उत्तर-दक्षिण - रामकुमार भ्रमर Uttar-Dakshin - Hindi book by - Ramkumar Bhramar
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उत्तर-दक्षिण

रामकुमार भ्रमर

प्रकाशक : हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :281
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7201
आईएसबीएन :978-81-216-1361

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संपूर्ण श्रीकृष्ण कथा का चौथा खण्ड उत्तर-दक्षिण...

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्रीकृष्ण-कथा पर आधारित 5 खण्डों में यह एक ऐसी उपन्यास-माला है, जो पाठकों का भरपूर मनोरंजन तो करती ही है, साथ ही सभी को श्रद्घा के भाव जगत में ले जाकर खड़ा कर देती है।
इन सभी उपन्यासों में लेखक ने श्रीकृष्ण के जीवन में आए तमाम लोगों का सजीव मानवीय चित्रण किया है तथा अनेक नए चौंकाने वाले तथ्य भी खोजे हैं। इस गाथा में श्रीकृष्ण का जीवंत चरित्र उद्घाटित होता है।
इस श्रृंखला के प्रत्येक खण्ड में 2 उपन्यास दिए गए हैं, जो समूची जीवन-कथा के 10 महत्वपूर्ण पड़ावों को मार्मिक ढंग से रेखांकित करते हैं।

सातवें खण्ड ‘जनपथ पर’ में समस्त मथुरावासियों की रेगिस्तान के रास्ते से होते हुए द्वारका की ओर प्रस्थान करने की भयानक कष्टकारी यात्रा का मार्मिक चित्रण है, जबकि आठवें खण्ड ‘जलयात्रा में श्रीकृष्ण सम्पूर्ण शक्तियों को विकसित कर ईश्वरत्व की ओर बढते हैं और समूचे भरत खण्ड के मुक्तिदाता बन जाते हैं एक पराक्रमी तथा नीतिज्ञ होने की पराकाष्टा सामने आती है।

जनपथ पर


सात्यकि ने अपने रथ से उतरकर एक बार महायात्रा पर जा रहे विशाल जन-समूह पर दृष्टि दौड़ायी।
कहां, क्या हो रहा है ? कहीं गति में अवरोध तो नहीं है ? वे सब ठीक तरह तो हैं ? और उनके किसी झुंड, परिवार या समुदाय में किसी प्रकार का झगड़ा तो नहीं हुआ है ?
पहली दृष्टि में लगा था कि सब कुछ ठीक है। वे पंक्तिबद्ध हो चुके थे। जब मथुरा से चले तब भीड़ लग रहे थे। एक अनियंत्रित, असंयोजित अस्त-व्यस्त भीड़। कहीं शोर हो रहा था, कहीं श्रीकृष्ण के नाम पर टिप्पणियां हो रही थीं। कोई स्त्री अपने वर्तमान के सत्य की कटुता को असह्य समझकर रो पड़ी थी। किसी वृद्ध ने घर की देहरी थामकर उनके साथ जाने से इनकार कर दिया था। किसी युवती ने सद्यःजात शिशु को लेकर बहुविध चिन्ता प्रकट करनी प्रारंभ कर दी थी। किसी परिवार के वृद्ध, प्रौढ़, युवक सभी किसी यादव सेनानायक को घेरकर खड़े हो गए थे। वे पूछ रहे थे कि उनके साथ जा रही उस महिला का क्या होगा, जो गर्भावस्था के अन्तिम दिनों में है ?

घंटों तक शोर, प्रश्न और तर्क-वितर्क होते रहे। कभी सात्यकि उन्हें आश्वासन देते, किसी बार अक्रूर और अनेक बार वे परस्पर ही तर्क-विर्तक कर उठते। सबसे बड़ा प्रश्न था कि वे कहां जा रहें ?
और जहां जा रहे हैं, वहां क्या करेंगे ? क्या खाएंगे ? क्या होगा उनका व्यवसाय ?

छोटे-छोटे शिशु थे। अनेक अभी अपनी माताओं की गोद में ही थे। अनेक यदि चार-छः साल की आयु में पहुँच गए थे, तो भी माता या पिता का सहारा लिए खड़े थे। विचित्र दृश्य था। उससे भी विचित्र थीं उनकी समस्याएं। और सबसे दुविधाजनक स्थिति थी उन यादव प्रमुखों की, जिन पर श्रीकृष्ण ने उन सभी सो सौराष्ट्र क्षेत्र तक पहुंचाने का दायित्व सौंपा था। कहा था, ‘‘वह स्थान मेरा, बलभद्र का और वसुहोम का देखा हुआ है। भगवान् परशुराम ने हम सबके लिए उसी को उपयुक्त और श्रेष्ठ बतलाया है। वहां की धरती अन्नपूर्णा है। जल स्वास्थ्यकर है और प्राकृतिक सम्पदा की भी वहां कमी नहीं है। हम सब वहीं रहेंगे। इस समय प्राणरक्षा के लिए आप लोग मथुरावासियों को लेकर आगे चलें। उचित समय पर मैं भी भइया बलभद्र और उद्धव सहित आ पहुंचूंगा।’’

वे चल पड़े थे। अनेक दिनों के विचार-विमर्श के पश्चात् निर्णय हुआ था। यादव गणसंघ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय था वह। सर्वाधिक कष्टदायी और उससे भी अधिक जोखिम-भरा, पर इसके अतिरिक्त कोई राह शेष नहीं रही थी। जरासन्ध से हुई शत्रुता यादव प्रमुखों में परस्पर भी कलहकारी होती जा रही थी। जिन अंधक, वृष्णि और भोजवंशियों को श्रीकृष्ण ने कठिनाई से जुटाकर एकमत किया था, अब वही सब बौखलाहट की स्थिति में परस्पर दोषारोपण करने लगे थे। सर्वाधिक दोष दिया जा रहा था श्रीकृष्ण को। बालक बुद्धि के हाथों खेल गए। शतक की आयु सीमा छूने वाले भी कैसी मूर्खता कर बैठे ! महाशक्ति सम्पन्न जरासन्ध को केवल राजनीतिक शत्रु ही नहीं बनाया, विनाश के लिए आमंत्रित कर डाला।
फिर वह राज-असंतोष और बिखराव सामान्य जन तक पहुँचा। इस बिखराव की सूचना के साथ थीं टिप्पणियां। विभिन्न व्यक्तियों के विभिन्न समर्थक टोलियों में बंटने लगे। एक अंधकवंशी उग्रसेन और देवक के पक्षधर थे, दूसरे वृष्णिवंशी अक्रूर के, तीसरे सत्यक आदि के। कुल मिलाकर लगने लगा था एक स्थिति आ पहुंचेगी, जब वे कलह से आगे बढ़कर परस्पर ही युद्ध कर बैठेंगे, नष्ट हो जाएंगे।

सात्यकि को स्मरण है, श्रीकृष्ण ने इस स्थिति को पूरी तरह समझ लिया था कि जरासन्ध इस ओर पुनः आ पहुंचे, इसके पूर्व ही मथुरा से पलायन कर देना सभी यादवों के लिए शुभकर होगा। जीवन-रक्षा का एकमात्र उपाय।
और इस उपाय को लेकर भी परस्पर बहुत तर्क-वितर्क हुए। उग्रसेन के नेतृत्व में हुई यादव-प्रमुखों की सभा में बड़ी उत्तेजना रही और अंत में श्रीकृष्ण ने इस उत्तेजना को शांत कर दिया था, यह कहकर कि जरासन्ध की समूची शत्रुता के केन्द्र वह स्वयं और करसंकर्षण होते हैं। अतः अन्य यादवों को जरासन्ध से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। वे अपने जीवन मूल्य पर यादव जाति का शुभ करेंगे।

सो कैसे ? और फिर उन्होंने कैसे, किस तरह होगा, यह सूचित कर दिया था उन्हें। देवक चिन्तित हुए। सात्यकि बहुत विश्वास और नेह रखते कृष्ण पर। उन्हें भी पीड़ा पहुंची। लगा था कि अपने ही त्राता को मृत्यु-मुख में धकेलकर सब अपना जीवन बचाने का सौदा कर रहे हैं मगधपति से।
कुछ ने कह भी दिया था, ‘‘नहीं-नहीं, वासुदेव, यह उचित नहीं।’’
श्रीकृष्ण ने कहा था, ‘‘यह उचित है और केवल यही एक मार्ग शेष है, जिससे मथुरा के निर्दोष जन-जन की जीवन रक्षा की जा सकती है।’’

बहुतों ने बहुत कुछ कहा। श्रीकृष्ण समर्थक श्रीकृष्ण विरोधियों को कायर, स्वार्थी, निम्न तक कह बैठे, किन्तु श्रीकृष्ण ने ही उन सबको शांत किया। बोले, ‘‘वैसा कुछ भी विचारणीय नहीं है और न ऐसी कोई स्थिति है। इस समय केवल यह सोचना है कि गणसंघ के जिन नागरिकों ने हम सभी को नेतृत्व सौंपा है, उनका शुभ किस में है ?’’
वे सब शांत हुए।
श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण योजना रख दी थी। कहा था, ‘‘ऐसी व्यवस्था हो चुकी है कि मगध राज तक विश्वस्त सूचना पहुंच जाएगी, मथुरावासियों के साथ श्रीकृष्ण और बलराम नहीं हैं।’’
‘‘उससे क्या अंतर पड़ेगा ?’’ सात्यकि ने ही पूछा था।

‘‘बहुत अंतर पड़ेगा, सात्यकि... बहुत अंतर पड़ेगा !’’ श्रीकृष्ण बोले थे। सदा की तरह निश्चिन्त मुस्कान थी उनके अधरों पर। उससे कहीं अधिक आश्वस्ति। कहा था, ‘‘जरासन्ध और उसकी सहायता के लिए दक्षिण दिशा से चला आ रहा कालयवन श्रीकृष्ण के पीछे होंगे।’’
‘‘पर आपका क्या होगा, वासुदेव ?’’
‘‘कुछ नहीं होगा।’’ कृष्ण ने कहा था, ‘‘न तो जरासन्ध हमें पा सकेगा, न ही कालयवन। यदि पा भी गए तो हमारी मृत्यु उनके हाथ से नहीं है। आप सब लोग निश्चिन्त हों।’’

किन्तु श्रीकृष्ण के कह देने-भर से तो कोई निश्चिन्त नहीं हो सकता ? न ही वे हो सके थे। केवल इतना हुआ था उस क्षण कि श्रीकृष्ण-विरोधी सहसा शांत हो गए। शांत हुए थे या निरुत्तर ?... या कि लज्जित हो गए थे अपने ही कहे शब्दों पर, सात्यकि नहीं जानते। केवल इतना जानते हैं कि उनके सिर झुक गए थे। निर्णय सर्वमान्य हुआ।
और फिर निर्णय कार्य रूप में परिणत किया गया। मथुरा में घर-घर, व्यक्ति-व्यक्ति तक सूचना भेजी गई थी, ‘‘तुरंत आवश्यकता का सामान लेकर एक लम्बी यात्रा के लिए सभी तैयार हो जाएं, सपरिवार। पशुधन एवं बहुमूल्य सामग्री भी साथ लेना न छोड़ें।’’
महायात्रा !... पर किस ओर !... किस कारण !

यादव प्रमुखों की ओर से एक ही उत्तर दिया गया था जन–साधारण को, ‘‘यह सब विचारणीय नहीं है। विचारणीय है जीवन-रक्षा। जरासन्ध शीघ्र ही आक्रमण करेगा और उसका पहला धक्का सहने का सामर्थ्य भी अब मथुरावासियों में नहीं रहा है।
विचित्र-सी आपाधापी और हड़बड़ी फैल गई सम्पूर्ण महानगर में। वह दिन, रात्रि और यात्रा की तैयारी का हर क्षण स्मरण है सात्यकि को। किस तरह बदहवासी और भयग्रस्तता में दौड़ रहे थे स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध, सभी नर-नारी। और फिर वह क्षण आ पहुंचा था, जब वे सभी अपने-अपने साजोसामान, बहुमूल्य वस्त्र, आभूषणों के अतिरिक्त पशु-पक्षियों को बटोरे हुए मथुरा की राजसीमा से बाहर मुख्यद्वार पर आ पहुंचे थे।
एक प्रहर तक यही सब चला। कुछ समय लग गया था उन्हें मथुरा के मोह-त्याग में और उससे अधिक समय परस्पर पीड़ा व्यक्त करते हुए।

सात्यकि को वह हर क्षण स्मरण है। श्रीकृष्ण जा चुके थे और वे सब खड़े थे जाने के लिए।
महायात्रा चल रही थी। चलते-चलते कितना समय बीत गया था, स्मरण नहीं। प्रारंभ में प्रहर, दिन, रात्रि गिने थे उन्होंने फिर गिनती छोड़ दी या कि वह गिनती आवश्यक ही नहीं रही ?
संभवतः गिनती का अर्थ नहीं रहा था। अर्थयुक्त हो गया था उनका यात्रा-पथ। पथ की कठिनाइयां। कठिनाइयों से बचाव, बचाव की योजनाएं, योजनाओं से जनमी दुविधाएं। और दुविधाओं से उपजा भय।

और इस भय के बीच वे सब थे पंक्तिबद्ध। सात्यकि को स्मरण है, जिस क्षण मथुरा की सीमा छोड़ी, पंक्तिबद्ध नहीं थे। जिसे जहां जिस ओर से राह मिल रही थी, वहां से आगे बढ़ने का प्रयत्न कर रहा था विचित्र गति थी उनकी। बालक, वृद्ध, युवा सभी तीव्र गति से बढ़े जा रहे थे। यमुना तट पर सभी रुक गए थे। सभी के पास साथ ले जाने के लिए जलपात्र थे। सैकड़ों वाहनों के अतिरिक्त पचासों रथों में विशालाकार पात्र भी रखे हुए थे। अपनी-अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार इस महायात्रा के सहभागी बने हुए थे सब। सबने अपने-अपने पात्र भरे, कुछ जल पिया फिर यमुना की निर्मल जलधारा को देखा, इस जलधारा के प्रति केवल मोह नहीं था उनके मन में श्रद्धा थी।

इस जलधारा ने क्या कुछ नहीं दिया था उन्हें ? धन-धान्य से सम्पूर्ण किया था। जीवन-शक्ति प्रदान की थी। पीढ़ियों को माता की तरह दुग्धवत जलपान कराया था। शरीर की नस-नस में यही जलधारा रक्त बनकर बह रही थी। जिस कोख से जन्मे थे सब, उससे कहीं अधिक इस जलमयी यमुना की कोख ने उनका पालन किया था, पर वे सब बिछुड़ रहे थे उससे। बिछड़कर कितनी दूर चले जाएंगे यह भी ज्ञात न था। जिन्हें ज्ञात था वे जानते थे कि अब इस जलधारा से उनकी आने वाली असंख्य पीढ़ियों का कोई सम्बन्ध नहीं रह जाएगा।


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