मुक्ति-संघर्ष - रामकुमार भ्रमर Mukti-Sangharsh - Hindi book by - Ramkumar Bhramar
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मुक्ति-संघर्ष

रामकुमार भ्रमर

प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :249
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7200
आईएसबीएन :978-81-216-1360

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संपूर्ण श्रीकृष्ण कथा का तीसरा खण्ड मुक्ति-संघर्ष...

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्रीकृष्ण-कथा पर आधारित 5 खण्डों में यह एक ऐसी उपन्यास-माला है, जो पाठकों का भरपूर मनोरंजन तो करती ही है, साथ ही सभी को श्रृद्धा के भाव जगत में ले जाकर खड़ा कर देती है।
इन सभी उपन्यासों में लेखक ने श्रीकृष्ण के जीवन में आए तमाम लोगों का सजीव मानवीय चित्रण किया है तथा अनेक नए चौंकाने वाले तथ्य भी खोजे हैं। इस गाथा में श्रीकृष्ण का जीवंत चरित्र उद्घाटित होता है।
इस श्रृंखला के प्रत्येक खण्ड में 2 उपन्यास दिए गए हैं, जो समूची जीवन-कथा के 10 महत्वपूर्ण पड़ावों को मार्मिक ढंग से रेखांकित करते हैं।

पांचवें खण्ड ‘कालयवन’ में गर्ग ऋषि और गोपाली अप्सरा से जन्मे तथा कालनेमि द्वारा संरक्षित महाबलशाली कालयवन की यह कथा उस ओर संकेत करती है, जहां वह आर्य रक्त होते हुए भी आर्यों के विरुद्घ उठ खड़ा होता है, जबकि छठे खण्ड ‘जनाधार’ में जरासंध के क्रूर आक्रमण से बचाने के लिए श्रीकृष्ण का जनाधारित रणकौशल और यादवों को संगठित करने की रोमांचक कथा का वर्णन है।

कालयवन


दिन-रात का हर प्रहर एक प्रश्न बन गया है, फिर प्रश्नों की एक श्रृंखला। एक ही बार में कितने प्रश्न जनम आए हैं। एक घटना और असंख्य प्रश्न !
कंसवध कुछ-कुछ ऐसी ही घटना है। उद्धव ही नहीं, सभी समझे थे कि एक क्रूर कष्टदायी अध्याय का संघीय जीवन से अन्त हुआ, पर लगता है कि भूल हुई। इस अंत ने कितने ही अंतहीन प्रश्नों का एक समुद्र बिछा दिया है समूचे जनपद क्षेत्र में। भोर होती है, तो आशंका की उदासियों से भरी हुई, दोपहर का सन्नाटा रहस्य की अजानी भूलभुलैयों का अदृश्य जाल और रात का अंधकार रहस्य की आशंकापूर्ण अंधगुफा !

कृष्ण हों या बलभद्र, वसुदेव हों या देवकी, महाराज उग्रसेन हों या श्वफलक सभी एक साथ यही कुछ झेल रहे हैं। दूर-सुदूर जनपद में असंख्य चर्चाएं बिखरी हुई हैं। आगत भय की नाश कल्पना ने जन-मानस को उन अंकुरों की तरह कर दिया है, जो जनमते हैं, पर रुग्ण ! मृत्यु का निश्चित भवितव्य चेहरों पर लिखे हुए।
उद्धव भी यही कुछ अनुभव करते हैं, जैसे-जैसे अनुभव करते हैं, अशांत होते जाते हैं। यह अशांति अनेक बार व्यग्रता में चिढ़ और खीझ बन गई है। कभी-कभी उत्तेजित, असंबद्घ बातें भी कर बैठते हैं।

न सुनने वाला आश्चर्य व्यक्त करता है, न कहने वाला। जब सभी एक ज्वालामुखी के मुख पर बैठे हुए हों, तो भला किसे इस सब पर विचारने का अवसर होगा !... और ज्वालामुखी, मगधराज जरासन्ध ! विचारों की क्रूरता और राजशक्ति के घातक दंभ का अनोखा सम्मिश्रण। लगता है कि मृत्यु और नाश के बीच विचित्र-सा समझौता हुआ है। इस समझौते का लक्ष्य मथुरा का यादव गणसंघ।

यादव गणसंघ या बालक श्रीकृष्ण और बलभद्र ? उद्धव ने अनेक बार सोचा है। सूचनाएं भी यही मिली हैं और पिछले निरंतर आक्रमणों से क्षीण होती जाती मथुरा की यादव शक्ति भी समझ गई है। कृष्ण-बलभद्र भगधपति के लिए मथुरा से कहीं अधिक उत्तेजक हैं, बल्कि जरासन्ध को केवल उन्हीं से शत्रुता है। मथुरा की शक्ति-संपन्नता उसका वांछित नहीं।
एक बार राजमार्ग से निकलते हुए दो सैनिकों की वार्ता सुनी थी उद्घव ने। उद्धव की ओर से अनजान वह बातें किए जा रहे थे। एक बोला था, ‘‘मगधराज स्पष्टतः भले न कह रहे हों, किंतु वह वासुदेव और बलभद्र का वध ही करना चाहते हैं। हम साधारण व्यक्तियों या मथुरा की जनता से उन्हें तनिक भी रोष नहीं है।’’

‘‘हां, किंतु क्या हम मथुरावासी यह होने देंगें ?’’ दूसरे सैनिक का उत्तर था, ‘‘श्रीकृष्ण हमारे उद्धारक हैं। क्या हम इतने कायर हो चुके हैं कि उन्मत्त जरासन्ध के घिनौने वांछित को पूरा होने दें ? अपने ही मुक्ति-दाता को भला कौन होगा, जो एक हत्यारे को सौंप दें ? फिर यह यादव गणसंघ के अस्तित्व का प्रश्न है भाई। संपूर्ण गरिमा और नैतिकता की कसौटी भी है।’’
‘‘सो तो है।’’ पहले ने गहरा, विवश श्वास लिया था, फिर बात पूरी की, ‘‘किंतु मगधराज जिस तरह निरंतर मथुरा पर आक्रमण किए जा रहे हैं, उन्होंने अब इसे इतना शक्तिहीन कर छोड़ा है, जब हम प्रतिरोध भी नहीं कर सकेंगे, उस समय क्या होगा। यही सोचकर चिंतिति हूं, भाई !’’

‘‘वह सब हमारे लिए चिंतनीय नहीं’’, दूसरे सैनिक ने साहस संजोकर उत्तर दे दिया था, ‘‘वह सब देवकीसुत को ही विचारने दो और यह मत भूलो कि मदांध जरासन्ध अपनी विशाल सैन्य शक्ति के होते हुए भी पिछले अनेक आक्रमणों में मथुरा को जय नहीं कर सका।’’

उद्धव ने सुना। सिर उसी तरह झुकाए आगे बढ़ गए, इस तरह की उन सैनिकों का उनकी ओर ध्यान न जा सके, पर लगता था कि मन में एक ज्वार बटोर लाए हैं, प्रश्नोत्तर के दोहरे किनारों से मानस की लहरों का सिर पीटता ज्वार।
मन हुआ था कि मूर्खतापूर्ण वार्ता के उन शब्दों को माथे से उलीच डालें, किंतु हो नहीं पाया। सोचने लगे थे कि क्या वह पहला सैनिक ठीक कह रहा था ? क्या जरासन्ध का अभीष्ट अब केवल वैयक्तिक शत्रु भाव ही रह गया है ? केवल श्रीकृष्ण और बलराम का अंत ? या वह समूचे शूरसेन जनपद को ही अपने जामाता वध का सबक देना चाहता है ? दण्डित कर देना चाहता है सभी को ?

उत्तर नहीं मिला या यों कि उत्तर खोज ही नहीं सके। इतना सहज तो नहीं था उत्तर पा जाना ?
इच्छा हुई थी कि श्रीकृष्ण तक पहुंचकर सब कुछ सुना दें। सामान्य-जन क्या सोचते-समझते हैं !... और उनका अपना विचार क्या है ? जरासन्ध के क्रूरतापूर्ण रुख की धरती क्या है ? श्रीकृष्ण-बलराम से बैरभाव या मथुरा का ही संपूर्ण नाश !
न चाहते हुए भी देवकीसुत के निवास की ओर बढ़ चले। मन अकुलाहट और संकोच में डूबा हुआ था। किस तरह और किन शब्दों में प्रश्न करेंगें उनसे ? मित्रभाव की भी सीमाएं होती हैं। उस स्थिति में तो यह भाव अधिक ही सीमित हो जाता है, जब मित्र नीति के आसन पर बैठा हो। मित्रता की सरलता सहसा नीति के जटिल गलियारों में खो जाया करती है।
इन गलियारों को लांघना आसान नहीं।

किंतु एक के बाद एक गलियारे लांघते हुए वे देवकीसुत के कक्ष तक जा पहुंचे। द्वारपाल ने सूचना दी थी, ‘‘यशोदापुत्र, उद्यान में हैं श्रीमान् !’’
उद्यान में पहुंचे। ठिठककर देखते रह गए। ऐसे जैसे अविश्वसनीय घट रहा हो उनके सामने ? श्रीकृष्ण और उतने शांत-गंभीर!

सांझ पीले, सलज्ज सरसों के फूलों जैसी आभा बिखराती धरती पर बरस रही थी। जैसे वायु के झोंको से फसलों में धरती की ओर झुकाव जनमता है, वैसे ही आकाश से धुंधलका उतर रहा था, बहुत धीमे-धीमे और श्रीकृष्ण उसी ओर देखते हुए। ऐसे जैसे धुंधलके को चीरकर आगत का सूर्य देख रहे हों। सब प्रकाशित ! सब स्पष्ट ! संपूर्ण भविष्य !
इस भविष्य में क्या-क्या होगा, उद्धव नहीं जानते, किंतु कृष्ण से अजाना कुछ नहीं। एक तरह अजाने का नाम ही कृष्ण है। अनायास ही स्मरण हो आया था उद्धव को अब से कई माह पूर्व, अपितु बरस हुए, कंस-वध के तुरंत बाद हुई जन-प्रसन्नता को श्रीकृष्ण ने दूर-दूरागत भविष्य तक देख-परख लिया था। न देखा होता, तो क्या यह मथुरा ऐसी ही होती ? शूरसेन जनपद इतना ही सहज, शांत दीख रहा होता ?

नहीं।
उद्धव ने मन से शरीर तक एक अज्ञात कंपन अनुभव किया। इस कंपन के साथ ही वह संपूर्ण स्मरण हो आया, जो कंस-वध के तुरंत बाद घटा था। अब तक किसी-न-किसी रूप में घटता ही चला जा रहा था और कृष्ण ने उसी क्षण आगत में आने वाले समय को देख-समझ लिया था। अंतर्यामी ! केवल अंतर्यामी ही नहीं, सर्वव्यापी श्रीकृष्ण !

निस्संदेह सर्वव्यापी। सर्वव्यापी न होते, तो उस उत्साह, हर्षोल्लास के महोत्सव में भविष्य का क्रूर, कष्टदायी रूप कैसे देख पाते ? जरासन्ध से लेकर मगध के सामान्य जन तक कंस-वध की क्या प्रतिक्रिया होगी और फिर उस प्रतिक्रिया के क्या परिणाम निकलेंगे ? उसी क्षण कैसे वर्णित कर देते ? उद्धव के सामने वही क्षण स्मरण हो आया है। उस दिन भी उद्धव ने इसी तरह एकांत में शांत, किंतु गंभीर खड़े विचारमग्न देखा था श्रीकृष्ण को।
कृष्ण की वह मुद्रा, मथुरा का संपूर्ण वातावरण, हर्षोल्लास की वह गुंजन अब भी उद्धव के मन-मस्तिष्क में बसे हुए हैं। दृश्य-चित्र की भांति, स्वर वायु की लहरों जैसे और विचार उस क्षण के हर सत्य से जुड़े हुए। अनजाने ही ठिठके हुए उद्धव के शरीर में एक हलचल हुई और फिर वह संपूर्ण स्मरण आने लगा।

कंस वध !

विचित्र प्रतिक्रिया हुई थी उस घटना की। असंख्य दृष्टियां विस्मित देखतीं रह गई थीं। जिन्होंने सुना था, वे अवाक् हो गए थे। जो बालक कृष्ण-बलराम को लेकर चिंतित और व्यग्र थे, विक्षिप्तों की भांति सहसा हंस पड़े थे।
यह सब होना था, अतः हुआ। कैसे न होता ? कंस जैसे महाशक्तिशाली और निरंकुश राजा का वध एक बालक के हाथों होगा, कौन कल्पना कर सकता था ? अतः विस्मय स्वाभाविक था। अवाक् रह गए लोगों की प्रतिक्रिया भी सहज थी। वहां जैसे असंभव, संभव के रूप में सुना गया था। निःशब्द हो जाना स्वाभाविक। कंस और कृष्ण की शक्ति का संतुलन करते हुए व्यग्र स्त्री-पुरुषों का सारा अनुमान गड़बड़ा गया। इस गड़बड़ाहट ने ही विक्षिप्तता से भर दिया मस्तिष्क। विश्वास और अविश्वास के बीच केवल हंसी निकल सकी।

और फिर वर्षा की पहली फुहार जिस तरह दग्ध शरीरों को शांति और उल्लास से भर देती है, वैसे ही कंस के समाचार ने नगर, ग्राम, दूर-सुदूर जनांचलों में प्रतिक्रिया की। संपूर्ण गणसंघ हर्षोन्मत्त होकर उल्लासोत्सव मनाने जुट गया।
प्रसन्नता, आनंद और सुख बहुरंगी फुलझड़ियों जैसे समस्त जनांचल पर फैल गए थे, किंतु सर्वाधिक चिंतित और व्यग्र एकमात्र व्यक्ति, श्रीकृष्ण !
उद्धव चकित हो रहे थे, ऐसा क्यों ?

किशोरायु वासुदेव की वंदना में वृष्णि, अंधक और यादववंशी आ जुटे थे। यहां तक कि मथुरा गणसंघ में व्यवसाय हेतु आ बसे विदेसी असुर भी। कोई दृष्टि में श्रद्धा और आभार की असंख्य किरणें भरकर आया था, कोई झुके सिर प्रणाम की अंजुलि भरे हुए। किसी असुर व्यापारी ने नई शासन-व्यवस्था और शक्ति की आराधना करते हुए कृपाप्राप्ति के लिए विविध भेटें प्रस्तुत कीं, किसी ने केवल दृष्टि में श्रद्धाश्रु जुटाए हुए वंदन किया।
किंतु कृष्ण प्रतिक्रियाहीन। उद्धव ने स्पष्ट देखा था, गोपाल के मुख पर जो सरल-निश्चल मुसकान उभरी हुई थी, वह कलात्मक। ऐसे जैसे किसी चित्रकार ने सजीव चित्र मढ़ दिया है।

बीच-बीच में वह ऐसे सभी लोगों के लिए आश्वस्ति के स्वर भी उड़ेलते पर उद्घव को अनुभव होता था, जैसे वे शब्द श्रीकृष्ण किसी पाठ की तरह बोल रहे हैं, ऐसा क्यों ? किस कारण ? उनके भीतर क्या घट रहा होगा ? उद्धव के अंतर में प्रश्नों का एक कुण्ड उभर आया था, फिर इस कुण्ड में प्रश्न पूछने, जानने की जिज्ञासा लहरों की तरह अन्तस् के किनारों से टकराने लगी।


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