रमला बहू - रूप सिंह चंदेल Ramla Bahu - Hindi book by - Roop Singh Chandel
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रमला बहू

रूप सिंह चंदेल

प्रकाशक : प्रवीण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :287
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7090
आईएसबीएन :00

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ग्रामीण परिवेश में साँस लेने वाले शुद्ध ग्रामीण चरित्रों को लेकर लिखा गया उपन्यास ग्राम्य-जीवन की एक यथार्थ, अविकृत छवि प्रस्तुत करता है...

Ramla Bahu - A hindi book - by Roop Singh Chandel

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 रमला बहू : जहां गांव अपने पूरे वजूद में जिंदा है

हीरालाल नागर

‘‘रमला बहू’’ युवा कथाकार रूपसिंह चंदेल का दूसरा उपन्यास है। उपन्यास के नाम से ऐसा प्रतीत होने लगता है कि यह गांव की किसी नारी पात्र पर केन्द्रित होकर लिखा गया है, लेकिन यह धारणा इस उपन्यास के साथ उपयुक्त नहीं है क्योंकि ज्यों-ज्यों उपन्यास के पृष्ठ खुलते जाते हैं नारी जाति की पीड़ा सिमटती हुई; पूरे गांव में समा जाने की आतुर दिखाई देने लगती है, लगभग आधे पृष्ठों में ‘‘रमला बहू’’ जैसा नारी पात्र नदारद रहकर जब इस उपन्यास की भाव भूमि से जुड़ता है तब यह अपना अर्थ ग्रहण कर पाता है, दरअसल ‘‘रमला बहू’’ गांव के वर्ग एवं जातीय चरित्र को एक साथ उद्घाटित करने वाला उपन्यास है, जिसमें गांव की विषमताएं तो हैं ही, मामूली से मामूली आदमी का भी जीवन संघर्ष इसमें झलक पा जाता है.

कानपुर जनपद का एक गांव है ‘गुधौली’, इस गांव के बीच से उठती है ‘‘रमला बहू’’ की कथा, गांव के ठाकुर छिद्दनसिंह के पुनर्विवाह की खबर से जागते गांव की चौपालें अचानक आशंका, दुर्भावना और साजिश से भर जाती है, कांट-छांट शुरू होती है—छिद्दनसिंह के खिलाफ साजिश रचने वाले प्रतिद्वन्दी जंगलसिंह की ‘‘काली करतूतों’’ से जंगली सिंह स्वभाव में क्रूर, ईर्ष्यालु, लोलुप और स्वार्थी है जब कि छिद्दनसिंह धर्म भूरु, अंधविश्वासी और सदाचारी है, इन ध्रुव पात्रों की क्रिया कलापों पर उपन्यास की कथागत घटनाओं का जिक्र जारी रहता है, यद्यपि दोनों एक ही परिवार की वंशबेलि हैं—फिर भी उनके स्वार्थ उन्हें परस्पर दुश्मनी की गर्त में ढकेल देते हैं.

छिद्दनसिंह की बहन है—शांता, जो शादी के तुरंत बाद विधवा हो जाती है और अपना वैधव्य काटने के लिए भाई के घर लौट आती है, वह नेक और जिद्दी औरत के रूप में पहचानी जाती है, बिरसा बेड़िया ठाकुर छिद्दासिंह का बंधुआ मजदूर ही नहीं, शांता का चहेता भी है, छिद्दासिंह की कोई संतान नहीं है, पहली पत्नी भाग चुकी है—शायद उसकी नपुंसकता के कारण, शांता अपने भाई की दूसरी शादी के लिए कटिबद्ध है, वह नहीं चाहती कि उसके भाई की जायदाद उसके मरणोपरांत किसी गैर के हाथों में जाये, जंगली सिंह शांता की इस योजना को सफल नहीं होने देना चाहता, वह छिद्दासिंह की शादी रुकवाने की चेष्टा करता है लेकिन सफल नहीं हो पाता, छिद्दासिंह की फसल को नष्ट कर देना चाहता है लेकिन बिरसा बेड़िया के आगे उसकी एक नहीं चलती, बिरसा केवल शांता के घर का मामूली कार्यकर्ता नहीं है वह शांता की दमित इच्छाओं को फलीभूत करने वाला सशक्त माध्यम भी है, रमला जब बहू बनकर छिद्दासिंह के घर पहुंचती है तो उसके सपनों में आग लग जाती है, छिद्दासिंह के निर्वीर्य होने की अलग कथा है जो अंधविश्वासों में विश्वास पैदा करती है, शांता रमला के मानसिक एवं शारीरिक उथल-पुथल का फायदा उठाना चाहती है, वह उसे (रमला) बिरसा के साथ अवैध शारीरिक संबंध के लिए उकसाती है, वह महाभारत काल के मिथ से जोड़ती कथा का हवला देते हुए कहती है—‘‘अरे ! पाप कैसा, पाप तो तब हो जब समर्थ पति के रहते कोई स्त्री दूसरे पुरुष से संबंध बनाये, जब पति इस योग्य न हो और वंश चलाना भी आवश्यक हो तो एक ही उपाय है, ‘‘(पृष्ठ 171). रमला और शांता का अंतर्द्वंद्व तथा उनके आत्ममंथन पूरे आवेग के साथ उपन्यास के पन्नों पर स्याह धब्बों की तरह उभरता है.

‘‘रमला’’ शांता की मंशा को ताड़ लेती है और वह उसके खिलाफ विद्रोह कर देती है. पति की उपेक्षा और ननद के दोमुहेपन के आगे रमला भविष्य के अंधकार में डूब जाती है, इस अंधेरे से उबारता है गांव के परधान का बेटा मदन, मदन स्वाध्यायी युवक है. वह घर-परिवार के रिश्तों को पहचानता है फिर भी वह रमला के प्रति आकर्षित होता चला जाता है. उसकी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है और रमला भी खुद को अपने भीतर छिपे किसी स्नेह की रेखा में सिमटती हुई पाती है.
उपन्यास में दो तरह के पात्र हैं, एक जो गांव की घटनाओं को तथ्यपूर्ण तथा प्राभाविक बनाते हैं : रामखिलावन, लाला जयत नारायण, झुमकी और महंगू ऐसे ही कुछ पात्र हैं, इनके प्रतिपक्ष में ऐसे पात्र हैं जिनके कारण गांव का ‘‘गंवईपन’’ मौजूद है, पंडित गजाधर, जमुना, लाजवंती, भगवान सिंह, जनार्दन सिंह और गोसाई बाबा की वजह से गांव में अच्छा कुछ बचा रहता है—मानवीय करुणा और इंसानियत के रूप में, उपन्यास की अंतर्वस्तु से जुड़ी तमाम छोटी-छोटी घटनाएं हैं, हास्य-व्यंग्य और हास-परिहास के प्रसंग हैं, कुछ चीजें ऐसी हैं जो घटनाओं से जुड़कर भी स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में बनी रहती हैं. तीज-त्यौहारों का रम्य वर्णन, शादी-ब्याह की रीति-रिवाजों का वास्तविक चित्रण, मेला-दंगल के अवसरों पर गीत-सोहरों में आनंद-उल्लास की स्वाभाविक अभिव्यक्ति आदि केवल घर-परिवार की ही नहीं पूरे गांव की समग्र सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना एकीकृत होकर उपन्यास में खास तरह की रोचकता और आत्मीयता को जन्म देती है, चंदेल ने उपन्यास के स्थूल कथानक को गांव के जीवन के भीतरी राग से जोड़कर पूरी कथा को एक नया मर्म दिया है.

चंदेल ने ‘‘रमला बहू’’ में गांव के सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक विघटन के कगार पर खड़े गांवों के मानसिक परिवर्तन की ओर संकेत किया है, पति के रहते हुए पति द्वारा ‘‘रमला बहू’’ को (कानून और सामाजिक मुहर के साथ) मदन को सौंपने की परिकल्पना लेखक की इसी मानसिकता की ओर संकेत देती है, लेकिन यहां पर गौर करने वाली बात है कि विवाहित किंतु उपेक्षित रमला को मदन के साथ लेखक ने पूरी तरह बांध तो दिया लेकिन शांता के भविष्य की कोई गारंटी नहीं दी, दूसरी बात—शांता जो दुर्भाग्य से एक विधवा भी है को तिल-तिल अपमान सहने के लिए छोड़ दिया और जंगली सिंह के हाथों बिरसा की हत्या करवा दी. ये घटनाएं उपन्यास की मूल थीम को प्रभावित करती हैं, किंतु चंदेल इनका कोई निराकरण नहीं करते, वे तो कथा को कथा की तरह स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते हैं. चंदेल की विशेषता है—कथा को रोचक किस्से की तरह बयान करना—जहां गांव अपने पूरे वजूद में जिंदा हो उठता है.

यहां पर लिखना अनुपयुक्त न होगा कि बीसवीं सदी का यह अंतिम दशक उपन्यास विद्या की वापसी के रूप में स्मरण किया जायेगा, भले ही कुछ आलोचक इस दशक को कहानी की वापसी का दशक कहें, लेकिन वास्तविकता यह है कि कहानी की वापसी तो आठवें दशक में ही हो चुकी थी, जब कि उपन्यास को लेकर जो शून्यता अनुभव की जा रही थी उसकी पूर्ति इस अंतिम दशक में संभव हुई है. वर्ष 1994 में जो उपन्यास प्रकाशित और चर्चित हुए उनमें मनोहरश्याम जोशी के ‘‘हरिया हरक्यूलिश की हैरानी’’ को छोड़कर शेष की चर्चा प्रायोजित रही और पूंजी और उच्च पदों की भूमिका का विशेष योगदान रहा, जबकि दो बेहतरीन उपन्यास ‘‘रमला बहू’’ (रूपसिंह चंदेल) और ‘‘नरककुंड में बास’’ (जगदीश चंद्र) को जानबूझकर हाशिये पर रखने का प्रयत्न किया गया. जबकि वास्तव में ये दोनों ही वर्ष के श्रेष्ठ उपन्यास कहे जाने योग्य हैं. हिंदी में पनप रही इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए. वर्ना कूड़ा-कचरा ही यहां श्रेष्ठता के परिचायक होकर रह जायेंगे.


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