कौआ कान ले गया - विवेक रंजन श्रीवास्तव Kaua Kan Le Gaya - Hindi book by - Vivek Ranjan Srivastava
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कौआ कान ले गया

विवेक रंजन श्रीवास्तव

प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7236
आईएसबीएन :81-88796-184-5

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व्यंग्य लेखों का अनुपम संग्रह ‘कौआ कान ले गया’...

Kaua Kan Le Gaya - A Hindi Book - by Vivek Ranjan Srivastava

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आत्म कथ्य

हम तो बोलेंगे ही, सुनो ना सुनो, यह बयान किसी कवि सम्मेलन पर नहीं है ना ही यह संसद की कार्यवाही का वृतांत है। यह सीधी सी बात है, मेरे जैसे कलम के साधकों की जो लगातार लिख रहे हैं, अपना श्रम, समय, शक्ति लगाकर अपने ही व्यय पर किताबों की शक्ल में छापकर ‘सच’ को बाँट रहे हैं। कोई सुने, पढ़े ना पढ़े, हमारे अंदर का रचनाकार अभिव्यक्ति को विवश है। इस विवशता में पीड़ा है, अंतर्द्वद है, समाज की विषमता, दोगलेपन पर प्रहार है। परिवेश के अनुभवों से जन्मी यह रचना प्रक्रिया एक निरंतर कर्म है। मेरे व्यंग्य लेख लगातार विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, इंटरनेट पर ब्लाग्स में प्रकाशित होते है, देश विदेश से पाठकों के, समीक्षकों के पत्र प्रतिक्रियायें मिलती हैं, तो लगता है, कोई तो है, जो सुन रहा है। कहीं तो अनुगूंज है। इससे लेखन कर्म को ऊर्जा मिलती है। समय-समय पर छपे अनेक लेखों के पिछले व्यंग्य संग्रह ‘रामभरोसे’ को व्यापक प्रतिसाद मिला। उसे अखिल भारतीय दिव्य अलंकरण भी मिला। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये हाल के व्यंग्य लेखों का यह संग्रह ‘कौआ कान ले गया’ के रूप में सौंपते हुये, आशा करता हूं, पाठकों को ये लेख पसंद आयेंगे। ये लेख कुछ मनोरंजन, कुछ वैचारिक सत्य है। आपको सोचने पर विवश कर सकें, तो मैं मान लूंगा कि मेरा कहा सुन लिया गया।

मैं इस कृति को पुस्तकाकार प्रस्तुत करने हेतु मेरे पूज्य पिता प्रो. सी. बी. श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जो स्वयं अनेक ग्रंथों के लेखक, शिक्षाविद्, अर्थशास्त्री, विचारक एवं समाज सेवी है, के आदेश का पालन कर रहा हूं, क्योंकि पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में लेखकीय शोषण, पाठकहीनता, एवं पुस्तकों की बिक्री की जो वर्तमान स्थितियां है, वे हम सबसे छिपी नहीं है, पर समय रचनाकारों के इस सारस्वत यज्ञ का मूल्यांकन करेगा, इसी आशा के साथ, प्रस्तुत है, ‘कौआ कान ले गया।’

अनुक्रम



१. हम तो बोलेंगे ही, सुनो न सुनो - विवेक रंजन
२. सुखद है उनका इस धर्म में दीक्षित होना - हरि जोशी
३. शैली विशिष्ट के व्यंग्य - संतोष खर
४. मोबाइल प्लान की प्लानिंग
५. दो दो किडनी रखने की लक्जरी क्यों ?
६. रेल्वे फाटक के उस पार
७. पिछड़े हुए होने का सुख
८. अरे एक रोटी और लीजिए ना !
९. आज कितनी बार मरे !
१॰. किसकी बोली कितनी
११. वर्चुएली रईस.......।
१२. कम्प्यूटर पीड़ित
१३. दूध वाले की गली में इंवेस्टर
१४. भगवान कृष्ण का अपहरण
१५. हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और
१६. आइये आत्म कथा लिखें।
१७. कौआ कान ले गया
१८. सरकारी मंदिर
१९. महापुरुष का निर्माण
२॰. अंधेरा कायम रहे !
२१. सूचना का अधिकार बनाम पार्दर्शी सरकार
२२. चिट्ठी आई है।
२३. संज्ञा के सर्वनाम
२४. ये मुऐ स्टिंग आपरेशन वाले।
२५. माननीय सदस्य जी।
२६. खेलेंगे या खेल बिगाड़ेंगे
२७. फंदा उल्टा-बंदा सीधा
२८. आश्वासन की आक्सीजन
२९. डिमांड है क्लीन चिट की
३॰. गांधीगिरी से निपटने के नुस्खे
३१. एक सरकिट की दरकार है सबको
३२. सब कुछ ठेके पर
३३. इस्तीफे की वैतरणी
३४. परदे में रहने दो
३५. घोषणा पत्र की महिमा
३६. चार पैसे की चवन्नी रह गई !
३७. मीटिंग जारी है
३८. मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो !
३९. एक बम मेरे घर
४॰. जादू तेरी नजर


सुखद है उनका इस धर्म में दीक्षित होना

व्यंग्य कर्म, एक ऐसा धर्म है, जिसकी पगडंडी पर चलता हुआ, अकेला पथिक, समाज में व्याप्त जंगल राज को ललकार सकता है। स्पष्ट है जब वह अवांछित कार्यकलापों का मखौल उड़ायेगा तो स्वयं उसे श्रेष्ठतर बनना होगा। विवेक रंजन में मैं उसी भावी प्रेरक व्यक्तित्व की संभावनाएं देख रहा हूं। इस धर्म में दीक्षित होने के लिए मैं उनका स्वागत करता हूँ। जब इस रास्ते पर नया यात्री पदन्यास करता है तब अनेक शंका कुशंकाएं उसे घेरती हैं। कितनी दूर तक चल पायेगा ? क्या इस मार्ग पर चलना सार्थक रहेगा ? क्या वह सुगमता से चल भी पायेगा ? आदि आदि।

यह भी सच है यह रास्ता कंटकाकीर्ण है। न तो छोटा है, न ही सुखकर। बस चलना है और चलते जाना है। जंगल राज के विरुद्ध विचार व्यक्त करने से, कई बार आक्रमण भी झेलने पड़ते हैं। अयोग्य उच्च पदासीनों के, समाज को खोखला करने की मुहिम में रत, सुविधा भोगियों के रास्ते का रोड़ा माना जाता है, व्यंग्यकर्मी। इसीलिए उसे रास्ते से हटाने का एक अनथक प्रयास चहुं ओर से होता हुआ दिखायी देता है, किंतु वह अपनी आंतरिक शक्ति से अपने रास्ते चलता रहता है।
यद्यपि देश में स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं, किंतु इधर या उधर से लाभ उठाने की ललक में बुद्घिजीवी भी मौन साधना करने में अपना हित देखते हैं। ऐसी स्थिति में सच को सच कहने का साहस मुझे विवेक रंजन में दिखायी देता है। उनकी जितनी भी रचनाएं मैंने पढ़ी हैं, उनमें समाज की सच्चाई मुझे मुखर होती दिखती है। उनकी रचनाएं शोषण और अत्याचार के विरुद्ध मुस्तैदी से एकजुट हैं।

मुझे पूरा विश्वास है कि अपने संपूर्ण विवेक के साथ वह आगे बढ़ते रहेंगे, तथा शोषितों का रंजन करेंगे, शोषकों का नहीं। कुटिल कार्यकलापों, भ्रष्ट गतिविधियों, अन्याय और अनाचार के विरुद्ध उनकी हास्य व्यंग्य की कलम अधिकाधिक पैनापन लिये सक्रिय रहेगी, ऐसी मेरी कामना है। एक जगह विवेक रंजन श्रीवास्तव ने लिखा है कि ‘आदमी की नियति है कि वह आदमी ही नहीं होता। कवि विदग्ध जी ने कहा है कि आदमी चांद तक तो पहुंच भी गया आदमीयत से अभी पर बहुत दूर है। तो आदमी आदमी नहीं होता या तो वह सफेद कालर वाला बगुला होता है जो प्रायः सेक्रेटेरियेट में पाया जाता है। यह प्रायः मछली किस्म के इंसानों पर दृष्टि जमाये रहता है। इन दिनों पाकिस्तान ने आदमियों को भेड़िया बनाने में निपुणता हासिल कर ली है, और ऐसे खूनी भेड़िये किस्म के जत्थे, अब कश्मीर के रास्ते, हमारे देश में मुफ्त एक्सपोर्ट कर रहा है।’
आगे श्री श्रीवास्तव लिखते हैं ‘कुछ आदमी गऊ भी होते हैं, और कुछ सांड भी, पर कौए और गिद्ध श्रेणी के इंसानों की भी कमी नहीं है। अकसर ये चालाक कौए अपनी तिजोरियों की चाबी संभाले, गद्दियों पर बैठे रहते हैं। ये सफेद पोश होते हैं।’
मात्र इसी विचार को केन्द्र में रखकर यदि श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव कलम चलाते रहेंगे तो भी मनुष्यता का भला ही होगा। अभी वह नदी में तैरने उतरे ही हैं, उस पार जाने से पहले कई छोटी बड़ी मछलियां उन्हें काटेंगी, उन्हें थपेड़े खाने पड़ेंगे, हाथ पांव मारने होंगे, हाथ दिखाने होंगे। जैसे-जैसे अपने श्रम और ईमानदारी से वे दूरियां तय करते जाएंगे उनका आत्मविश्वास और संतोष बढ़ेगा। अतः वह पिटें। मेरी कामना है कि जीवन के कष्ट वह उठायें लगातार सहन करें आत्मसात करें, यहीं कहीं से उपजता रहेगा सार्थक लेखन। फिर वह जो कुछ लिखते, चलेंगे, वह चाव से पढ़ा जाएगा और कुछ को सही आदमी भी बनाकर ही छोड़ेगा। उनका नया व्यंग्य संग्रह ‘कौआ कान ले गया’ साहित्य में अपना स्थान बनायेगा ही यह विश्वास मुझे तो है।

मोबाइल प्लान की प्लानिंग


मैं सदा से परिवर्तन का समर्थक रहा हूँ। मेरा विश्वास है कि समय से तालमेल बैठा कर चलना प्रगतिशील होने की पहचान है। अपने इसी ध्येय की प्राप्ति हेतु और कुछ बीबी, बच्चों की फरमाईश पर, नितांत अनावश्यक होते हुये भी मैंने एक मोबाइल फोन खरीद लिया। अब यह आवश्यक हो गया कि मैं किसी कंपनी की एक सिम खरीद कर, किसी प्लान विशेष को चुनकर, मोबाइल हो जाऊँ। ‘जागो ग्राहक जागो’ की अलख सुन, अपने पढ़े लिखे होने का परिचय देते हुये एक जागरूक उपभोक्ता की तरह, मैं किस कंपनी का कौन सा प्लान चुनूं इस अनुसंधान में जुट गया। समय की दौड़ में सरकारी विभाग से लिमिटेड कंपनी में परिर्वतित कंपनी सहित चार पाँच निजी कंपनियों के प्रिपेड एवं पोस्ट पेड प्लान्स के ब्रोशर्स शहर भर में घूम घूम कर एकत्रित किये, मेरे उत्साही बेटे ने इंटरनेट से भी काफी सारी जानकारी डाउनलोड कर प्रिंट रूप में सुलभ कर दी, जी पी आर एस एवं सी डी एम तकनीक की वैकल्पिक प्रणालियों में से एक का चयन करना था। फिर हमें निर्णय लेना था कि हम किस मोबाइल सेवा के कैसे उपभोक्ता बनें ? कोई कुछ आफर कर रहा था तो कोई कुछ और प्रलोभन दे रहा था। कहीं सिम खरीदते ही फ्री गिफ्ट थी, तो कहीं तारीख विशेष तक छूट का आकर्षण किसी की रोमिंग, इनकमिंग कम थी तो किसी की आउटगोइंग। मोबाइल से मोबाइल, मोबाइल से डब्लू एल एल, मोबाइल से फिक्स्ड लाइन सबकी काल दरें बिल्कुल अलग-अलग थीं। अपने ही टेलीकाम सर्किल के रेट्स अलग और एस.टी.डी. व आई.एस.डी. के भी रेट्स अलग-अलग थे। कहीं पल्स पंद्रह सेकेंड्स की थी तो कहीं एक मिनट की। अपनी कंपनी के ही दूसरे फोन पर काल करने की दर कुछ और थी, तो अपनी कंपनी से किसी अन्य कंपनी के उपभोक्ता से बातें करने के चार्जेज अलग। विदेश बातें करनी हों तो विभिन्न देशों के लिये भी रेट्स पूरी तरह से भिन्न थे। मैं पूरी तरह कंफ्यूज्ड हो गया था।

इतनी अधिक विविधताओं के बीच चयन करके आज तक मैंने कभी भी कुछ नहीं लिया था। बचपन में परीक्षा में सभी प्रश्न अनिवार्य होते थे। च्वाइस होती भी थी तो एक ही चैप्टर के दो प्रश्नों के बीच, मुझसे ऊपर वाला प्रश्न ही बन जाता था अतः कभी चुनने की आवश्यकता नहीं पड़ी, हाँ चार वैकल्पिक उत्तरों वाले सवालों में जरूर जब कुछ नहीं सूझता था, तो राम राम भजते हुये किसी एक पर सही का निशान लगा देता था। तब आज की तरह ऐंसर शीट पर काले गोले नहीं बनाने पड़ते थे। डिग्री लेकर निकला तो जहाँ सबसे पहले नौकरी लगी, वहीं आज तक चिपका हुआ हूँ, नेम प्लेट में अपने डिपार्टमेंट का नाम ऐसे चिपका रखा है जैसे सारा डिपार्टमेंट ही मेरा हो। कोई मेरे विभाग के विषय में कुछ गलत सही कहता है, तो लगता है, जैसे मुझे ही कह रहा हो। मैं सेंटीमेंटल हो जाता हूँ। आज की प्रगतिशील भाषा मे मैं थोड़ा-थोड़ा इमोशनल फूल टाइप का प्राणी हूँ। जीवन ने अब तक मुझे कुछ चुनने का ज्यादा मौका नहीं दिया। पिताजी ने खुद चुनकर जिस लड़की से मेरी शादी कर दी, वह मेरी पत्नी है और अब मेरे लिये सब कुछ चुनने का एकाधिकार उसके पास सुरक्षित है। मेरे तो कपड़े तक वही ले आती है, जिनकी उन्मुक्त कण्ठ से प्रशंसा कर पहनना मेरी अनिवार्य विवशता होती है। अतः जब सैकड़ों आप्शन्स के बीच श्रेष्ठतम मोबाइल प्लान चुनने की जवाबदारी मुझ पर बरबस आ पड़ी थो मेरा दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक ही था। अपना प्लान चुनने के लिये मैंने सरकारी खरीदी की तरह कम्पेरेटिव स्टेटमेंट बनाने का प्रयास किया तो मैंने पाया कि हर प्लान दूसरे से पूरी तरह भिन्न है और चयन की यह प्रणाली कारगर नहीं है। हर विज्ञापन दूसरे से ज्यादा लुभावना है। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था।

ऐसे सैकड़ों विकल्पों वाले आकर्षक प्लान के निर्माताओं, नव युवा एम.बी.ए. पास, मार्केटिंग मैनेजर्स की योग्यता का मैं कायल हो गया था। मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा था कि आखिर क्यों उतना ही शिक्षित होने पर भी, आज के फ्रेश युवाओं से उनके पिताओं को चौथाई वेतन ही मिल रहा है। मैं हर हाथ में मोबाइल लिये घूम रही आज की पीढ़ी का भी सहज प्रशंसक बन गया हूँ जो सुगमता से इन ढेर से आफरों में अपनी जरूरत का विकल्प चुन लेती है।


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