बधिया स्त्री - जर्मेन ग्रीयर Badhiya Stri - Hindi book by - German Greyer
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बधिया स्त्री

जर्मेन ग्रीयर

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :318
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7005
आईएसबीएन :81-267-0124-2

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दुनिया की एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं में पढ़ी जाने वाली यह पुस्तक नारीवादी आन्दोलन के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है।

Badhiya Stri - A Hindi Book - by Germaine Greer

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुनिया की एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं में पढ़ी जाने वाली यह पुस्तक नारीवादी आन्दोलन के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है। इतिहास, साहित्य, लोक-धारणाओं से उदाहरण चुन-चुनकर जर्मेन ग्रीयर इस पुस्तक को स्त्री-विमर्श का एक अनूठा और समग्र दस्तावेज बना देती हैं।

अब तक की सर्वोत्कृष्ट नारीवादी पुस्तक....एक ऐसी पुस्तक जिसका अपना एक व्यक्तित्व है; जो ‘स्व’ और ‘अन्य’ के बीच भेद करना जानती है; और, जो पुरुष और स्त्री के श्रेष्ठ का संश्लेषण करती चलती है।

-न्यूयॉर्क टाइम्स

द फीमेल यूनक में जर्मेन ग्रीयर ने अपने विलक्षण हास्य-बोध और सूक्ष्म तार्किकता से मुझे स्त्री-स्वातंत्र्य का समर्थक बना दिया।

-कीनेथ टिनैन, आब्जर्वर

क्रुद्ध शक्ति की अद्भुत्, सतत धारा.....हिला देने वाला तर्क-प्रवाह।

-लिसनर

तीक्ष्ण बुद्धिमता के साथ रचित; कौतुक, संवेदनात्मक सघनता, अन्तर्दृष्टि तथा आवेश से भरपूर (पुस्तक)....

-न्यूयॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू

गहन बौद्धिकता, कौतुक और खूबसूरती के साथ लिखी गई (पुस्तक)....

-वोग

यह पुस्तक लिलियन को समर्पित है जो न्यूयॉर्क के तिलचट्टों की एक बस्ती के साथ रहती है, जिसकी ऊर्जा उसकी दुश्चिंताओं और दमे और मोटापे के बावजूद चुकी नहीं है, जो हमेशा हर किसी में रुचि लेती है, अक्सर नाराज होती है, कभी-कभी बातें भी बनाती है, लेकिन हमेशा ही जुड़ी रहती है। बहुला-विपुला, स्वर्णिम, मुखरा, बहुत अच्छी तरह और बुरी तरह जिससे प्रेम किया गया है, वह लिलियन, सुंदर लिलियन जो मानती है कि वह असुंदर है, निरंतर सक्रिय लिलियन सोचती है कि वह हमेशा ही थकी रहती है।

यह कैरॅलाइन को समर्पित है जो नाचती थी लेकिन बुरा, पेंट करती थी लेकिन बुरा, जो खाने की मेज से आँसुओं से भरी ‘मुझे एक व्यक्ति बनना है’ कहती उठी, बाहर गई और बावजूद अपनी विलक्षण सुंदरता के व्यक्ति बन गई। कैरॅलाइन जो हर वार से टीस जाती है, जिसे प्रशंसा पर शंका होती है, जिसने बड़े-बड़े काम विनम्रता और नर्माई से किए हैं, जिसने साहसपूर्ण प्रेम से अधिकारियों पर आक्रमण किया है और जिसे हराया नहीं जा सकता।

यह हरी आँखोंवाली परी-सी मेरी धर्ममाता जॉय के लिए है जिसका पति उसकी सहज समझदारी की निंदा करता था और उसके विचारों को नीचा दिखाता था क्योंकि उसकी अपेक्षा वह बहुत उद्दामतापूर्वक बुद्धिमती और बुद्धिमत्तापूर्वक उद्दाम थी, आखिर वह उसे छोड़कर चली गई और खुद को, अपनी अंतर्दृष्टि और अपनी हास्य-प्रतिभा को फिर से पा लेने के बाद फिर कभी नहीं रोई, सिवा तब के जब वह करुणा से भर उठती थी।

यह कासूंड़्रा के लिए है जो खालों, धागों की लच्छियों और कलमों से जादू पैदा कर देती है। जो कभी अचल, बेखबर नहीं होती। निष्ठा से भरी और कड़वी, इस्पाती रस्से-सी मजबूत और उसाँस-सी कोमल, जो अपने विचित्र भाग्य पर सवार न्यूयॉर्क के वीराने में घूम रही है।

मार्सिया के लिए, जिसका मानस सब-कुछ को धारे है और किसी भी चीज को नष्ट नहीं करता। स्वप्नों और दु:स्वप्नों को समझती, जो तूफानों को देखती है और विचलित नहीं होती, जो अभागे नरकवासियों के बीच जीती है और उनसे डरती नहीं, मुर्दों के बीच एक जीती-जागती आत्मा।

पैलेडिन इक्कीसवें संस्करण का प्राक्कथन

बीस साल पहले ‘द फीमेल यूनॅक’ के परिचय में मैंने लिखा था कि मेरे विचार से यह किताब जल्दी ही डेटेड होकर गायब हो जाएगी। मुझे आशा थी कि धरती पर औरतों की एक ऐसी नस्ल आ जाएगी जिसके लिए बीसवीं सदी के उत्तपार्द्ध में विकसित जगत के यौन-दमन का मेरा विश्लेषण एकदम असंगत होगा।

औरत की कई नस्लें धरती पर आ गई हैं : बॉडीबिल्डर औरतें जिनके कंधों की पेशियाँ मर्द की पेशियों जैसी सख़्त हैं; मैराथन धावक औरतें जिनके शरीर की पेशियाँ मर्दों जैसी ही सुतवाँ हैं; प्रशासक औरतें जिनकी सत्ता मर्दों के बराबर है; औरतें जो अपने तलाकुशदा पतियों को गुजारा भत्ता (एलिमनी) दे रही हैं और औरतें जो संगाती रही होने के नाते गुजारा भत्ता (पैलिमनी) पा रही हैं; समलैंगिक औरतें जो शादी करने और वीर्यदान से बच्चे पैदा करने का अधिकार माँग रही हैं; मर्द जो अपना अंग-भंग करके वैधानिक रूप से औरते होने के नाते पासपोर्ट पा रहे हैं; वेश्याएँ जो अपने जाने-माने व्यावसायिक संगठनों में एकजुट हो गई हैं; संसार की सबसे ताकतवर सेनाओं के अगले दस्तों में सशस्त्र औरतें हैं; पूरे ओहदे-दर्जे की कर्नल हैं जो शोख लिपस्टिक और नेलपॉलिश लगाती हैं; औरतें जो अपनी फतहों के बारे में किताबें लिखती हैं जिनमें लोगों के नाम, मुद्राओं के वर्णन, अंगों के नाप जैसे विवरण मिलते हैं। बीस साल पहले इनमें कोई भी स्त्री-घटना देखने में नहीं आती थी।

औरतों की पत्रिकाएँ अब वयस्कों के लिए लिखी जाती हैं और विवाह से पहले सेक्स, संतति-निरोध और गर्भपात के बारे में ही नहीं बल्कि यौन-रोगों, परिवार में व्यभिचार और यौन-विकृतियों के बारे में भी बात करती हैं। और तो और, आर्थिक मामलों, राजनीति, संरक्षण, पशुओं के अधिकार और उपभोक्ताओं की ताकत पर भी बात होती है। संतति निरोध की दुकान मंदी पड़ गई और इसने मासिकधर्म से कमाए जानेवाले मुनाफे को भी बहुत कम कर दिया है सो अब बहुराष्ट्रीय दवा-निर्माताओं का ध्यान रजोनिवृत्ति के दौर में चल रही या उससे गुजर चुकी औरतों पर टिका है जो हार्मोन रिप्लेसमेंट थिरैपी के एक बड़े, अनछुए बाजार का प्रतिनिधित्व करती हैं। हर टेलीविजन सोप ओपेरा में बूढ़ों की काम-कुलाँचें देखी जा सकती हैं। औरतें और क्या चाह सकती हैं ?
आजादी, वे आजादी चाह सकती हैं !

आजादी, आँखों में आँखें डालकर देखते इंसान के बजाय देखी जा रही चीज होने से। संकोच से आजादी। आजादी मर्दों की खाई-अघाई चाहत को उकसाते रहने की जिम्मेदारी से जिसकी नाक तले किसी भी छाती की सख्ती या किसी भी टाँग की लंबाई नहीं आती। आजादी तकलीफदेह कपड़ों से जिनका पहना जाना मर्दों को गुदगुदाने के लिए जरूरी है। उन जूतों से आजादी जो हमें छोटे कदम लेने पर मजबूर करते हैं और हमारे कूल्हों को उभारते हैं। पेज 3 के सदा बने रहनेवाले किशोरसुलभ लावण्य से आजादी। पत्रिकाओं की दुकान में सबसे ऊपर के खाने में (यहाँ पोर्नोग्राफिक पत्रिकाएँ रहती हैं) हम पर बरसती लानत-छीछालेदार से आजादी; बलात्कार से आजादी चाहे वह इमारत बना रहे मर्दों द्वारा हमें जुबानी नंगा करने से हो, चाहे रोजमर्रा के कामों के सिलसिले में आते-जाते टोह रखे जाने, रोके जाने, बात कहे जाने या सड़क पर पीछा किए जाने, मर्द सहकर्मियों की चिपचिपी छेड़छाड़ या बॉस के टटोलने या जिन्हें हम प्यार करती हैं उन मर्दों के परपीडन या हमें हमारी इच्छा के विरुद्ध इस्तेमाल करने, या किसी अपरिचित या अपरिचितों के दल द्वारा हिंसा से आतंकित करने और पीटने से हो।

अब हम इस बधिया स्त्री को संसार-भर में देख सकते हैं; जब हम सोच रहे थे कि हम उसे अपने दिलो-दिमाग से बाहर कर रहे हैं, वह खुद को जहाँ भी कोका कोला और नीली जींस जाएँ, वहाँ फैला रही थी। जहाँ कहीं आपको नेलपॉलिश, लिपस्टिक, ब्रेजियर और ऊँची एड़ियाँ दिखती हैं वहाँ बधिया स्त्री ने डेरा डाल लिया है। आप पर्दे के नीचे तक उसे विजयी पा सकते हैं।

सार संक्षेप


‘संसार अपनी आत्मा खो बैठा है और मैं अपना लिंग’

    -टॉलर, हिंकमैन

 यह पुस्तक नारीवाद की दूसरी लहर का एक हिस्सा है। उन पुरानी स्त्री-मताधिकार की संघर्षकर्ताओं ने जिन्होंने कैद काटी और धीरे-धीरे उन व्यवसायों में, जिन्हें अपनाने से उन्होंने इंकार किया, उन संसदीय स्वतंत्रताओं में जिन्हें इस्तेमाल करने से उन्होंने इंकार किया, उन शैक्षणिक संस्थानों में जिन्हें उन्होंने विवाह होने के इंतजार का समय काटने और डिग्रियाँ लेने की दुकानों के रूप में उपयोग किया, स्त्रियों के प्रवेश को देखने को जिंदा रहीं; अपनी भावना को एक नई और जीवंत भूमिकावाली युवा स्त्री में पुनर्जीवित होते देखा है। सिक्स पॉइंट ग्रुप की नेता श्रीमती बेज़ेल हंकिन्स-हैलिनन ने युवा संघर्षकारिणियों का ही नहीं, उनके खुले यौन-व्यवहार का भी स्वागत किया। उन्होंने इर्मा कुर्ट्ज़ से कहा भी, ‘ये लोग कमउम्र हैं और राजनैतिक रूप से एकदम ही अनुभवहीन भी, लेकिन ये उत्साह से भरी हैं। हाल तक हमारे दल की सदस्य मेरी पसंद से कहीं ज्यादा उम्र की रही हैं।’1 सीधी कार्रवाई के आनंद के ज्वार के उतर जाने के बाद दो पीढ़ी पहले की संघर्षकारिणी महिलाएँ बहुत से छोटे-छोटे संगठनों के माध्यम से एकजुटीकरण के काम में लग गईं जबकि उनकी ऊर्जा की प्रमुख शक्ति युद्धोपरांत छँटनियों और बीस के दशक की उन्मुक्तता के बाद झालरों, कॉर्सेटों और नारीत्व के पुनर्जीवन, पचास के दशक के लिंग को नियति-निर्धारक मानने के सिद्धांत से छनती-छनती लगातार छीजती, सम्माननीय बनती चली गई। धर्म-प्रचार मुरझाकर खब्त बन गया।

अब दिया जा रहा जोर अलग तरह का है। तब भद्र मध्यवर्गीय महिलाएँ सुधार के लिए चीख-पुकार करती थीं, अब अभद्र मध्यवर्गीय स्त्रियाँ क्रांति की पुकार कर रही हैं। उनमें से कइयों ने स्त्री की पुकार से पहले क्रांति की पुकार सुनी। ज्यादातर आंदोलन का स्रोत्र नववाम (The New Left) रहा है, और कइयों के लिए मुक्ति वर्गहीन समाज के आने और राज्य के छीज जाने पर निर्भर है। अंतर आमूल-चूल है, स्त्री-मताधिकार के लिए संघर्ष करनेवालियों की मौजूदा राजनैतिक प्रक्रमों में आस्था और उनमें भागीदारी की गहरी इच्छा मर चुकी है।

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