जाल - सुरेन्द्र मोहन पाठक Jaal - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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रहस्य-रोमांच >> जाल

जाल

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :402
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7103
आईएसबीएन :9788176049795

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‘जाल’ उसकी जान का जंजाल बन गया और राजनगर में एक ही शख्स था जो उसे जाल से, जंजाल से रिहाई दिला सकता था।...

Jaal - A hindi book - by Surendra Mohan Pathak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कोई अन्जान औरत निरन्तर गुमनाम टेलीफोन करके सिग्मा कार्प के अभिनन्दन शुक्ला को उसकी तबाही से बचाने की स्थिति में होने का दावा करती थी जो कि अभिनन्दन शुक्ला से महज चार दिन दूर थी।
क्या उसके दावे में दम था ?
कौन थी वो रहस्यमयी रमणी ?
क्या शुक्ला निश्चित तबाही को टाल सका ?

जाल


सुनील यूथक्लब पहुंचा।
रमाकांत को उसने मेन हाल के एक कोने की टेबल पर मौजूद पाया जहां वो एक सूटबूटधारी, कोई टॉप एग्जीक्यूटिव दिखने वाले, पैंतीसेक साल के व्यक्ति के साथ किसी संजीदा गुफ्तगू में मशगूल जान पड़ता था। दोनों के सामने विस्की के गिलास थे और दोनों धूम्रपान कर रहे थे।
सुनील ठिठका, वो अभी सोच ही रहा था कि क्या उनको डिस्टर्ब करना मुनासिब होगा कि रमाकांत की उस पर निगाह पड़ी। उसने हाथ के आग्रहपूर्ण इशारे से उसे करीब बुलाया।
सुनील लम्बे डग भरता उनके करीब पहुंचा।

‘‘आ भई, काकाबल्ली’’–रमाकांत बोला–‘‘जी आयां नूं।’’
सुनील ने फरमायशी मुस्कराकर दिखाया।
‘‘रख अपनी तशरीफ।’’
‘‘मैं डिस्टर्ब तो नहीं...’’
‘‘खामखाह ! वैलकम बोला नहीं तेरे को ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘क्या नहीं ?’’

‘‘वैलकम नहीं बोला।’’
‘‘माईंयवा, जुलाई दियां मस्खरियां मां भैन नाल। ‘जी आया नूं’ का मतलब ‘वैलकम’ नहीं होता तो क्या ‘दफा हो’ होता है ? ‘गैट लॉस्ट’ होता है ?’’
सुनील हंसा।
‘‘हस्सया ई कंजर। अब रख तो सही।’’
सुनील एक खाली कुर्सी पर ढेर हुआ। फिर उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से पहले सूटबूटधारी व्यक्ति की ओर और फिर रमाकांत की ओर देखा।

‘‘अभिनंदन शुक्ला।’’–रमाकांत ने परिचय दिया–‘‘वड्डा आदमी। वड्डा बिजनेसमैन। टॉप कार्पोरेट बॉस।’’
सुनील ने मुस्कराते, सहमति में सिर हिलाते परिचय कबूल किया। ‘‘ओये, तू कल्पना नहीं कर सकता ये कितना वड्डा आदमी है ! नाम से भी वड्डा और रुतबे से भी वड्डा। लंच करता है तो दो क्रेडिट कार्डों से बिल चुकता होता है। जहां डिनर करता है, उसके रेट सुनेगा तो पागल हो जायेगा। ड्रिंक डिनर को बैंक से फाइनांस कराना पड़ता है। दौलतखाना इतना बड़ा है मालकां दा कि उसका फ्रंट और पिछवाड़ा दो डिफ्रेंट टाइम जोन में पड़ते हैं।’’
‘‘क्या मतलब ?’’

‘‘भई, ड्राईंगरूम में जब साढ़े चार बजे होते हैं, तब किचन में पांच बजे होते हैं।’’
‘‘क्योंकि ड्राइगरूम इंडिया में हैं’’–शुक्ला बोला–‘‘और किचन बंगलादेश में हैं।’’
रमाकांत धूर्त भाव से हंसा।
‘‘अभी ये मुझे बावन गज का साबित करके मानेंगे।’’
‘‘ओये, नहीं मालको।’’–रमाकांत बोला–‘‘खैर, अब इसका परिचय प्राप्त करो। ये सुनील है अपना मित्तर प्यारा। यारों का यार, फिर भी सदा बेकरार। हर घड़ी तड़पता है न्यूज की खातिर।’’
‘‘न्यूज की खातिर !’’–शुक्ला की भवें उठीं।

‘‘अखबारची जो ठहरा। ‘ब्लास्ट’ का चीफ रिपोर्टर जो ठहरा।’’
‘‘ओह ! ओह !’’
‘‘लगता है वाकिफ हो।’’
‘‘नाम से वाकिफ हूं। काम से वाकिफ हूं। धूम से भी वाकिफ हूं लेकिन सूरत से वाकिफ नहीं था।’’
‘‘ऐ भूतनी दा कोई शाहरुख है ! रितिक है ! सलमान है ! बहरहाल आज सूरत से भी वाकफियत हो गयी। हल्लो बोलो।’’
दोनों ने हल्लो बोला।
‘‘हाथ मिलाओ।’’
दोनों ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया।

‘‘क्या बिजनेस है शुक्ला साहब का ?’’–फिर सुनील ने पूछा। जवाब रमाकांत ने दिया।
‘‘सिग्मा रियल एस्टेट डवैलपमेंट कार्पोरेशन का नाम सुना है ?’’–वो बोला।
‘‘सिग्मा कॉर्प इन शार्ट।’’–शुक्ला बोला।
‘‘वो कम्पनी’’–सुनील बोला–‘‘जो आजकल प्राक्सी फाइट का मरकज बनी हुई है ?’’
‘‘बनी नहीं हुई लेकिन दुश्मनों की चल गयी तो आइंदा दिनों में बनेगी।’’
‘‘आपका क्या वास्ता ?’’
‘‘प्यारयो’’–रमाकांत बोला–‘‘शुक्ला साहब सिग्मा कॉर्प के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।’’
‘‘आई सी।’’

‘‘और वो प्राक्सी वार इनके खिलाफ है।’’
‘‘आई सी। आई सी।’’
‘‘तू सी सी कर, मैं तेरे लिए ड्रिंक मंगाता हूं।’’
‘‘नहीं।’’–सुनील ने तत्काल विरोध किया।
‘‘क्या नहीं ? क्यों नहीं ?’’
‘‘मैं यहां लंच के लिये आया था, वापिस आफिस जाना है और बहुत काम करना है, जिसमें बिगबॉस की पेशी भी शामिल है, इसलिये महकते जाना ठीक न होगा।’’

‘‘बल्ले भई तेरियां मजबूरियां ! ऐन्ना मजबूर आदमी भी किस काम का !’’
‘‘साथ देने के लिये मैं एक गिलास बीयर पी लूंगा।’’
‘‘चल, ऐसे ही सही।’’
रमाकांत ने एक वेटर को तलब किया और उसको आर्डर समझाया।
तत्काल ड्रिंक्स का नया राउंड सर्व हुआ। तीनों ने चियर्स बोला।
सुनील ने लक्की स्ट्राइक का अपना पैकेट निकालकर एक सिग्रेट सुलगाया।
‘‘पिछले कुछ दिनों से’’–धुआं उगलता वो बोला–‘‘ब्लास्ट’’ में और कई दूसरे अखबारों में एक विज्ञापन छप रहा है जिसकी भाषा सिग्मा कॉर्प के माइनारिटी स्टॉक होल्डर्स को कम्पनी के मौजूदा निजाम के खिलाफ भड़काने वाली होती है...’’

‘‘और खास निशाना मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर होता है।’’–शुक्ला संजीदगी से बोला।
‘‘मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर यानी कि आप ?’’
‘‘हां। वो अंशधारक जो इलैक्शन के वक्त वोट देने के लिये कभी खुद हाजिर नहीं होते, या तो अपने किसी पसंदीदा कैंडीडेट के हक में अपनी वोट डाक से भेज देते हैं–जिसे कि प्राक्सी वोटिंग कहते हैं–या प्राक्सी वोटिंग के सरकुलर को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसी प्राक्सीज आज तक हमेशा मुझे हासिल होती आयी हैं लेकिन अब ऐसे वोटरों को मेरे खिलाफ भड़काया जा रहा है ताकि मुझे एम.डी. की कुर्सी से हटाया जा सके और कोई खुद आकर उस कुर्सी पर काबिज हो सके।’’
‘‘कोई कौन ?’’

‘‘है एक आस्तीन का सांप जो कभी सिग्मा कॉर्प का जनरल मैनेजर था और जिसे कई फाइनांशल इररेगुलरिटीज के तहत डिसमिस कर दिया गया था। धर्मेश पाहवा नाम है।’’
‘‘उन विज्ञापनों के पीछे यही आदमी है ? धर्मेश पाहवा ! सिग्मा कॉर्प का एक्स जी.एम. ?’’
‘‘हां।’’
‘‘वो आपकी कुर्सी हिला सकता है ?’’
‘‘बजातेखुद नहीं हिला सकता। लेकिन माइनारिटी स्टॉक होल्डर्स को, अल्पसंख्यक अंशधारकों को, अगर अपने हक में एकजुट कर पाने में कामयाब हो जाये तो हिला सकता है।’’
‘‘आई सी।’’
‘‘वो ऐसे स्टॉक होल्डरों को विज्ञापनों के जरिये पट्टी पढ़ा रहा है कि कम्पनी का भविष्य अंधकारमय है, वो तेजी से बर्बादी की राह पर बढ़ रही है और इसकी वाहिद वजह मैं हूं क्योंकि मैं कम्पनी के मौजूदा निजाम का सरगना हूं।’’
‘‘इसमें कितनी सच्चाई है ?’’

‘‘कोई सच्चाई नहीं। हर कम्पनी के प्राफिट मेकिंग कारोबार में ऊंच नीच होती है जिसका असर उसके स्टॉक पर रिफ्लेक्ट करता है। आजकल स्टॉक मार्केट की जो हालत है, उसमें हर उम्दा शेयर की प्राइस डावांडोल है। इसलिये सिग्मा कॉर्प के शेयर की भी है जो कि बदकिस्मती से हाल में दो सौ अस्सी की स्टेडी प्राइस से एक सौ बयालीस पर आ गया है–मौजूदा मार्केट ट्रेंड के मद्देनजर हो सकता है अभी और नीचे जाये–और वो विश्वासघाती, व्यक्तिगत विद्वेष का मारा शख्स प्रचार कर रहा है कि वजह स्टॉक मार्केट नहीं, मैं हूं क्योंकि मैं नाकारा हूं। दूरअन्देशी से कोरा हूँ, बद्इन्तजामी और हेराफेरी का झंडाबरदार हूं और अपने जाती मुनाफें के तहत खुद कम्पनी को घुन की तरह खा रहा हूं, उसे दिवालियेपन की तरफ धकेल रहा हूं। कहता है कि आइंदा इलैक्शन में अगर मुझे न हराया गया, एम.डी. की कुर्सी से न हटाया गया तो इसी फाइनांशल इयर में सिग्मा कॉर्प के शेयर की औकात उस कागज जितनी भी नहीं रहेगी जिस पर कि वो छपा है।’’
‘‘जबकि इतना बुरा हाल नहीं हैं।’’

‘‘न है, न होने वाला है।’’
‘‘न होना चाहिये।’’–रमाकांत बोला–‘‘क्योंकि सिग्मा के चार हजार शेयर मेरे पास भी हैं।’’
‘‘मौजूदा मार्केट फ्लक्चुएशन वक्ती है’’–शुक्ला बोला–‘‘मार्केट कभी भी सम्भल सकती है और ऊपर उठना शुरू कर सकती है।’’
‘‘मार्केट या आपका शेयर।’’–सुनील बोला।
‘‘शेयर भी।’’
‘‘फिर प्राब्लम क्या है ?’’

‘‘प्राब्लम वो सिलसिलेवार पब्लिसिटी है जो वो कुत्ता प्रैस के जरिये मेरे खिलाफ कर रहा है। मेरे को खुफिया जानकारी हासिल है कि माइनारिटी स्टॉक होल्डर्स उसके झांसे में आ रहे हैं, उसकी पेपर पब्लिसिटी से मुतमईन हो रहे हैं और अपनी प्राक्सी उस बोर्ड को भेज रहे हैं जिसका गठन इसी काम के लिए किया गया है और जिसका कर्ता धर्ता धर्मेश पाहवा है।’’
‘‘तो ये अभियान आपकी कुर्सी हिला सकता है ?’’


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