भ्रष्ट सत्यम् जगत मिथ्या - संजय झाला Bhrast Satyam Jagat Mithya - Hindi book by - Sanjay Jhala
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भ्रष्ट सत्यम् जगत मिथ्या

संजय झाला

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :118
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7006
आईएसबीएन :81-267-0473-x

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भ्रष्ट सत्यम् जगत मिथ्या

Bhrast Satyam Jagat Mithya A Hindi Book by Sanjay Jhala

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

व्यंग्य विधा के पंच महाभूत माने गये हैं हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल और के०पी० सक्सेना। इनके लेखन में व्यंग्य के पंचतत्वों को परिभाषित किया जाये तो परसाई जी में ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’, शरद् जोशी में ‘शैली के नये अवयवों का प्रयोग’, त्यागी जी में ‘अध्ययन की उद्धरणी’, श्रीलाल शुक्ल में ‘कहन की कारीगरी’ और के०पी० सक्सेना के लेखन में ‘भाषिक चटखारे’ हैं।

समर्थ व्यंग्यकार संजय झाला ने अलग-अलग पड़े इन पंच व्यंग्य तत्त्वों को एकीकृत कर इन्हें सार्थक और सशक्त रूप में प्रस्तुत किया है। दशकों बाद, सम्पूर्ण चेतना, समग्रता और आत्मविश्वास के साथ व्यंग्य के बंद कपाटों को संजय झाला ने पूरी ताक़त के साथ खटखटाया है।

जहाँ इनका लेखन स्वत:स्फूर्त एवं अनायास है वहीं उसकी अन्य विशेषताएँ भी हैं। संजय झाला अपने व्यंग्य लेखों में अव्यवस्थाओं को हास्य के माध्यम से दण्डित करते हैं। इनके लेखन में हास्य अपने विशद आनन्द से हटकर प्रयोजननिष्ठ होता हुआ व्यंग्य का मार्ग पकड़ता है। यही व्यंग्य की सिद्धता और सार्थकता है। संजय झाला के पास विराट व्यंग्य-दृष्टि है। व्यापक दृष्टिकोण है। उनके लेखन में विद्रूपताओं एवं विसंगतियों पर आँखों से आँसू बह जाने के बाद वाली ताज़गी, शुद्धता, स्वच्छता और स्निग्धता है।

व्यंग्य-विवेक एक नहीं मोरे


व्यंग्य के प्रति पाठकों की सदैव उत्सुकता रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी अविवाहिता को मातृत्व प्राप्त होने पर बालक के जन्मदाता को लेकर उत्सुकता रहती है। व्यंग्य का जन्म कहाँ हुआ ? इसका पंजीकृत पिता कौन है तथा ये कितने प्रकार का होता है ? पाठक इस बात को जानना चाहता है। देश के अनेक दुर्दान्त और जघन्य व्यंग्यकारों ने इस व्यंग्य-बोध पर शोध किया है। जहाँ तक अपना सवाल है, व्यंग्य दो प्रकार का होता है, एक तो ‘व्यंग्य’ होता ही है और दूसरा ‘व्यंग’ होता है।

पहले ‘व्यंग्य’ के विषय में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल व रवीन्द्रनाथ त्यागी अच्छी तरह बता सकते हैं, दूसरे ‘व्यंग्य’ के विषय में कामसूत्रोलोजिस्ट वात्सायन ही अच्छी तरह बता सकते हैं। कुछ लोग ‘व्यंग्यकार’ होते हैं, कुछ ‘व्यंगकार’ होते है, ठीक उसी तरह जिस तरह कुछ लोग ‘कवि’ होते हैं, कुछ ‘कव’। हमारे यहाँ कविता लिखी जाती है। जू०पी० (यू०पी०) साइड में ‘कबता’ दी जाती है, उठाई जाती है, जोड़ी जाती है इत्यादि-इत्यादि। इसी तरह ‘व्यंग्य’ लिखा जाता है, और ‘व्यंग’, इसके ‘कबता’ की तरह अनेक स्वरूप होते हैं और विशेष रूप से कवि सम्मेलनीय मंचों पर इसका प्रयोग विविध रूपों में किया जाता हैं। वहाँ ‘व्यंग’ उठाया जाता है, जोड़ा जाता तथा और भी बहुत कुछ किया जाता है।

वैसे भी इस देश में किसी को कुछ भी करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। यहाँ व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में है कि वह किसी भी दीवार, चाहे वह ताजमहल की हो या संसद की, के पास खड़ा होकर पानी की तरह तरल विशेष रासायनिक पदार्थ का विसर्जन कर सकता है। पान का पीक कहीं भी थूँककर मॉर्डन आर्ट व मुगलकालीन चित्रकला के प्रति अपना प्रेम समय-समय पर प्रदर्शित कर सकता है। सार्वजनिक स्थानों, विशेष रूप से रेल शौचालयों में, उत्कृष्ट अलौकिक साहित्य की सर्जना कर नर-नारी के संबंध विशेष की सचित्र कामाख्या या व्याख्या कर, कुछ नर, पुंगव अपनी सोलह कलाओं में पारंगति का परिचय कराते हैं।

यहाँ व्यक्ति का सामर्थ्य देखो !!!
हाँ, तो अपना विषय था, व्यंग्य कैसे और कहाँ से पैदा हुआ ? मुझे याद है कि शहर में एक बार अखिल भारतीय स्तर पर व्यंग्य पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता शहर के एक मशहूर ग्रास कान्ट्रेक्टर यानी कि घास, तूड़े और तुस के व्यापारी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यंग्य साहित्य को एक नई दिशा दी, उन्होंने व्यंग्य की उत्पत्ति व उसके जन्मदाता के बारे में बताया जिसके लिए व्यंग्य साहित्य उनका सदैव ऋणी रहेगा। (उनका अध्यक्षीय उद्बोधन यहाँ ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जा रहा है)

‘‘अब ये व्यंग-फंग तो हमारी समझ से बाहर है, लेकिन जो हमारी समझ के अन्दर है, वो है कि परसाई दादा, त्यागी जी, जोशी भाई बहुत अच्छा ‘टोन्ट’ मारते हैं। इनके टोन्ट और चुटकुले मैंने पढ़े हैं, भई धाँसू चीज हैं। मुझे टोन्ट पर याद आया कि हमारे मौहल्ले के पास ही एक कम्मो धोबन रहा करती थी, कम्मो हमारे मौहल्ले का पॉवर हाऊस थी, उसे देख मज़ा आता था, बाई गॉड ! हमारे मौहल्ले के छंगा भड़भूँजा का छोरा रज्जो भड़भूँजा भी कम्मो धोबन को देखकर ऐसे ही टोन्ट मारता था, जैसे आप लोग मारते हो।’’

ग्राम कान्ट्रेक्टर श्री छोगा लाल ने अपने वृहद् तुसीय, तूड़ीय और घासीय (ये तीनों शब्द क्रमश: तुस, तूड़ा और घास से बनाये गये हैं) अनुभव से सिद्ध करने में सफल रहे कि कम्मो और रज्जो की टोंटात्मक प्रतिक्रिया से ये ‘व्यंग-फंग’ पैदा हुआ। उन्होंने अपने भाषण का अंत भारत माता की जय, धरती माता की जय हो और गाय माता की जय से किया।

मैं श्री छोगा लाल और उनके जैसे अनेक ‘व्यंगकारों’ के ‘व्यंग’ बोध को ‘दोऊ कर जोरी’ प्रणाम करता हूँ।
व्यंग्य के बारे में मैं ज्यादा क्या लिखूँ ? तुलसीदास जी की तरह मैं भी ‘व्यंग विवेक एक नहीं मोरे’ टाइप हूँ। फिर भी कोशिश कर रहा हूँ, सब कुछ आप ही से सीखा है, आप ही को सौंप रहा हूँ। इन भावनाओं के साथ कि ‘तेरा तुझको अर्पण’

                                        आपका
                                            मैं

निन्दा सबल रसाल


‘‘क्या कहा ? छमिया छैलबना के साथ भाग गई ! मैं तो पहले ही जानता था’’, कहते हुए छोगा काका के मुखमण्डल पर एक विशेष आभा का संचार हुआ। छोगा काका का यह जानना कि छमिया का हरण छैलबना द्वारा परम्परागत रूप से किया जावेगा, ठीक उसी प्रकार था जैसे मनीषियों का यह जानना कि ‘संसार में पैदा होने वाले हर आदमी की मृत्यु निश्चित है।’ मिसेज शर्मा पर इस खबर का विशेष प्रभाव हुआ, दो साल से लकवे की मारी खाट पर पड़ी थीं, इस खबर से अंगों में क्रान्ति का संचार हुआ और घोड़े के माफिक दौड़ने लगी। फिर तो ये खबर शहर के सभी अस्पतालों में जाकर बैड-टू-बैड सुनाई गई, जिसके अद्भुत् परिणाम सामने आये, सभी प्रकार के रोगी अस्सी प्रतिशत ठीक हो गये।

चिकित्सा जगत को एक रामबाण नुस्खा मिला। वैसे भी चिकित्सा मनोदशा को देखकर वातानुकूलित की जानी चाहिए। अगर कोई प्रेम में असफलता के कारण बीमार हुआ है तो उससे कहा जाना चाहिए कि तुम्हारी पूर्व प्रेमिका का पति थैली वाली दारु पीकर शहर के एक व्यस्ततम चौराहे की नाली में पड़ा पाया गया। अगर कोई घर में लड़की पैदा होने से दु:खी है तो उससे कहो कि तू क्यूँ चिन्ता करता है, पड़ोसी छाजूलाल के तो आठ लड़कियाँ हैं नवीं होने वाली है।

अगर कोई अपने अधिकारी से दु:खी है तो उससे कहो कि बॉस की बीबी का नौकर से चक्कर है और जल्दी ठीक करना है तो कहो कि आज उसके घर एन्टीकरप्शन वालों का छापा पड़ गया। रोगी को परमसुख मिलेगा।

हम प्रारम्भ से ही परनिन्दा-रस-पिपासु हैं। निन्दा करने में व परनिन्दा सुनने में जो सुख है, सकल निन्दा वेत्ताओं मुताबिक वो सुख नाही राम भजन में, वो सुख नाहिं अमीरी में। हमारी प्रसन्नता सदैव दूसरे की अप्रसन्नता पर डिपेण्ड करती है और वो हमेशा लाशों पर कबड्डी खेलने की फिराक में रहती है। हम अपने पूर्वजों (बन्दरों) के संस्कारों को कैसे छोड़ सकते हैं जिसमें किसी ‘बया’ का आशियाना उजाड़ना बड़ा सुखकर होता है।
मैं कई ऐसे परनिन्दावेत्ताओं को जानता हूँ जो ‘क’ के सामने ‘ख’ की निन्दा करते हैं और ‘ख’ के सामने ‘क’ की और इसका जो परिणाम मिलता है वो यह है कि ये सुबह ‘क’ के घर चाय पीते हैं और शाम को ‘ख’ के साथ पनीर पकोड़े खाते हैं।
विरोधियों की निन्दा सुनकर जो मज़ा आता है वो एक विद्वान के मुताबिक ‘‘ना मदिरा के चषक में है ( इसका सरलार्थ दारू की सिप के रूप में भी किया जा सकता है) ना नर्तकियों के नादमय पदन्यास में है और ना ही अप्सराओं के आवेगपूर्ण आलिंगन में है।’’

राजनीति में विरोधियों की निन्दा, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आलाकमान के सामने उनके ही विरोधी की निन्दा कर कई प्रतिभाशाली निन्दामनीषी म्यूनिसपाल्टी के मेम्बर से लेकर पार्लियामेन्ट के मेम्बर बन चुके हैं।



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