन्द स्वराज्य’ में पायी जाती है। इसलिए गांधी जी के विचारसागर में इस छोटी-सी पुस्तक का महत्व असाधारण है।
गांधी जी के बताये हुए अहिंसक रास्ते पर चलकर भारत स्वतंत्र हुआ। असहयोग, कानूनों का सविनय भंग और सत्याग्रह-इन तीनों कदमों की मदद से गांधी जी ने स्वराज्य का रास्ता तय किया। हम इसे चमत्कारपूर्ण घटना का त्रिविक्रम कह सकते हैं।

गांधी जी के प्रयत्न का वही हाल हुआ, जो दुनिया की अन्य श्रेष्ठ विभूतियों के प्रयत्नों का होता आया है।
भारत ने, भारत के नेताओं ने और एक ढंग से सोचा जाय तो भारत की जनता ने भी गांधी जी के द्वारा मिले हुए स्वराज्य-रूपी फल तो तो अपनाया, लेकिन उनकी जीवन-दृष्टि को पूरी तरह अपनाया नहीं है। धर्मपरायण, नीति-प्रधान पुरानी संस्कृति की प्रतिष्ठा जिसमें नहीं है ऐसी ही शिक्षा-पद्धति भारत में आज प्रतिष्ठित है। न्यायदान पश्चिमी ढंग से ही हो रहा है। इसकी तालीम भी जैसी अंग्रेजों के दिनों में थी वैसी ही आज है। इसकी तालीम भी जैसी अंग्रेजों के दिनों में थी वैसे ही आज है। अध्यापक, वकील, डॉक्टर, इंजीनिर और राजनातिक नेता-ये पाँच मिलकर  भारत के सार्वजनिक जीवन को पश्चिमी ढंग से चला रहे हैं। अगर पश्चिम के विज्ञान और यांत्रिक कौशल्य (Technology)  का सहारा हम न लें और गांधी जी के ही सांस्कृतिक आदर्श का स्वीकार करें, तो भारत जैसा महान देश साउदी अरेबिया जैसे नगण्य देश की कोटि तक पहुँच जायगा, यह डर भारत के आज के सभी पक्ष के नेताओं को है।

भारत शांततावादी है, युद्ध-विरोधी है। दुनिया का साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, शोषणवाद, राष्ट्र-राष्ट्र के बीच फैला हुआ उच्च-नीच भाव-इन सबका विरोध आदर्श का गांधी जी ने अपनी किताब ‘हिन्द स्वराज्य’ में पुरस्कार किया है, उसका तो उसने अस्वीकार ही किया है। स्वाभाविक है कि इस तरह के नये भारत में अंग्रेजी भाषा का ही बोलबाला रहे। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, किन्तु रशिया, जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, जापान आदि विज्ञान-परायण राष्ट्रों की मदद से भारत यंत्र-संस्कृति में जोरों से आगे बढ़ रहा है और उसकी आंतरिक निष्ठा मानती है कि यही सच्चा मार्ग है। पूं. गांधीजी के विचार जैसा है वैसे नहीं चल सकते।

यह नई निष्ठा केवल नेहरू जी कि नहीं, किन्तु करीब-करीब सारे राष्ट्र की है। श्री विनोबा भावे गांधीजी के आत्मवाद का, सर्वोदय का और अहिंसक शोषण-विहान समाज-रचना का जोरों से पुरस्कार कर रहे हैं। ग्रामाज्य की स्थापना से शांतिसेना के द्वारा नई तालीम के ज़रिये स्त्री-जाति की जागृति के द्वारा वे मानस-परिवर्तन, जीवन-परिवर्तन और समाज-परिवर्तन का पुरस्कार कर रहे हैं। भूदान और ग्रामदान के द्वारा सामाजिक जीवन में आमूलाग्र क्रांति करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने भी देख लिया है कि पश्चिम के विज्ञान और यंत्र-कौशल्य के बिना सर्वोदय अधूरा ही रहेगा।
जब अमेरिका का प्रजासत्तावाद, रशिया और चीन का साम्यवाद, दूसरे और देशों का औरभारत का समाजसत्ता और गांधी जी का सर्वोदय दुनिया के सामने स्वयंवर के लिए खड़े हैं, ऐसे अवसर पर गांधी जी की इस युगांतरकारी छोटी-सी किताब का अध्ययन जोरों से होना चाहिये। गांधी जी स्वयं भी नहीं चाहते थे कि शब्द-प्रमाण की दुहाई देकर हम उनकी बातें जैसी की वैसी ग्रहण करें।

‘हिन्द स्वराज्य’ की प्रस्तावना में गाँधी जी ने स्वयं लिखा है कि व्यक्तिशः उनका सारा प्रयत्न ‘हिन्द स्वराज्य’ में बताये हुए आध्यात्मिक स्वराज्य की स्थापना करने के लिए ही है। लेकिन उन्होंने भारत में अनेक साथियों की मदद से स्वराज्य का जो आन्दोलन चलाया, कांग्रेस के जैसी राजनीतिक राष्ट्रीय संस्था का मार्गदर्शन किया, वह उनकी प्रवृत्ति पार्लियामेन्टरी स्वराज्य (Parliamentary Swarajva) के लिए ही थी।
स्वराज्य के लिए अन्याय का, शोषण का और परदेशी सरकार का विरोध करने में अहिंसा का सहारा लिया जाय, इतना एक ही आग्रह उन्होंने रखा है। इसलिए भारत की स्वराज्य-प्रवृत्ति का अर्थ उनकी इस वामनमूर्ति पुस्तक ‘हिन्द स्वराज्य से न किया जाय।

गांधी जी की यह चेतावनी कांग्रेस के स्वराज्य-आन्दोलन का विपर्यास करने वालों के लिए थी। आज जो लोग भारत का स्वराज्य चला रहे हैं, उनके बचाव में भी यह सूचना काम आ सकती है। भारत के राष्ट्रीय विकास का दिन-रात चिंतन करने वाले चिंतक और नेता भी कह सकते हैं कि हमारे सिर पर ‘हिन्द स्वराज्य’ के आदर्श का बोझा गांधी जी ने नहीं रखा था।
लेकिन अगर गांधी जी की बात सही है और भारत का और दुनिया का भला ’हिन्द स्वराज्य’ में प्रतिबिम्बित सांस्कृतिक आदर्श से ही होने वाला बै तो इसके चिंतन का, नव-ग्रंथन का और और आचरण का भार किसी के सिर पर तो होना ही चाहिये।

मैंने एक दफे गांधी जी से कहा था कि ‘‘आपने अपनी स्वराज्य सेवा के प्रारम्भ में ‘हिन्द स्वराज्य’ नामक जो पुस्तक लिखी उसमे आपके मौलिक विचार है, तो भी शंका होती है कि वे रस्किन, थोरो, एडवर्ड कारपेन्टर, लेटर, मैक्स नार्डू आदि लोगों के चिंतन से प्रभावित हैं। इन लोगों ने आधुनिक सभ्यता का इन लोगों ने पुरस्कार किया, इसलिए आपका ‘हिन्द स्वराज्य’ पढ़ने से यही ख़याल होता है कि आप भूतकाल को फिर से जागृत करने के पक्ष में हैं। आपको बार-बार कहना पड़ता है कि आप भूतकाल के उपासक नहीं है। मानव-जाति के गलत रास्ते जितनी प्रगति की उतना रास्ता पीछे चलकर सच्चे रास्ते पर लगने के बाद आप फिर नीतिनिष्ठ, आत्मनिष्ठ रास्ते से नई ही प्रगति करना चाहते है तोः

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