कितना अकेला आकाश - श्रीनरेश मेहता Kitna Akela Aakash - Hindi book by - SriNaresh Mehta
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कितना अकेला आकाश

श्रीनरेश मेहता

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :75
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 697
आईएसबीएन :81-263-0840-0

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्री नरेश मेहता का यह प्रथम यात्रा-संस्मरण ‘कितना अकेला आकाश’ में भारतीय कवि द्वारा अपनी सहज सर्जक दृष्टि से यूरोपीय जीवनधारा को परखने की चेष्टा है।

kitna akela aakash

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्री नरेश मेहता का यह प्रथम यात्रा-संस्मरण ‘कितना अकेला आकाश’ में भारतीय कवि द्वारा अपनी सहज सर्जक दृष्टि से यूरोपीय जीवनधारा को परखने की चेष्टा है। यूगोस्लाविया के एक छोटे-से जनस्थान स्त्रूगा में आयोजित काव्य सामारोह में एकमात्र भारतीय प्रतिनिधि के रूप में सहभागिता करने के लिए भेजे गये श्रीनरेश मेहता ने सहज कौतुक से न सिर्फ स्त्रूगा को देखा बल्कि वहाँ आयोजित और भी काव्य-समारोह में सहभागिता की। उन्होंने वहाँ के जीवन, वहाँ के स्त्री-पुरुषों की गतिविधियों, मानसिकताओं और हलचलों की भी मन के कैमरे में छवि उतारी। एनी और बुदिमका जैसे सौम्य और बुद्धिदीप्त महिलाओं के सहयोग ने कवि के अकेले और सूने आकाश को काफी दीप्ति और उल्लास से भर दिया। इसी तरह के और भी अनेक लोग कवि के इस प्रवास को बेहद आत्मीयता से भर देते हैं।

प्रस्तुति

‘समय देवता’ लिखते हुए विश्व भाव के कवि नरेश मेहता के मन में विश्वयात्रा की इच्छा अवश्य जागी होगी, परन्तु उनकी यह इच्छा पहली बार जीवन के उत्तरांश में तब पूरी हुई जब वे स्त्रूगा में एक विश्व कवि-सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत की ओर से भेजे गये। यहाँ कवि ने जो देखा, अनुभव किया उसे एक सपाट और निरूद्वेगी भाषा में नहीं बल्कि एक महान काव्यात्मक सौन्दर्यानुभव में व्यक्त किया है।
नरेश जी का यह यात्रा-वृत्तान्त हमें श्रीमती महिमा मेहता के सौजन्य से मिला है। भारतीय ज्ञानपीठ इस सद्भाव के लिए उनका आभारी है।

कितना अकेला आकाश

वैसे तो भारत से, तात्पर्य दिल्ली से, चार घण्टे की हवाई-यात्रा की दूरी पर इस वनस्पति-हीन, रेतीले देश में हूँ। परन्तु बुलबुल और सुधीर के कारण ऐसा विदेशपन लगता नहीं है। बालू वाली तट-रेखा की समाप्ति पर एक गहरी नीली पट्टी, रिबन जैसी क्षितिज में खिंची है और उसके ऊपर, फीके नीले रंग के आकाश का गुम्बद, ढक्कन-सा तना रखा लगता है। बालू की भू-विस्तीर्णता में पतली, काली चिन्दियों सी सड़के हैं जिन पर तरह-तरह के वाहन आ-जा रहे हैं। कितनी महँगी हैं यहाँ वह हरियाली जो इन महँगी कालोनियों में दिखलाई देती है-पैसे और साधन-सम्पन्नता की प्रतीक। युगोस्लाविया के पश्चिमी जीवन और यहाँ के जीवन में न केवल प्राकृतिकता की ही भिन्नता है पर मनुष्य और उसके अन्तर की सांस्कृतिकता में कितनी भिन्नता एवं पार्थक्य है कि ऊपर से वस्तुगत सभ्यता एक जैसी, बल्कि लगभग समान लगने पर भी सर्वथा भिन्न प्रभाव डालती है। जब केवल मनुष्य का आधिपत्य होता है तब राज्य व्यवस्था का दबाव लगता है-नियमों और कायदे-कानून के रूप में। भले ही वह व्यवस्था, बल्कि सुव्यवस्था जैसे लगे पर आपको एक प्रकार के भय तथा कसेपन का भाव लगता है। प्रायः यहाँ, मतलब पश्चिम में भी लोग वाहन में होने पर पेटियाँ कस लेते हैं, जैसी कि विमान में कसते हैं। वस्तुतः ये पेटियाँ ऊपर से देखने पर तेज यात्रा में सुरक्षा के लिए होती है, पर लगता है ये पेटियाँ आपके स्वत्व पर भी कस दी गयी हैं। यहाँ आप चलते हुए, घूमते हुए, सड़कों पर, फुटपाथों पर या किसी दूकान में, के बाहर भी अपने पर, अपने घूमने पर, दृष्टि तक पर कसी पेटियाँ अनुभव करते हैं। एक कानूनी दबाव बराबर लगता है जिसके कारण आप शायद पूरी तरह अपना हाथ भी ठीक से या पूरी तरह नहीं उठा या घुमा सकते हैं।

 जिस प्रकार विशाल, गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ, एकदम धुली-पुँछी महँगी से महँगीतर चीजें आदमकद काँच के शो-केसों में मुँह बन्द किये चुप, आपकी ओर देखती होती हैं, उसी प्रकार आप भी तो एक वस्तु या चलते-फिरते जड़ व्यक्तित्व ही तो हो गये होते हैं। अन्तर क्या है ? मध्य-पूर्व, जो कि इस्लाम प्रधान भूखण्ड है, केवल प्राकृतिक दृष्टि से ही रेगिस्तान नहीं है बल्कि यहाँ के लोगों, मूल्यों, जीवन-दृष्टि तथा ऐतिहासिक व्यक्तित्व तक में मार्दवहीन रेगिस्तान दिखता है। चिलचिलाता, बल्कि खूँख्वार भी। अपनी आदिम जीवन-पद्धतियों, मान्यताओं के ऐसे अमानवीय दुर्ग की उपस्थिति का भाव लगता है जिसमें केवल आतंक ही आतंक है। दुनिया में न जाने कितने परिवर्तन हुए पर यह इस्लामी मध्यपूर्व आज भी न जाने कैसे अपनी आदिमता को न केवल वहन करता है बल्कि किसी भी प्रकार के नये पन को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं लगता बल्कि आक्रामक रूप से अपने आदिम खानाबदोशीपन की मानसिकता को यथावत रखे हुए है। अपनी मान्यताओं के आदिम अँधेरों में सिवा अपनी एक पवित्र किताब और पैगम्बरी हठधर्मिता के किसी अन्य विचार को अपने पास नहीं फटकने देते हैं। लेकिन क्यों ? इस मनोग्रन्थि का क्या कारण है ? इस्लाम क्यों इतना कट्टर है अपने आदिमपन के प्रति ? इन्हें परिवर्तन से क्या भय है ? ज्ञान या विचारों के क्षितिज की विस्तृति से किस बात का भय है ? कब तक एक भूखण्ड एक मानवता इस प्रकार जड़ बनी रह सकती है ? क्या किसी दिन यहाँ के अँधेरों में नया प्रकाश, नये विचार प्रवेश कर सकेंगे ?
स्त्रूगा अन्तर्राष्ट्रीय काव्य-समारोह के लिए 17 अगस्त 89 को दिल्ली के लिए ‘प्रयागराज’ से रवाना हुआ। न जाने क्यों मन में कोई विशेष उत्साह नहीं लग रहा था। बस, मन को ढीला छोड़ दिया ताकि इस यात्रा की तमाम प्रक्रिया में से असंग भाव से गुजर सकूँ और शायद मेरा निर्णय ठीक ही था। उत्साह होता तो उत्तेजना होती और तब विदेश में अकेलेपन की जो स्थिति बनी, उसमें और अधिक कष्ट पाता। बस, जल की भाँति अपने को परिस्थितियों की भूमि पर डाल दिया ताकि वह धरती ही पथ, दिशा, गति आदि का निर्माण करती चले। खैर-

प्लेटफार्म नम्बर एक पर महिमा और बाबुल के अलावा शैलेश मटियानी, सत्य-प्रकाश मिश्र, नीलकान्त, राधेश्याम त्रिपाठी तो थे ही, साथ ही दो-एक व्यक्ति और भी थे। गले में मालाएँ डल जाने पर खामखाँ आप अपनी दृष्टि में भी तथा लोगों की दृष्टि में विविष्ट लगने लगते हैं, जैसे आपको रेखांकित कर दिया गया है। ट्रेन अपने ठीक समय से रवाना हुई।। डिब्बे में थोड़ी गहमागहमी रही, फिर सब शान्त। केवल दो युवक जरूर काफी अभद्र थे। पर एक कश्मीरी सज्जन स्वरूप कौल-अवश्य ही भद्रलोक थे। हालाँकि शुरू में उन्हें देखकर कुछ अच्छा नहीं लगा था, चूँकि वह कभी सेना में थे इसलिए उनके व्यक्तित्व में कड़कपन था, जिस पर सबसे पहले ध्यान गया था और वही रूचिकर नहीं लगा था। लेकिन कालान्तर में वह बहुत बुद्धिमान निकले। साहित्य और भाषा पर, परिचय हो जाने के बाद, दिलचस्प बातें करते रहे जो कि प्रायः आम लोगों को पता ही नहीं होती। वह शायद इलाहाबाद में कभी रहते थे पर अब अपना सब-कुछ समेटकर दिल्ली जा रहे थे, हमेशा के लिए। क्या प्रत्येक को जीवन के उत्तरकाल में बसने-उजड़ने की इस मर्मान्तक प्रक्रिया में से गुजरना अनिवार्यता होती है ? शायद, हाँ।

सवेरे समय से ही दिल्ली पहुँचे। टैक्सी से तारा अपार्टमेण्ट्स पहुँचा। खासी दूर है यह जगह। तभी तो  टैक्सी में अस्सी रुपये लगे। सामान उठाये-उठाये दादा के अपार्टमेण्ट में ऊपर पहुँचा। हालाँकि जिस फाटक पर दादा ने मेरे सामान के लिए कह रखा था उसके बजाय मैं दूसरे गेट से गया था अतः थोड़ा कष्ट जरूर हुआ श्वास का, पर आखिरकार पहुँच ही गया। मैंने तब साहित्य अकादमी के सचिव चौधुरी को फोन किया। बोले कि मैं  10.30 तक पहुँच जाऊँ। तैयार होकर दादा के साथ अकादमी गया। दादा मुझे छोड़ गये। वापसी में करीब 1.30 बजे ले लेगें। वैसे उतरते समय मैं अपना पोर्टफोलियो गाड़ी में ही भूल गया, पर कोई हर्ज नहीं हुआ। श्री चौधुरी के सेक्रेटरी वेंकटेश्वरन ने बताया कि टिकट आदि सब तैयार है। अब मुझे सिर्फ विदेशी मुद्रा अशोक होटल से लेनी है। मैं अपने साथ पन्द्रह हजार का ड्राफ्ट लाया था, वह दादा को दिया ताकि वह उसके बदले में रुपया दे सकें।

अकादमी से लौटकर सुरेश अवस्थी से फिर फोन पर बात हुई। सुरेश अकादमी आने वाले थे, पर नहीं आ सके थे। मालूम हुआ कि उनकी कार खराब हो गयी थी। बिना वाहन की सुविधा के यहाँ से कहीं भी जाना, लम्बी-लम्बी दूरियों के कारण असम्भव ही होता है। फोन पर ही सुरेश को बता दिया गया कि मैं ग्रीस नहीं जा पाऊँगा। केवल तीन दिनों के लिए इतनी भागमभाग करना तथा फ्लाइट्स की तारीखों के साथ ग्रीस का हिसाब बैठ नहीं पा रहा था अतः फिर कभी देखा जाएगा। सुरेश थोड़े दुखी जरूर हुए पर सारी बात सुनकर बोले कि-ठीक है, भविष्य में देखा जाएगा। ग्रीस तो कभी भी जाया जा सकता है। चूँकि दिन का समय था इसीलिए श्रीकान्त से तो बात नहीं हो पायी परन्तु जयश्री को बता दिया। राजी सेठ से बातें हो सकीं। वह कोई लम्बी कहानी में व्यस्त हैं, पर एकाध दिन में आएँगी। इलाहाबाद से मैंने दुर्गावती सिंह को तार किया था कि मैं 21 अगस्त को टी.वी.रिकॉर्डिंग करवा सकता हूँ। उन्हें फोन किया ऑफिस में कुछ पता ही नहीं चला। राजी सेठ से उनके घर का फोन नम्बर लिया तो वहाँ से मालूम हुआ कि वह चार-पाँच दिनों के लिए भोपाल गयी हुई हैं, अतः यह कार्यक्रम नहीं हो सका। चूँकि 22 अगस्त तक समय ही समय था सो पाकिस्तानी सीरियल ‘धूप किनारे’ देख डाला।

19 अगस्त की रात को बुलबुल का फोन आया। इस बीच देखा कि ‘काली कविता’ का अंग्रेजी अनुवाद इलाहाबाद में ही छूट गया। इलाहाबाद रमेश को फोन करना चाहा पर जब नहीं मिला तो फिर रावल साहब को लखनऊ फोन किया। उन्होंने तब मित्तल साहब को फोन किया। उनके बेटे ने घर जाकर कविता कोरियर सर्विस से भिजवा दी, जो समय से मिल गयी।
19 अगस्त की सवेरे शाजापुर से बसन्त भट्ट आये, अपने किसी काम से। 21 अगस्त को दादा वसन्त भट्ट और बृजमोहन शर्मा के साथ अशोक होटल गये और डालर प्राप्त किया। कुल 650 डालर के यात्री-चेक तथा नोट लिये। इस बीच ‘अनकही’ सीरियल भी देख डाला। श्रीकान्त से दो बार फोन पर बातें हुई। यही तय हुआ कि यात्रा से लौटकर ही मिला जाएगा। 22 अगस्त की रात में करीब 8 बजे दादा ने पूछा कि मैंने कोई गरम सूट लिया कि नहीं ? जूता लिया कि नहीं ? मैंने कहा कि नहीं, तो फिर उन्होंने एक स्वेटर दिया और हम लोग तब जूता खरीदने गये। उस समय तो जूता ठीक ही था पर बाद में दिल्ली से बेलग्रेड पहुँचने तक काफी कष्ट दिया। बल्कि पैर सूज गया सो उसे बेलग्रेड के बाद फिर नहीं पहना और चप्पलों से ही काम चलाया। वैसे सिवाय 30 अगस्त के जबकि वर्षा हो जाने के कारण मौसम स्कोपिया और बेलग्रेट में अच्छा-खासा ठण्डा हो गया था, तब लगा कि जूता होता तो ठीक होता, पर कुछ खास नहीं।

अनुपम ने हवाई अड्डे की सारी प्रक्रिया बता दी। साथ ही वह अपनी एक साथी नमिता दयाल से भी मिलवा लाया ताकि वह हवाई-अड्डे पर सहायता कर सके। असल में उस दिन उसने बीमारी के बहाने से छुट्टी ले रखी थी सो वह साथ में हवाई-अड्डे के भीतर नहीं जा सकता था। चलने के पूर्व रावल साहब, मालती का फोन आया। बाद में करीब 11 बजे बुलबुल और सुधीर का भी फोन आया। उन्हें बता दिया कि मैं 31 की सवेरे दुबई पहुँच रहा हूँ और ग्रीस नहीं जा रहा हूँ। मेरा वीसा तैयार करवा लिया है उन्होंने। रात 2.30 बजे जागना था, पर नींद ही नहीं आयी। तीन बजे तैयार होकर दादा-भाभी और अनुपम के साथ निकले। अनुपम तो गाड़ी में ही रहा पर दादा-भाभी जरूर दरवाजे तक आये। मैंने ट्राली में सामान चढ़ाया और इन दोनों से विदा ली। अब तो केवल मैं था और पहली विदेश-यात्रा का अनजाना, अनदेखा पथ, उसके अनुभव और उसकी रोमांचकता !

हवाई-अड्डे पर : दिल्ली

सबसे पहले अपने सामान की जाँच करवायी। उसके बाद बैंक वाले काउण्टर पर तीन सौ रुपये देकर विदेश-यात्रा-कर चुकाया और रसीद ली। उसके बाद फर्स्टक्लास काउण्टर पर नमिता मिल गयी। उसके कारण बाकी प्रक्रिया सरल और आसान हो गयी। मेरा सामान सीधे बेलग्रेड के लिए बुक हो गया। अब मेरे पास केवल ब्रीफकेस रह गया। अपना बोर्डिंग कार्ड लिया। नमिता मुझे सुरक्षा जाँच के बाद प्रतीक्षालय में बड़े से लाउंस में छोड़ गयी। चूँकि अभी एक घण्टा था, सो वह 4.30 बजे आने को कह कर चली गयी। विदेश यात्रा में अपना पासपोर्ट, टिकिट और मुद्रा सदा अपने ही पास होना चाहिए। ये ही आपके साथी और सुरक्षा हैं। जब पौने पाँच बज गये और नमिता नहीं आयी तथा हमारी उड़ान की घोषणा भी होने लगी तो मैंने यही ठीक समझा कि अब मैं नम्बर 9 के गेट पर चलूँ। वहाँ काफी भड़ी थी। विदेशी लोग किसी बात में संकोच नहीं करते। फर्श पर आम भारतीय लोगों की तरह लेटे-बैठे रहते हैं। न जाने क्यों 5.30 बजे तक गेट नहीं खुला। आखिरकार गेट खुलने पर बोगदे जैसे रास्ते से होते हुए अपना बोर्डिंग-कार्ड दिखाकर अपनी सीट पर बैठ गया। नमिता ने पहले ही यह सीट जो कि खिड़की के पास थी, सुरक्षित करवा रखी थी। कोई कठिनाई नहीं हुई। जरूर ही नमिता किसी काम से फँस गयी होगी, पर वह विमान चलने के पाँच मिनट पूर्व आयी और मेरा हालचाल पूछ गयी।

 बड़ी भली लड़की है। हाँ, इस बीच हुआ यह कि हवाई-अड्डे पर यात्री 20 डालर खरीद सकता है, उसकी याद ही नहीं रही। यदि ले लेता तो छोटे ‘डिनामिनेशन’ के नोट मिल जाते और सुविधा होती। मेरे पास 10 डालर से छोटे नोट ही नहीं थे पर खैर—असल में बीस से तेईस हजार फीट की ऊँचाई से उड़ते हुए सिवा कृष्ण आकाश की अथाहता के और कुछ नहीं होता। लगता है जैसे आप टाँग दिये गये हैं आकाश में। गति या चलने की प्रतीति विमान की आवाज से आपको भले ही लगे, बाकी तो बीतता हुआ कुछ नहीं होता। बस, आप हैं भर। हाँ, जब मेघों के बीच से या ऊपर से गुजर रहे होते हैं, तब जरूर कुछ दिखता है। सब मायालोक जैसा लगता है। बादलों की पर्त-दर-पर्त पतली उड़ती-सी लगती है और उसमें से उझकी पड़ती नीचे की धरती, ऐसा लगता है जैसे मेघों के समुद्र जल में डूबी हुई हो। कभी सुदूर क्षितिज मेघ-विस्तार, बर्फ के मैदान लगते हैं। क्षितिज पर धूप की स्वर्ण आभा में देवप्रासाद जैसे लगते हैं। बल्कि सम्पूर्ण देवसृष्टि का बोध होने लगता है। ऐसे निमन्त्रण देते मेघ पहले नहीं देखे। बस खिड़की से कूदकर मेघों के इस संगमरमरी फर्श पर दौड़ जाने को मन करता है। कई बार आपको भ्रम होता है जैसे आकण्ठ बर्फ की पर्वतमाला के बीच से तैर रहे हैं।

 इस बीच विमान में घोषणा हुई कि हम लोग इस्ताम्बुल के ऊपर से गुजर रहे हैं। इतने ऊपर से किसी भी, कैसे भी बड़े शहर का आस्तित्व खिलौने जैसा लगता है। शायद इससे पूर्व हम लोग ईरान, ईराक के मरुस्थलों के ऊपर से गुजर रहे थे। सैकड़ों मीलों तक बालुई निर्जनता, रण्ड-मुण्ड सिर-सी गुजरती रही थी। कई बार विमान या तो अपनी दिशा या ऊँचाई बदलने के लिए थोड़ा डगमग होता तो सारा क्षितिज ऊपर से नीचे होने लगता है, जैसे कोई क्षितिज रेखा को ऊपर-नीचे कर रहा है। हमारी घड़ी के भारतीय समय में दो बज रहे थे, जबकि रोम में उस समय 12 या 12.30 रहा होगा और घोषणा हुई कि रोम आने वाला है। रोम का नाम सुनकर ही बड़ी अविश्वसनीयता लगी कि दिल्ली के बाद धरती का स्पर्श रोम में होगा, वह भी यूरोपीय धरती पर, जिसके साथ दुनिया के इतिहास, मिथकों की रहस्यमयता जुड़ी हुई है। पता नहीं क्यों, विमान ने काफी नीचे आकर रोम की पहाड़ियों के तीन चक्कर लगाये और तब जाकर करीब पाँच घँटे बाद हमारे पैर का प्रतिनिधित्व करते हुए जब विमान ने यूरोप की धरती का स्पर्श किया, तो थोड़ा रोमांच हआ। जैसे ही विमान से बाहर आया तो पहली बार यूरोपीय आकाश, हवा और परिदृश्य को देखा, सूँघा और अपने भीतर तक अनुभव किया। विमान से हाई अड्डे तक के लिए नीचे प्लेटफार्म वाली बस तैयार खड़ी थी। ऐसी बसें शायद दिल्ली विमानपत्तन में नहीं हैं। अब कानों में, अपने चारों ओर न जाने कितनी अजनबी भाषाओं की ध्वनियाँ सुनता खड़ा था। ऐसा लगा कि विदेशों में अकेला होना कितनी त्रासद होता है। आप उस सर्वथा विदेशी वातावरण में नितान्त ऐसे अकेले होते हैं कि किसी भी दूसरे विदेशी व्यक्ति के लिए आपका कोई अस्तित्व नहीं होता। बस में हमें एक लाउंज के मुहाने पर लेजाकर खड़ा कर दिया गया।

जिधर सब जा रहे थे, मैं भी चल दिया। ‘ट्रांजिट-’ लाउंज में पहुंच कर जब एक पुलिस अफसर, जो कि निहायत ही खूबसूरत नीली कमीज और पी.केप में था, से पूछा कि JAT (तात्पर्य युगोस्लाविया) का काउण्टर कहाँ है, मुझे बेलग्रेड जाना है तो उसने संकेत से ऊपर जाने के लिए स्वचालित सीढ़ियों की ओर इशारा किया। स्वचालित सीढ़ियों पर चढ़ने का पहला मौका था, और इसके लिए थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। यह तो अच्छा था कि मेरी अटैची सीधे बेलग्रेड बुक कर दी गयी थी, मेरे पास केवल ब्रीफकेश ही था। ऊपर का यह तल्ला काफी गुलजार था। रोम सचमुच ही काफी बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय विमानपत्तन है। दिल्ली में दस या ग्यारह गेट ही हैं पर यहाँ तो 40-45 गेट होंगे। इतना लंबा-चौड़ा लाउंज कि तीन-चार चक्कर लगाने पड़ जाएँ तो एक मील से भी ज्यादा आपका चलना हो जाए। विदेशों में कोई किसी से कुछ पूछता नहीं है क्योंकि प्रत्येक बात के लिए सूचना-सेट्स होते हैं। वैसे लाउंज में पचासों काउण्टर थे। मैंने अपने भारतीय ढंग से  युगोस्लाविया के काउण्टर के बारे में पूछना चाहा तो इतालवी उच्चारण के साथ अंग्रेजी में बताया गया कि मैं सूचना-सेट्स से पता करूँ। मैंने लाउंज भर के सारे सेट्स पढ़ डाले पर JAT के बारे में कुछ पता ही नहीं चल पा रहा था।

 चूँकि मेरे पास पूरा दिन था और मेरी उड़ान शाम को 6.30 बजे थी। इसलिए कोई जल्दबाजी तो नहीं थी पर मैं जानना चाहता था कि किस काउण्टर से मुझे आगे का बोर्डिंग-कार्ड मिलेगा। इस चिंता और चक्कर में पूरे लाउंज में मारा मारा फिरता रहा और कोई काउण्टर वाला, पुलिस के लोग, कोई कुछ नहीं बता रहा था। जब मैं लगभग परास्त हो गया तो एक काउण्टर वाले से बड़ी नम्रता से अपनी कठिनाई बतलाई। उस सदाशयी ने मुझे 30 नम्बर के दूसरे सिरे पर बने काउण्टर पर जाने के लिए कहा। मैं फिर हारकर उस सारे अजनबी, अमानवीय, सुहावने परिवेश में किसी तरह 30 नम्बर काउण्टर पर पहुँचा। इसके पूर्व मैं 31 नम्बर के काउण्टर पर दो बार पूछ गया था पर उक्त श्रीमान ने पास वाले काउण्टर की कोई जानकारी नहीं दी थी। जब मैं उक्त काउण्टर पर पहुँचा तो लाल वेशभूषा में एक महिला मिली। पहले तो उसने भी काफी रूखे तरीके से बताया कि मैं 4.30 बजे के बाद यहीं आ जाऊँ, तब बोर्डिंग-कार्ड मिल जाएगा। पता नहीं कैसे, मेरी बातें सुनकर वह कुछ पसीजी, जब मैंने कहा कि कितनी मुश्किलों से मैं आप तक पहुँचा हूँ। पता नहीं कैसे उसने पूछा कि मैं क्या करता हूँ ? और जब मैंने कहा कि मैं लेखक हूँ और युगोस्लाविया इसी सिलसिले में जा रहा हूँ तथा ये मेरी पहली विदेश-यात्रा है। उसने बहुत मुस्कराकर तत्काल दो मिनट में मेरा बोर्डिंग-कार्ड बना दिया और बताया कि यहीं सामने के 30 नम्बर गेट से मुझे 6 बजे जाना है। मेरा ख्याल है इस सारी दौड़-धूप में घण्टा-डेढ़ घण्टा जरूर लग गया पर अब मेरे पास बोर्डिंग-कार्ड आ गया था, सो निश्चिन्त हुआ।

अब मेरी कठिनाई थी कि मैं क्या खाऊँ ? और मेरे पास छोटे नोट नहीं थे। क्योंकि मैं बाहर निकल ही नहीं सकता था क्योंकि वीसा नहीं था। लाउंज के रेस्तरां में ताक-झाँक करने की कोशिश की पर समझ नहीं पा रहा था कि इसमें कौन चीज वेजिटेरियन के लिए है। विदेशों में पानी एक समस्या है। लोग यहाँ पानी नहीं पीते जबकि हम लोग पानी ही तो पीते हैं। मुझे लगा कि लंगन कर जाना ज्यादा टीक होगा बनिस्बत कुछ खाने के। किसी प्रकार तरह-तरह के लोग, शीशों की दीवारों से बाहर का दृश्य देखता-टहलता रहा। रोम का यह ट्रांजिट हाल बड़ा भी है और सुखद भी है। आप आराम से उठ बैठ सकते हैं। इस बीच कुछ दूरी पर केवल एक भारतीय दम्पत्ति जरूर दिखा। एक बार मन में आया कि उनसे मिला जाए पर वे दोनों थोड़ी ही देर में कहीं खो गये। विदेश को पहली बार और वह भी अपनी आँखों से देख रहा था। इन लोगों का आचार-व्यवहार  सर्वथा भिन्न प्रकार का है। निश्चित ही एक प्रकार की उन्मुक्तता सारी आयु के लोगों में मिल जाती है। हमारे देश की तरह नहीं है कि वयस्क या वृद्ध लोग भिन्न प्रकार से व्यवहार करते हैं।

 स्त्री और पुरुष सब खुले व्यवहार में विश्वास करते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर भी इन्हें कोई भी ढंग से बैठने, सटे-सटे टिके होने में कोई संकोच नहीं होता। लाउंज एयर कण्डीशण्ड था, बड़ा था फिर भी वातावरण में सिगरेट और शराब की गन्ध थी। पर एक बात माननी है पड़ती है कि सफाई और स्वच्छता इतनी अधिक होती है कि क्या किसी के वैयक्तिक ड्राइंगरूम में होगी। यह बड़ा-सा लाउंज जिसमें पूरे पर नीला कारपेट और क्या मजाल जो उस पर कागज का छोटा-सा टुकड़ा भी हो। लोग अन्धाधुन्ध सिगरेट पीते हैं पर पीकर ऐश-ट्रे में ही फेंकते हैं। लाउंज में नीचे उतरकर टायलेट है।




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