धोखा - सुरेन्द्र मोहन पाठक Dhokha - Hindi book by - Surendra Mohan Pathak
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धोखा

सुरेन्द्र मोहन पाठक

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :347
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7104
आईएसबीएन :978-81-8491-006

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धोखा देना और धोखा खाना इंसानी फितरत है, जो इस लानत से आजाद है वो जरूर जंगल में रहता है।...

Dhokha - A hindi book - by Surendra Mohan Pathak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हर कोई उससे यही सवाल करता था। कोई उसे नशे में समझता था, तो कोई उसके दिमाग में नुक्स बताता था। किसी को उस खून खराबे पर यकीन नहीं आता था जो वह अपनी आँखों से देखा बताता था। आखिरकार ये हाल हुआ कि खुद उसे हकीकत सपना जान पड़ने लगी।
फिर भी एक शख्स था जिसको उसकी हर बात पर एतबार था।
एक नौजवान की भंवर में फंसी जिन्दगी की लोमहर्षक दास्तान...

धोखा


रोहित सूरी उस घड़ी करोलबाग थाने में मौजूद था जहां कि वो अपनी हाजिरी गैरजरूरी समझता था। बड़े साहब का हुक्म हुआ था कि वो प्रह्लाद सक्सेना के साथ जाना चाहता था लेकिन चला आया था क्योंकि ‘जाना चाहता था तो जा सकता था’ यूं कहा गया था जैसे उसे मजबूत इशारा हो कि उससे ‘जाना था’ वाला विकल्प चुनना अपेक्षित था।
बड़ा साहब राजाराम महतानी था जो कि करोलबाग में ही बैंक स्ट्रीट के एक आफिस कम्पलैक्स में स्थित महतानी इनवेस्टमेंट्स कंसल्टेंसी का प्रोप्राइटर था।

प्रह्लाद सक्सेना आफिस इंचार्ज था और खुद वो आफिस असिस्टेंट था जिसे कि फील्ड में भी आपरेट करना पड़ता था।
सक्सेना कोई अड़तालीस साल का लम्बा, दुबला पतला व्यक्ति था जो कि बाईफोकल्स लगाता था, सज धजकर रहता था और आदतन ऐंठा रहता था। उसे हर किसी से बड़ी फूं फां से पेश आने की आदत थी जो औरों को भले ही कैसी भी लगती हो, रोहित को खास तौर से नागवार गुजरती थी। बेऔलाद विधुर था, दूसरी शादी के लिए कोई औरत पटी नहीं थी, शायद इसलिये भी चिड़चिड़ाया रहता था। होली दीवाली पर ही शायद उसकी सूरत पर कभी हंसी आती थी।

रोहित सूरी को अपनी उस नौकरी से उतनी शिकायत नहीं थी जितनी कि प्रह्लाद सक्सेना से थी। प्रोप्राइटर उस पर उतना रोब नहीं गांठता था जितना कि वो उस पर गांठता था। हर घड़ी वो उसे ह्यूमीलियेट करने की, नीचा दिखाने की, तदबीरें सोचता रहता था। वो एक कोई अट्ठाइस साल का, सुथरे नयन नक्श वाला और आकर्षक व्यक्तित्त्व वाला अविवाहित युवक था और मोटे तौर पर उसे अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। मूलरूप से वो यमुनानगर का रहने वाला था, नौकरी की वजह से उसका मौजूदा मुकाम दिल्ली था जहां कि वो अपनी मौसी देवियानी सहगल के साथ, जिसकी कि अपनी कोई औलाद नहीं थी, न्यू राजेंद्र नगर में रहता था।

थाने में हाजिरी की वजह उनका दीनानाथ भारद्वाज नाम का पिचहत्तर साल उम्र का एक क्लायंट था जो कि उनके आफिस के करीब रोड एक्सीडेंट में मारा गया था। वो गुडगांव का रहने वाला था और उसका ऐसा कोई काम नहीं था जो उसके आफिस में खुद आये बिना नहीं हो सकता था लेकिन वो आया था, अकेला आया था और जैसे घर से दूर दिल्ली में मौत के आगोश में पहुंचने के लिये ही आया था।
कई बार उसका हाथ उस जेब की ओर गया था जिसमें कि सिग्रेट का पैकेट था लेकिन हर बार ठिठक गया था और वापिस लौट आया था।

पता नहीं वहां सिग्रेट पीना मुनासिब होता या नहीं !
या सिग्रेट सुलगाते ही एस.एच.ओ. का बुलावा आ जाता, जिसके सामने सिग्रेट पीते पेश होना तो यकीनन मुनासिब न होता।
तभी एक हवलदार उससे थोड़ा परे बैठे प्रहलाद सक्सेना के पास पहुंचा और उसने उसे खबर की कि अब एस.एच.ओ. साहब उसे रिसीव करने के लिये फारिग थे।
सक्सेना उठकर खड़ा हुआ और हवलदार के पीछे एस.एच.ओ. के आफिस की ओर बढ़ा। तत्काल रोहित उठकर उन दोनों के पीछे हो लिया।

आफिस के दरवादे पर लगी नेम प्लेट के मुताबिक एस.एच.ओ. का नाम हरिशंकर मीना था
दोनों आगे पीछे भीतर दाखिल हुए।
संजीदा सूरत बनाये एस.एच.ओ. ने उन्हें बैठने का इशारा किया।
दोनों उसके सामने अगल बगल दो कुर्सियों पर बैठ गये।
‘‘आपका नाम प्रह्लाद सक्सेना है’’–एस.एच.ओ. सक्सेना से सम्बोधित हुआ–‘‘महतानी इनवेस्टमेंट्स नामक स्टाक ब्रोकर्स फर्म में आप आफिस इंचार्ज हैं ?’’

‘‘जी हां।’’–सक्सेना बोला।
‘‘अपने दर्दनाक एक्सीडेंट से पहले मरहूम दीनानाथ भारद्वाज आपके आफिस में था ?’’
‘‘जी हां।’’
‘‘क्या हुआ था ? जो आपकी जानकारी में है, बयान कीजिये।’’
‘‘दीनानाथ भारद्वाज की मेरे बॉस और फर्म के मालिक महतानी साहब के साथ अप्वायंटमेंट थी जिस पर वो अकेले हमारे आफिस में पहुँचे थे और मैं समझता हूं कि इतने उम्रदराज शख्स को दिल्ली की भीड़ में अकेले विचरते नहीं होना चाहिए था।’’

‘‘आप क्या समझते हैं ’’–एस.एच.ओ. शुष्क स्वर में बोला–‘‘वो मेरी तफ्तीश का मुद्दा नहीं है; आप क्या जानते हैं, वो बयान कीजिये।’’
‘‘लेकिन मैं जो समझता हूं’’–सक्सेना ने प्रतिवाद किया–‘‘वही तो उनकी मौत की वजह बना ! ठीक से, मजबूती से कदम उठाकर कहां चल पाते थे वो ! ऊपर से शाम के वक्त की करोलबाग की बेतहाशा भी़ड से तो आप नावाकिफ होंगे नहीं !’’
एस.एच.ओ. ने सहमति में सिर हिलाया।
‘‘आप उनके साथ थे ?’’–फिर बोला।

‘‘यही समझ लीजिये।’’
‘‘समझ लूं ?’’
‘‘मैं उनको आटो दिलवाने की नीयत से उनके साथ था जिस पर सवार होकर कि वो कश्मीरी गेट बस अड्डे पर जा सकते जहां से कि उन्हें गुडगांव की बस मिलती। बुजुर्गवार ने ही दरख्वास्त की थी कि मैं आटो स्टैंड तक उनके साथ चलता जबकि आटो उन्हें हमारे आफिस की सीढ़ियां उतरकर सड़क पर कदम रखते ही मिल सकता था।’’
‘‘ऐसा होता तो आपका उनके साथ होना, न होना एक ही बात होती ?’’
‘‘जी हां।’’

‘‘इस वजह से साथ के नाम पर आपने ‘यही समझ लीजिये’ कहा ?’’
‘‘जी हां।’’
‘‘आगे बढ़िये।’’
‘‘वो शाम का वक्त था और बारिश होकर हटी थी, आसमान में काले बादल तब भी थे और बारिश किसी भी वक्त दोबारा शुरू हो सकती थी। इस वजह से माहौल में सूरज की रौशनी नहीं थी और कदरन अंधेरा था... अंधेरा नहीं था तो समझ लीजिये कि धुंधलका सा था...’’
‘‘आप समझाते बहुत हैं।’’

‘‘...बुजुर्गवार बेवजह उतावले हो रहे थे और खामखाह तेज चल रहे थे... समझ लीजिये कि लपक रहे थे, जो कि उनकी उम्र से मैच करती बात नहीं थी।’’
‘‘क्यों लपक रहे थे ? क्यों उतावले हो रहे थे ?’’
‘‘क्या पता ! बारिश फिर शुरू हो जाने का अंदेशा होगा ! घर लौटने की जल्दी होगी ! इस वजह से बस अड्डे पर पहुंचने की जल्दी होगी !’’
‘‘आगे बढ़िये।’’

‘‘बहरहाल मेरे पहलू में, मेरे साथ चलने की जगह वो मेरे से आगे चल रहे थे। मोड़ पर पहुंचकर जब उन्होंने आर्य समाज रोड पर कदम रखा था, तब वो मेरे से दो कदम आगे थे। मैंने उन्हें पुकारकर बोला भी था कि ऐसी हड़बड़ी की कोई जरूरत नहीं थी लेकिन उनकी रफ्तार में कोई फर्क नहीं आया था।’’
‘‘सुना नहीं होगा ?’’
‘‘हो सकता है। ट्रैफिक का शोर तो वहां काफी था। उस घड़ी इत्तफाकन काफी बसें सड़क पर से आ जा रही थीं जिनका शोर सबसे ज्यादा था। कोई बड़ी बात नहीं कि उस शोर में उन्होंने मेरी आवाज न सुनी हो। ऊपर से उनकी उम्र ! पता नहीं पूरा सुनाई भी देता था या नहीं !’’
‘‘ठीक।’’

‘‘फिर उन्होंने सड़क पार करने के इरादे से पटड़ी से नीचे सड़क पर कदम रखा और...’’
‘‘और क्या ?’’
‘‘लड़खड़ा गये।’’
‘‘वजह ?’’
‘‘मालूम नहीं।’’
‘‘ठोकर खायी ?’’

‘‘जनाब, बोला न, मालूम नहीं। ठोकर खायी या बूढ़ी टांगें धोखा दे गयीं, मुझे नहीं मालूम। एक रिफ्लेक्स एक्शन के तौर पर अपने आप ही मेरी बांह उन्हें सम्भालने को लपकी लेकिन तब तक वो अपने लड़खड़ाते जिस्म के वेग से सड़क पर पहुंच गये और उसी घड़ी तेज रफ्तार से गुजरती एक बस की चपेट में आ गये। खतम ! पलक झपकते सब हो गया।’’
‘‘गिरने से पहले वो–उनके जिस्म का कोई हिस्सा–आपकी पकड़ में न आये ?’’
‘‘न।’’

‘‘पकड़ न बनी या पकड़ में न आये ?’’
‘‘मेरे खयाल से पकड़ न बनी।’’
‘‘खयाल से क्यों ? ऐसी बात तो आप को यकीन से कहनी चाहिये।’’
‘‘समझ लीजिये पकड़ न बनी।’’
‘‘यकीन से आपने अभी भी नहीं कहा।’’
‘‘पकड़ नहीं बनी थी।’’

‘‘छू तो पाये होंगे ? हाथ जाके उनके जिस्म से कहीं टकराया तो होगा ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘पक्की बात ?’’
‘‘क्या कहना चाहते हैं ?’’
‘‘कहना नहीं, सुनना चाहता हूँ। जवाब दीजिए।’’
‘‘आप कहीं ये तो नहीं कहना चाहते’’–एकाएक सक्सेना का स्वर तीखा हो उठा–‘‘कि उस एक्सीडेंट में मेरा कोई हाथ था ?’’

‘‘आप बताइये ?’’
‘‘आगर आप समझते हैं कि मेरे हाथ बढ़ाकर उन्हें थामने की कोशिश ने उनका बैलेंस बिगाड़ दिया था तो गलत समझते हैं। जब वो गिरे थे, उस घड़ी मैं उनसे कम से कम नहीं तो एक गज दूर था।’’

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