वित्त-वासना - शंकर Vitt Vaasna - Hindi book by - Shankar
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वित्त-वासना

शंकर

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :190
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7093
आईएसबीएन :9788180311499

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भीष्म ने कहा, धर्मराज! जिसके प्रभाव से पाप जन्म लेते हैं, मैं उसके बारे में बताने जा रहा हूँ, सुनिए...

Vitt Vasna - A Hindi Book - by Shankar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

वित्त-वासना

माला मिश्र की सिगरेट खत्म हो चुकी है। यह होटल तो उसी का घर है। मैं तो यहाँ कई घंटे के लिए आ गया हूँ। फिर भी माला ने मेरा टायलेट इस्तेमाल करने के लिए मेरी इजाजत माँगी।
मैंने कहा, ‘‘अवश्य इस्तेमाल कर सकती हो!’’
उसके बाद माला टायलेट से निकली। बाथरूम में उसने अपना चेहरा पोंछ लिया था। अपने को फ्रेश कर लिया था। इस समय उसकी आँखों में शिकार को पकड़ने की आग धधकने लगी है।

माला एकदम मेरे करीब में आकर बैठ गयी। उसके जवान जिस्मों की खुशबू मेरी नाक में प्रवेश करने लगी।
सुपुष्ट पयोधरों को यथासम्भव, ऊपर उठा कर माला मेरी तरफ लुभावनी आँखों से देखने लगी। फिर माला बोली, ‘‘आई एम सो सॉरी मिस्टर चक्रवर्ती। कब किस महिला ने कैसे आपको ठगा था, अब उसे भूल जाएँ।’’
माला ने अचानक मेरा दाहिना हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार-भरे स्वर में कहा, ‘‘आप भी जितना चाहें, बदला लेते जाइए मिस्टर चक्रवर्ती। अतिथि के कमरे में बैठकर ड्रिंक करना मना है। लेकिन यू आर ए स्पेशल मैन और ऐज ए स्पेशल केस....’
-इसी पुस्तक से

मेरे बायें हाथ की क्वार्ट्ज घड़ी में उस समय ग्यारह बज कर पैतीस मिनट बारह सेकण्ड हुए थे। बिजनेस और इण्डस्ट्री में समय बड़ा ही मूल्यवान है। इसलिए उन दिनों में संसार की सबसे अच्छी घड़ी का इस्तेमाल करने लगा था। उस घड़ी में एक वर्ष में एक सेकण्ड की भी घट-बढ़ नहीं होती थी।
स्वीट्जरलैण्ड की सबसे अच्छी घड़ी कलाई में बाँध कर प्रतिदिन प्रति मिनट के सदुपयोग के लिए तैयार रह कर भी मैं क्या करता, जब कि मेरी जननी जन्मभूमि के लोग, यानी मेरे भाई-बहनें इस देश के हर आदमी को समय के मामले में लापरवाह बनाने के लिए हर वक्त तैयार बैठे रहतें ! भारत में समय की कोई कीमत नहीं है। यह तो इतिहास के हर पृष्ठ पर लिखा है। इस देश में कभी घड़ी नहीं थी। अगर थी भी तो लोग न तो उसे कलाई में बाँधते थे और न घर की दीवार पर लगाते थे। हमारे श्रद्धेय पूर्वज जिसको ले कर हर घड़ी व्यस्त रहते थे, वह था महाकाल। महाकाल की एक फूँक से लाखों करोड़ों वर्ष गायब हो जाते हैं। इसलिए मैमूली घण्टा-मिनट-सेकण्ड का हिसाब ले कर कभी किसी ने सिर खपाने की जरूरत महसूस नहीं की।

इसी एक अलगरजी ने आज भी इस देश के लोगों को अकर्मण्य और उत्साहहीन बना रखा है। उस दिन सबेरे से उस समय तक मुझे जो अनुभव मिला, उसके बारे में सुन लेने पर आप सभी मुझसे सहमत होंगे।
उस दिन भोर में मेरी आँखों मे मजे की नींद थी। लेकिन मुझे बाहर जाना था। मेरी यह कलाई घड़ी अनेक प्रकार से समय का हिसाब रख सकती थी, जिसमें एक यह भी था बाँसुरी बजा कर समय का संकेत कर देना। एक बार सजग कर देने पर मेरी यह साथी हर पाँच मिनट पर अपनी तरफ से यह संकेत करती जाती थी।

एकदम भोर से मेरी प्यारी नींद को जब प्यार जताने के लिए मेरा मन बेचैन होने लगा था, ठीक उसी समय उस विदेशी घड़ी ने पीं-पीं आवाज लगाना शुरू कर दिया था। नींद की दुनिया की वह घूँघट वाली छाया उस समय भी मुझे पर अपनी मोहनी डालने के लिए अधीर हो रही थी, लेकिन हवाई अड्डे जाने के लिए मुझे बिस्तर छोड़ कर उठना ही पड़ा।
फिर विक्रमशिला से अस्सी किलोमीटर ड्राइव कर सही समय पर मैं उस प्रसिद्ध हवाई अड्डे पर पहुँच गया। वंगवासियों की बहुत बड़ी बदनामी यह है कि हर काम में अड़ंगा लगा कर बेड़ा गर्क करने में वे अपना सानी नहीं रखते। लेकिन उस हवाई अड्डे मे एक से अधिक वंगवासी नहीं था। माफ कीजियेगा, उस बार एयरलाइन्स इनक्वेरी में एक वंगललना को बंगला मैगनीज पढ़ते देखा था। महिलाओं की बात छोड़ दी जाय। इस देश में जो भी प्रगति हुई, उसमें वे कभी बाधक नहीं बनी।
बंगालियों से खाली उस व्यस्त और विख्यात हवाई अड्डे में भी उस दिन श्रमिक अशान्ति थी।
मेरे दायें हाथ में एक नाटा-मोटा भारी-भरकम बैग था। देखने मे हिपोपटेमस होने से क्या होता, एयरलाइन्स के माप-तौल में वह बैग एरदम नाबालिग था, यानी मालिक का हाथ पकड़ कर वह विमान के केबिन में जा सकता था लगेज में भेजने की जरूरत नहीं थी।

मैंने जल्दी-जल्दी रिपोर्टिंग का काम निपटा कर नारंगी रंग का बोर्डिंग कार्ड ले लिया और उसके बाद पितरपच्छ के कौवे की तरह उम्मीद लगाये बैठा रहा कि कब दिल्ली फ्लाइट की सिक्युरिटी चेकिंग होगी।
मेरी शर्ट के बीच में बोर्डिंग कार्ड रखा था, जो झाँक भी रहा था। मेरा नाटा-मोटा बैग डरपोक बंगाली ग्रामीण किशोर की तरह मेरा हाथ थामे हुए था। लेकिन फ्लाइट के बारे किसी तरह घोषणा मेरे कानों में नही पड़ रही थी।
समय बिताने के लिए इस बीच मैने थोड़ा-बहुत कॉन्स्ट्रक्विव काम कर लिया था। लगभग जॉगिग की स्टाइल में खटाखट एयरपोर्ट का एक चक्कर लगा चुका था। बदन में केलॉरी की जो अधिकता थी, उसे इसी तरह मैंने सरकारी हवाई अड्डे में खर्च कर डाला था।

लेकिन मजे की बात यह देखिए कि ईधन की कमी के कारण इस देश के लोग कितना कष्ट उठा रहे हैं, ऊर्जा के अभाव में इस गरीब देश की प्रगति किस कदर अवरुद्ध हो रही है और इस चक्रवर्ती-नन्दन ने शरीर में जमा अतिरिक्त केलॉरी को जलाने के लिए अकारण ही चहलकदमी करना शुरू कर दिया। जस्ट थिंक आफ इट ! ठीक उसी समय, जब मैं चहलकदमी करने लगा था, भारत के गाँव-गाँव में न जाने कितनी बहुएँ कुएँ और तालाब से पानी ढो कर घर तक नहीं ला पा रही थी, क्योंकि वे कुपोषण के कारण कमजोर थीं और कोई उनकी सहायता करने वाला भी नहीं था। छोटे-छोटे बच्चे चूल्हे के सामने बैठ कर रो रहे थे। उन बच्चों को तेज भूख लगीं थी। हमारी सभ्यता के एक छोर पर ऐसी स्थिति थी तो दूसरे पर मुझे अतिरिक्त केलॉरी जलाने का कोई रास्ता ही नहीं मिल रहा था !

सचमुच मैं लोगों की निगाह बचा कर पदयात्रा की शैली में इस तरह हवाई अड्डे के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने लगा था कि मानों मुझे बड़ी कीमती चीर की तलाश थी। फिर वह चीज वहाँ न मिली तो मैं दूसरी दिशा में चलने लगा।
मेरी क्वार्ट्ज घड़ी एक प्रकार से कम्प्यूटर जैसी थी। अतिरिक्त केलॉरी खर्च होते ही वह पीं-पीं की रट लगा कर मुझे बता देती थी। किस तरह कितनी देर कौन सा काम करने पर शरीर की कितनी चर्बी जलती थी, उसका पूरा हिसाब उस घड़ी की यांत्रिक स्मृति में दर्ज था।

कोई-कोई शायद यह सोच रहे होंगे कि कितने आश्चर्य की बात है ! यह आदमी एयरपोर्ट में जा कर भी हलका-फुलका व्यायाम, यानी हाथ-पाँव हिलाने-डुलाने का मौका क्यों ढूँढ़ने लगा ? इसका यही जवाब होगा-बहुत अच्छा किया ! तो स्नेहमयी वंगजननी के आँचल में छिपने वाला शान्त-शिष्ट बालक जैसा नहीं हूँ। मुझे इस बहुत बड़े संसार में तमाम अन्य लोगों से बुद्घि और परिश्रम के बल पर लड़ कर जिन्दा रहना होगा। शारीरिक दक्षता, यानी फिजिकल फिटनेस मेरे लिए आवश्यक है। सिर्फ बंगाली बाबुओं को छोड़ कर सभ्य जगत् के सभी आदिकाल के पण्डितों ने बिना किसी मतलब के नहीं कहा है कि स्वास्थ्य ही सम्पदा है, हेल्थ इज वेल्थ।

आलसी बंगालियों की मानसिकता मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति से भी छिपी नहीं है। वे सोचते हैं कि बाँभन की देवोत्तर सम्पति की तरह यह पैतृक काया-मानों भगवान से तब तक के लिए पट्टे पर मिली है, जब तक आकाश में चन्द्र-सूर्य रहेगें। इसलिए शरीर की देखभाल की कोई जरूरत नहीं हैं। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द कड़ी से कड़ी बात कहते-कहते हार गये, लेकिन बंगाली सज्जनों की तोंद और उनके अम्लपित्त रोग का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। मैं तो मामूली प्रवासी बंगाली ठहरा, इस दिशा में बंगालियों में सुधार लाना मेरे वश का काम नहीं है।

हवाई अड्डे मे मैं जब जोर-जोर से चलने लगा था, तब देखा कि एक आदमी कनखियों से मेरी तरफ देख रहा है। मैने मन ही मन कहा, देखो बेटा, तुम अपने काम से सिर खपाओ ! माइण्ड योर योन बिजनेस ! तुम्हें क्या पता है कि अमरीकी प्रेसिडेण्ट या वाइस-प्रेसीडेण्ट जब विदेश यात्रा पर जाते है, तब उनके पास हजारों काम रहते हैं। फिर भी रोज सबेरे रंगीन हाफपैण्ट पहन कर वे जॉगिग करते हैं। राष्ट्रनेता के उस केलॉरी बर्निंग कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा के लिए उनके साथ सिक्यूरिटी के आधे दर्जन लोगों को भी भागदौड़ करनी पड़ती है। फिर भी साहब लोग शरीर को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। चर्बी की धर्मशाला के रूप में ईश्वर ने इस मानव-काया का निर्माण नहीं किया है। इसलिए यह समझ लो बेटा, चर्बी बहुत बुरी चीज है !

खैर, हवाई अड्डे का चक्कर लगाना पूरा किया। चर्बी विसर्जन नाटक का एक दृश्य भी पूरा हुआ। लेकिन हवाई अड्डे के सुरक्षा कर्मियों द्वारा उत्पीड़ित होने का ही दूसरा नाम सिक्यूरिटी चेक था। सुना था कि पूर्व एयर होस्टेस ही एयरपोर्ट में घोषिका बनती है। ऐसी ही घोषिका कितने मधुर स्वर में कहती हैं, ‘‘सिक्यूरिटी गेट पर चले आइए। चेकिंग शुरू हो गयी है।’’
एयरपोर्ट चेकिंग के बारे में मत पूछिए ! लेकिन सिक्यूरिटी विभाग के कुछ लोग मेरी शक्ल-सूरत देख कर ही समझ जाते हैं कि ऐसा आदमी कभी हवा में उड़ते समय विमान का अपहरण नहीं कर सकता। इसलिए वे लोग मुझसे अपना नाटा-मोटा भारी-भरकम बैग खोलने के लिए कहते हैं। मैं बैग खोलता हूँ तो वे लोग कनखियों से ऊपर देख लेते और फिर हलके हाथ से एक-दो को छूने के बाद बैग को बन्द करने के लिए कहते हैं।

बैग खोलना तो आसान होता है, लेकिन बन्द करना बड़ा मुश्किल। ठूँसा सामान तो ठीक रहता है, लेकिन खोलते ही वह मानों हवा पी कर फूल जाता इसलिए भरा बैग हो या बक्सा, खोलने पर जल्दी बन्द होना नहीं चाहता।
सुरक्षा केन्द्र, यानी सिक्सूरिटी चेक में और एक तरह से तलाशी ली जाती है। उसमें पुलिस के निर्देशानुसार बैग से सारा सामान निकाल कर दिखाना पड़ता है। खास कर बैग के अन्दर के बैग ही पुलिस कर्मचारी के कौतूहल के केन्द्र बन जाते हैं।
मान लीजिए, आपने कहा कि दाढ़ी बनाने का सामान है। लेकिन पैसेंजर की कही बात को हलफनामा मान लेने के लिए पुलिस पैदा नहीं हुई है। पुलिस अपनी आँखों से देखना चाहती है कि किस बैग में दाढ़ी बनाने का सामान है और वह सचमुच दाढ़ी का सफाया करता है या आसमान में विमान के उड़ते समय किसी छद्यवेशी दस्यु के हाथ कोई भयानक हरिथार बन सकता है ?

फिर सिक्यूरिटी पुलिस को कैसे दोष दिया जा सकता है ? देश-विदेश में दाढ़ी साफ करने के कितने ही यंत्र बन गये हैं और उनको देख कर अनुभवी सुरक्षा कर्मियों को भी यह समझने में काफी समय लग जाता है कि उनका निर्माण शोविंग के लिए हुआ है !

मेरे आफिस में मार्केटिंग ग्रुप की मीटिंग मे एक बार मैंने सुविमल से कहा था, ‘‘दाढ़ी बनाने की क्रीम के लिए सारे भारत में मार्केट सर्वे कराने की आवश्यकता नहीं है।’’ इस पर सुविमल ने आपत्ति करते हुए कहा था, ‘‘लेकिन सर, एजेन्सी और मार्केट रिसर्च ग्रुप का कहना है कि कम से कम सात शहरो में, यानी बम्बई, दिल्ली, मद्रास, कलकत्ता, अहमदाबाद, बंगलौर और हैदराबाद में घर-घर प्रतिनिधि भेज कर पता लगाना होगा कि किस इनकम ब्रैकेट में कौन किस शोविंग सोप और क्रीम का इस्तेमाल कर रहा है।’’



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